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गर्मी में बच्चों को कौन सी 5 बीमारियाँ ज़्यादा होती हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan

गर्मियों का मौसम आते ही बच्चों में कई तरह की बीमारियाँ तेज़ी से बढ़ने लगती हैं। तेज़ धूप, लू और खराब खान-पान के कारण बच्चों का कमज़ोर पाचन तंत्र जल्दी प्रभावित हो जाता है। आधुनिक चिकित्सा में इसके लिए तुरंत एंटीबायोटिक्स या भारी दवाइयाँ दी जाती हैं, जो कुछ समय के लिए आराम देती हैं लेकिन शरीर की इम्युनिटी को कमज़ोर कर देती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, गर्मी में मुख्य रूप से 'पित्त दोष' भड़कता है और पाचक अग्नि कमज़ोर पड़ जाती है, जिससे दस्त, घमौरियाँ, डिहाइड्रेशन, टायफाइड और हीट स्ट्रोक जैसी 5 मुख्य बीमारियाँ होती हैं। सही खान-पान से बचाव संभव है।

गर्मी की बीमारियाँ और पित्त असंतुलन क्या है?

गर्मियों के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत अधिक होता है, जो शरीर के अंदर के तापमान (पित्त दोष) को भी भड़का देता है। एक स्वस्थ बच्चे में शरीर पसीने के ज़रिए तापमान को नियंत्रित करता है, लेकिन खेलते समय तेज़ धूप और कम पानी पीने से शरीर की ठंडक खत्म हो जाती है। लोग बच्चों को तुरंत फ्रिज का ठंडा पानी या आइसक्रीम देते हैं, जो पाचक अग्नि को पूरी तरह बुझा देता है। पाचक अग्नि के कमज़ोर होते ही खाना पेट में सड़ने लगता है और 'आम' (टॉक्सिन्स) बनाता है। बिना डॉक्टर की सलाह के सिर्फ एंटीबायोटिक्स देना बच्चों के लिवर और आँतों को हमेशा के लिए कमज़ोर कर देता है।

गर्मी में बच्चों से जुड़ी 5 मुख्य बीमारियाँ कौन सी हैं?

गर्मी के मौसम में बच्चों को मुख्य रूप से इन 5 बीमारियों का सामना करना पड़ता है:

  • हीट स्ट्रोक (लू लगना): तेज़ धूप में खेलने से शरीर का तापमान अचानक बढ़ जाता है, जिससे भयंकर सिरदर्द और तेज़ बुखार आता है।
  • डायरिया और फूड पॉइज़निंग (दस्त): गर्मी में खाना जल्दी खराब होता है। बाहर का दूषित खाना खाने से आँतों में इन्फेक्शन और भयंकर दस्त लग जाते हैं।
  • डिहाइड्रेशन (जल की कमी): पसीने के रूप में शरीर का सारा पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं, जिससे शरीर में भारी कमज़ोरी आती है।
  • घमौरियाँ (Prickly Heat): पसीने की ग्रंथियाँ ब्लॉक होने से त्वचा पर छोटे-छोटे लाल दाने निकल आते हैं जिनमें भयंकर खुजली और जलन होती है।
  • टाइफाइड और पीलिया: यह दूषित पानी और बर्फ से फैलने वाली गंभीर बीमारियाँ हैं जो सीधे लिवर और आँतों पर हमला करती हैं।

गर्मी की बीमारियों के लक्षण और संकेत

दवाओं से आराम मिलने के बाद बीमारी का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • तेज़ बुखार और उल्टी: शरीर का तापमान बहुत ज़्यादा बढ़ जाना और खाया हुआ सब कुछ उल्टी से बाहर आ जाना।
  • लगातार दस्त: पानी जैसे पतले दस्त होना और पेट में भयंकर मरोड़ या ऐंठन रहना।
  • गला सूखना और कम पेशाब आना: डिहाइड्रेशन के कारण बच्चे का मुँह और होंठ सूखना, और गहरे पीले रंग का पेशाब आना।
  • सुस्ती और कमज़ोरी: बच्चे का खेलकूद छोड़ देना और दिन भर थका-थका या लेटा हुआ महसूस करना।
  • त्वचा पर लाल दाने: पसीने वाली जगहों पर लालपन और दाने आना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार बीमार होने के कारण (पित्त और अग्नि दृष्टि)

गर्मी में बच्चों के बार-बार बीमार होने के पीछे सिर्फ धूप नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • पित्त दोष का भड़कना: बाहर की गर्मी और मसालेदार जंक फूड शरीर में 'पित्त' को भड़काते हैं, जो उल्टी और दस्त का कारण बनता है।
  • पाचक अग्नि का कमज़ोर होना: गर्मी में प्राकृतिक रूप से जठराग्नि कमज़ोर होती है। ऐसे में भारी खाना खाने से वह पचता नहीं है।
  • दूषित जल और भोजन: बाहर की बर्फ, खुले में रखा कटा हुआ फल या गन्ने का रस शरीर में सीधे बैक्टीरिया पहुँचाते हैं।
  • एकदम से ठंडा पानी पीना: धूप से आकर तुरंत फ्रिज का ठंडा पानी पीने से शरीर का तापमान बिगड़ जाता है।
  • इम्युनिटी (ओजस) की कमी: सही पोषण न मिलने से शरीर बाहरी बीमारियों से लड़ नहीं पाता।

गर्मी की बीमारियों के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

इन बीमारियों को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ बाहरी दवाओं के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • गंभीर डिहाइड्रेशन: शरीर का पानी सूख जाने से किडनी पर भारी असर पड़ता है और बच्चा बेहोश भी हो सकता है।
  • लिवर की कमज़ोरी: बार-बार पीलिया या टाइफाइड होने से लिवर हमेशा के लिए कमज़ोर पड़ जाता है।
  • आँतों का इन्फेक्शन: लगातार दस्त आँतों के अच्छे बैक्टीरिया को खत्म कर देते हैं।
  • मस्तिष्क पर प्रभाव: हीट स्ट्रोक का तेज़ बुखार अगर दिमाग पर चढ़ जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

बच्चों की 5 बीमारियों पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से गर्मी की ये 5 बीमारियाँ सिर्फ बाहरी इन्फेक्शन नहीं हैं। आयुर्वेद में इसे 'पित्त प्रकोप', 'अग्निमांद्य' और 'आम' के संचय की श्रेणी में रखा जाता है। जब बाहर की गर्मी के कारण शरीर का पित्त भड़कता है और अग्नि कमज़ोर होती है, तो पेट में गया खाना ज़हर ('आम') का काम करता है। यही टॉक्सिन्स जब खून में मिलते हैं, तो घमौरियाँ और पीलिया जैसी बीमारियाँ पैदा करते हैं। डॉक्टर नाड़ी देखकर ढूँढते हैं कि पित्त और वात का स्तर कितना बिगड़ चुका है। आयुर्वेद में बस एंटीबायोटिक्स देकर बीमारी को दबाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि पाचक अग्नि सुधरे, शरीर को अंदर से ठंडक मिले और इम्युनिटी प्राकृतिक रूप से मज़बूत हो।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर बच्चे का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके नाज़ुक शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: उल्टी, दस्त के समय, और बुखार की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पिछली बीमारियाँ और खायी जा रही एंटीबायोटिक्स का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: बच्चे के रोज़ाना के खान-पान, बाहर खेलने के समय और पानी पीने की आदत को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: पित्त असंतुलन को पकड़ने के बाद ही शरीर को प्राकृतिक ठंडक देने का सबसे सटीक इलाज शुरू किया जाता है।

पित्त शांत करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में शरीर को ठंडक देने, दस्त रोकने और पित्त शांत करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • पुदीना (Mint): यह पेट की गर्मी को तुरंत शांत करता है, पाचक अग्नि को बढ़ाता है और उल्टी-दस्त में जादुई आराम देता है।
  • धनिया (Coriander): रात भर पानी में भीगे हुए धनिये का पानी पित्त को शांत करता है और पेशाब की जलन व डिहाइड्रेशन दूर करता है।
  • सौंफ (Fennel): यह बच्चों के लिए बहुत ही सौम्य औषधि है, जो पेट दर्द, गैस और मरोड़ को प्राकृतिक रूप से खत्म करती है।
  • गिलोय (Giloy): यह इम्युनिटी को मज़बूत करती है और टाइफाइड या पीलिया जैसे गंभीर बुखार में शरीर से विषैले टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है।

बच्चों के लिए आयुर्वेदिक देखभाल: पित्त शमन

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, बच्चों को नया जीवन देने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • हल्का शोधन: बच्चों के नाज़ुक शरीर के लिए बहुत भारी पंचकर्म नहीं किया जाता, बल्कि सौम्य औषधियों से पित्त को शांत किया जाता है।
  • इलाज का समय: यह कुछ दिनों तक चलने वाली पाचन और शरीर की गर्मी को शांत करने की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • चंदन और गुलाब का लेप: घमौरियों और हीट स्ट्रोक के प्रभाव को कम करने के लिए शरीर पर ठंडे लेप लगाए जाते हैं।
  • पेट की सफाई: हलकी आयुर्वेदिक औषधियों से आँतों में जमे दूषित पित्त और 'आम' को मल के रास्ते बाहर निकाला जाता है।

गर्मी के रोगी बच्चों के लिए सही और शुद्ध आहार

इन 5 बीमारियों से बचाने के लिए पित्त दोष को शांत करने वाला, सुपाच्य और ठंडा आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • ताज़े फल और रस: तरबूज़, खरबूज़ा और ताज़ा नारियल पानी बच्चों को खूब पिलाएँ, यह डिहाइड्रेशन से बचाते हैं।
  • हल्का और सुपाच्य भोजन: पुराना चावल, मूंग दाल की खिचड़ी और लौकी-तोरई खिलाएँ, यह आसानी से पच जाते हैं।
  • छाछ और नींबू पानी: भुना जीरा और सेंधा नमक डालकर ताज़ा छाछ या नींबू पानी दिन भर में कई बार दें।

क्या न खाएँ?

  • बासी और बाहर का खाना: गोलगप्पे, गन्ने का खुला रस और बाहर की बर्फ बिल्कुल न दें, यह सीधा टाइफाइड और पीलिया का कारण बनते हैं।
  • तीखा और जंक फूड: चिप्स, पिज़्ज़ा और मसालेदार खाना पेट में भयंकर पित्त (गर्मी) पैदा करते हैं।
  • फ्रिज का बहुत ठंडा पानी: धूप से आकर सीधे फ्रिज का पानी पीने से कमज़ोर पाचक अग्नि पूरी तरह बुझ जाती है।

जीवा आयुर्वेद में बच्चे की जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में बच्चे की जाँच पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले बच्चे की परेशानी और बुखार या दस्त के लक्षणों को माता-पिता से आराम से सुना जाता है।
  • बच्चे के बाहर खेलने के रूटीन और इस्तेमाल की जा रही भारी दवाओं के बारे में पूछा जाता है।
  • बच्चे के खाने-पीने और बाहर का खाना लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • पेशाब के रंग, मल की प्रकृति और कमज़ोरी की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद बच्चे के लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो उसकी इम्युनिटी को अंदर से मज़बूत करे।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

बीमारी का इलाज पूरी तरह से हर बच्चे के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे इन्फेक्शन कितना गहरा है और एंटीबायोटिक्स पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर उल्टी, दस्त या घमौरियों की शुरुआत है, तो आमतौर पर 3 से 5 दिनों में ही पुदीने और धनिये के पानी से आराम आ जाता है।
  • गंभीर बीमारी का समय: अगर टाइफाइड या पीलिया है, तो लिवर और आँतों को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ होने में 4 से 6 हफ्ते लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: डाइट का कड़ाई से पालन करने पर बच्चे की इम्युनिटी मज़बूत हो जाती है और गर्मी में बार-बार बीमार पड़ने की संभावना खत्म हो जाती है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य एंटीबायोटिक्स और पेनकिलर्स से बुखार या दस्त को तुरंत रोकना अग्नि सुधारकर और पित्त शांत कर शरीर की प्राकृतिक इम्युनिटी बढ़ाना
नज़रिया संक्रमण को केवल कीटाणुओं की समस्या मानना कमजोर गट, पाचन और इम्युनिटी असंतुलन को मूल कारण मानना
उपचार तरीका भारी एंटीबायोटिक्स और दवाओं पर निर्भरता सौंफ, पुदीना, गिलोय और प्राकृतिक उपायों से गट को मज़बूत करना
डाइट और लाइफस्टाइल दवाओं पर मुख्य फोकस, सीमित खान-पान सलाह हल्का सुपाच्य भोजन, प्राकृतिक पेय और संतुलित दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर अच्छे बैक्टीरिया नष्ट होकर बच्चा बार-बार बीमार पड़ना इम्युनिटी मजबूत होकर बच्चा प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहना

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • बच्चे को लगातार उल्टियाँ हो रही हों और वह पानी की एक घूँट भी न पचा पा रहा हो।
  • दस्त के कारण बच्चा बिल्कुल सुस्त पड़ जाए और आँखें अंदर धँस जाएँ (गंभीर डिहाइड्रेशन)।
  • तेज़ धूप से आने के बाद बच्चे को भयंकर सिरदर्द हो और वह बेहोश होने लगे।
  • बुखार की दवा देने के बाद भी तापमान 102 डिग्री से ऊपर बना रहे।

समय पर सलाह लेने से बच्चे को बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के अनुसार गर्मी के मौसम में बच्चों को होने वाली बीमारियाँ मुख्य रूप से शरीर में 'पित्त दोष' के भड़कने और पाचक अग्नि के कमज़ोर होने का परिणाम हैं। तेज़ धूप, दूषित पानी और बाहर का जंक फूड बच्चों के नाज़ुक शरीर में टॉक्सिन्स ('आम') पैदा करते हैं, जिससे हीट स्ट्रोक, दस्त और घमौरियाँ जैसी 5 बीमारियाँ आसानी से घेर लेती हैं। केवल भारी दवाइयाँ या एंटीबायोटिक्स इसका स्थायी समाधान नहीं हैं। बच्चों को सौंफ, पुदीना, धनिया जैसी ठंडी तासीर वाली प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ और सही आहार देकर उनके पाचन और इम्युनिटी को अंदर से मज़बूत किया जा सकता है।

FAQs

बच्चों को दिन भर में पर्याप्त मात्रा में हल्का गुनगुना पानी, नारियल पानी और ताज़ा छाछ पिलाते रहें। खेलते समय बीच-बीच में पानी पीने की आदत डालें ताकि शरीर का पानी सूखे नहीं।

बिल्कुल नहीं। आइसक्रीम और फ्रिज का ठंडा पानी बच्चों की पाचक अग्नि को पूरी तरह सुन्न कर देते हैं, जिससे शरीर में कफ और वात बढ़ता है और खाना पचने के बजाय पेट में सड़ने लगता है।

लू लगने पर बच्चे को ठंडी जगह पर लिटाएँ। कच्चा आम भूनकर उसका पना (आम पन्ना) बनाकर पिलाएँ और शरीर के तापमान को कम करने के लिए माथे पर चंदन का ठंडा लेप लगाएँ।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार जब गर्मी से पित्त दोष भड़कता है और पाचक अग्नि कमज़ोर होती है, तो शरीर खाने को पचा नहीं पाता और अपचे खाने को दस्त के रूप में शरीर से तुरंत बाहर फेंकने लगता है।

बच्चों को सूती और ढीले कपड़े पहनाएँ। नहलाते समय मुल्तानी मिट्टी या नीम के पानी का इस्तेमाल करें, यह पसीने की ग्रंथियों को खोलता है और त्वचा की भारी जलन व लालपन को तुरंत शांत करता है।

गर्मी के मौसम में शरीर अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल बाहरी तापमान से लड़ने और शरीर को ठंडा रखने में करता है, जिस कारण पेट की पाचक अग्नि प्राकृतिक रूप से कमज़ोर और सुस्त पड़ जाती है।

हाँ, नारियल पानी तासीर में बहुत ठंडा (पित्तशामक) और इलेक्ट्रोलाइट्स से भरपूर होता है। यह गर्मी में डिहाइड्रेशन से बचाने और पेशाब की जलन को दूर करने का सबसे बेहतरीन प्राकृतिक उपाय है।

गर्मियों में बाहर की बर्फ, खुले में रखा गन्ने का रस या कटे हुए फल बहुत जल्दी बैक्टीरिया पकड़ लेते हैं। ये दूषित चीज़ें सीधे लिवर और आँतों पर हमला कर टाइफाइड और पीलिया जैसी गंभीर बीमारियाँ फैलाती हैं।

बिल्कुल, पुदीना और सौंफ बच्चों के लिए बहुत ही सौम्य और ठंडी औषधियाँ हैं। ये पेट की गर्मी को बाहर निकालते हैं, गैस व मरोड़ को खत्म करते हैं और कमज़ोर पाचन को तुरंत दुरुस्त करते हैं।

हाँ, बार-बार भारी एंटीबायोटिक्स देने से बीमारी के साथ-साथ आँतों के सारे अच्छे बैक्टीरिया (Gut flora) भी मर जाते हैं, जिससे बच्चे का पाचन और प्राकृतिक इम्युनिटी हमेशा के लिए कमज़ोर पड़ जाती है।

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