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30 की उम्र में Bone Loss शुरू - Working Women के लिए चेतावनी

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 26 May, 2026
  • category-iconUpdated on 12 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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आज की इस भागमभाग भरी जिंदगी में वर्किंग विमेन घर और ऑफिस, दोनों मोर्चे संभालते हुए अपनी सेहत पर ध्यान देना जैसे भूल ही जाती हैं। सुबह सोकर उठते ही कमर का वो हल्का सा दर्द हो, या सीढ़ियां चढ़ते वक्त घुटनों का चटकना, वे इन सबको बस दिनभर की थकान समझकर टाल देती हैं। एक पेनकिलर खाई और बस, निकल पड़ीं अपने काम पर।

लेकिन यह महज़ थकान नहीं है। मेडिकल साइंस के अनुसार, 30 वर्ष की आयु के बाद महिलाओं के शरीर में नई हड्डियाँ बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और पुरानी हड्डियाँ तेज़ी से घुलने लगती हैं। यह एक खामोश डैमेज है जो आपकी रीढ़ और जोड़ों को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है, और अगर इसे समय रहते नहीं समझा गया, तो भविष्य में यह गंभीर फ्रैक्चर और हमेशा के लिए अपाहिज कर देने वाले दर्द का कारण बन सकता है।

30 की उम्र में कामकाजी महिलाओं की हड्डियाँ क्यों कमज़ोर होने लगती हैं?

महिलाओं के शरीर का ढाँचा 30 की उम्र तक अपनी पीक बोन मास (Peak Bone Mass) हासिल कर लेता है। इसके बाद, अगर शरीर को सही पोषण और माहौल न मिले, तो निम्नलिखित कारणों से हड्डियाँ खोखली होने लगती हैं:

  • हॉर्मोनल बदलाव (Hormonal Changes): 30 के बाद महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन (Estrogen) हॉर्मोन का स्तर धीरे-धीरे डगमगाने लगता है। एस्ट्रोजन हड्डियों की सुरक्षा करता है, और इसकी कमी से ऑस्टियोपोरोसिस की शुरुआत बहुत तेज़ी से होती है।
  • विटामिन डी और कैल्शियम की भारी कमी: ऑफिस में 9 से 5 बजे तक लगातार कुर्सी पर बैठे रहने और धूप न सेंकने के कारण शरीर में विटामिन डी का स्तर शून्य हो जाता है। बिना विटामिन डी के, शरीर कैल्शियम को सोख ही नहीं पाता।
  • अत्यधिक तनाव और कॉर्टिसोल (Cortisol): करियर और परिवार को बैलेंस करने का मानसिक तनाव शरीर में कॉर्टिसोल हॉर्मोन बढ़ाता है। यह हॉर्मोन सीधे तौर पर नई हड्डियों के निर्माण (Bone formation) को रोक देता है।

हड्डियों के इस नुकसान (Bone Loss) के कौन-कौन से प्रकार हो सकते हैं?

बोन लॉस हर महिला में एक ही तरीके से नहीं होता है। आपकी जीवनशैली और शरीर के अंदरूनी हॉर्मोन्स के आधार पर, यह हड्डियों का कमज़ोर होना इन खतरनाक रूपों में सामने आ सकता है:

  • ऑस्टियोपीनिया (Osteopenia): यह बोन लॉस की शुरुआती स्टेज है। इसमें हड्डियों का घनत्व (Bone density) सामान्य से कम हो जाता है, लेकिन यह इतना कम नहीं होता कि इसे ऑस्टियोपोरोसिस कहा जाए। यह एक बड़ा वार्निंग साइन है।
  • ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis): जब हड्डियों के सिरों पर मौजूद कुशन (Cartilage) घिसने लगता है, तो जोड़ों के बीच की जगह कम हो जाती है। इसमें घुटनों और उँगलियों में भयंकर दर्द और सूजन रहती है।
  • सेकेंडरी बोन लॉस (Secondary Bone Loss): यह स्थिति किसी अन्य बीमारी जैसे थायराइड के असंतुलन या पीसीओडी (PCOD) की तेज़ दवाइयों के साइड-इफेक्ट के कारण पैदा होती है, जो हड्डियों को अंदर से गलाने लगती है।

शरीर के किन खामोश संकेतों से पहचानें कि हड्डियाँ खोखली हो रही हैं?

हड्डियों का गिरता हुआ घनत्व एक 'साइलेंट डिसीज़' है जो तब तक आवाज़ नहीं करता जब तक कोई हड्डी टूट न जाए। फिर भी, आपका शरीर बहुत पहले से ये खामोश अलार्म बजाने लगता है:

  • लगातार पीठ और कमर का दर्द: काम करते समय या ज़्यादा देर खड़े रहने पर कमर का दर्द महसूस होना, जो आराम करने के बाद भी पूरी तरह ठीक नहीं होता है। यह रीढ़ की हड्डी के कमज़ोर होने का इशारा है।
  • मसूड़ों का सिकुड़ना (Receding Gums): अगर आपके मसूड़े दाँतों को छोड़ रहे हैं और दाँत कमज़ोर महसूस हो रहे हैं, तो यह आपके जबड़े की हड्डी (Jawbone) के लॉस का सीधा संकेत है।
  • हाथों की कमज़ोर ग्रिप (Weak Grip Strength): जार का ढक्कन खोलने या भारी सामान उठाने में अचानक तकलीफ महसूस होना, जो कलाई और उँगलियों की हड्डियों में डैमेज को दर्शाता है।
  • बिना बात की थकावट: पूरा दिन काम करने की ऊर्जा न बचना और सुबह उठते ही शरीर में क्रोनिक फटीग और भारीपन महसूस होना।

हड्डियों को मज़बूत बनाने के चक्कर में महिलाएं क्या भयंकर गलतियाँ करती हैं?

दर्द और कमज़ोरी से घबराकर महिलाएं अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स और नुस्खे अपना लेती हैं, जो उनकी हड्डियों और किडनी को लंबे समय के लिए नुकसान पहुँचाते हैं:

  • कैल्शियम सप्लीमेंट्स का अंधाधुंध सेवन: बिना डॉक्टर की सलाह के रोज़ाना भारी कैल्शियम की गोलियां खाना। यह अतिरिक्त कैल्शियम हड्डियों में जाने के बजाय किडनी में पथरी (Stones) बनाता है और नसों को कड़क कर देता है।
  • पेनकिलर्स (Painkillers) की लत: थोड़ा सा दर्द होने पर तुरंत पेनकिलर खा लेना। ये दवाइयाँ शरीर की पाचन क्रिया को बिगाड़ती हैं और पेट के साथ-साथ बोन मैरो (Bone marrow) को भी सप्रेस (Suppress) कर देती हैं।
  • वज़न घटाने के लिए क्रैश डाइटिंग: पतले दिखने की चाहत में खाना छोड़ देना। इससे शरीर को ज़रूरी फैट्स और मिनरल्स नहीं मिलते, और शरीर ऊर्जा के लिए अपनी ही हड्डियों से कैल्शियम खींचने लगता है।

आयुर्वेद 'कमज़ोर हड्डियों' और 'बोन लॉस' को किस नज़रिए से समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे केवल कैल्शियम की कमी और हॉर्मोन्स का खेल मानता है, आयुर्वेद उसे शरीर में 'अस्थि धातु' के क्षय, दूषित 'अग्नि' और भड़के हुए वात के असंतुलन के रूप में गहराई से समझता है:

  • वात दोष का रूखापन: आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में हड्डियाँ (अस्थि) वात दोष का मुख्य स्थान हैं। जब 30 की उम्र के बाद शरीर में वात बढ़ता है, तो वह हड्डियों की प्राकृतिक नमी और घनत्व को सुखाकर उन्हें भुरभुरा (Porous) बना देता है।
  • अग्निमांद्य (कमज़ोर पाचन): अगर आपका पाचन तंत्र कमज़ोर है, तो आप कितना भी कैल्शियम खा लें, शरीर उसे पचा नहीं पाएगा। जठराग्नि की कमज़ोरी से पोषण हड्डियों (अस्थि धातु) तक पहुँचने से पहले ही 'आम' (Toxins) में बदल जाता है।
  • हॉर्मोनल असंतुलन और ओजस: अत्यधिक काम के दबाव के कारण जब नींद पूरी न होना दिनचर्या बन जाता है, तो शरीर का 'ओजस' (Vitality) गिर जाता है, जिससे हॉर्मोनल असंतुलन पैदा होता है और अस्थि धातु का क्षय होता है।

हड्डियों को प्राकृतिक रूप से फौलादी बनाने वाली आयुर्वेदिक डाइट

अपनी हड्डियों को 30 की उम्र के बाद भी मज़बूत रखने के लिए आपको अपनी डाइट में 'वात-नाशक' और कैल्शियम से भरपूर आहार शामिल करना होगा। इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी दिनचर्या बनाएं:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - हड्डियों को पोषण देने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - हड्डियों को गलाने वाले)
अनाज (Grains) रागी (कैल्शियम का खजाना), पुराना चावल, ओट्स, ज्वार। मैदा, वाइट ब्रेड, बासी और बहुत ज़्यादा पैकेटबंद बिस्कुट।
वसा और बीज (Fats & Seeds) देसी गाय का शुद्ध घी, सफेद तिल (Sesame seeds), बादाम। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा बाज़ार का ट्रांस फैट।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, पालक (पका हुआ), गाजर, सहजन (Drumsticks)। भारी कटहल, बैंगन, बहुत ज़्यादा कच्चा सलाद (वात बढ़ाता है)।
फल (Fruits) उबला हुआ सेब, आँवला, पपीता, अंजीर (Figs), मुनक्का। बहुत ज़्यादा खट्टे फल, बिना मौसम के डिब्बाबंद जूस।
पेय पदार्थ (Beverages) हल्दी वाला दूध (रात को घी के साथ), धनिया-जीरे का पानी। अत्यधिक डार्क कॉफी, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स (हड्डियों का कैल्शियम खींचते हैं)।

अस्थि धातु के लिए जड़ी-बूटियाँ

कुदरत ने हमें कुछ ऐसी नायाब चीजें तोहफे में दी हैं, जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के हमारी हड्डियों को अंदर से ठोस और मजबूत बनाती हैं:

  • अस्थिश्रृंखला: इसका नाम ही बताता है कि यह हड्डियों को जोड़ने और मज़बूत करने का काम करती है। यह आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी बोन मिनरल डेंसिटी को बढ़ाने और फ्रैक्चर के रिस्क को कम करने में सबसे असरदार है।
  • अश्वगंधा: 30 की उम्र में जब स्ट्रेस आपकी हड्डियों को गला रहा होता है, तो अश्वगंधा स्ट्रेस हॉर्मोन्स को कम करता है और हड्डियों के साथ-साथ मांसपेशियों को भी भारी ताक़त देता है।
  • शतावरी: महिलाओं के लिए यह सबसे बेहतरीन रसायन है। यह एक प्राकृतिक फाइटोएस्ट्रोजन है, जो उम्र के साथ कम हो रहे एस्ट्रोजन को बैलेंस करती है और बोन लॉस को रोकती है।
  • गिलोय: यह शरीर से एसिडिटी और टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर सूजन को खत्म करती है, जिससे हड्डियों और जोड़ों को नुकसान से बचाया जा सके।

हड्डियों और जोड़ों को मज़बूत करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब हड्डियाँ अंदर से बहुत कमज़ोर हो चुकी हों और खराब पोश्चर के कारण दर्द लगातार बना हो, तो पंचकर्म की ये क्लासिकल थेरेपीज़ शरीर को तुरंत डिकंप्रेस कर देती हैं:

  • अभ्यंग मालिश: वात दोष को शांत करने और हड्डियों में प्राकृतिक चिकनाई (Lubrication) वापस लाने के लिए महानारायण या क्षीरबला जैसे शुद्ध औषधीय तेलों से पूरे शरीर की डीप-टिशू मालिश की जाती है।
  • बस्ती कर्म (Enema): आयुर्वेद में वात और बोन डैमेज को रोकने के लिए 'बस्ती' को आधा इलाज माना गया है। मेडिकेटेड ऑयल (मात्रा बस्ती) सीधे तौर पर आंतों के ज़रिए अस्थि धातु तक पहुँचकर हड्डियों को फौलादी बनाती है।
  • कटि बस्ती और ग्रीवा बस्ती: जो महिलाएं घंटों लैपटॉप पर काम करती हैं, उनकी कमर और गर्दन की हड्डियों में दर्द के लिए औषधीय तेल का एक घेरा बनाकर सिकाई की जाती है, जिससे गर्दन और कंधों में जकड़न तुरंत खुल जाती है।

हड्डियों के प्राकृतिक रूप से रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

सालों के खराब खानपान और स्ट्रेस से खोखली हुई हड्डियों को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने और घनत्व बढ़ाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और डाइट से आपका बढ़ा हुआ वात शांत होगा। सुबह उठकर होने वाली जकड़न (Morning Stiffness) और दिन भर रहने वाला कमर दर्द काफी हद तक कम हो जाएगा।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म (बस्ती) और रसायनों के प्रभाव से जठराग्नि भोजन से कैल्शियम सोखना शुरू कर देगी। जोड़ों की कट-कट की आवाज़ बंद होगी और शरीर में नई ऊर्जा आएगी।
  • 5-6 महीने: आपकी अस्थि धातु और हॉर्मोनल सिस्टम पूरी तरह से पोषित हो जाएंगे। आप बिना किसी बाहरी कैल्शियम सप्लीमेंट के, एक प्राकृतिक, सुरक्षित और दर्दरहित जीवन जीना शुरू कर देंगी।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

बोन लॉस और कमज़ोर हड्डियों के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य बोन लॉस को धीमा करने के लिए बिस्फोस्फोनेट्स (Bisphosphonates) और सिंथेटिक कैल्शियम/विटामिन डी के सप्लीमेंट्स देना। वात को शांत करना, अस्थि धातु को पोषण देना और जठराग्नि सुधारकर शरीर को खुद कैल्शियम सोखने लायक बनाना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल कैल्शियम की कमी और बढ़ती उम्र का एक मैकेनिकल (Mechanical) व हॉर्मोनल इरर मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात दोष और 'ओजस' के क्षय का एक संपूर्ण सिंड्रोम (Syndrome) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट में केवल दूध पीने और कैल्शियम की गोलियां खाने की आम सलाह दी जाती है। डाइट में 'स्नेहन' (घी), वात-नाशक भोजन, और शिरोधारा थेरेपी द्वारा स्ट्रेस कम करने पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर सप्लीमेंट्स बंद करने पर हड्डियाँ फिर से तेज़ी से कमज़ोर होने लगती हैं और गोलियों से किडनी पर असर पड़ता है। शरीर का मेटाबॉलिज़्म और हड्डियाँ अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि वे प्राकृतिक रूप से कैल्शियम को होल्ड करना सीख जाती हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालाँकि आयुर्वेद आपकी हड्डियों की कमज़ोरी को प्राकृतिक रूप से पूरी तरह रिवर्स और रिपेयर कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये गंभीर बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल इमरजेंसी में जाना ज़रूरी हो जाता है:

  • हल्की सी चोट पर हड्डी टूटना (Fragility Fracture): अगर हल्का सा पैर मुड़ने या छींकने/खाँसने भर से पसलियों या कलाई की हड्डी टूट जाए (यह सीवियर ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत है)।
  • लंबाई (Height) का अचानक कम होना: अगर आपको महसूस हो कि आपकी लंबाई पहले से 1-2 इंच कम हो गई है और आपकी पीठ आगे की तरफ झुक (Stooped posture) गई है।
  • रीढ़ की हड्डी में असहनीय दर्द: अगर पीठ के बीच में अचानक इतना भयंकर दर्द उठे कि सीधा खड़ा होना असंभव हो जाए (यह स्पाइनल कम्प्रेशन फ्रैक्चर हो सकता है)।
  • हाथ या पैर का सुन्न पड़ना: कमर या गर्दन के दर्द के साथ अगर हाथ-पैरों में सुन्नपन आ जाए और ताक़त बिल्कुल खत्म हो जाए (यह नस दबने का बड़ा अलार्म है)।

निष्कर्ष

अपने शरीर की हड्डियों को एक घर की नींव की तरह समझें। जब आप 30 की उम्र के बाद काम और ज़िम्मेदारियों के बोझ तले अपनी डाइट और नींद को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो यह नींव अंदर ही अंदर खोखली होने लगती है। रोज़ सुबह उठकर कमर का अकड़ना, जार का ढक्कन खोलते हुए कलाई में दर्द होना और दिन भर थकावट महसूस करना, ये कोई सामान्य 'महिलाओं की कमज़ोरी' नहीं है; यह एक अलार्म है कि आपका 'वात दोष' बेकाबू हो चुका है और आपकी 'अस्थि धातु' तेज़ी से नष्ट हो रही है। केवल बाज़ार से कैल्शियम की गोलियां खरीदकर या दर्द को पेनकिलर्स से दबाकर इस डैमेज को टालने की कोशिश न करें, क्योंकि यह आपके शरीर के ढाँचे को हमेशा के लिए अपाहिज कर रहा है।

पेनकिलर्स की लत और खोखली होती हड्डियों के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलें। बाहर के रूखे जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक्स को छोड़कर हमेशा पौष्टिक, सुपाच्य और शुद्ध गाय के घी से बना भोजन खाएं। अपनी डाइट में रागी, सफेद तिल और हल्दी वाला दूध शामिल करें। हड़जोड़, अश्वगंधा और शतावरी जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की बस्ती व अभ्यंग मालिश से अपनी सूखी और कमज़ोर हड्डियों को प्राकृतिक चिकनाई देकर नया जीवन दें। 30 के बाद शुरू होने वाले इस बोन लॉस को अपनी नियति न बनने दें, आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, ऐसा ज़रूरी नहीं है। 30 के बाद बोन रिप्लेसमेंट की प्रक्रिया थोड़ी धीमी ज़रूर हो जाती है, लेकिन अगर आपकी लाइफस्टाइल अच्छी है, आप पर्याप्त सूर्य की रोशनी (Vitamin D) लेती हैं और आपकी जठराग्नि मज़बूत है, तो आप अपने पीक बोन मास (Peak bone mass) को बुढ़ापे तक सुरक्षित रख सकती हैं।

दूध कैल्शियम का अच्छा स्रोत है, लेकिन केवल दूध पीने से हड्डियां मज़बूत नहीं होतीं। अगर आपके शरीर में विटामिन डी की कमी है या आपका पाचन कमज़ोर है (लैक्टोज़ इनटॉलरेंस या आम), तो वह कैल्शियम आपकी हड्डियों तक पहुँचेगा ही नहीं। दूध को हमेशा हल्दी या घी के साथ लेना चाहिए ताकि वह आसानी से पच सके।

शत-प्रतिशत। कैफीन एक प्राकृतिक डाइयूरेटिक (Diuretic) है, जो शरीर से पेशाब के रास्ते कैल्शियम को बाहर निकाल देता है। इसके अलावा, बहुत ज़्यादा कॉफी पीने से वात दोष बढ़ता है, जिससे हड्डियां रूखी और भुरभुरी (Porous) हो जाती हैं।

सुबह की पहली धूप (Morning sun) सबसे ज़्यादा फायदेमंद होती है। सुबह 8 बजे से 10 बजे के बीच कम से कम 20-30 मिनट धूप में टहलना चाहिए। इसके अलावा, डाइट में गाय का घी और ज़रूरत पड़ने पर आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से प्राकृतिक सप्लीमेंट्स लिए जा सकते हैं।

बिल्कुल सुरक्षित और बेहद ज़रूरी है। वेट-ट्रेनिंग या रेजिस्टेंस एक्सरसाइज़ हड्डियों पर एक सुरक्षित तनाव (Stress) डालती है, जिससे शरीर को नई बोन सेल्स (Osteoblasts) बनाने का सिग्नल मिलता है। यह बोन डेंसिटी को तेज़ी से बढ़ाने का सबसे असरदार तरीका है।

हाँ, अत्यधिक रिफाइंड चीनी शरीर में अम्लीयता (Acidity) बढ़ाती है। शरीर इस एसिड को न्यूट्रलाइज़ (Neutralize) करने के लिए आपकी हड्डियों से कैल्शियम खींचने लगता है। इसलिए ज़्यादा चीनी और मीठे प्रोडक्ट्स आपकी हड्डियों को अंदर से गलाने का काम करते हैं।

प्रेगनेंसी और ब्रेस्टफीडिंग के दौरान शिशु को माँ के शरीर से काफी कैल्शियम मिलता है। अगर माँ का पाचन सही नहीं है और डाइट कमज़ोर है, तो शरीर माँ की हड्डियों से कैल्शियम खींच लेता है। इसीलिए डिलीवरी के बाद आयुर्वेद में विशेष सूतिका परिचर्या (Postnatal care) और घी के सेवन पर बहुत ज़ोर दिया जाता है।

जेनेटिक्स एक भूमिका निभाते हैं, लेकिन यह आपकी नियति (Destiny) नहीं है। अगर आपकी फैमिली हिस्ट्री है, तो आपको 30 की उम्र से ही अपनी डाइट, एक्सरसाइज़ और जठराग्नि पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आयुर्वेद के पालन से आप इस जेनेटिक प्रीडिस्पोज़िशन को ट्रिगर होने से रोक सकती हैं।

हाँ, आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विज्ञान दोनों मानते हैं कि रागी (Finger millet) में किसी भी अन्य अनाज या दूध की तुलना में बहुत अधिक कैल्शियम होता है। इसे अपनी डाइट में दलिया, रोटी या चीले के रूप में शामिल करना बोन डेंसिटी के लिए एक जादुई उपाय है।

लंबे समय तक दर्द निवारक (NSAIDs) खाने से बोन हीलिंग और नई हड्डी बनने की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है। इसके साथ ही, स्टेरॉयड युक्त दवाइयों का लंबे समय तक इस्तेमाल हड्डियों के घनत्व (Bone density) को तेज़ी से गिरा देता है, जिससे हल्का सा मुड़ने पर भी फ्रैक्चर का रिस्क कई गुना बढ़ जाता है।

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