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2 साल हो गए — Conceive नहीं हो रहा, Reports Normal हैं, तो Problem कहाँ?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 03 Jun, 2026
  • category-iconUpdated on 03 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
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हर महीने एक नई उम्मीद, कैलेंडर पर तारीखों का हिसाब, ओव्यूलेशन की गणना और फिर से वही गहरा दुख और निराशा। जब एक दंपति एक नए जीवन को दुनिया में लाने की कोशिश करता है और महीनों या सालों तक सफलता नहीं मिलती, तो मानसिक तनाव बढ़ना पूरी तरह से स्वाभाविक है। लेकिन सबसे गहरी निराशा और उलझन तब पैदा होती है जब तमाम अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद, खून की हर संभव जाँच करवाने के बाद और अल्ट्रासाउंड करवाने के बाद डॉक्टर कहते हैं कि "आपकी सारी जाँच बिल्कुल सामान्य हैं।"

जब ट्यूब खुली हैं, अंडे सही बन रहे हैं, और शुक्राणुओं की संख्या भी बेहतरीन है, तो आप खुद से सवाल पूछने पर मजबूर हो जाते हैं कि आख़िर रुकावट कहाँ है? विज्ञान इसे 'अनएक्सप्लेंड इनफर्टिलिटी' का नाम दे देता है। यह एक ऐसी रहस्यमयी स्थिति है जहाँ माइक्रोस्कोप के नीचे सब कुछ उत्तम दिखता है, लेकिन असल जीवन में गोद सूनी रहती है।

इनफर्टिलिटी की समस्या असल में क्या है?

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जब शरीर की जाँच करता है, तो वह मुख्य रूप से संरचना और हॉर्मोन के मोटे-मोटे स्तरों को देखता है। अगर गर्भाशय का आकार सही है, फैलोपियन ट्यूब में कोई रुकावट नहीं है और थायरॉइड या प्रोलैक्टिन जैसे हॉर्मोन अपनी सीमा के भीतर हैं, तो उन्हें सब कुछ ठीक लगता है। लेकिन शरीर कोई साधारण मशीन नहीं है; यह एक अत्यंत सूक्ष्म और जटिल ऊर्जा तंत्र है। 'अनएक्सप्लेंड इनफर्टिलिटी' असल में वह स्थिति है जहाँ समस्या अंगों की बनावट में नहीं, बल्कि उन अंगों के काम करने के सूक्ष्म तरीके और वातावरण में होती है।

आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान के मिश्रित दृष्टिकोण से समझें तो, भले ही अंडा और शुक्राणु स्वस्थ हों, लेकिन जब वे मिलते हैं, तो गर्भाशय का सूक्ष्म वातावरण (माइक्रो-एन्वायरनमेंट) शायद उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता। आधुनिक विज्ञान इसे 'एंडोमेट्रियल रिसेप्टिविटी' की कमी या सूक्ष्म सूजन (माइक्रो-इन्फ्लेमेशन) कह सकता है। आयुर्वेद इसे शरीर में जमा हुए 'आम' (टॉक्सिन्स) और 'वात' दोष के असंतुलन के रूप में देखता है। जब शरीर का चयापचय (मेटाबॉलिज़्म) बिगड़ता है, तो खाए गए भोजन का सही रस नहीं बनता, जिससे प्रजनन प्रणाली को वह उच्च कोटि का पोषण नहीं मिल पाता जो एक नए जीवन के निर्माण के लिए अति आवश्यक है। मशीनें इस सूक्ष्म कुपोषण और ऊर्जा की कमी को पकड़ने में असमर्थ रहती हैं।

यह समस्या किन रूपों में प्रकट होती है?

भले ही कागज़ पर आपकी मेडिकल रिपोर्ट्स बिल्कुल साफ़ और सामान्य हों, लेकिन यह अदृश्य रुकावट शरीर और मन के भीतर कई अलग-अलग और सूक्ष्म रूपों में प्रकट होने लगती है:

  • सूक्ष्म हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव: खून की जाँच अक्सर चक्र के दूसरे या तीसरे दिन होती है जो सामान्य आ सकती है, लेकिन पूरे महीने के दौरान हॉर्मोन जिस तरह से एक दूसरे के साथ तालमेल बिठाते हैं, उसमें हल्की सी भी गड़बड़ी गर्भधारण को रोक सकती है।
  • अंडों की गुणवत्ता में कमी: अल्ट्रासाउंड में यह तो दिख जाता है कि अंडा बन रहा है और फूट (रप्चर) भी रहा है, लेकिन उस अंडे के भीतर की ऊर्जा और आनुवंशिक गुणवत्ता (डीएनए क्वालिटी) कैसी है, यह कोई रिपोर्ट नहीं बता सकती।
  • गर्भाशय की परत का रूखापन: गर्भाशय की परत (एंडोमेट्रियम) का केवल मोटा होना ही काफी नहीं है, उसका स्पंजी, रसयुक्त और भ्रूण को पोषण देने लायक होना ज़रूरी है। वात दोष के कारण यह परत रूखी हो सकती है, जिससे भ्रूण टिक नहीं पाता।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली का अति-सक्रिय होना: कई बार महिला के शरीर की इम्युनिटी ही शुक्राणु या बनने वाले भ्रूण को एक बाहरी खतरा मानकर उस पर हमला कर देती है और उसे नष्ट कर देती है।

यह समस्या कौन से संकेत देती है?

जब शरीर भीतर ही भीतर इस संघर्ष से गुज़र रहा होता है, तो वह कई खामोश अलार्म बजाता है। अगर आप ध्यान दें, तो ये सामान्य सी दिखने वाली रिपोर्ट्स के बावजूद कुछ संकेत स्पष्ट नज़र आते हैं:

  • मासिक धर्म के दौरान भारी दर्द: यदि पीरियड्स के दौरान आपको असहनीय दर्द, ऐंठन या पीठ के निचले हिस्से में भारीपन महसूस होता है, तो यह 'अपान वात' के अवरोध का बहुत बड़ा संकेत है, जो प्रजनन अंगों में रुकावट पैदा कर रहा है।
  • प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (पीएमएस) का उग्र होना: पीरियड्स आने से एक हफ्ता पहले अत्यधिक चिड़चिड़ापन, स्तनों में भारीपन, उदासी या गुस्सा आना हॉर्मोनल असंतुलन और शरीर में पित्त के भड़कने का इशारा करता है।
  • संबंध बनाने की इच्छा में कमी: लगातार प्रयास करने के दबाव और शरीर के भीतर ऊर्जा की कमी (ओजस क्षय) के कारण शारीरिक संबंधों में रुचि पूरी तरह से खत्म होने लगती है।
  • हर समय थकान और मानसिक तनाव: बिना कोई भारी काम किए शरीर का हर समय थका-थका रहना और मन में एक अजीब सी घबराहट बने रहना यह बताता है कि आपकी कोशिकाएँ भीतर से कुपोषित हैं।

आगे चलकर यह क्या परेशानियाँ दे सकती है?

इस अदृश्य रुकावट को नज़रअंदाज़ करना या जल्दबाज़ी में बिना शरीर को तैयार किए भारी कृत्रिम दवाइयों का सहारा लेना भविष्य में कई गंभीर जटिलताओं को जन्म दे सकता है:

  • गंभीर मानसिक अवसाद: हर महीने की विफलता और समाज के ताने महिला और पुरुष दोनों को गहरे डिप्रेशन और एंग्जायटी में धकेल सकते हैं, जिससे उनका आपसी रिश्ता भी कमज़ोर होने लगता है।
  • कृत्रिम हॉर्मोन के दुष्प्रभाव: बिना मूल कारण जाने लगातार आईवीएफ (IVF) या आईयूआई (IUI) के लिए भारी स्टेरॉयड और हॉर्मोन के इंजेक्शन लेने से शरीर का वजन तेज़ी से बढ़ता है, अंडाशय में सूजन (ओवेरियन हाइपरस्टिम्यूलेशन) आ सकती है और लिवर पर भारी दबाव पड़ता है।
  • आर्थिक और भावनात्मक दिवालियापन: बार-बार महँगे कृत्रिम उपचारों के विफल होने से न केवल बैंक खाते खाली होते हैं, बल्कि माता-पिता बनने का सपना देखने वालों का आत्मविश्वास पूरी तरह टूट जाता है।
  • शरीर का समय से पहले बूढ़ा होना: अत्यधिक मानसिक तनाव और कृत्रिम दवाइयों का अंधाधुंध इस्तेमाल शरीर के 'ओजस' (जीवन शक्ति) को सुखा देता है, जिससे चेहरे की चमक चली जाती है और उम्र से पहले बुढ़ापे के लक्षण दिखने लगते हैं।

आयुर्वेद इस समस्या को कैसे देखता है और कौन से उपाय मदद कर सकते हैं?

आधुनिक विज्ञान जहाँ शरीर को अलग-अलग अंगों का एक ढाँचा मानता है, वहीं आयुर्वेद शरीर को प्रकृति के एक सुंदर खेत (खेत या बगीचे) के रूप में देखता है। आयुर्वेद में गर्भधारण के लिए चार सबसे मुख्य स्तंभ बताए गए हैं: ऋतु (सही समय), क्षेत्र (गर्भाशय), अंबू (पोषण या एमनियोटिक द्रव), और बीज (स्वस्थ अंडा और शुक्राणु)।

जब आपकी रिपोर्ट्स सामान्य हैं, तो इसका मतलब है कि बीज मौजूद है और क्षेत्र भी बना हुआ है। लेकिन यदि बीज को सही अंबू (पोषण) न मिले या क्षेत्र में वात के कारण रूखापन हो, तो बीज कभी अंकुरित नहीं हो सकता। आयुर्वेद मानता है कि खराब खान-पान, अनियमित दिनचर्या और अत्यधिक तनाव के कारण हमारे शरीर में 'आम' (जहरीले तत्व) पैदा होते हैं। यह 'आम' प्रजनन प्रणाली तक जाने वाली सूक्ष्म नाड़ियों (आर्तववह स्रोतस) को ब्लॉक कर देता है।

इस स्थिति में आयुर्वेद का सबसे पहला उपाय है 'शोधन' (शरीर की गहरी सफाई)। शरीर को भीतर से साफ किए बिना कोई भी ताक़तवर दवा काम नहीं कर सकती। इसके बाद 'शमन' चिकित्सा के द्वारा भड़के हुए वात, पित्त और कफ को शांत किया जाता है। अंत में 'रसायन' और 'वाजीकरण' चिकित्सा के माध्यम से गर्भाशय और प्रजनन धातुओं को ऐसा फौलादी और रसयुक्त पोषण दिया जाता है कि शरीर स्वतः ही एक नए जीवन को धारण करने के लिए तैयार हो जाता है।

फर्टिलिटी और अंडो की गुणवत्ता बढ़ने के लिए आयुर्वेदिक आहार योजना

समय क्या खाएं क्या फायदा होगा
सुबह उठते ही हल्का गुनगुना पानी, जीरा या धनिया पानी शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन अग्नि को सक्रिय करता है और हार्मोन बैलेंस में मदद करता है
सुबह खाली पेट 4-5 भीगे बादाम, 1-2 अखरोट, 1 चम्मच काला किशमिश प्रजनन क्षमता (Fertility) बढ़ाने वाले हेल्दी फैट्स और मिनरल्स मिलते हैं
नाश्ता (7–9 AM) मूंग दाल चीला, दलिया, ओट्स, पोहा या ताज़े फल (सेब, पपीता) शरीर को हल्की लेकिन स्थिर ऊर्जा मिलती है, PCOS/हार्मोनल असंतुलन में मदद मिलती है
मिड-मॉर्निंग नारियल पानी या ताज़ा मीठा छाछ शरीर को हाइड्रेट रखता है और पित्त व वात को शांत करता है
दोपहर का भोजन ताज़ी रोटी, मूंग दाल, घी, हरी सब्जियाँ (लौकी, तोरई, परवल), सलाद गर्भाशय और प्रजनन तंत्र को पोषण मिलता है, पाचन बेहतर होता है
भोजन के बाद 100 कदम हल्की वॉक (शतपावली) ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और हार्मोन बैलेंस में मदद मिलती है
शाम का हल्का स्नैक भुना चना, मखाना, हर्बल चाय या फल एनर्जी स्थिर रहती है और अनहेल्दी क्रेविंग्स कम होती हैं
रात का भोजन (7–8 PM) मूंग खिचड़ी, हल्की सब्जियाँ, घी के साथ गर्म भोजन पाचन पर दबाव नहीं पड़ता और शरीर रात में बेहतर रिपेयर करता है
सोने से पहले हल्दी और घी वाला हल्का गर्म दूध नर्वस सिस्टम शांत होता है, नींद बेहतर आती है और प्रजनन स्वास्थ्य को पोषण मिलता है

(नोट: यह डाइट चार्ट सामान्य रूप से बांझपन की समस्या से जूझ रहे मरीजों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। अधिक व्यक्तिगत आहार योजना और उचित परामर्श के लिए कृपया जीवा चिकित्सकों से संपर्क करें।)

जीवनशैली में शामिल करने योग्य उपयोगी आयुर्वेदिक उपाय

जीवनशैली सहयोग लाभ
रोज़ाना योगासन (भद्रासन, तितली आसन, सेतुबंधासन) पेल्विक ब्लड फ्लो और हार्मोन बैलेंस में मदद
7–8 घंटे की गहरी नींद फर्टिलिटी हार्मोन्स को संतुलित रखने में मदद
तनाव कम करें (Meditation/Pranayama) Cortisol कम होता है और गर्भधारण की संभावना बेहतर हो सकती है
रोज़ाना हल्की धूप लें Vitamin D और हार्मोनल हेल्थ बेहतर होती है

कौन सी जड़ी-बूटियाँ इस स्थिति को सुधारने में मदद करती हैं?

प्रकृति ने हमें ऐसी कई चमत्कारी और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के शरीर के सूक्ष्म वातावरण को बदल सकती हैं:

  • शतावरी: इसे महिलाओं की सबसे अच्छी मित्र कहा जाता है। यह गर्भाशय को पोषण देती है, पित्त की गर्मी को शांत करती है और गर्भाशय की परत (एंडोमेट्रियम) को भ्रूण के लिए एक मुलायम बिस्तर की तरह तैयार करती है।
  • अश्वगंधा: गर्भधारण न होने के पीछे मानसिक तनाव एक बहुत बड़ा कारण है। अश्वगंधा शरीर के स्ट्रेस हॉर्मोन (कॉर्टिसोल) को घटाता है, नर्वस सिस्टम को शांत करता है और पुरुषों में भी शुक्राणुओं की ऊर्जा बढ़ाता है।
  • पुष्पधन्वा रस और फल घृत: 'फल घृत' एक प्रकार का औषधीय घी है जो विशेष रूप से प्रजनन अंगों की खुश्की मिटाने और 'अपान वात' को शांत करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह अंडों की गुणवत्ता में भारी सुधार करता है।
  • अशोक और लोध्र: ये जड़ी-बूटियाँ गर्भाशय की मांसपेशियों को टोन करती हैं और पूरे ओवेरियन सिस्टम में रक्त के संचार को बढ़ाती हैं, जिससे रुका हुआ पोषण अंगों तक पहुँचने लगता है।

इस समस्या के लिए सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक थेरेपीज़ कौन सी हैं?

जब समस्या पुरानी हो और केवल गोलियों से बात न बन रही हो, तो आयुर्वेद की 'पंचकर्म' थेरेपीज़ शरीर के पूरे सिस्टम को रीबूट कर देती हैं:

  • उत्तर बस्ती: यह अनएक्सप्लेंड इनफर्टिलिटी के लिए एक संजीवनी के समान है। इसमें औषधीय तेलों या काढ़े को एक विशेष नली के माध्यम से सीधे गर्भाशय के भीतर पहुँचाया जाता है। यह गर्भाशय की अंदरूनी सूजन को खत्म करती है और ट्यूब्स के सूक्ष्म जालों को खोलती है।
  • विरेचन कर्म: शरीर के पुराने और दूषित पित्त को मल के रास्ते बाहर निकालने की यह प्रक्रिया लिवर को डिटॉक्स करती है, जिससे पूरे शरीर का हॉर्मोनल संतुलन अपने आप सेट हो जाता है।
  • शिरोधारा: सिर पर औषधीय तेल की लगातार धार गिराने की यह थेरेपी दिमाग के उस हिस्से (हाइपोथैलेमस) को शांत करती है जो सभी हॉर्मोन्स को नियंत्रित करता है। यह गहरे अवसाद और स्ट्रेस को जड़ से मिटा देती है।
  • अभ्यंग मालिश: विशेष वात-शामक तेलों से पेल्विक हिस्से (कमर और पेट के निचले भाग) की मालिश करने से वहाँ रक्त का संचार (ब्लड फ्लो) तेज़ी से बढ़ता है, जिससे अंगों में नई जान आ जाती है।

आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से इस समस्या में सुधार का समयकाल क्या है?

चूँकि आयुर्वेद समस्या को दबाने के बजाय शरीर की ज़मीन को दोबारा उपजाऊ बनाने का काम करता है, इसलिए इसमें एक अनुशासित समय लगता है। यह कोई जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है:

  • शुरुआती 1 से 2 महीने: इस दौरान जठराग्नि (पाचन तंत्र) को ठीक किया जाता है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकाले जाते हैं। आपको अपने मासिक धर्म के चक्र में सुधार दिखेगा, थक्के आने बंद होंगे और शरीर की दिन भर की थकान दूर होकर एक नई ऊर्जा का संचार होगा।
  • 3 से 4 महीने: पंचकर्म और विशेष औषधियों के सेवन से वात, पित्त और कफ का संतुलन स्थापित होता है। गर्भाशय की परत में रक्त का प्रवाह सुधरता है और मन का भारीपन पूरी तरह से शांत होने लगता है।
  • 5 से 6 महीने और आगे: शरीर की 'शुक्र धातु' (प्रजनन उत्तक) पूरी तरह से पोषित होकर अपनी सर्वश्रेष्ठ अवस्था में आ जाती है। अंडे और शुक्राणु की गुणवत्ता चरम पर होती है। इस समय शरीर प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने के लिए पूरी तरह तैयार होता है। यदि इस बीच आईवीएफ (आई.वी.एफ.) की आवश्यकता भी पड़े, तो सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

प्रजनन संबंधी इस समस्या के इलाज में आयुर्वेद बेहतर कैसे है?

आधुनिक चिकित्सा अक्सर एक खराब ज़मीन में सीधे बीज बोने की कोशिश करती है (जैसे सीधा आईवीएफ करना)। यदि ज़मीन बंजर है या उसमें गर्मी बहुत ज़्यादा है, तो बीज कैसे पनपेगा? आयुर्वेद उस ज़मीन (गर्भाशय) को जोतने, उसमें सही खाद (पोषण) डालने और उसके वातावरण को अनुकूल बनाने पर काम करता है।

आयुर्वेद आपको हॉर्मोन्स के भारी इंजेक्शन देकर आपके शरीर के साथ ज़बरदस्ती नहीं करता। यह आपके शरीर की प्राकृतिक बुद्धिमत्ता को जगाता है। जहाँ एक तरफ कृत्रिम दवाइयाँ आपको शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ देती हैं, वहीं आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ और थेरेपीज़ आपके पूरे स्वास्थ्य को निखारती हैं, आपके तनाव को खत्म करती हैं और आपको आने वाले बच्चे के लिए एक स्वस्थ और ऊर्जावान माँ (या पिता) बनाती हैं।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

प्राकृतिक रूप से प्रयास करना सबसे अच्छा है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में आपको इंतज़ार करने के बजाय तुरंत एक विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए:

  • उम्र का प्रभाव: यदि महिला की उम्र 35 वर्ष से अधिक हो चुकी है और प्राकृतिक रूप से प्रयास करते हुए 6 महीने से ज़्यादा का समय बीत चुका है, तो समय नष्ट किए बिना उचित चिकित्सा लेनी चाहिए।
  • पेल्विक हिस्से में भयंकर दर्द: यदि संबंध बनाते समय या पीरियड्स के अलावा भी पेल्विक हिस्से में असहनीय दर्द रहता है, तो यह छुपे हुए एंडोमेट्रियोसिस का संकेत हो सकता है।
  • मासिक धर्म का पूरी तरह गायब होना: यदि बिना गर्भधारण किए पीरियड्स महीनों तक न आएँ, तो यह गंभीर हॉर्मोनल रुकावट है जिसे तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • अत्यधिक मानसिक पतन: जब बच्चे की चाहत एक ऐसा जुनून बन जाए जो आपकी रातों की नींद छीन ले और आपको डिप्रेशन की अंधेरी खाई में धकेल दे, तो आपको तुरंत डॉक्टर और काउंसेलर की मदद लेनी चाहिए।

निष्कर्ष

हम समझते हैं कि जब रिपोर्ट्स सामान्य आती हैं और गोद सूनी रहती है, तो आप खुद को ही दोषी मानने लगते हैं। लेकिन जीवा आयुर्वेद में हम आपको आश्वस्त करते हैं कि 'नॉर्मल रिपोर्ट्स' आना वास्तव में एक बहुत अच्छी खबर है! इसका मतलब है कि आपके शरीर में कोई स्थायी टूट-फूट या स्ट्रक्चरल खराबी नहीं है। बस आपके शरीर का कंप्यूटर थोड़ा हैंग हो गया है और उसे एक सही 'रीस्टार्ट' और प्राकृतिक पोषण की ज़रूरत है।

खुद को तनाव और कृत्रिम दवाइयों की भट्टी में झोंकने के बजाय, प्रकृति की ओर लौटें। अपनी जीवनशैली को सुधारें, जंक फूड से दूरी बनाएँ और योग व ध्यान को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ। अपनी नाड़ी और दोषों का सही मूल्यांकन करवाकर गर्भाशय के सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करें। आपको इस दर्दनाक और खामोश सफर में अकेले चलने की कोई ज़रूरत नहीं है।

डॉक्टर की सलाह सीधे अपने फोन पर — WhatsApp Channel से जुड़ें।

FAQs

बिल्कुल नहीं। इस शब्द का मतलब केवल यह है कि वर्तमान में उपलब्ध आम टेस्ट और मशीनों के ज़रिए डॉक्टर रुकावट का कारण नहीं ढूँढ पा रहे हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप कभी कंसीव नहीं कर सकते। जैसे ही शरीर का सूक्ष्म हॉर्मोनल और चयापचय (मेटाबॉलिक) संतुलन ठीक होता है, कई महिलाएँ प्राकृतिक रूप से माँ बन जाती हैं।

हाँ, सौ प्रतिशत। पुरुष का सीमेन एनालिसिस (वीर्य की जाँच) केवल शुक्राणुओं की गिनती और आकार बताता है। लेकिन अत्यधिक तनाव के कारण शुक्राणु के अंदर मौजूद डीएनए को नुकसान पहुँचता है (जिसे डीएनए फ्रैगमेंटेशन कहते हैं)। ऐसे में अंडा निषेचित (फर्टिलाइज़) तो हो जाता है, लेकिन भ्रूण आगे नहीं बढ़ पाता।

एक अच्छी डाइट और सही वजन (बीएमआई) रखना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यह इंसुलिन के स्तर और हॉर्मोन्स को सुधारता है। लेकिन अगर समस्या कई सालों से है और शरीर में आम (गहराई में जमे टॉक्सिन्स) बहुत ज़्यादा है, तो केवल डाइट से फायदा नहीं होगा। इसके लिए आयुर्वेदिक पंचकर्म जैसी गहरी सफाई की भी आवश्यकता होती है।

नींद का सीधा संबंध आपके शरीर में मेलाटोनिन हॉर्मोन से होता है। मेलाटोनिन केवल नींद नहीं लाता, बल्कि यह अंडाशय (ओवरीज़) में मौजूद अंडों को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस (क्षरण) से भी बचाता है। जो महिलाएँ रात को देर से सोती हैं या जिनकी नींद पूरी नहीं होती, उनके अंडों की गुणवत्ता तेज़ी से गिरने लगती है, भले ही अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट नॉर्मल हो।

यह एक बहुत बड़ी भ्रांति है। आईवीएफ उन स्थितियों में बहुत कारगर है जहाँ फैलोपियन ट्यूब पूरी तरह से बंद हों या शुक्राणु बिल्कुल नगण्य हों। जब सब कुछ खुला है और सामान्य है, तो शरीर को आईवीएफ के महंगे और तनावपूर्ण चक्र में धकेलने से पहले आयुर्वेदिक तरीके से शरीर की शुद्धि (डिटॉक्स) करना एक बहुत ही सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प है।

आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ बहुत शक्तिशाली होती हैं और उनका अपना एक अलग काम करने का तरीका होता है। यदि आप भारी हॉर्मोनल दवाइयाँ ले रही हैं, तो बिना अपने आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श किए जड़ी-बूटियों का सेवन नहीं करना चाहिए। आमतौर पर डॉक्टर दोनों के बीच एक सुरक्षित गैप रखने की सलाह देते हैं।

आयुर्वेद का सिद्धांत है कि आप जो खाते हैं, वह पचकर सबसे पहले रस बनता है, फिर रक्त, मांस और ऐसे ही क्रम से होते हुए शरीर की सातवीं और अंतिम धातु शुक्र (प्रजनन तत्व) बनती है। यदि आपका पाचन (जठराग्नि) ही खराब है, तो खाना पहले चरण में ही सड़ जाएगा और प्रजनन अंगों तक शुद्ध पोषण कभी पहुँच ही नहीं पाएगा।

हाँ, बिल्कुल। व्यायाम शरीर के लिए अच्छा है, लेकिन अत्यधिक भारी वजन उठाना या घंटों कार्डियो करना शरीर में वात दोष को बुरी तरह भड़का देता है और शरीर को एक प्रकार के सर्वाइवल मोड (तनाव की स्थिति) में डाल देता है। ऐसी स्थिति में शरीर प्रजनन जैसी प्रक्रिया को रोक देता है क्योंकि उसे लगता है कि वर्तमान माहौल बच्चे के लिए सुरक्षित नहीं है।

नहीं। आम टेस्ट में केवल टीएसएच का स्तर देखा जाता है। कई बार टीएसएच नॉर्मल होता है लेकिन शरीर के भीतर एंटीबॉडीज़ मौजूद होते हैं जो थायरॉइड ग्रंथि पर हमला कर रहे होते हैं (जैसे हाशिमोटो रोग की शुरुआत)। यह सूक्ष्म ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया भी गर्भधारण में एक अदृश्य दीवार का काम कर सकती है।

यदि आपकी उम्र 30 वर्ष से कम है, तो आप बिना तनाव लिए 1 साल तक प्राकृतिक रूप से कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यदि इस एक साल बाद भी रिपोर्ट्स नॉर्मल होने के बावजूद सफलता न मिले, तो बिना देरी किए आयुर्वेद के माध्यम से शरीर का शुद्धिकरण करवाना चाहिए ताकि बढ़ती उम्र के साथ अंडे की गुणवत्ता खराब न हो।

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