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40 की उम्र के बाद Bone Density हर साल 1% घटती है — रोकने का आयुर्वेदिक तरीका

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 04 May, 2026
  • category-iconUpdated on 10 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5087

उम्र का 40वाँ पड़ाव पार करते ही हमारे शरीर में कई ऐसे अदृश्य बदलाव शुरू हो जाते हैं, जिनकी आहट हमें सालों बाद तब सुनाई देती है, जब कोई बड़ी परेशानी सामने खड़ी होती है। इनमें से सबसे गंभीर और खामोश बदलाव है आपकी हड्डियों का धीरे-धीरे अंदर से खोखला होना, जिसे हम अक्सर सामान्य थकावट या बढ़ती उम्र का प्रभाव मानकर टाल देते हैं।

विज्ञान के अनुसार, 40 की उम्र के बाद हर साल हमारी हड्डियों का घनत्व (Bone Density) 1 प्रतिशत की दर से कम होने लगता है। बाहर से मज़बूत दिखने वाला हमारा शरीर अंदर ही अंदर एक ऐसी कमज़ोरी का शिकार होने लगता है, जो एक मामूली सी चोट को भी फ्रैक्चर में बदल सकती है, और इस धीमी तबाही का असर हमारे पूरे जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।

40 के बाद शरीर की हड्डियाँ अंदर से खोखली क्यों होने लगती हैं?

बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों का कमज़ोर होना कोई रातों-रात होने वाली घटना नहीं है। यह हमारे शरीर के अंदर चल रहे कई रासायनिक और हॉर्मोनल बदलावों का सीधा परिणाम है, जिन्हें समय रहते समझना बेहद ज़रूरी है।

  • हॉर्मोन्स का गिरता स्तर: 40 की उम्र के बाद महिलाओं में मेनोपॉज़ (Menopause) के कारण एस्ट्रोजन (Estrogen) और पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन तेज़ी से कम होता है। हमारा एंडोक्राइन सिस्टम (Endocrine system) हड्डियों को सुरक्षित रखने वाले ये हॉर्मोन्स बनाना कम कर देता है, जिससे बोन डेंसिटी तेज़ी से गिरने लगती है।
  • पाचन और जठराग्नि की कमज़ोरी: उम्र बढ़ने के साथ शरीर की अग्नि (Digestive fire) मंद पड़ने लगती है। इस बढ़ती उम्र में पाचन (Digestion after 40) की कमज़ोरी के कारण शरीर भोजन से कैल्शियम और अन्य मिनरल्स को सोखने की प्राकृतिक क्षमता खो देता है।
  • वात दोष का प्राकृतिक रूप से बढ़ना: आयुर्वेद के अनुसार 40 के बाद जीवन का वात काल शुरू होता है। शरीर में प्राकृतिक रूप से रूखापन (Dryness) बढ़ने लगता है, जो सीधा अस्थि धातु (हड्डियों) को सुखाकर उसे अंदर से झरझरा (Porous) बना देता है।
  • कैल्शियम सोखने में बाधा: सिर्फ गोलियों के ज़रिए कैल्शियम खाना काफी नहीं है, विटामिन डी और सही मेटाबॉलिज़्म के बिना शरीर उसे सोख नहीं पाता और वह किडनी या जोड़ों की समस्याओं (Joint issues) के रूप में ज़हरीले कचरे की तरह जमा होने लगता है।

बोन डेंसिटी घटने और हड्डियों की कमज़ोरी के कितने प्रकार हैं?

हर इंसान का शरीर अलग तरह से उम्रदराज़ होता है। हड्डियों के इस खोखलेपन को दोषों के असंतुलन के आधार पर मुख्य रूप से तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है:

  • वातज अस्थि क्षय: इसमें हड्डियाँ बिल्कुल सूखी हो जाती हैं। जोड़ों को हिलाने पर कट-कट की आवाज़ें आती हैं और इंसान को भयंकर दर्द व खुश्की का सामना करना पड़ता है।
  • पित्तज अस्थि क्षय: इसमें हड्डियों के जोड़ों में भयंकर सूजन आ जाती है और शरीर में यूरिक एसिड या गर्मी बढ़ने के कारण तेज़ जलन वाला दर्द होता है, जो अक्सर घुटनों और एड़ियों में महसूस होता है।
  • कफज अस्थि क्षय: इस अवस्था में कमज़ोर मेटाबॉलिज़्म के कारण भारी शरीर का पूरा दबाव कमज़ोर हड्डियों पर पड़ता है। इसमें वज़न नियंत्रण (Weight management) बिगड़ जाता है और जोड़ों में हमेशा भारीपन बना रहता है।

क्या आपका शरीर भी हड्डियाँ कमज़ोर होने के ये अलार्म बजा रहा है?

हड्डियाँ कमज़ोर होने पर कोई तेज़ अलार्म नहीं बजता, लेकिन शरीर कुछ छोटे-छोटे संकेत ज़रूर देता है। अगर आप 40 के पार हैं और रोज़ाना इन संकेतों को महसूस कर रहे हैं, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • सुबह उठते ही कमर में भयंकर जकड़न: बिस्तर से उठते समय कमर सीधी करने में तेज़ दर्द होना और कुछ कदम चलने के बाद ही सुबह पीठ में जकड़न (Morning back stiffness) का हल्का होना अस्थि धातु के कमज़ोर होने का पहला संकेत है।
  • मसूड़ों का सिकुड़ना और दाँत कमज़ोर होना: आपके दाँत और जबड़े की हड्डी आपके अस्थि धातु का ही हिस्सा हैं। मसूड़ों का ढीला होना और दाँतों में कमज़ोरी आना बोन डेंसिटी गिरने का साफ इशारा है।
  • सीढ़ियाँ चढ़ते समय घुटनों में चुभन: समतल ज़मीन पर ठीक महसूस करना, लेकिन सीढ़ियाँ चढ़ते या उतरते ही चलते समय घुटने का दर्द (Knee pain while walking) अचानक से एक झटके के साथ महसूस होना।
  • हाथों की ग्रिप (Grip) कमज़ोर होना: जार का ढक्कन खोलने या भारी सामान उठाने में हाथों की ताकत का कम लगना, जो हड्डियों और मांसपेशियों की गिरती ताकत को दर्शाता है।

हड्डियों के इस खोखलेपन को रोकने में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ?

इस उम्र में हड्डियों के क्षय को रोकने के लिए लोग अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं, जो शरीर की प्राकृतिक मशीनरी को और भी ज़्यादा खराब कर देते हैं।

लोग इसमें क्या गलतियाँ करते हैं?

  • कृत्रिम कैल्शियम का अंधाधुंध उपयोग: बिना अपनी जठराग्नि को सुधारे बाज़ार से महँगे कैल्शियम सप्लीमेंट्स खाना सीधा आंतों में भयंकर कब्ज़ पैदा करता है। यह लगातार रहने वाली कब्ज़ (Chronic constipation) आंतों में गैस बनाती है जो वापस हड्डियों को सुखा देती है।
  • दर्द निवारक गोलियों (Painkillers) पर निर्भरता: घुटने या कमर दर्द (Back pain) को दबाने के लिए रोज़ाना पेनकिलर खाना लिवर को डैमेज करता है और कैल्शियम को सोखने की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक देता है।
  • गलत व्यायाम और पोश्चर: कमज़ोर हड्डियों के साथ अचानक भारी वज़न उठाना या घंटों तक कंप्यूटर के आगे गलत पोश्चर में बैठना सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस (Cervical spondylosis) का सबसे बड़ा कारण बनता है।

इससे क्या जटिलताएँ होती हैं?

  • स्थायी डैमेज का जोखिम: अगर बोन डेंसिटी के इस गिरते स्तर को रोका न जाए, तो हड्डियों की कमज़ोरी (Osteoporosis) का खतरा इतना बढ़ जाता है कि एक हल्की सी चोट भी भयंकर फ्रैक्चर कर सकती है, जो जोड़ों के स्थायी डैमेज (Permanent joint damage) का कारण बनती है।
  • रीढ़ की हड्डी का मुड़ना: बोन मास कम होने से रीढ़ की हड्डियाँ (Vertebrae) दबने लगती हैं, जिससे लंबाई कम हो जाती है और पीठ में कूबड़ (Hump) निकल आता है।

आयुर्वेद 40 के बाद अस्थि क्षय को कैसे समझता है?

आधुनिक चिकित्सा जहाँ बोन डेंसिटी को केवल टी-स्कोर (T-Score) और कैल्शियम की कमी के नज़रिए से देखती है, वहीं आयुर्वेद इसे शरीर की अग्नि और वात दोष के विज्ञान से गहराई से समझता है।

  • अस्थि धातु और वात का विलोम संबंध: आयुर्वेद के अनुसार शरीर सात धातुओं से बना है, जिसमें अस्थि (हड्डी) मुख्य है। जब शरीर में वात दोष बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो वह अस्थि धातु को सोखने लगता है, जिससे हड्डियाँ खोखली (Porous) हो जाती हैं। इसे रोकने के लिए वात दोष कम करने के उपाय बेहद ज़रूरी हैं।
  • धात्वाग्नि की मंदता: 40 के बाद जब पाचन तंत्र (Digestive system) की जठराग्नि कमज़ोर होती है, तो अस्थि धातु को बनाने वाली धात्वाग्नि भी बुझ जाती है। भोजन का पोषण हड्डियों तक पहुँच ही नहीं पाता।
  • श्लेषक कफ का सूखना: जोड़ों के बीच प्राकृतिक चिकनाई (श्लेषक कफ) होती है। उम्र के साथ और गलत खानपान से यह चिकनाई सूख जाती है, जिससे हड्डियों के सिरे आपस में रगड़ खाने लगते हैं और घिसने लगते हैं।

अस्थि धातु को पोषण देने वाली आयुर्वेदिक डाइट

40 के बाद असली ताकत आपको बाज़ार के सप्लीमेंट्स से नहीं, बल्कि आपकी अपनी रसोई से मिलती है। हड्डियों के क्षय को रोकने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएँ।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - हड्डियों को पोषण देने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - हड्डियों को गलाने वाले)
अनाज (Grains) रागी (कैल्शियम का खजाना), पुराना चावल, ओट्स, ज्वार। मैदा, वाइट ब्रेड, बासी और बहुत ज़्यादा पैकेटबंद बिस्कुट।
वसा और बीज (Fats & Seeds) देसी गाय का शुद्ध घी, सफेद तिल (Sesame seeds), बादाम। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा बाज़ार का ट्रांस फैट।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, पालक (पका हुआ), गाजर, सहजन (Drumsticks)। भारी कटहल, बैंगन, बहुत ज़्यादा कच्चा सलाद (वात बढ़ाता है)।
फल (Fruits) उबला हुआ सेब, आँवला, पपीता, अंजीर (Figs), मुनक्का। बहुत ज़्यादा खट्टे फल, बिना मौसम के डिब्बाबंद जूस।
पेय पदार्थ (Beverages) हल्दी वाला दूध (रात को घी के साथ), धनिया-जीरे का पानी। अत्यधिक डार्क कॉफी, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स (हड्डियों का कैल्शियम खींचते हैं)।

बोन डेंसिटी (Bone Density) बढ़ाने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो 40 की उम्र के बाद भी हड्डियों के घनत्व को तेज़ी से बढ़ाते हैं और खोखली हो रही हड्डियों में दोबारा जान फूँक देते हैं:

  • अस्थिशृंखला (Hadjod): यह नाम ही बताता है कि यह कमज़ोर हड्डियों को जोड़ने और उनमें प्राकृतिक कैल्शियम भरने की सबसे उत्तम आयुर्वेदिक औषधि है। यह हड्डियों की डेंसिटी को चमत्कारिक रूप से सुधारती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): बढ़ती उम्र की कमज़ोरी दूर करने और नसों को मज़बूत बनाने के लिए अश्वगंधा (Ashwagandha) एक अद्भुत बल्य औषधि है। यह शरीर की ऊर्जा को बढ़ाता है और अस्थि धातु को भारी पोषण देता है।
  • शतावरी (Shatavari): 40 के बाद महिलाओं में हॉर्मोनल बदलाव के कारण कमज़ोर हो रही हड्डियों को दोबारा ताकत देने के लिए शतावरी (Shatavari) एक जादुई रसायन का काम करती है।
  • गिलोय (Giloy): अगर हड्डियों के जोड़ों में यूरिक एसिड या पुराने वात-पित्त के कारण सूजन है, तो गिलोय (Giloy) शरीर से उस ज़हरीली गर्मी को बाहर निकालकर अस्थि धातु को सुरक्षित करती है।
  • लाक्षा (Laksha): यह प्राकृतिक जड़ी-बूटी बोन डेंसिटी को सुधारने, हड्डियों को फौलादी बनाने और बुढ़ापे की कमज़ोरी को दूर करने में अचूक मानी जाती है।

अस्थि धातु को फौलादी बनाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात दोष बहुत अधिक बढ़ चुका हो और हड्डियाँ अंदर से सूखी हुई महसूस हों, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ सीधा अस्थि धातु तक गहराई से पोषण पहुँचाने का अचूक काम करती हैं:

  • अभ्यंग मालिश (Abhyanga): गुनगुने वात-शामक औषधीय तेलों (जैसे महानारायण तेल या तिल का तेल) से की जाने वाली यह संपूर्ण शारीरिक अभ्यंग मालिश (Abhyanga massage) सूखी हुई हड्डियों को प्राकृतिक चिकनाई देती है और जकड़न खत्म करती है।
  • स्वेदन थेरेपी (Swedana): तेल की मालिश के बाद हर्बल औषधियों की भाप से की जाने वाली यह स्वेदन थेरेपी (Swedana therapy) शरीर के रोम छिद्रों को खोलती है और नसों के अंदर तक गर्माहट पहुँचाती है।
  • कटि बस्ती (Kati Basti): 40 के बाद अगर कमज़ोर हड्डियों के कारण कमर में भयंकर दर्द रहता है, तो कमर पर तेल रोककर की जाने वाली कटि बस्ती (Kati Basti) से सूखी हुई रीढ़ की हड्डी दोबारा रिपेयर होती है।
  • बस्ती (Basti / Enema): आयुर्वेद में वात दोष को जड़ से खत्म करने के लिए मेडिकेटेड ऑयल और काढ़े की बस्ती (Basti) दी जाती है। चूंकि आंतें वात का मुख्य स्थान हैं, यह थेरेपी आंतों से वात को निकालकर हड्डियों को सीधा ताकत देती है।

हड्डियों का घनत्व दोबारा बढ़ने और रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

खोखली हो चुकी हड्डियों का घनत्व (Density) बढ़ाने और वात को शांत करने में थोड़ा अनुशासित और लगातार समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: आपकी जठराग्नि मज़बूत होगी, पेट की कब्ज़ टूटेगी और सुबह उठते समय महसूस होने वाली जकड़न व मीठा-मीठा दर्द काफी हद तक शांत हो जाएगा।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से जोड़ों की कट-कट की आवाज़ कम होने लगेगी। आपके शरीर में एक नई ताज़गी आएगी और हड्डियाँ प्राकृतिक कैल्शियम सोखना शुरू कर देंगी।
  • 5-6 महीने: अस्थि धातु पूरी तरह से पोषित हो जाएगी। ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम कम हो जाएगा और आप बिना किसी कृत्रिम सप्लीमेंट के एक मज़बूत और फौलादी जीवन जी सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

40 के बाद हड्डियों की देखभाल को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य बोन लॉस को धीमा करने के लिए बिस्फोस्फोनेट्स (Bisphosphonates) और सिंथेटिक कैल्शियम/विटामिन डी के सप्लीमेंट्स देना। वात को शांत करना, अस्थि धातु को पोषण देना और जठराग्नि सुधारकर शरीर को खुद कैल्शियम सोखने लायक बनाना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल कैल्शियम की कमी और बढ़ती उम्र का एक मैकेनिकल (Mechanical) व हॉर्मोनल इरर मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात दोष और 'ओजस' के क्षय का एक संपूर्ण सिंड्रोम (Syndrome) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट में केवल दूध पीने और कैल्शियम की गोलियां खाने की आम सलाह दी जाती है। डाइट में 'स्नेहन' (घी), वात-नाशक भोजन, और शिरोधारा थेरेपी द्वारा स्ट्रेस कम करने पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर सप्लीमेंट्स बंद करने पर हड्डियाँ फिर से तेज़ी से कमज़ोर होने लगती हैं और गोलियों से किडनी पर असर पड़ता है। शरीर का मेटाबॉलिज़्म और हड्डियाँ अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि वे प्राकृतिक रूप से कैल्शियम को होल्ड करना सीख जाती हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद 40 के बाद हड्डियों को प्राकृतिक रूप से मज़बूत कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • हल्की चोट पर भी हड्डी का टूट जाना: अगर ज़रा सा पैर मुड़ने या हल्की सी चोट लगने पर ही भयंकर फ्रैक्चर हो जाए, तो यह गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत है।
  • रीढ़ की हड्डी में अचानक झुकाव आना: अगर आपकी लंबाई अचानक कम लगने लगे या 40-50 की उम्र में ही पीठ के ऊपरी हिस्से में कुबड़ (Hump) निकलने लगे।
  • लगातार और असहनीय दर्द: अगर हड्डियों या जोड़ों में इतना भयंकर दर्द हो कि रात को सोना मुश्किल हो जाए और पेनकिलर के बिना आराम न मिले।
  • हाथ-पैरों में भयंकर सुन्नपन: अगर रीढ़ की हड्डी कमज़ोर होने से नसें इतनी दब जाएँ कि हाथों या पैरों में लकवे जैसी सुन्नता (Numbness) या झुनझुनी आ जाए।

निष्कर्ष

40 की उम्र पार करना कोई बीमारी नहीं है, लेकिन इस उम्र के बाद अपनी हड्डियों की कमज़ोरी को नज़रअंदाज़ करना ज़रूर एक बहुत बड़ी गलती है। जब आपके शरीर की बोन डेंसिटी हर साल 1% घट रही होती है, तो उसे महज़ कैल्शियम की कुछ गोलियों से नहीं रोका जा सकता। यह आपके शरीर की उस बुझती हुई जठराग्नि और भड़के हुए वात दोष का स्पष्ट परिणाम है जो आपके शरीर को अंदर से सुखा रहा है। इस धीमी तबाही को रोकने के लिए आयुर्वेद के प्राकृतिक विज्ञान को अपनाएं। अपनी डाइट में रागी, तिल और शुद्ध गाय के घी को शामिल करें। अपनी आंतों को साफ रखें, अस्थिशृंखला और शतावरी जैसी दिव्य औषधियों का प्रयोग करें, और पंचकर्म की मालिश से अपनी हड्डियों की खोई हुई ताकत वापस लाएं। कृत्रिम सप्लीमेंट्स के धोखे से बचें और 40 के बाद भी अपनी हड्डियों को फौलादी ताकत देने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

ऐसा नहीं है। आयुर्वेद के अनुसार अगर आप अपनी जठराग्नि को मज़बूत रखें और वात-शामक जीवनशैली (जैसे रोज़ाना तेल की मालिश और सही आहार) अपनाएं, तो हड्डियों के प्राकृतिक क्षय (Decay) को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है और हड्डियों को मज़बूत रखा जा सकता है।

महिलाओं में 40-45 की उम्र के बाद मेनोपॉज़ (Menopause) की शुरुआत होती है, जिससे एस्ट्रोजन (Estrogen) हॉर्मोन का स्तर तेज़ी से गिरता है। यह हॉर्मोन हड्डियों की सुरक्षा करता है, इसलिए इसके कम होने से महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बहुत बढ़ जाता है।

दूध कैल्शियम का अच्छा स्रोत है, लेकिन 40 के बाद शरीर की इसे सोखने की क्षमता कम हो जाती है। अगर आपका पेट खराब रहता है, तो दूध केवल गैस बनाएगा। दूध को सुपाच्य बनाने के लिए उसमें एक चुटकी हल्दी, सोंठ या अश्वगंधा मिलाकर पीना चाहिए।

बिल्कुल। आयुर्वेद में अस्थि धातु (हड्डी) और वात का सीधा विलोम संबंध है। जब शरीर में वात (हवा और रूखापन) बढ़ता है, तो वह हड्डियों के अंदर का प्राकृतिक कफ (चिकनाई) सुखा देता है, जिससे हड्डियाँ खोखली और कमज़ोर हो जाती हैं।

बढ़ती उम्र में अस्थि धातु को पोषण देने के लिए तिल का तेल (Sesame Oil) या महानारायण तेल सबसे उत्तम माना गया है। तिल का तेल स्वभाव से गर्म होता है और वात दोष को बहुत तेज़ी से शांत करके हड्डियों को फौलादी बनाता है।

हाँ। बहुत ज़्यादा कैफीन (चाय/कॉफी) पीने से शरीर में वात भड़कता है और यह शरीर से कैल्शियम को मूत्र (Urine) के रास्ते बाहर निकाल देता है। 40 के बाद इसका अत्यधिक सेवन हड्डियों के लिए ज़हर के समान है।

अस्थिशृंखला हड्डियों को जोड़ने वाली एक जादुई जड़ी-बूटी है। यह शरीर में अस्थि कोशिकाओं (Osteoblasts) को सक्रिय करती है और बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती है, जिससे हड्डियों का खोखलापन रुक जाता है।

बिल्कुल। जब 40 के बाद मेटाबॉलिज़्म धीमा होता है और वज़न बढ़ता है, तो शरीर का भारी दबाव कमज़ोर हो रही हड्डियों (खासकर घुटनों और रीढ़) पर पड़ता है। इससे कार्टिलेज तेज़ी से घिसता है और घुटने हमेशा के लिए खराब हो सकते हैं।

हाँ, सूरज की किरणें विटामिन-डी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। 40 के बाद आंतों को कैल्शियम सोखने के लिए भारी मात्रा में विटामिन-डी की ज़रूरत होती है। रोज़ाना सुबह की गुनगुनी धूप में 20-30 मिनट बैठना हड्डियों के लिए संजीवनी है।

रागी कैल्शियम का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है, जो दूध से भी कई गुना ज़्यादा ताकतवर है। 40 की उम्र के बाद इसे रोटी, चीले या हलवे के रूप में खाने से शरीर को प्राकृतिक कैल्शियम मिलता है जो आसानी से पच जाता है और पथरी (Stones) नहीं बनाता।

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