सर्दी का मौसम आते ही दुनिया की गति कुछ बदल-सी जाती है। सुबह की धूप देर से उठती है, हवा में एक तीखी ठंड घुल जाती है, और शरीर जैसे खुद को एक मुलायम खोल में समेट लेना चाहता है। बाहर की ठिठुरन और भीतर की गर्म रजाई—इन दोनों के बीच हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि इस मौसम में शरीर के भीतर भी कई बदलाव चुपके से हो रहे होते हैं। कुछ ऐसे बदलाव, जो कई लोगों के लिए सर्दी को थोड़ा असहज, थोड़ा दर्दनाक और कभी-कभी खौफ़नाक बना देते हैं। खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें बवासीर या फिशर की समस्या है।
हैरानी की बात यह है कि गर्मियों में जो समस्या संभालने लायक लगती है, सर्दियों की शुरुआत होते ही वही दर्द, वही जलन और वही खिंचाव अचानक बढ़ जाता है। कई लोग बताते हैं कि सर्दियों में सुबह उठकर शौच जाने का अनुभव उन्हें डराने लगता है—क्योंकि वे जानते हैं कि थोड़ी-सी भी कठोरता गुदा क्षेत्र की नसों पर इतनी तीखी चोट करती है कि पूरा दिन उस दर्द की छाया में निकल जाता है।
आखिर ऐसा क्यों होता है? क्यों ठंड का मौसम बवासीर और फिशर को बढ़ाने में इतनी बड़ी भूमिका निभाता है? इसके पीछे शरीर की एक बहुत विस्तृत कहानी छिपी है—नमी की कमी से लेकर रक्तसंचार में बदलाव तक, और मन की थकान से लेकर खाने-पीने की आदतों में आए परिवर्तनों तक। जब ये सभी चीज़ें मिलती हैं, तो शरीर अपनी सहजता खो देता है और रोग ज़्यादा प्रबल हो उठते हैं।
सर्दियों की ठंड और नसों का संकुचन — समस्या की शुरुआत
ठंड का सबसे गहरा असर शरीर की नसों पर पड़ता है। जैसे ही तापमान गिरता है, त्वचा और नसें सिकुड़ने लगती हैं। यह बिल्कुल सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है, क्योंकि शरीर इस तरह खुद को गर्म रखने की कोशिश करता है। लेकिन यही संकुचन गुदा क्षेत्र की नसों पर दबाव बढ़ा देता है। बवासीर पहले से ही नसों के दबाव की बीमारी है, और सर्दियों में यह दबाव दोगुना हो जाता है।
जब आंतों में थोड़ा भी खिंचाव होता है, तो वह संकुचित नसें दर्द, सूजन और जलन में बदल देती हैं। फिशर वाले रोगियों के लिए यह समस्या और भी अधिक पीड़ादायक होती है। एक छोटा-सा कट, जो सामान्य मौसम में भर सकता है, ठंड में लगातार खिंचता और फटता रहता है।
पानी की कमी — आंतों का सूखना और मल का कठोर होना
सर्दियों में प्यास कम लगना सबसे सामान्य बात है। शरीर को जितना पानी चाहिए, उसका आधा भी नहीं मिल पाता। जब पानी की मात्रा कम हो जाती है, तो शरीर सबसे पहले नमी त्वचा से खींचता है, फिर आंतों से। यहीं से समस्या की असली शुरुआत होती है। कठोर मल, खिंचाव और दर्द का सबसे बड़ा कारण यही सूखापन है। जब मल सूखकर कठोर हो जाता है, तो शौच का हर प्रयास घाव को फिर से तोड़ देता है। इसीलिए लोग ठंड में कहते हैं— “दर्द गर्मियों में नहीं, सर्दियों में ज़्यादा होता है।”
सर्दियों का भोजन — स्वाद बढ़ता है, लेकिन पाचन कमज़ोर होता है
ठंड में खाने की मात्रा और लालच दोनों बढ़ जाते हैं। गरम पराठे, हरी सब्जियों के पकवान, मसालेदार भोजन, गजक, रेवड़ी, हलवा—यह सब स्वाद तो देता है, लेकिन शरीर की अग्नि को ओवरलोड भी कर देता है। पाचन धीमा पड़ता है और कब्ज़ की संभावना बढ़ जाती है। कब्ज़ किसी भी बवासीर या फिशर रोगी के लिए सबसे बड़ी दुश्मन है।
कब्ज़ = खिंचाव
खिंचाव = दर्द
दर्द = सूजन
सूजन = रोग का भड़कना
यह पूरी प्रक्रिया इतनी चुपचाप होती है कि लोग समझ भी नहीं पाते कि उनकी थाली ही उनकी परेशानी का सबसे बड़ा कारण बन रही है।
शारीरिक गतिविधि का कम होना — शरीर का जम जाना
सर्दियों में लोग देर से उठते हैं, धीमे चलते हैं और दिनभर कम गतिविधि करते हैं। आंतों की गति भी गतिविधि पर निर्भर करती है।
कम गतिविधि = धीमी आंत = कठोर मल
अगर शरीर सर्दियों में बिल्कुल भी गर्म न हो, तो रक्तसंचार और भी कमज़ोर होता है और गुदा क्षेत्र में होने वाला दर्द दूर नहीं होता। कई बार लोग कह देते हैं— “मौसम ऐसा है, इसलिए दर्द है… गर्मियों में ठीक हो जाएगा।”
लेकिन आयुर्वेद कहता है— समस्या मौसम से नहीं, बल्कि सर्दी में बदली जीवनशैली से बढ़ती है।
आयुर्वेद बताता है — सर्दियों में बढ़ता है वात दोष
आयुर्वेद के अनुसार सर्दियों में वात स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। वात का स्वभाव ही है—
- सूखापन
- ठंडक
- कठोरता
- संकुचन
- दर्द
और यही पाँचों चीज़ें बवासीर और फिशर की जड़ में हैं। जब वात बढ़ता है, तो आंतें सूखने लगती हैं, मल कठोर होता है, और छोटी-सी चोट भी जलन में बदल जाती है। यही कारण है कि आयुर्वेद सर्दियों में कुछ विशेष उपाय सुझाता है— शरीर को भीतर से चिकनाहट देना और बाहर से गर्माहट देना।
सर्दियों में बवासीर और फिशर को बढ़ने से रोकने के आयुर्वेदिक उपाय
आहार में बदलावा
- भोजन हल्का, ताज़ा और सुपाच्य रखें
- रात में एक चम्मच घी
- गर्म पानी का सेवन
- हरी सब्ज़ियाँ, दालें और सूप
वात शांत करने वाले उपाय
- गुनगुने तिल तेल से हल्की मालिश
- शौच के बाद हल्के गर्म पानी से बैठकर सिकाई
- दिन में थोड़ी-सी धूप
आंतों को चिकनाहट देने के उपाय
- घी
- त्रिफला
- इसबगोल
- गुनगुना पानी
क्या न करें
- बहुत मसालेदार भोजन
- तले हुए पदार्थ
- देर रात खाना
- दिनभर बैठे रहना
ये उपाय रोग को तेज़ होने से रोकते हैं और शरीर को संतुलन में रखते हैं।
ठंड में बवासीर या फिशर बढ़ रहे हों तो अपनाएँ ये आयुर्वेदिक घरेलू उपाय
सबसे पहले यह समझें कि सर्दियों में समस्या बढ़ना सामान्य है, लेकिन उसे अनदेखा करना बिल्कुल सही नहीं। कुछ छोटे-छोटे बदलाव आपको गहरी राहत दे सकते हैं। अपनाएँ ये आयुर्वेदिक उपाय–
- सुबह गुनगुना पानी पीने की आदत डालें: यह छोटी-सी आदत आँतों को मुलायम करती है, कब्ज़ रोकती है और पूरे दिन पाचन को बेहतर रखती है।
- तिल का तेल मलद्वार पर हल्के हाथ से लगाएँ: यह वात शांत करता है, ऊतकों में नमी लाता है और फिशर में होने वाली जलन व कटाव को भरने में मदद करता है।
- रोज़ाना 10–15 मिनट गर्म पानी का Sitz Bath लें: गुनगुने पानी से तुरंत आराम मिलता है। यह नसों को रिलैक्स करता है और दर्द काफी कम हो जाता है।
- रात में त्रिफला: पाचन को हल्का करता है, आँतों को साफ रखता है और कब्ज़ को जड़ से ठीक करता है।
- ठंडा पानी, ठंडी चीज़़ें और तली-चटपटी चीज़़ों से दूरी रखें: इनसे वात और कब्ज़ दोनों बढ़ते हैं।
- कम से कम 10–20 मिनट चलना ज़रूरी: अंदर जमा ठंडक को कम करने में मदद मिलती है और पाचन बेहतर होता है।
निष्कर्ष — सर्दियों की ठंड से नहीं, असंतुलन से बढ़ती है समस्या
बवासीर और फिशर सर्दियों में इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि शरीर सूख जाता है, आंतें कठोर हो जाती हैं और नसें सिकुड़ जाती हैं। अगर शरीर को नमी, गर्माहट और संतुलन मिले, तो यह समस्या उतनी ही तेज़ी से शांत भी हो जाती है। सर्दी का मौसम कठिन है, लेकिन सही समझ और सही देखभाल से यह आपके लिए बिल्कुल आसान और आरामदायक बन सकता है।
FAQs
- क्या सचमुच सर्दियों में बवासीर और फिशर बढ़ जाते हैं?
हाँ, ठंड में शरीर की नसें सिकुड़ती हैं, आंतें सूखती हैं और मल कड़ा होता है, जिससे समस्या बढ़ जाती है। - क्या सर्दियों में पानी ज़्यादा पीना ज़रूरी है?
जी हाँ, सर्दियों में पानी पीना बहुत ज़रूरी है। पर्याप्त पानी न पीने से मल सूखता है और फिशर फट सकता है। - क्या घी से वाकई फायदा होता है?
हाँ, घी आंतों को चिकनाहट देता है और मल को मुलायम बनाता है, जिससे खिंचाव कम होता है। - क्या मसालेदार भोजन सर्दियों में समस्या बढ़ाता है?
हाँ, मसाले पाचन को गर्म करते हैं लेकिन आंतों को चिढ़ाते भी हैं, जिससे दर्द बढ़ सकता है। - क्या आयुर्वेद में बवासीर और फिशर का स्थायी समाधान है?
हाँ, आयुर्वेद शरीर को संतुलित करता है और रोग के मूल कारण को ठीक करता है, जिससे रोग दोबारा उभरने की संभावना कम होती है।





















































































































