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बच्चों में हड्डी कमज़ोर — Rickets का अब भी डर है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 06 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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आज के दौर में माता-पिता अपने बच्चों को हर सुख-सुविधा देने की पूरी कोशिश करते हैं। महँगे कैल्शियम सप्लीमेंट्स से लेकर विटामिन्स से भरे डिब्बाबंद दूध तक, सब कुछ उनकी डाइट में शामिल किया जाता है ताकि वे लंबे और ताकतवर बन सकें। लेकिन इन सभी सुख-सुविधाओं के बावजूद, बच्चे रोज़ाना पैरों में दर्द, भयंकर थकावट और कमज़ोरी की शिकायत कर रहे हैं।

हमें लगता था कि रिकेट्स Rickets जैसी बीमारियाँ केवल इतिहास की किताबों या अत्यधिक गरीबी में ही पाई जाती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि कंक्रीट के जंगलों, वातानुकूलित कमरों और लगातार स्क्रीन से चिपके रहने वाली इस आधुनिक जीवनशैली ने इस भयंकर बीमारी को दोबारा हमारे घरों में एक खामोश खतरे के रूप में वापस ला खड़ा किया है।

आज के दौर में बच्चों की हड्डियाँ इतनी कमज़ोर Weak Bones क्यों हो रही हैं?

हम अपने बच्चों को सबसे बेहतरीन खाना देने का दावा करते हैं, फिर भी उनके शरीर की बुनियादी संरचना यानी हड्डियाँ अंदर से खोखली हो रही हैं। इसके पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि हमारी पूरी बदलती हुई दिनचर्या ज़िम्मेदार है।

  • धूप से पूरी तरह दूरी Lack of Sunlight: आज के बच्चे मैदानों में खेलने के बजाय सारा दिन कमरों में वीडियो गेम खेलते हैं। सूरज की रोशनी न मिलने से शरीर में विटामिन-डी Vitamin D नहीं बनता, जो कैल्शियम को सोखने के लिए सबसे ज़रूरी चाबी है।
  • कमज़ोर जठराग्नि Weak Digestive Fire: पैकेटबंद चिप्स, नूडल्स और भारी जंक फूड खाने से बच्चों का पाचन तंत्र बिल्कुल सुस्त पड़ जाता है। जब भोजन ठीक से पचता ही नहीं, तो वह हड्डियों तक पोषण पहुँचाने के बजाय शरीर में ज़हरीला कचरा Toxins बनाता है।
  • वात दोष का भड़कना: भागदौड़, तनाव और प्राकृतिक वातावरण से दूरी के कारण बच्चों के शरीर में वात दोष बढ़ रहा है। यह बढ़ा हुआ वात हड्डियों की कमज़ोरी पैदा करता है और अस्थि धातु को पूरी तरह सुखा देता है।
  • मेटाबॉलिज़्म का धीमा होना: शारीरिक मेहनत की कमी और सुविधाजनक जीवनशैली के कारण बच्चों के शरीर का विकास रुक जाता है, जो उनकी बोन डेंसिटी Bone Density को तेज़ी से गिरा देता है।

रिकेट्स Rickets और हड्डियों की कमज़ोरी बच्चों में किन रूपों में सामने आती है?

यह बीमारी केवल हड्डियों के टेढ़े होने तक सीमित नहीं है। बच्चों की शारीरिक प्रकृति और उनके अंदर बिगड़े हुए दोषों वात, पित्त, कफ के आधार पर यह कमज़ोरी अलग-अलग प्रकार से दिखाई देती है:

  • वात-प्रधान अस्थि क्षय: इसमें बच्चे की हड्डियाँ बहुत रूखी और पतली रह जाती हैं। बच्चे के जोड़ों से कट-कट की आवाज़ें आती हैं और वह हमेशा क्रोनिक फटीग यानी भयंकर थकावट महसूस करता है। ऐसे में वात दोष कम करने के उपाय बेहद ज़रूरी हो जाते हैं।
  • पित्त-प्रधान अस्थि क्षय: जब शरीर में गर्मी ज़्यादा होती है, तो बच्चों को हड्डियों और जोड़ों में हल्का-हल्का बुखार और चुभन महसूस होती है। उन्हें बार-बार भयंकर पसीना आता है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।
  • कफ-प्रधान अस्थि क्षय: इस स्थिति में बच्चे का वज़न बढ़ना तेज़ी से शुरू हो जाता है, लेकिन उसकी हड्डियाँ उस वज़न को सहने के लायक नहीं होतीं। इससे पैरों की हड्डियाँ Bowing of legs बाहर की तरफ मुड़ने लगती हैं।

क्या आपके बच्चे में भी हड्डियों के खोखलेपन के ये शुरुआती संकेत नज़र आ रहे हैं?

रिकेट्स अचानक से हड्डियों को नहीं तोड़ता। यह बीमारी बहुत पहले से अलार्म बजाती है, जिसे हम अक्सर ग्रोइंग पेन्स Growing pains मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं:

  • लगातार पैरों और पिंडलियों में दर्द: अगर बच्चा थोड़ा सा भी खेलने या भागने के बाद पैरों में भयंकर दर्द की शिकायत करता है और उसे मालिश की ज़रूरत पड़ती है, तो यह साधारण बात नहीं है।
  • हड्डियों का आकार बदलना Bone Deformities: बच्चे के घुटनों का आपस में टकराना Knock knees या पैरों का धनुष के आकार Bow legs में मुड़ जाना रिकेट्स का सबसे बड़ा और स्पष्ट संकेत है।
  • दाँतों का देर से निकलना या टूटना: चूँकि दाँत भी अस्थि धातु का ही हिस्सा हैं, इसलिए दाँतों का समय पर न आना या उनका बहुत कमज़ोर होना हड्डियों की गंभीर कमज़ोरी को दर्शाता है।
  • कलाई और टखनों Ankles का चौड़ा होना: अगर बच्चे की कलाई के जोड़ या पैरों के टखने असामान्य रूप से मोटे या चौड़े दिखने लगें, तो यह जोड़ों के विकास में आ रही भारी रुकावट का इशारा है।

बच्चों को ताकतवर बनाने के चक्कर में माता-पिता क्या गलतियाँ करते हैं?

बच्चे को जल्दी से बड़ा और मज़बूत बनाने की होड़ में माता-पिता अक्सर इंटरनेट और विज्ञापनों का सहारा लेकर ऐसे शॉर्टकट्स अपनाते हैं, जो बच्चे के शरीर को फायदे की जगह भारी नुकसान पहुँचाते हैं:

  • कृत्रिम कैल्शियम Artificial Calcium का अत्यधिक सेवन: बिना डॉक्टर की सलाह के रोज़ाना कैल्शियम की भारी गोलियाँ या गमीज़ Gummies देना बच्चों के पेट में पुरानी कब्ज़ Chronic constipation पैदा करता है और किडनी पर भारी दबाव डालता है।
  • धूप से पूरी तरह बचाना: बच्चों को टैनिंग Tanning या काले होने के डर से हमेशा सनस्क्रीन लगाकर रखना या धूप में न निकलने देना, जिससे उनका शरीर प्राकृतिक विटामिन-डी सोखना ही भूल जाता है।
  • पेट की गैस और कब्ज़ की अनदेखी: माता-पिता बच्चों को ताकतवर खाना तो देते हैं, लेकिन उनके पेट साफ होने पर ध्यान नहीं देते। यह कब्ज़ शरीर में वात बढ़ाकर जोड़ों की समस्याओं की शुरुआत करती है।
  • जोड़ों के स्थायी डैमेज का खतरा: अगर बचपन में ही हड्डियों की इस बनावट को न सुधारा जाए, तो भविष्य में जोड़ों के स्थायी डैमेज का भारी जोखिम बन जाता है, जिससे बच्चा हमेशा दर्द में रहता है।

आयुर्वेद बच्चों की इस अस्थि कमज़ोरी और रिकेट्स को कैसे समझता है?

आधुनिक चिकित्सा इसे केवल विटामिन-डी और कैल्शियम की कमी मानती है, लेकिन आयुर्वेद इसे शरीर की अग्नि और धातुओं के निर्माण की विफलता के रूप में बहुत गहराई से समझता है।

  • अस्थि धातु Bone Tissue का सही न बनना: आयुर्वेद के अनुसार शरीर सात धातुओं से बना है। जब बच्चे की जठराग्नि कमज़ोर होती है, तो भोजन रस और रक्त में तो बदल जाता है, लेकिन वह अस्थि धातु तक पहुँचने से पहले ही रुक जाता है।
  • धात्वाग्नि की मंदता: हड्डियों को बनाने वाली अपनी एक अलग आग धात्वाग्नि होती है। जब शरीर में वात और कफ का असंतुलन होता है, तो यह आग बुझ जाती है और हड्डियाँ रबर की तरह नर्म Soft हो जाती हैं।
  • आम Toxins का संचय: जंक फूड से बना ज़हरीला कचरा आम जब बच्चों के छोटे-छोटे स्रोतस Channels को ब्लॉक कर देता है, तो उनकी पूरी शारीरिक ग्रोथ Growth बुरी तरह प्रभावित होती है।

बच्चों की हड्डियों को लोहे जैसा मज़बूत बनाने वाली आयुर्वेदिक डाइट

अपने बच्चे को ताकतवर बनाने के लिए आपको बाज़ार के महंगे पाउडर्स की नहीं, बल्कि अपनी रसोई में रखे प्राकृतिक खज़ाने की ज़रूरत है। यह आयुर्वेदिक डाइट हड्डियों के लिए एक संपूर्ण संजीवनी है।

आहार की श्रेणी क्या खिलाएं (फायदेमंद - अस्थि पोषक और अग्नि बढ़ाने वाले) क्या न खिलाएं (ट्रिगर फूड्स - कैल्शियम को शरीर से सोखने वाले)
अनाज (Grains) रागी (कैल्शियम का सबसे बड़ा स्रोत), दलिया, ओट्स, पुराना चावल, ज्वार। मैदा, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद नूडल्स, पिज़्ज़ा, अत्यधिक बिस्कुट।
वसा और डेयरी (Fats & Dairy) देसी गाय का शुद्ध दूध (हल्दी डालकर), शुद्ध घी, तिल का तेल। बाज़ार का फ्लेवर्ड (Flavored) दूध, रिफाइंड तेल, बहुत अधिक मेयोनेज़।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, शकरकंद, पालक (घी में छौंक कर)। अत्यधिक आलू, बाज़ार के फ्रोज़न (Frozen) स्नैक्स, कच्चा सलाद।
मेवे और बीज (Nuts & Seeds) भुने हुए सफेद और काले तिल (गुड़ के साथ), रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट। बाज़ार के अत्यधिक नमक वाले रोस्टेड नट्स, पैकेटबंद नमकीन।
पेय पदार्थ (Beverages) ताज़ा मट्ठा, त्रिफला (Triphala) का हल्का पानी (डॉक्टर की सलाह पर), जीरा पानी। सभी तरह के कोल्ड ड्रिंक्स (इनका फास्फोरस हड्डियों को खोखला करता है)।

बच्चों के अस्थि धातु को फौलादी बनाने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में ऐसे कई सौम्य और जादुई रसायन हैं, जो बच्चों के शरीर पर बिना कोई भारी दबाव डाले उनकी हड्डियों का घनत्व और ताकत कई गुना बढ़ा देते हैं:

  • अस्थिशृंखला: यह प्राकृतिक जड़ी-बूटी बच्चों की कमज़ोर या मुड़ रही हड्डियों को दोबारा सीधा करने और उनमें कैल्शियम का भारी पोषण भरने के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है।
  • अश्वगंधा: बच्चों के समग्र शारीरिक विकास और उनकी मांसपेशियों को फौलादी ताकत देने के लिए अश्वगंधा एक अद्भुत बल्य औषधि है।
  • गिलोय: बार-बार बीमार पड़ने वाले बच्चों की इम्यूनिटी को बढ़ाने और शरीर के अंदरूनी ज़हर को साफ करने के लिए गिलोय एक संजीवनी की तरह काम करती है।
  • शतावरी: बढ़ते हुए बच्चों की लंबाई और शारीरिक ढाँचे को प्राकृतिक रूप से विकसित करने में शतावरी भारी पोषण प्रदान करती है।
  • ब्राह्मी: हड्डियों के साथ-साथ बच्चों के दिमाग की नसों को शांत करने और उनके एंडोक्राइन सिस्टम को संतुलित रखने के लिए ब्राह्मी एक बेहतरीन मेध्य रसायन है।

बच्चों की हड्डियों का रूखापन मिटाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब बच्चों की हड्डियाँ अंदर से रूखी हो जाती हैं और पैरों में भयंकर दर्द रहता है, तो पेट की दवाइयों के साथ-साथ शरीर पर बाहरी पोषण देना भी बेहद चमत्कारी असर दिखाता है:

  • अभ्यंग मालिश: बच्चों के शरीर पर रोज़ाना गुनगुने तिल के तेल या बला तैल से की जाने वाली यह संपूर्ण हड्डियों को अंदर से चिकनाई देती है और चलते समय घुटने का दर्द जड़ से खत्म करती है।
  • षष्टिक शाली पिंड स्वेद: यह बच्चों के लिए एक विशेष पोटली मालिश है, जिसमें औषधीय चावल और दूध का इस्तेमाल होता है। यह कमज़ोर मांसपेशियों और हड्डियों को भारी ताकत देती है।
  • स्वेदन: मालिश के बाद शरीर को हल्की जड़ी-बूटियों की भाप देने वाली यह स्वेदन थेरेपी नसों की जकड़न को दूर करती है और बच्चे के शरीर को लचीला बनाती है।

कमज़ोर हड्डियों के पूरी तरह रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

बच्चों के शरीर में रिकवरी Recovery बहुत तेज़ी से होती है, लेकिन खोखली हो चुकी हड्डियों का घनत्व दोबारा बढ़ाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: बच्चे की जठराग्नि सुधरेगी। पेट की गैस खत्म होगी और रात को सोते समय पैरों में होने वाले दर्द में भारी कमी आएगी।
  • 3-4 महीने: आयुर्वेदिक रसायनों और मालिश के प्रभाव से हड्डियों का रूखापन खत्म होने लगेगा। बच्चा पहले से ज़्यादा एक्टिव Active महसूस करेगा और उसकी भूख प्राकृतिक रूप से खुल जाएगी।
  • 5-6 महीने: अस्थि धातु पूरी तरह पोषित हो जाएगी। रिकेट्स का जोखिम टल जाएगा, पैरों का मुड़ना रुक जाएगा और बच्चा एक सामान्य, ऊर्जावान व ताकतवर जीवन जी सकेगा।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में बुनियादी अंतर

बच्चों की हड्डियों के विकास को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और स्पष्ट अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य बोन डेंसिटी बढ़ाने के लिए विटामिन-डी के ड्रॉप्स और कैल्शियम के कृत्रिम सप्लीमेंट्स देना। बच्चे की जठराग्नि को बढ़ाना, वात शांत करना और प्राकृतिक भोजन से अस्थि धातु का भारी पोषण करना।
शरीर को देखने का नज़रिया रिकेट्स को केवल विटामिन-डी और धूप की कमी की एक सीधी बीमारी (Deficiency) मानना। हड्डियों की कमज़ोरी को कमज़ोर पाचन, 'आम' के संचय और अस्थि धातु के फेलियर से जोड़कर देखना।
डाइट और लाइफस्टाइल केवल कैल्शियम रिच फूड खाने पर ज़ोर, शरीर की पाचन क्षमता की कोई चिंता नहीं की जाती। बच्चे की अग्नि के अनुसार सुपाच्य भोजन देने और रोज़ाना औषधीय तेल की मालिश पर पूरा ज़ोर।
लंबा असर सप्लीमेंट्स छोड़ने पर शरीर फिर कमज़ोर हो जाता है और कब्ज़ की समस्या बनी रहती है। शरीर का मेटाबॉलिज़्म इतना मज़बूत हो जाता है कि वह भविष्य में भी प्राकृतिक रूप से मिनरल्स सोखने लगता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी है?

हालांकि आयुर्वेद बच्चों की हड्डियों को प्राकृतिक रूप से मज़बूत कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने बच्चे के शरीर में ये गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • हल्की सी चोट पर भी बार-बार फ्रैक्चर होना: अगर बच्चा खेलते हुए ज़रा सा गिर जाए और उसकी हड्डी चटक जाए, तो यह गंभीर अस्थि क्षय का संकेत है।
  • पैरों या रीढ़ की हड्डी में भयंकर टेढ़ापन: अगर बच्चे के पैर बहुत अधिक O या X के आकार में मुड़ जाएं, जिससे उसका सामान्य रूप से चलना असंभव हो जाए।
  • लगातार और असहनीय दर्द से रोना: अगर बच्चा रात भर पैरों या जोड़ों के दर्द से रोता रहे और मालिश से भी उसे कोई आराम न मिले।
  • अत्यधिक सुस्ती और विकास का रुक जाना: अगर बच्चा अपनी उम्र के हिसाब से न बढ़ रहा हो, न बैठ पा रहा हो और हमेशा एक भयंकर क्रोनिक फटीग में रहता हो।

निष्कर्ष

आधुनिक सुख-सुविधाओं के बीच बच्चों में हड्डियों का कमज़ोर होना और रिकेट्स के लक्षणों का वापस लौटना कोई सामान्य बात नहीं है। यह हमारे उस बदलते हुए लाइफस्टाइल का चीखता हुआ अलार्म है जहाँ हमने बच्चों को धूप, मैदान और प्राकृतिक भोजन से दूर कर दिया है। जब आप अपने बच्चे के पैरों के दर्द को केवल बाज़ार के कैल्शियम पाउडर्स और विटामिन्स की गोलियों से दबाने की कोशिश करते हैं, तो आप उसके कमज़ोर पाचन तंत्र पर और भी ज़्यादा बोझ डाल रहे होते हैं। इस कृत्रिम सप्लीमेंट्स के जाल से बाहर निकलें। अपने बच्चे की जठराग्नि को सुधारें, उसे रोज़ाना सुबह की धूप में खेलने दें और डाइट में रागी, तिल व शुद्ध गाय के दूध को शामिल करें। अस्थिशृंखला और अश्वगंधा जैसी दिव्य औषधियों का प्रयोग करें, और रोज़ाना औषधीय तेलों की मालिश से उसकी हड्डियों को नया जीवन दें। अपने बच्चे की नींव को अंदर से फौलादी बनाने और इस समस्या से स्थायी रूप से राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

दूध कैल्शियम का एक बेहतरीन स्रोत है, लेकिन अगर बच्चे का पाचन तंत्र (जठराग्नि) कमज़ोर है, तो दूध पचने के बजाय पेट में कफ और गैस बनाएगा। दूध का पूरा फायदा उठाने के लिए उसमें एक चुटकी हल्दी और अश्वगंधा मिलाकर देना ज़्यादा फायदेमंद होता है।

बच्चों के शरीर में प्राकृतिक विटामिन-डी बनाने के लिए सुबह 8 बजे से 10 बजे के बीच की गुनगुनी धूप सबसे बेहतरीन होती है। दोपहर की तेज़ धूप बच्चों की नाज़ुक त्वचा को नुकसान पहुँचा सकती है, इसलिए सुबह के समय 20-30 मिनट धूप में खेलना पर्याप्त है।

ज़्यादातर कैल्शियम गमीज़ में भारी मात्रा में कृत्रिम चीनी और प्रिजर्वेटिव्स होते हैं, जो बच्चों के पेट में आम (Toxins) बनाते हैं और कीड़े लगने का कारण बनते हैं। प्राकृतिक आहार जैसे रागी और तिल से मिलने वाला कैल्शियम शरीर आसानी से और बिना किसी नुकसान के सोख लेता है।

हाँ, साइकिल चलाना या आउटडोर (Outdoor) खेलना हड्डियों पर एक प्राकृतिक दबाव (Mechanical stress) डालता है। आयुर्वेद और मॉडर्न साइंस दोनों मानते हैं कि इस प्रकार की एक्टिविटी अस्थि कोशिकाओं (Osteoblasts) को सक्रिय करती है और बोन डेंसिटी को तेज़ी से बढ़ाती है।

सामान्य ग्रोइंग पेन्स अक्सर शाम या रात को पिंडलियों में होते हैं और मालिश से ठीक हो जाते हैं। लेकिन रिकेट्स का दर्द हमेशा बना रहता है, इसमें हड्डियाँ छूने पर भी दुखती हैं, और इसके साथ जोड़ों में सूजन या मुड़ाव भी दिखाई देने लगता है।

बिल्कुल। बच्चों में वात दोष बहुत चंचल होता है। रोज़ाना तिल या बला तेल से अभ्यंग मालिश करने से उनका नर्वस सिस्टम शांत होता है, हड्डियों का रूखापन खत्म होता है और शरीर में फौलादी ताकत आती है। यह बच्चों के लिए एक प्राकृतिक टॉनिक है।

शत-प्रतिशत। पैकेटबंद जूस और कोल्ड ड्रिंक्स में बहुत ज़्यादा कृत्रिम चीनी और फास्फोरस होता है। शरीर इस एसिडिक माहौल को न्यूट्रल (Neutral) करने के लिए हड्डियों से कैल्शियम खींचने लगता है, जिससे हड्डियाँ अंदर से खोखली हो जाती हैं।

रागी एक सुपरफूड है जिसमें दूध से कई गुना ज़्यादा कैल्शियम होता है। यह पचने में हल्का और ग्लूटेन-फ्री (Gluten-free) होता है। रागी की रोटी, डोसा या शीरा बच्चों को देने से उनकी हड्डियाँ बिना किसी सप्लीमेंट के प्राकृतिक रूप से मज़बूत होने लगती हैं।

हाँ। रिकेट्स सीधे बच्चों की हड्डियों के ग्रोथ प्लेट्स (Growth plates) को नुकसान पहुँचाता है। अगर समय पर इसका आयुर्वेदिक इलाज और पोषण न दिया जाए, तो हड्डियों का विकास रुक जाता है और बच्चा अपनी प्राकृतिक लंबाई तक नहीं पहुँच पाता।

बिल्कुल। जंक फूड (जैसे नूडल्स, चिप्स) में मौजूद मैदा और खतरनाक केमिकल्स आंतों के अंदरूनी हिस्से (Villi) पर चिपक जाते हैं। इससे आंतें प्राकृतिक भोजन से भी कैल्शियम और विटामिन्स सोखना बंद कर देती हैं, जिससे शरीर गंभीर कुपोषण का शिकार हो जाता है।

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