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कोहनी और घुटनों पर सफेद पपड़ी बनना: सोरायसिस का संकेत, आयुर्वेद में इसे कैसे समझते हैं

Information By Dr. Keshav Chauhan

स्टेरॉयड क्रीम (Steroid creams) और भारी इम्यूनोसप्रेसेंट दवाओं का इस्तेमाल कोहनी, घुटनों पर बनने वाली सफेद पपड़ी यानी सोरायसिस (Psoriasis) में काफी आम है। ये दवाएं त्वचा की ऊपरी सूजन को कुछ समय के लिए दबा देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह ठीक हो गया है। लेकिन क्रीम छोड़ते ही सफेद पपड़ी और भयंकर खुजली पहले से भी बड़े रूप में वापस आ जाती है। इसका मुख्य कारण सिर्फ ऊपरी लेप लगाना और शरीर के अंदर जमे 'दूषित रक्त' व 'वात-कफ दोष' को साफ न करना है। संपूर्ण आयुर्वेदिक उपचार के बिना यह स्थायी रूप से नहीं रुक सकता।

सोरायसिस (Psoriasis) क्या है?

सोरायसिस त्वचा की एक बेहद ज़िद्दी और क्रोनिक (Chronic) ऑटोइम्यून बीमारी है। एक सामान्य इंसान की त्वचा की कोशिकाएं (Skin cells) 28 से 30 दिनों में बनकर ऊपरी सतह तक आती हैं और झड़ जाती हैं। लेकिन सोरायसिस के मरीज़ों में, इम्यून सिस्टम के भ्रमित हो जाने के कारण, ये कोशिकाएं महज़ 3 से 4 दिनों में ही तेज़ी से बनने लगती हैं।

इतनी तेज़ी से बनने के कारण मृत कोशिकाएं (Dead cells) त्वचा से झड़ नहीं पातीं और कोहनी, घुटनों, पीठ या सिर की त्वचा (Scalp) पर एक के ऊपर एक जमा होने लगती हैं। यही जमाव मोटी, लाल और सफेद या चाँदी के रंग की पपड़ी (Silvery scales) का रूप ले लेता है। स्टेरॉयड क्रीम लगाने पर यह पपड़ी कुछ समय के लिए साफ हो जाती है, लेकिन ये दवाएं सिर्फ बाहरी सतह को साफ करती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस 'ऑटोइम्यून' प्रतिक्रिया और रक्त की अशुद्धि को ठीक नहीं करतीं जिसमें सोरायसिस बार-बार पनपता है।

सोरायसिस की बीमारियाँ मुख्य रूप से कितने प्रकार की होती हैं?

आधुनिक चिकित्सा में सोरायसिस को इसके लक्षणों और फैलने के आधार पर इन प्रकारों में बांटा गया है:

  • प्लैक सोरायसिस (Plaque Psoriasis): यह सबसे आम है (लगभग 80% मामले)। इसमें कोहनी, घुटनों और सिर पर लाल चकत्ते और सफेद मोटी पपड़ी जम जाती है।
  • गट्टेट सोरायसिस (Guttate Psoriasis): यह अक्सर बच्चों या युवाओं में गले के इन्फेक्शन (Strep throat) के बाद होता है। इसमें शरीर पर पानी की बूंदों जैसे छोटे-छोटे लाल दाने उभर आते हैं।
  • इन्वर्स सोरायसिस (Inverse Psoriasis): यह पपड़ीदार नहीं होता, बल्कि शरीर की सिलवटों (जाँघों के बीच, स्तनों के नीचे, काँख में) गहरा लाल और चिकना चकत्ता बनाता है।
  • पस्टुलर सोरायसिस (Pustular Psoriasis): इसमें लाल त्वचा के ऊपर मवाद (Pus) से भरे दर्दनाक दाने निकल आते हैं।
  • एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस (Erythrodermic Psoriasis): यह सबसे खतरनाक रूप है, जिसमें पूरा शरीर भयंकर लाल हो जाता है और त्वचा छिलने लगती है, मानो शरीर जल गया हो।

सफेद पपड़ी और सोरायसिस के मुख्य लक्षण और संकेत

कोहनी और घुटनों पर बार-बार पपड़ी बनना शरीर की अंदरूनी गंदगी और ऑटोइम्यून समस्या का संकेत है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • चाँदी जैसी सफेद पपड़ी (Silvery Scales): लाल और उभरे हुए चकत्तों के ऊपर मोटी, सूखी और सफेद रंग की पपड़ी का जमना।
  • भयंकर खुजली और जलन: पपड़ी वाली जगह पर असहनीय खुजली मचना; खुजलाने पर सफेद पाउडर सा झड़ना और खून निकल आना।
  • त्वचा का फटना और खून रिसना: त्वचा इतनी ज़्यादा रूखी हो जाती है कि उसमें दरारें (Cracks) पड़ जाती हैं और खून रिसने लगता है।
  • नाखूनों में बदलाव: हाथों और पैरों के नाखूनों में छोटे-छोटे गड्ढे पड़ जाना (Pitting) या उनका रंग पीला-भूरा हो जाना।
  • जोड़ों में दर्द (Psoriatic Arthritis): बीमारी पुरानी होने पर जोड़ों में भयंकर दर्द और सूजन आना।

दवा छोड़ने के बाद सोरायसिस क्यों लौटता है? – मुख्य कारण

  • स्टेरॉयड विड्रॉल (Topical Steroid Withdrawal): लगातार स्टेरॉयड क्रीम लगाने से त्वचा की रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो जाती है। क्रीम छोड़ते ही बीमारी 'रिबाउंड' (Rebound) करती है और पहले से 10 गुना ज़्यादा भड़क जाती है।
  • रक्त की अशुद्धि (Rakta Dushti): ग़लत खान-पान से शरीर में जो टॉक्सिन्स (आम) बनते हैं, वे खून को दूषित कर देते हैं। जब तक खून साफ नहीं होगा, त्वचा साफ नहीं हो सकती।
  • विरुद्ध आहार (Incompatible Food): दूध के साथ नमक, मछली या खट्टी चीज़ें खाने से खून तुरंत ज़हरीला होता है, जो सोरायसिस का सबसे बड़ा ट्रिगर है।
  • मानसिक तनाव: तनाव से शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ती है, जिससे इम्यून सिस्टम और ज़्यादा भ्रमित होकर सोरायसिस को भड़काता है।

सोरायसिस के जोखिम और  जटिलताएँ क्या हैं?

सोरायसिस को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ क्रीम से दबाया जाए, तो यह कई जानलेवा जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • सोरायटिक आर्थराइटिस (Psoriatic Arthritis): लगभग 30% सोरायसिस के मरीज़ों में यह बीमारी जोड़ों की हड्डियों को गलाने लगती है, जिससे उँगलियां टेढ़ी हो जाती हैं और इंसान अपाहिज हो सकता है।
  • हृदय रोग का खतरा: शरीर में लगातार सूजन बने रहने से खून की नसें सख्त हो जाती हैं, जिससे हार्ट अटैक का जोखिम काफी बढ़ जाता है।
  • टाइप-2 डायबिटीज़ और मोटापा: सोरायसिस मेटाबॉलिक सिंड्रोम को जन्म देता है, जिससे वज़न बढ़ता है और शुगर की बीमारी हो जाती है।
  • मानसिक अवसाद (Depression): शरीर पर भद्दे दाग़ों और झड़ती हुई पपड़ी के कारण मरीज़ डिप्रेशन, शर्मिंदगी और हीन भावना का शिकार हो जाता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण: जड़ कारण क्या है?

आयुर्वेद में सोरायसिस को 'एककुष्ठ' (Ekakushtha) या 'किटिभ कुष्ठ' (Kitibha) के रूप में देखा जाता है। आयुर्वेद मानता है कि यह सिर्फ त्वचा का रोग नहीं है, बल्कि यह तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) के बिगड़ने और रक्त (खून) व मांस धातु के दूषित होने का परिणाम है।

जब हम लगातार 'विरुद्ध आहार' (ग़लत भोजन का मेल) खाते हैं, बहुत ज़्यादा तनाव लेते हैं या हमारा पाचन कमज़ोर होता है, तो पेट में ज़हरीला 'आम' (Toxins) बनता है। यह 'आम' और बढ़ा हुआ वात-कफ दोष खून को दूषित कर देते हैं। बढ़ा हुआ 'वात' त्वचा में भयंकर रूखापन और सफेद पपड़ी पैदा करता है। बढ़ा हुआ 'कफ' चकत्तों को मोटा करता है और 'पित्त' उसमें लालिमा व खुजली पैदा करता है। जब तक यह दूषित खून शरीर में घूमता रहेगा, पपड़ी बनती रहेगी। आयुर्वेद का मकसद सिर्फ क्रीम लगाना नहीं है, बल्कि रक्त की गहरी शुद्धि करना (रक्त शोधन), 'आम' को बाहर निकालना और इम्यून सिस्टम को प्राकृतिक रूप से रीसेट करना है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से जड़ पर आधारित (Root-cause based) है:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है, इसलिए इलाज उनकी प्रकृति और बिगड़े हुए दोषों (वात और कफ) के अनुकूल तय किया जाता है।
  • लक्षणों और अग्नि की पहचान: मरीज़ की पाचन शक्ति, पपड़ी के झड़ने की रफ्तार और खुजली के समय की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: मरीज़ ने कितने सालों तक स्टेरॉयड क्रीम लगाई है या भारी इंजेक्शन लिए हैं, इसका पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है ताकि 'विड्रॉल' को सँभाला जा सके।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: जठराग्नि को बढ़ाने, दूषित खून को साफ करने और 'आम' को शरीर से बाहर निकालने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

सोरायसिस मिटाने वाली महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में रक्त की शुद्धि करने, वात-कफ को शांत करने और त्वचा को अंदर से नया जीवन देने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • मंजिष्ठा: आयुर्वेद में इसे सबसे शक्तिशाली रक्त शोधक (Blood purifier) माना गया है। यह खून से गहरे टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है और लालिमा व पपड़ी को कम करती है।
  • नीम: इसका कड़वा रस खून की अशुद्धि को साफ करता है, इन्फेक्शन को रोकता है और भयंकर खुजली को तुरंत शांत करता है।
  • खदिर : सभी प्रकार के कुष्ठ (त्वचा रोगों) के लिए खदिर बहुत ताक़तवर है। यह त्वचा की गहराई में जाकर नई और स्वस्थ कोशिकाओं (Cells) के निर्माण में मदद करता है।
  • गिलोय: सोरायसिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, इसलिए इम्युनिटी को सुधारना सबसे ज़रूरी है। गिलोय इम्यून सिस्टम को शांत कर उसे शरीर पर हमला करने से रोकती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित रक्त और 'आम' को बाहर निकालकर सोरायसिस को जड़ से मिटाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया।

  • विरेचन (Virechana): सोरायसिस में खून की सफाई सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। विरेचन में औषधीय दस्त के ज़रिए लिवर और खून में घुली हुई सारी गंदगी मल के रास्ते बाहर निकाल दी जाती है। इससे खुजली और पपड़ी में जादुई आराम मिलता है।
  • वमन (Vamana): कफ दोष के बढ़ने के कारण चकत्ते बहुत मोटे हो जाते हैं। औषधीय उल्टी (Vamana) के ज़रिए शरीर का पुराना कफ और 'आम' एक ही झटके में बाहर निकाला जाता है।
  • तक्रधारा (Takradhara): भयंकर मानसिक तनाव और एंग्ज़ायटी (जो सोरायसिस भड़काते हैं) को दूर करने के लिए माथे पर औषधीय छाछ (Takra) की धारा गिराई जाती है।
  • रक्तमोक्षण (जोंक थेरेपी): बहुत ज़िद्दी और लाल चकत्तों वाली जगह पर औषधीय जोंक (Leeches) लगाई जाती हैं। ये अशुद्ध खून को चूस लेती हैं, जिससे खुजली तुरंत बंद हो जाती है।

सोरायसिस के रोगी के लिए शुद्ध आहार

रक्त को शुद्ध रखने और बीमारी को दोबारा पनपने से रोकने के लिए हमेशा हल्का, पचने में आसान और 'विरुद्ध आहार' से मुक्त भोजन चुनना महत्वपूर्ण है:

1. क्या खाएँ?

  • कड़वी और हल्की सब्ज़ियाँ: करेला, परवल, लौकी और तरोई खाएँ। कड़वा रस (Bitter taste) खून को साफ करता है और त्वचा के रोगों को जड़ से मिटाता है।
  • पुराना अनाज और मूंग दाल: पचने में हल्के अनाज और छिलके वाली हरी मूंग की दाल खाएं।
  • पर्याप्त पानी और घी: दिन भर गुनगुना पानी पिएं। त्वचा के भयंकर रूखेपन (वात) को अंदर से खत्म करने के लिए भोजन में 1-2 चम्मच शुद्ध गाय का घी ज़रूर शामिल करें।

2. क्या न खाएँ?

  • विरुद्ध आहार (सख्त मनाही): दूध के साथ खट्टे फल, नमक, मूली, प्याज़, लहसुन या मछली भूलकर भी न खाएं। आयुर्वेद में इसे सोरायसिस का सबसे बड़ा कारण माना गया है।
  • खट्टा और तीखा: टमाटर, इमली, अचार, दही और बहुत ज़्यादा मिर्ची बिल्कुल बंद कर दें। ये शरीर में पित्त और लालिमा बढ़ाते हैं।
  • चीनी और जंक फूड: मिठाइयां, मैदे से बनी चीज़ें और पैकेटबंद भोजन पेट में 'आम' बनाते हैं, जो सीधा खून को ज़हरीला कर देता है। इन्हें न खाएं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की  जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की  जाँच सिर्फ त्वचा की पपड़ी देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, पपड़ी झड़ने की मात्रा और खुजली के समय को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी पुरानी बीमारी, तनाव के स्तर और पहले लगाई गई भारी स्टेरॉयड क्रीमों के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने, 'विरुद्ध आहार' लेने की आदतों और कब्ज़ की स्थिति को समझा जाता है।
  • नाड़ी  जाँच और शरीर की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) को जाना जाता है।
  • जीभ पर सफेद परत देखकर पेट में जमे 'आम' (गंदगी) को पकड़ा जाता है।
  • इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो सिर्फ बाहरी लेप न दे, बल्कि आपके खून और इम्यून सिस्टम को पूरी तरह शुद्ध करे।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

1. अपनी जानकारी हमारे साथ साझा करें: सबसे पहले आपको अपनी सेहत से जुड़ी बुनियादी जानकारी हमें देने के लिए, आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपने इलाज के सफर की शुरुआत कर सकते हैं।

2. डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करना: आपकी सुविधा के अनुसार, हमारे अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर से बातचीत करने का समय तय किया जाता है। आप अपनी पसंद के हिसाब से नीचे दिए गए दो तरीकों में से कोई भी चुन सकते हैं:

  • क्लिनिक पर जाकर: अगर आप आमने-सामने बैठकर बात करना चाहते हैं, तो अपने नज़दीकी जीवा क्लिनिक पर जा सकते हैं।
  • वीडियो कंसल्टेशन (सिर्फ ₹49 में): अगर क्लिनिक आना मुमकिन न हो, तो आप घर बैठे ही वीडियो कॉल के ज़रिए डॉक्टर से जुड़ सकते हैं। यह खास सुविधा अभी सिर्फ ₹49 में उपलब्ध है।

3. बीमारी को गहराई से समझना: हमारे डॉक्टर आपसे तसल्ली से बात करते हैं ताकि आपकी तकलीफों और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को अच्छे से समझ सकें। हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को ठीक करना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह (Root Cause) तक पहुँचना है।

4. आपके लिए खास इलाज की योजना: पूरी जाँच के बाद, डॉक्टर सिर्फ आपके लिए एक कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान तैयार करते हैं। इसमें शुद्ध जड़ी-बूटियों से बनी दवाइयाँ दी जाती हैं, जो आपके शरीर के दोषों को संतुलित करने और आपको अंदर से सेहतमंद बनाने में मदद करती हैं।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में सोरायसिस का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ की स्थिति के हिसाब से किया जाता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक़्त इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी शरीर के कितने हिस्से पर फैल चुकी है, आपने कितने सालों तक स्टेरॉयड या इंजेक्शन (Biologics) का इस्तेमाल किया है, और आपका खून कितना अशुद्ध है।
  • स्टेरॉयड विड्रॉल फेज़ : जब आप स्टेरॉयड क्रीम बंद करते हैं और आयुर्वेदिक दवा शुरू करते हैं, तो शुरुआत के 15-20 दिन बीमारी थोड़ी बढ़ सकती है (यह शरीर से ज़हर बाहर आने का संकेत है)। इससे घबराना नहीं चाहिए।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर बीमारी कोहनी और घुटनों तक सीमित है, तो 2 से 3 महीने में पपड़ी बनना काफी कम हो जाती है और खुजली शांत हो जाती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी पूरे शरीर में है और सालों पुरानी है, तो खून को पूरी तरह शुद्ध होने और त्वचा को नया रंग पाने में 6 महीने से 1 साल या उससे ज़्यादा समय भी लग सकता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर 'विरुद्ध आहार' छोड़ दे और सात्विक दिनचर्या का पालन करे, तो सोरायसिस का दोबारा लौटकर आना लगभग बंद हो जाता है और जीवन भर क्रीम लगाने की ज़रूरत खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

नमस्ते, मैं मधु महेश्वरी, जयपुर से बात कर रही हूँ। मुझे स्कैल्प (scalp) में और पूरी स्किन पर सोरायसिस की प्रॉब्लम बहुत ज्यादा थी। मैं यहाँ जयपुर जीवा सेंटर (Jiva Center) पर आई और यहाँ मैं डॉक्टर मनीष जी शर्मा से मिली।
उन्होंने मेरा ट्रीटमेंट किया और मैंने उनके बताए गए ट्रीटमेंट को पूरी तरह से फॉलो किया। सिर्फ तीन महीने में मैं पूरी तरह से स्वस्थ हो गई हूँ।
मैं रिकमेंड (recommend) करूँगी कि अगर आपको भी स्किन से रिलेटेड एलर्जी या किसी भी तरह की कोई भी प्रॉब्लम है, तो आप जीवा आ सकते हैं और अपने आप को पूरी तरह स्वस्थ कर सकते हैं। मनीष जी शर्मा और जीवा आयुर्वेदिक केंद्र के लिए थैंक यू वेरी मच।"

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

अपने इलाज पर कितना खर्च आएगा, यह जानना हर मरीज़ के लिए ज़रूरी होता है। जीवा आयुर्वेद में हम खर्च की जानकारी साफ और आसान तरीके से देते हैं, ताकि आप बिना किसी उलझन के सही फैसला ले सकें।

इलाज का सामान्य खर्च:

जो लोग अपनी बीमारी के लिए नियमित (regular) इलाज शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए दवाइयों और डॉक्टर की सलाह का महीने का खर्च लगभग ₹3,000 से ₹3,500 के बीच आता है। यह एक औसत अंदाज़ा है। असल खर्च आपकी बीमारी कितनी पुरानी है और उसकी स्थिति कैसी है, इस पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल (स्पेशल पैकेज):

अगर आप अपनी बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए थोड़ा ज़्यादा गहराई और विस्तार से इलाज करना चाहते हैं, तो हमारे 'विशेष पैकेज' आपके लिए सबसे अच्छे हैं। इसमें हम सिर्फ बीमारी को नहीं दबाते, बल्कि आपकी पूरी लाइफस्टाइल को सुधारने पर काम करते हैं। इसमें शामिल हैं:

  • खास दवाइयाँ (Customized Medicines)
  • सीनियर डॉक्टर से कंसल्टेशन
  • मन को शांत रखने के सेशन्स (Stress Management)
  • योग और फर्टिलिटी एक्सरसाइज़ की ट्रेनिंग
  • पर्सनल डाइट प्लान (जो सिर्फ आपके लिए बना हो)

इन पैकेजेस का खर्च आमतौर पर ₹15,000 से ₹40,000 के बीच होता है, जो आपके 3 से 4 महीने के पूरे इलाज को कवर करता है।

जीवाग्राम (24x7 देखभाल वाला इलाज):

जिन लोगों को बीमारी से लड़ने के लिए ज़्यादा ध्यान, शांति और आराम के साथ इलाज (पंचकर्म व शोधन) चाहिए, उनके लिए हमारा जीवाग्राम सेंटर सबसे बेहतरीन विकल्प है। यह प्रकृति के करीब बना एक ऐसा सेंटर है जहाँ आपको घर जैसा सुकून और अस्पताल जैसी केयर मिलती है। यहाँ आपको मिलता है:

  • पंचकर्म थेरेपी (उत्तर बस्ती, विरेचन और अंदरूनी सफाई)
  • सादा और पौष्टिक 'सात्विक' खाना
  • इलाज की आधुनिक और बेहतर सुविधाएँ
  • आरामदायक रहने की व्यवस्था

यहाँ 7 दिन का प्रोग्राम लगभग ₹1 लाख का होता है। इसमें आपको हर समय विशेषज्ञों की देखभाल मिलती है, ताकि आपका शरीर और मन दोनों पूरी तरह से तरोताज़ा (rejuvenated) होकर स्वस्थ प्रेगनेंसी के लिए तैयार हो सकें।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • असली कारण पर आधारित इलाज: हमारा पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि बीमारी की जड़ (Root Cause) क्या है। हम सिर्फ बाहरी हार्मोन नहीं देते, बल्कि शरीर के अंदर जाकर उस प्रजनन समस्या को ठीक करते हैं जिससे बांझपन शुरू हुआ है।
  • हर मरीज़ के लिए एक खास प्लान: आयुर्वेद मानता है कि हर इंसान का शरीर अलग होता है। इसलिए, हम सबको एक ही दवा नहीं देते। आपका इलाज आपकी अपनी प्रकृति, खान-पान और आपकी लाइफस्टाइल के हिसाब से खास आपके लिए तैयार किया जाता है।
  • जाँच और इलाज का सही तरीका: हम एक बहुत ही व्यवस्थित (systematic) प्रक्रिया का पालन करते हैं। इससे शरीर के वात दोष और मेटाबॉलिज़्म से जुड़ी समस्याओं को गहराई से समझकर उन्हें बैलेंस करने में मदद मिलती है।
  • शुद्ध और सुरक्षित दवाइयाँ: जीवा की सभी आयुर्वेदिक दवाइयाँ पूरी तरह से शुद्ध जड़ी-बूटियों से बनी होती हैं। इनके बनाने में सुरक्षा और क्वालिटी के कड़े मानकों का पालन किया जाता है ताकि आपको या आपके होने वाले बच्चे को कोई नुकसान न हो।
  • अनुभवी डॉक्टरों की टीम: हमारे पास ऐसे डॉक्टरों की एक बड़ी टीम है जिन्हें आयुर्वेद का सालों का अनुभव है। ये एक्सपर्ट्स हर दिन हज़ारों मरीज़ों की मुश्किल समस्याओं को सुलझाने में उनकी मदद करते हैं।
  • परिणाम जो सच में दिखते हैं: हमारे 90% से ज़्यादा मरीज़ों ने अपने स्वास्थ्य में बड़ा और सकारात्मक सुधार महसूस किया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता में कमी: हमारा लक्ष्य आपको अंदर से सेहतमंद बनाना है। हमारे 88% मरीज़ धीरे-धीरे कृत्रिम दवाओं और भारी-भरकम हार्मोनल इंजेक्शन्स पर अपनी निर्भरता कम करने में सफल रहे हैं और एक नेचुरल लाइफस्टाइल की ओर बढ़े हैं।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण स्टेरॉयड क्रीम और इम्यूनोसप्रेसेंट देकर लक्षणों को दबाना बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका त्वचा की सूजन कम करता है और इम्यूनिटी को दबाता है शरीर को अंदर से संतुलित और शुद्ध करता है
मूल कारण पर प्रभाव दूषित रक्त', वात-कफ और जठराग्नि को नहीं सुधारता वात-कफ-पित्त, पाचन और रक्त अशुद्धि को संतुलित करता है
उपचार विधियाँ क्रीम और भारी दवाइयाँ मंजिष्ठा, गिलोय जैसी जड़ी-बूटियाँ
दुष्प्रभाव लंबे समय में लिवर पर असर और बीमारी का तेज़ी से लौटना सामान्यतः सुरक्षित, शरीर के अनुकूल सुधार
परिणाम क्रीम छोड़ते ही बीमारी फिर से उभर आती है इम्यून सिस्टम संतुलित होकर रोग में स्थायी सुधार
समय जल्दी राहत थोड़ा समय लगता है, लेकिन जड़ से लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

सोरायसिस की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • पपड़ीदार चकत्ते शरीर के बड़े हिस्से (छाती, पेट, पीठ) पर तेज़ी से फैलने लगें।
  • घुटनों और उँगलियों के जोड़ों में सुबह-सुबह भयंकर जकड़न और दर्द महसूस हो (Psoriatic Arthritis के संकेत)।
  • लगातार खुजलाने की वजह से त्वचा छिल गई हो और उसमें से पीला मवाद (Pus) रिसने लगा हो।
  • त्वचा पर चकत्ते इतने दर्दनाक हो जाएं कि कपड़े पहनना या रोज़मर्रा के काम करना मुश्किल हो जाए।
  • पूरा शरीर लाल हो जाए और त्वचा की परत उतरने लगे (Erythrodermic Psoriasis)।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से कोहनी और घुटनों पर सफेद पपड़ी बनना (सोरायसिस) इस बात का स्पष्ट संकेत है कि शरीर का खून (रक्त धातु) और मांस धातु बहुत गहराई तक दूषित हो चुके हैं, और शरीर का वात-कफ दोष भड़का हुआ है। विरुद्ध आहार खाने (जैसे दूध के साथ नमक), जंक फूड, भारी तनाव और कमज़ोर पाचन से शरीर में 'आम' (Toxins) बनता है, जो त्वचा के रास्ते बाहर आने की कोशिश करता है और पपड़ी बनाता है। सिर्फ बाहरी स्टेरॉयड क्रीम लगाने से यह गंदगी अंदर ही दब जाती है, लेकिन खत्म नहीं होती। इलाज में रक्त शुद्धि सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें जठराग्नि को मज़बूत करना, विरुद्ध आहार छोड़ना, नीम व मंजिष्ठा जैसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करना और सात्विक दिनचर्या अपनाना शामिल है, जिससे सोरायसिस को हमेशा के लिए जड़ से खत्म किया जा सके।

FAQs

नहीं, सोरायसिस बिल्कुल भी छुआछूत की बीमारी नहीं है। यह किसी मरीज़ को छूने, उसके साथ खाने या कपड़े साझा करने से कभी नहीं फैलती। यह शरीर की अंदरूनी (ऑटोइम्यून) समस्या है।

स्टेरॉयड त्वचा की इम्युनिटी को सुन्न कर इन्फेक्शन और चकत्तों को अंदर दबा देते हैं। क्रीम छोड़ते ही वो दबी हुई बीमारी 'रिबाउंड' करती है और भयंकर रूप में त्वचा पर फूट पड़ती है।

सादा दूध पीना सुरक्षित है, लेकिन दूध पीने के आसपास नमक या खट्टी चीज़ें बिल्कुल न खाएं। आयुर्वेद में दूध और नमक के एक साथ सेवन को सोरायसिस का सबसे बड़ा कारण माना गया है।

बिल्कुल। बहुत ज़्यादा तनाव लेने से शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है और भयंकर सूजन (Inflammation) पैदा होती है, जिससे इम्यून सिस्टम भ्रमित होकर सोरायसिस को भड़का देता है।

सोरायसिस में वात दोष के कारण त्वचा में भयंकर रूखापन आ जाता है। भोजन में 1-2 चम्मच गाय का घी खाने से शरीर को अंदर से 'स्नेहन' (चिकनाई) मिलता है, जो रूखेपन को जड़ से खत्म करता है।

आयुर्वेद के अनुसार, दही (विशेषकर खट्टा और रात के समय) कफ और पित्त दोष को बढ़ाता है, जो त्वचा के रोगों को भड़काने का काम करता है। सोरायसिस में दही से परहेज़ करना चाहिए।

हां, गिलोय एक प्राकृतिक 'इम्यूनोमोडुलेटर' और रक्त शोधक है। यह भ्रमित इम्यून सिस्टम को शांत करती है और खून की अशुद्धि को साफ कर बीमारी को रोकती है।

विरेचन औषधीय दस्त के ज़रिए लिवर और खून में जमा पित्त और टॉक्सिन्स को शरीर से बाहर निकालता है, जो सोरायसिस को जड़ से ठीक करने की सबसे असरदार प्रक्रिया है।

हां, लगभग 30% मरीज़ों में यह बीमारी जोड़ों तक पहुँच जाती है जिसे 'सोरायटिक आर्थराइटिस' (Psoriatic Arthritis) कहते हैं। इसमें जोड़ों में भयंकर सूजन आ जाती है और उँगलियां टेढ़ी हो सकती हैं।

हां, करेले का कड़वा रस (Bitter taste) आयुर्वेद में खून को साफ करने और त्वचा की लालिमा व पित्त को शांत करने का सबसे बेहतरीन प्राकृतिक उपाय माना गया है।

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