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Postherpetic Neuralgia (Shingles के बाद का दर्द) — महीनों बाद भी क्यों रहता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आपकी जीवनशैली में छोटे छोटे बदलाव और शरीर पर हुआ एक पुराना संक्रमण कभी कभी लंबे समय तक दर्द का कारण बन सकता है। कई बार शिंगल्स के दाने या त्वचा की समस्या ठीक होने के बाद भी उसी जगह पर जलन, चुभन या तेज दर्द महसूस होता रहता है।

यह दर्द अचानक खत्म नहीं होता, बल्कि नसों पर पड़े असर के कारण धीरे-धीरे लंबे समय तक बना रह सकता है। यही वजह है कि त्वचा ठीक दिखने के बावजूद व्यक्ति अंदर से लगातार असहजता और दर्द महसूस करता रहता है।

शिंगल्स (हरपीज जोस्टर) क्या होता है?

शिंगल्स असल में एक वायरल इन्फेक्शन है। क्या आपको याद है बचपन में होने वाला चिकनपॉक्स (माता निकलना)? यह उसी 'वैरिसेला जोस्टर' वायरस की वजह से होता है। चिकनपॉक्स ठीक होने के बाद भी यह वायरस शरीर में चुपचाप सोता रहता है और सालों बाद अचानक दोबारा जागकर शिंगल्स के रूप में सामने आता है। जब यह दोबारा एक्टिव होता है, तो नसों के जरिए स्किन तक पहुँचता है और वहां दाने, तेज जलन और भयंकर दर्द पैदा कर देता है।

  • स्किन पर पानी भरे लाल दाने या फफोले (blisters) निकल आते हैं।
  • शुरुआत में आग जैसी जलन और बर्दाश्त न होने वाला दर्द होता है।
  • आमतौर पर यह शरीर के किसी एक ही हिस्से (दाएं या बाएं तरफ) को अपना शिकार बनाता है।
  • दाने और इन्फेक्शन तो कुछ हफ्तों में सूख जाते हैं, लेकिन नसों पर इसका गहरा असर लंबे समय तक टिका रहता है।

पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया (Postherpetic Neuralgia) क्या है? 

शिंगल्स की बीमारी ठीक होने के महीनों या सालों बाद भी जो जिद्दी दर्द पीछा नहीं छोड़ता, मेडिकल भाषा में उसे ही 'पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया' कहते हैं। क्योंकि यह दर्द सीधे नसों से जुड़ा है, इसलिए बाहर से स्किन एकदम नॉर्मल दिखने के बावजूद, अंदर से भयंकर चुभन और जलन होती रहती है। बीमारी के दौरान वायरस नसों के 'सिग्नल सिस्टम' को बिगाड़ देता है। नतीजा यह होता है कि स्किन पर कोई घाव न होने के बावजूद, नसें दिमाग को लगातार दर्द के झूठे सिग्नल भेजने लगती हैं।

  • यह दर्द महीनों या कई बार सालों तक इंसान को परेशान कर सकता है।
  • उस हिस्से की स्किन इतनी नाजुक हो जाती है कि कपड़ों की रगड़ या पंखे की हल्की हवा से भी जान निकलती है।
  • हर वक्त ऐसा लगता है जैसे स्किन के अंदर आग लगी हो या कोई लगातार सुइयां चुभा रहा हो।
  • उस खास हिस्से की सेंसिटिविटी (संवेदनशीलता) हद से ज्यादा बढ़ जाती है।

शिंगल्स के बाद दर्द क्यों रह जाता है? 

बाहर से शिंगल्स के दाने भले ही सूख जाएं, लेकिन अंदर से नसें पूरी तरह पुरानी और नॉर्मल स्थिति में नहीं लौट पातीं। घाव भर जाने के बाद भी ये डैमेज हो चुकी नसें बौखला जाती हैं और दिमाग को बिना बात के दर्द के सिग्नल भेजती रहती हैं। नसें इतनी ज्यादा सेंसिटिव हो जाती हैं कि कोई आपको प्यार से छू भी ले, तो वो भी किसी झटके या तेज दर्द जैसा लगता है। यही वजह है कि दाने गायब होने के बाद भी यह दर्द लंबे समय तक डेरा डाले रहता है।

नसों पर इसका असर कैसे पड़ता है? 

हमारी नसें शरीर के 'वायरिंग सिस्टम' की तरह हैं, जिनका काम हर छोटी-बड़ी फीलिंग और दर्द का मैसेज दिमाग तक पहुंचाना है। जब शिंगल्स का वायरस इस वायरिंग पर अटैक करता है, तो पूरा सिस्टम 'शॉर्ट सर्किट' जैसा हो जाता है। आसान शब्दों में समझें तो नसें 'हाइपर-रिएक्टिव' हो जाती हैं। जो नसें पहले सिर्फ असली चोट लगने पर दर्द का मैसेज भेजती थीं, वो अब कपड़े के छू जाने या हल्की सी हवा लगने पर भी दिमाग को चीख-चीख कर दर्द का सिग्नल देने लगती हैं।

पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया के मुख्य लक्षण 

इस बीमारी में दर्द सिर्फ ऊपर की चमड़ी पर नहीं होता, बल्कि नसों के अंदर एक अजीब सी और लगातार रहने वाली बेचैनी बनी रहती है।

  • लगातार दर्द रहना: बीमारी वाली जगह पर लगातार एक टीस उठती रहती है या बार-बार दर्द के झटके महसूस होते हैं।
  • आग जैसी जलन: ऐसा लगता है जैसे स्किन के ठीक नीचे कोई गर्माहट या अंगारे रख दिए हों, हमेशा जलन बनी रहती है।
  • तेज झनझनाहट: नसों में करंट लगने जैसी या तेज झनझनाहट महसूस होती है।
  • सुई जैसी चुभन: बैठे-बैठे अचानक ऐसा महसूस होता है जैसे किसी ने एक साथ कई सुइयां चुभा दी हों।
  • छूने से दर्द (सेंसिटिविटी): स्किन इतनी नाजुक हो जाती है कि उस पर शर्ट का कपड़ा रगड़ना या हल्का सा छू जाना भी दर्दनाक हो जाता है।

पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया के कारण 

यह दर्द कोई हवा-हवाई बीमारी नहीं है, बल्कि शिंगल्स के दौरान नसों में हुई वास्तविक टूट-फूट का नतीजा है। इसके पीछे ये मुख्य कारण होते हैं:

  • नसों का डैमेज होना: वायरस नसों के अंदर घुसकर उनके काम करने के तरीके को पूरी तरह बिगाड़ देता है।
  • हद से ज्यादा सेंसिटिविटी: नसें इतनी 'ओवर-सेंसिटिव' हो जाती हैं कि एक मामूली से टच को भी बड़े दर्द के रूप में दिमाग तक भेजती हैं।
  • दिमाग को गलत सिग्नल: स्किन पूरी तरह साफ होने के बावजूद, ये डैमेज नसें दिमाग को लगातार 'यहाँ दर्द है' का झूठा मैसेज भेजती रहती हैं।
  • बढ़ती उम्र: जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, नसों की खुद को हील (रिपेयर) करने की स्पीड धीमी हो जाती है, जिससे दर्द सालों तक टिका रहता है।
  • कमजोर इम्युनिटी (Immune System): अगर शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत कमजोर है, तो नसों की रिपेयरिंग बहुत धीमी पड़ जाती है।

आयुर्वेद में पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया की समझ 

आयुर्वेद इस बीमारी को बिल्कुल अलग नजरिए से देखता है। आयुर्वेद के मुताबिक, यह समस्या मुख्य रूप से शरीर में 'वात दोष' के भड़कने और नसों के अंदरूनी डैमेज की वजह से होती है। हमारे शरीर में वात ही नसों, मूवमेंट और हर तरह की फीलिंग को कंट्रोल करता है। जब यह वात बेकाबू हो जाता है, तो शरीर में दर्द, जलन और चुभन अपने चरम पर पहुँच जाती है। शिंगल्स वायरस की वजह से नसें पहले ही कमजोर हो चुकी होती हैं और ऊपर से वात का बिगड़ना उन्हें इतना ज्यादा सेंसिटिव कर देता है कि दर्द जाने का नाम ही नहीं लेता।

वात दोष का असंतुलन और नसों का दर्द 

आयुर्वेद मानता है कि जब शरीर में वात का प्रकोप बढ़ता है, तो नसों का पूरा सिस्टम (स्नायु तंत्र) हिल जाता है। नसें अपना कंट्रोल खो बैठती हैं और दर्द का अहसास कई गुना बढ़ जाता है।

  • वात के बढ़ने से शरीर और नसों के अंदर बहुत ज्यादा सूखापन (रुक्षता) और अस्थिरता आ जाती है।
  • नसें इतनी चिड़चिड़ी हो जाती हैं कि हल्के से टच को भी बर्दाश्त नहीं कर पातीं और दर्द का सिग्नल दे देती हैं।
  • इस वजह से दर्द का कोई फिक्स पैटर्न नहीं होता कभी यह बिल्कुल हल्का लगता है, तो कभी जानलेवा बन जाता है।
  • नसों की खुद को रिपेयर करने की स्पीड बहुत धीमी पड़ जाती है, जिससे यह बीमारी लंबी खिंचती है।

इसलिए, आयुर्वेद में सिर्फ ऊपर से दर्द की गोली खाने पर फोकस नहीं किया जाता। इलाज का असली मकसद भड़के हुए वात को शांत करना और उन डैमेज नसों को अंदर से ताकत देकर धीरे-धीरे रिपेयर करना होता है।

आयुर्वेद में पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया का उपचार दृष्टिकोण

आयुर्वेद में पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया को हम महज़ कोई स्किन या ऊपरी दर्द की तरह नहीं देखते। हमारा टारगेट सिर्फ पेनकिलर देकर आपको कुछ घंटों की राहत देना नहीं होता। हम शरीर के पूरे सिस्टम को अंदर से सुधारने पर काम करते हैं:

  • वात को शांत करना: सबसे पहला और जरूरी काम है बेकाबू हो चुके वात को काबू में लाना। जैसे ही वात शांत होता है, नसों की वह अजीब सी बेचैनी और फड़फड़ाहट अपने आप कम होने लगती है।
  • नसों में दोबारा जान फूंकना: बीमारी से टूट चुकी नसों को फिर से अंदरूनी ताकत दी जाती है। इससे जो स्किन हद से ज्यादा सेंसिटिव हो गई थी (यानी कपड़े छूने से भी दर्द होना), वो धीरे-धीरे नॉर्मल होने लगती है।
  • अंदरूनी रूखापन दूर करना: इस बीमारी में नसें सूखने लगती हैं। इस खुश्की को खत्म करने के लिए शरीर को अंदर से गहरा पोषण (जिसे हम 'स्नेहन' कहते हैं) दिया जाता है।
  • लाइफस्टाइल को सुधारना: जब तक आपकी नींद, डाइट और दिमागी स्ट्रेस का लेवल सही नहीं होगा, दवाइयां पूरा असर नहीं करेंगी। हम इसे इस तरह सेट करते हैं कि शरीर खुद को तेजी से हील (रिपेयर) कर सके।
  • हर मरीज के लिए अलग इलाज: हर इंसान की तासीर और दर्द बर्दाश्त करने की क्षमता अलग होती है। इसीलिए, एक ही नुस्खा सब पर लागू करने के बजाय इलाज को हर मरीज के हिसाब से तय किया जाता है।

इस पूरे प्रोसेस का सबसे बड़ा फायदा यही है कि आपका शरीर अपने असली और नेचुरल बैलेंस में लौट आता है, और आपको बार-बार दर्द की दवाइयों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया में काम आने वाली असरदार आयुर्वेदिक औषधियां

ये वात के भड़कने और नसों के कमजोर पड़ने का है। ऐसे में कुछ खास आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां किसी चमत्कार से कम नहीं हैं। ये सिर्फ दर्द नहीं खींचतीं, बल्कि नसों को रिलैक्स करके पूरा बैलेंस ठीक करती हैं:

  • अश्वगंधा: यह नसों का सबसे अच्छा दोस्त है। यह उन्हें गजब की ताकत देती है और अंदर मची हुई सारी बेचैनी को एकदम शांत कर देती है।
  • बाला: नाम से ही जाहिर है 'बल' (ताकत)। यह बीमारी से कमजोर पड़ चुकी नसों और मांसपेशियों में दोबारा जान डालने का काम करती है।
  • शतावरी: अगर आपको शरीर में हर वक्त आग या जलन महसूस हो रही है, तो शतावरी उसे जादुई तरीके से ठंडक पहुंचाकर बैलेंस कर देती है।
  • गुग्गुलु: अंदरूनी सूजन को चूसने और नसों के उस भयंकर, चुभने वाले दर्द में आराम दिलाने के लिए इससे बेहतरीन शायद ही कुछ हो।
  • त्रिफला: पेट साफ तो सब साफ! यह आपके डाइजेशन को दुरुस्त रखता है, जिससे शरीर में जमे सारे टॉक्सिन्स (गंदगी) बिना किसी दिक्कत के बाहर आ जाते हैं।
  • तिल तेल: जब नसों पर इस तेल की मालिश होती है, तो उन्हें अंदर तक नमी मिलती है। इससे नसों का रूखापन और दर्द अपने आप घटने लगता है।

पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया से राहत दिलाने वाली खास आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेदिक पंचकर्म या थेरेपी का रोल इसमें बहुत बड़ा है। इनका मकसद सिर्फ ऊपरी दर्द को गायब करना नहीं है। ये थेरेपी तो सीधा डैमेज नसों पर असर करती हैं और उन्हें अंदर से फौलादी बना देती हैं:

  • अभ्यंग (हर्बल तेल की मालिश): खास जड़ी-बूटियों से पके हल्के गर्म तेल से जब मालिश की जाती है, तो वह नसों को गहरा पोषण देता है और दर्द को पूरी तरह चूस लेता है।
  • स्वेदन (भाप चिकित्सा): औषधियों वाले पानी से दी गई भाप शरीर की सारी जकड़न को तोड़ देती है। इसे लेने के बाद जो हल्कापन और आराम मिलता है, वो कमाल का होता है।
  • बस्ती थेरेपी: अगर वात दोष बहुत ज्यादा बिगड़ गया है, तो उसे जड़ से उखाड़ने के लिए आयुर्वेद में इससे अचूक और दमदार इलाज कोई दूसरा नहीं माना गया है।
  • शिरोधारा: माथे पर जब एक लय में तेल की धार गिरती है, तो दिमागी स्ट्रेस छूमंतर हो जाता है। इसके साथ ही, बौखलाई हुई नसें एकदम रिलैक्स हो जाती हैं।
  • लेप चिकित्सा: जिस जगह सबसे ज्यादा दर्द और जलन है, वहां जड़ी-बूटियों से तैयार ठंडा लेप लगाते ही उस असहनीय जलन में तुरंत सुकून मिल जाता है।

पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया में कैसा हो आपका खानपान?

इस बीमारी में आपकी डाइट ही आपकी आधी दवा है। आप सही खाना खाएंगे, तो नसों की रिकवरी दोगुनी रफ्तार से होगी और शरीर जल्दी पटरी पर आएगा:

  • हल्का और गर्म खाना: हमेशा कोशिश करें कि खाना ताजा और हल्का गुनगुना ही खाएं। ये हाजमे पर भारी नहीं पड़ता और वात को भड़कने का मौका नहीं देता।
  • देसी घी का इस्तेमाल: अपनी डाइट में शुद्ध देसी घी जरूर शामिल करें। यही घी सूख चुकी नसों के अंदर जाकर जरूरी चिकनाहट और जान वापस लाता है।
  • ताजा बना खाना: फ्रिज में रखा या बासी खाना बिल्कुल न खाएं। तुरंत का बना ताजा खाना पचने में आसान होता है और शरीर को असली एनर्जी देता है।
  • खूब पानी और गुनगुने पेय: शरीर को अंदर से तर (हाइड्रेट) रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए आप हल्का गुनगुना पानी, हर्बल चाय या सूप बीच-बीच में लेते रहें।
  • ठंडी और तीखी चीजों से दूरी: हद से ज्यादा मिर्च-मसाले वाला या फ्रिज का एकदम ठंडा खाना आपकी नसों को और ज्यादा तकलीफ दे सकता है। इसलिए, इनसे जितनी दूरी रहे उतना बेहतर है।

डॉक्टर से कब सलाह लें?

इस दर्द को सिर्फ सहने और इग्नोर करने की गलती न करें। अगर आपके साथ ये दिक्कतें हो रही हैं, तो तुरंत किसी अच्छे आयुर्वेदिक एक्सपर्ट या डॉक्टर को दिखाएं:

  • जब दर्द और आग जैसी जलन लगातार बनी रहे और रुकने का नाम न ले।
  • जब दर्द के मारे आपकी रातों की नींद उड़ जाए।
  • जब हल्के से छूने या कपड़े के रगड़ने से भी जानलेवा दर्द महसूस हो।
  • जब दर्द घटने के बजाय हर दिन और भयंकर होता जाए।
  • जब इस तकलीफ के चलते आपका रोजमर्रा का काम करना मुश्किल हो जाए।
  • जब तमाम कोशिशों के बाद भी महीनों तक कोई आराम न मिल रहा हो।

निष्कर्ष

पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया सिर्फ स्किन की कोई ऊपरी बीमारी नहीं है; इसका सीधा कनेक्शन आपकी नसों की गहराई से है। जहां मॉडर्न मेडिसिन (एलोपैथी) इसे सिर्फ नसों का डैमेज और सिग्नल की गड़बड़ी मानती है, वहीं आयुर्वेद इसकी गहराई में जाकर इसे बिगड़े हुए वात दोष और नसों की कमजोरी से जोड़कर देखता है।

लंबे समय तक नसों का इस हालत में रहना आपके पूरे शरीर का सिस्टम बिगाड़ सकता है। इसीलिए, समझदारी इसी में है कि सिर्फ दर्द मिटाने वाली कोई दवा खाकर काम चलाने के बजाय, अपने पूरे शरीर, डाइट और लाइफस्टाइल को अंदर से सुधारने पर फोकस किया जाए।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, शिंगल्स होने के बाद हर व्यक्ति में यह दर्द जरूरी नहीं होता। कुछ लोगों में नसें जल्दी ठीक हो जाती हैं और दर्द नहीं रहता। लेकिन जिनकी नसें अधिक प्रभावित होती हैं, उनमें यह दर्द लंबे समय तक रह सकता है। यह शरीर की रिकवरी क्षमता पर निर्भर करता है।

अधिकतर मामलों में यह दर्द शरीर के उसी हिस्से में रहता है जहां शिंगल्स हुआ था। यह अक्सर एक तरफ सीमित क्षेत्र में महसूस होता है। कभी-कभी यह फैलाव जैसा महसूस हो सकता है, लेकिन सामान्यतः एक ही स्थान पर केंद्रित रहता है।

नहीं, यह स्थिति एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती। यह केवल नसों की अंदरूनी समस्या होती है। इसलिए इसमें संक्रमण का कोई खतरा नहीं होता। यह पहले हुए वायरल संक्रमण के बाद की प्रतिक्रिया होती है।

हां, मानसिक तनाव से नसों की संवेदनशीलता बढ़ सकती है। इससे दर्द और जलन अधिक महसूस हो सकती है। आराम और शांत वातावरण में दर्द कुछ कम महसूस हो सकता है। इसलिए मानसिक स्थिति का प्रभाव इस दर्द पर देखा जाता है।

 कुछ लोगों में ठंड या मौसम बदलने पर दर्द बढ़ सकता है। तापमान में बदलाव नसों की संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए मौसम के अनुसार दर्द में उतार चढ़ाव देखा जा सकता है।

 हां, अधिक उम्र में नसों की रिकवरी धीमी हो जाती है। इसलिए बुजुर्ग लोगों में यह दर्द अधिक समय तक रह सकता है। युवा लोगों में यह अक्सर जल्दी कम हो सकता है। शरीर की मरम्मत क्षमता इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

अधिकतर यह एक ही क्षेत्र तक सीमित रहता है। लेकिन दर्द के कारण व्यक्ति को पूरे शरीर में थकान या असहजता महसूस हो सकती है। सीधा फैलाव आमतौर पर नहीं होता। यह नसों के प्रभावित क्षेत्र पर निर्भर करता है।

 हां, नींद की कमी से शरीर की रिकवरी प्रक्रिया धीमी हो सकती है। इससे दर्द अधिक महसूस हो सकता है। अच्छी नींद शरीर को आराम देने में मदद करती है। इसलिए नींद इस स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

नहीं, दर्द की तीव्रता समय के साथ बदल सकती है। कभी हल्का तो कभी तेज महसूस हो सकता है। यह शरीर की स्थिति और दिनचर्या पर निर्भर करता है। कुछ समय में इसमें उतार चढ़ाव सामान्य होता है।

 कई लोगों में समय के साथ दर्द काफी कम हो जाता है। नसों की रिकवरी होने पर राहत मिल सकती है। लेकिन यह प्रक्रिया धीरे धीरे होती है। हर व्यक्ति में सुधार की गति अलग होती है।

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