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IT Professional का 35 के बाद का Health Crisis - 7 Common Diseases

Information By Dr. Keshav Chauhan

आज के समय में कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करना सफलता और एक अच्छे करियर की निशानी माना जाता है। वातानुकूलित (एसी) दफ़्तर, अच्छी तनख्वाह और आरामदायक कुर्सी, बाहर से देखने में यह ज़िंदगी बहुत ही शानदार लगती है। लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि पैंतीस की उम्र पार करते ही, इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का शरीर अचानक जवाब क्यों देने लगता है?

जब आप लगातार दस-बारह घंटे सिर्फ स्क्रीन को घूरते हुए बिताते हैं, तो शरीर अंदर ही अंदर एक गहरी थकावट का शिकार होने लगता है। गर्दन में एक हल्की सी चुभन से शुरू हुई बात कब सर्वाइकल और पेट की गैस में बदल जाती है, इंसान को पता ही नहीं चलता। पैंतीस की उम्र के बाद शरीर की प्राकृतिक रिकवरी (ठीक होने की क्षमता) धीमी पड़ जाती है, और तब एक कुर्सी पर बिताए गए सालों का बिल आपका शरीर आपको सौंपता है। यह महज़ बढ़ती उम्र का असर नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकट है जो आज हर दूसरे व्यक्ति को अपनी चपेट में ले रहा है।

यह स्वास्थ्य संकट असल में क्या है?

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, इसे 'गतिहीन जीवनशैली से जुड़ी बीमारी' कहा जाता है। मानव शरीर को लगातार चलने-फिरने और मेहनत करने के लिए बनाया गया था। जब हम इसे घंटों तक एक ही मुद्रा में कुर्सी पर कैद कर देते हैं, तो शरीर का चयापचय बहुत धीमा पड़ जाता है, रक्त संचार बाधित होता है और मांसपेशियाँ सिकुड़ने लगती हैं।

वहीं, आयुर्वेद इस संकट को मुख्य रूप से 'वात' और 'पित्त' दोष के असंतुलन के रूप में देखता है। लगातार स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी और अत्यधिक मानसिक कार्य वात दोष को बढ़ाते हैं, जो शरीर में रूखापन और अंगों में क्षय लाता है। दूसरी ओर, घंटों तक बिना हिले-डुले बैठे रहने से हमारी जठराग्नि (पाचन अग्नि) बुझने लगती है। बिना भूख के खाना या गलत समय पर खाने से पेट में 'आम' (विषैले तत्व) पैदा होता है, जो शरीर के हर जोड़ और नस में जाकर बैठ जाता है और दर्द व बीमारियों को जन्म देता है।

ये स्वास्थ्य संकट किन रूपों और बीमारियों में प्रकट होता है?

पैंतीस की उम्र के बाद, शारीरिक गतिविधि की कमी और मानसिक दबाव का यह गठजोड़ मुख्य रूप से सात गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आता है:

  • सर्वाइकल और कमर का दर्द: स्क्रीन की तरफ लगातार झुककर काम करने से रीढ़ की हड्डी और गर्दन की मांसपेशियों पर भारी दबाव पड़ता है, जो स्थायी दर्द बन जाता है।
  • आँखों का सूखापन (Dry Eyes): कंप्यूटर पर काम करते समय पलकें कम झपकती हैं, जिससे आँखों की प्राकृतिक नमी खत्म हो जाती है और हमेशा जलन महसूस होती है।
  • मोटापा और मधुमेह: शारीरिक श्रम शून्य होने के कारण वज़न तेज़ी से बढ़ता है, और शरीर में इंसुलिन का संतुलन बिगड़ने से शुगर की बीमारी घर कर लेती है।
  • तनाव और अनिद्रा: दफ़्तर के काम का भारी दबाव और देर रात तक स्क्रीन देखने से दिमाग शांत नहीं हो पाता, जिससे रात-रात भर नींद नहीं आती।
  • पाचन और एसिडिटी की समस्या: कुर्सी पर बैठे-बैठे भोजन करने से खाना पचता नहीं है, जिससे गैस, कब्ज़ और खट्टी डकारें आना रोज़ की बात हो जाती है।
  • घुटनों और जोड़ों का दर्द: शरीर का बढ़ता वज़न और कुपित वात घुटनों की हड्डियों के बीच मौजूद कुशन (कार्टिलेज) को पूरी तरह घिस देता है, जिससे ह‌ड्डियाँ आपस में टकराने लगती हैं। साथ ही, जोड़ों के बीच की वह प्राकृतिक 'ग्रीस' सूख जाती है जो मोड़ने में मदद करती है।
  • हृदय संबंधी रोग: लगातार बैठे रहने से नसों में खून का बहाव धीमा पड़ता है, जो तनाव के साथ मिलकर उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) को जन्म देता है।

ये बीमारियाँ कौन से संकेत देती हैं?

हमारा शरीर किसी भी बड़ी बीमारी के आने से पहले खतरे की घंटी ज़रूर बजाता है। यदि आप भी इस पेशे में हैं, तो आपको शरीर के इन संकेतों को बिल्कुल नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए:

  • सुबह सोकर उठने पर गर्दन, पीठ और कंधों में अकड़न महसूस होना।
  • काम के बीच में आँखों में धुंधलापन आना या सिर के पिछले हिस्से में तेज़ दर्द उठना।
  • बार-बार मीठा खाने की इच्छा होना या बिना कोई मेहनत किए हमेशा थका-थका सा महसूस करना।
  • घुटनों से आवाज़ आना, यानी उठते या बैठते समय बहुत तेज़ 'कटकट' की आवाज़ आना, जो सूखी हई ह‌ड्डियों के आपस में रगड़ने का संकेत है।
  • रात को बिस्तर पर जाने के बाद भी घंटों तक दिमाग में काम के विचार चलना और बेचैनी महसूस होना।

आगे चलकर ये क्या परेशानियाँ दे सकता है?

अगर काम के दबाव में इन शुरुआती संकेतों को रोज़ाना दर्द निवारक गोलियों से दबा दिया जाए, तो भविष्य में यह बहुत बड़ी मुसीबत बन सकता है:

  • रीढ़ की हड्डी की डिस्क का खिसकना (Slipped Disc), जिसके कारण व्यक्ति महीनों तक बिस्तर पकड़ सकता है।
  • मानसिक तनाव इतना बढ़ जाना कि व्यक्ति क्रोनिक डिप्रेशन का शिकार हो जाए, जिससे उसका करियर और निजी जीवन दोनों तबाह हो जाएँ।
  • कार्टिलेज न होने के कारण हड्डियों के किनारे खुद को बचाने के लिए अतिरिक्त हड्डी (Spurs) बनाने लगते हैं, जो चलते समय घुटनों में दर्द को भयानक रूप दे देता है। कई बार तो नौबत सर्जरी तक आ जाती है।
  • छोटी सी उम्र में हृदय की नसों में ब्लॉकेज होना या दिल का दौरा पड़ने जैसी जानलेवा स्थितियाँ पैदा होना।

आयुर्वेद इस समस्या को कैसे देखता है और कौन से उपाय मदद कर सकते हैं?

आयुर्वेद इन सातों बीमारियों को अलग-अलग नहीं देखता, बल्कि इन्हें एक ही खराब जीवनशैली की शाखाएँ मानता है। दफ़्तरों में लगातार ठंडे वातावरण में रहने से परेशानी और बढ़ जाती है। वात दोष की तासीर ठंडी होती है, इसलिए जब जोड़ों पर एसी की सीधी ठंडी हवा लगती है, तो नसों और मांसपेशियों में सिकुड़न आ जाती है, जिससे अकड़न और दर्द तुरंत बढ़ जाता है।

आयुर्वेद इन परेशानियों को जड़ से मिटाने के लिए वात दोष को शांत करने, शरीर की अग्नि (पाचन) को दोबारा प्रज्वलित करने और सूखी हुई नसों व जोड़ों में वापस नमी (स्नेहन) लाने पर काम करता है।

लंबे समय तक ऑफिस में बैठकर काम करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

समय क्या खाएँ संभावित लाभ
सुबह उठते ही 1–2 गिलास हल्का गुनगुना पानी रातभर जमा अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने और पाचन को सक्रिय करने में सहायक
खाली पेट जीरा-सौंफ-धनिया का पानी पाचन को सपोर्ट करने और दिन की शुरुआत हल्केपन के साथ करने में मदद
नाश्ता (7:30–9:00 AM) पोहा, उपमा, दलिया, मूंग दाल चीला या ओट्स + 4–5 भीगे बादाम स्थिर ऊर्जा और बेहतर एकाग्रता के लिए
मिड-मॉर्निंग (11 AM) सेब, अमरूद, पपीता या नारियल पानी अनहेल्दी स्नैकिंग से बचाव और हाइड्रेशन
दोपहर का भोजन (1–2 PM) 2 रोटी, मूंग/मसूर दाल, मौसमी सब्ज़ी, सलाद, 1 चम्मच घी संतुलित पोषण और दोपहर की थकान कम करने में सहायक
भोजन के बाद 5–10 मिनट हल्की वॉक गैस, भारीपन और सुस्ती से बचाव
शाम का नाश्ता (4–5 PM) भुना चना, मखाना, हर्बल चाय या ग्रीन टी चाय-बिस्किट और जंक फूड की आदत कम करने में मदद
शाम (यदि भूख हो) फल या मुट्ठीभर नट्स ऊर्जा बनाए रखने के लिए
रात का भोजन (7–8:30 PM) मूंग दाल खिचड़ी, हल्की सब्ज़ी, सूप या दलिया पाचन पर कम भार
सोने से पहले हल्का गुनगुना पानी हाइड्रेशन बनाए रखने में सहायक

किस तरह की जड़ी-बूटियाँ इस स्थिति को सुधारने में मदद करती हैं?

कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों के लिए प्रकृति ने कुछ ऐसी खास औषधियाँ बनाई हैं, जो शरीर के नुकसान की भरपाई करती हैं:

  • अश्वगंधा: यह मानसिक तनाव को सोखने के साथ-साथ हड्डियों को ताकत देने और मांसपेशियों की कमज़ोरी को दूर करने के लिए सबसे बेहतरीन औषधि है।
  • त्रिफला: यह कमज़ोर पाचन को मज़बूत करता है और पेट साफ रखकर नया 'आम' (विषैला तत्व) बनने से रोकता है, ताकि पेट का भारीपन दूर हो।
  • गिलोय: यह जोड़ों की पुरानी सूजन को कम करता है और दफ़्तर के बंद माहौल में कमज़ोर हुई रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को तेज़ी से बढ़ाता है।
  • शतावरी: स्क्रीन के कारण सूखी हुई आँखों और नसों को अंदर से नमी प्रदान करने के लिए यह रसायन बहुत फायदेमंद है।

इस समस्या के लिए सबसे अच्छी आयुर्वेदिक थेरेपी कौन सी हैं?

जब शरीर की नसें पूरी तरह जकड़ चुकी हों और जड़ी-बूटियाँ गहराई तक न पहुँच पा रही हों, तो ये बाहरी पंचकर्म थेरेपी जादू की तरह काम करती हैं:

  • ग्रीवा बस्ती: इसमें गर्दन के पीछे उड़द की दाल का घेरा बनाकर औषधीय गर्म तेल भरा जाता है, जो सर्वाइकल के जमे हुए दर्द को तुरंत खींच लेता है।
  • शिरोधारा: माथे पर लगातार एक धार में औषधीय तेल गिराया जाता है। यह तनाव, अनिद्रा और दिमागी थकान को इस तरह धो देता है जैसे दिमाग को रीसेट कर दिया हो।
  • जानु बस्ती और अभ्यंग: घुटनों के दर्द के लिए जानु बस्ती कार्टिलेज को तुरंत पोषण देती है और दर्द को खींच लेती है। साथ ही, अभ्यंग मालिश शरीर की नसों को रिलैक्स करती है और वात दोष को कंट्रोल करती है।

आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से इस समस्या में सुधार का टाइमलाइन क्या है?

चूँकि यह समस्या कई सालों की गलत आदतों से बनी है, इसलिए इसे ठीक होने में भी एक व्यवस्थित समय लगता है:

  • शुरुआती 2-3 हफ्ते: सही हाइड्रेशन, स्नेहन और हर्बल औषधियों से जोड़ों की सूजन और भारीपन में तुरंत राहत मिलती है और अनिद्रा की समस्या कम होती है।
  • 1-2 महीने: जठराग्नि सुधरने से 'आम' नष्ट होने लगता है, घुटनों व गर्दन की जकड़न काफी कम हो जाती है और शरीर में एक नया आत्मविश्वास वापस आने लगता है।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से दिमाग की एकाग्रता वापस आती है, कार्टिलेज पोषित होने लगता है और शरीर बिना किसी दर्द के लंबी शिफ्ट में काम करने के लायक बन जाता है।

इन बीमारियों के इलाज के लिए आयुर्वेद बेहतर क्यों है?

अक्सर जब गर्दन या कमर में दर्द होता है, तो लोग रोज़ाना दर्द निवारक गोलियाँ खाना शुरू कर देते हैं, जो किडनी और पाचन तंत्र को अंदर ही अंदर खत्म कर देती हैं। ये दवाइयाँ सिर्फ कुछ घंटों के लिए दर्द का एहसास सुन्न करती हैं, बीमारी को नहीं मिटातीं।

आयुर्वेद इसलिए बेहतर है क्योंकि यह केवल दर्द को नहीं दबाता। यह आपको सिखाता है कि आप दफ़्तर में खड़े होकर और तेज़ी से पानी न पिएँ क्योंकि इससे शरीर में वात असंत‌ुलित होता है और जोड़ों के दर्द का कारण बनता है। आयुर्वेद आपकी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव करवाकर, नसों को प्राकृतिक तेलों से पोषित करके और सही खान-पान की मदद से इस पूरे 'सिंड्रोम' को पलट देता है, जिससे आपको दर्द निवारक गोलियों का मोहताज नहीं होना पड़ता।

डॉक्टर से कब सलाह लें?

हालाँकि जीवनशैली के कई दर्द प्राकृतिक रूप से ठीक हो जाते हैं, लेकिन शरीर में होने वाले इन गंभीर बदलावों पर तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए:

  • जब बैठे-बैठे अचानक सीने में बहुत भारी दबाव महसूस हो, पसीना आए और साँस फूलने लगे।
  • जब गर्दन का दर्द हाथों की उँगलियों तक पहुँच जाए और हाथ सुन्न पड़ने लगें।
  • चलते हुए अचानक घुटने का लॉक हो जाना, यानी जब घुटना पूरी तरह जाम हो जाए या आप गिर पड़ें।
  • जब लगातार कई हफ्तों तक रात में नींद न आए और बेचैनी व डिप्रेशन नियंत्रण से बाहर होने लगे।

निष्कर्ष

एक अच्छा करियर बनाने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आप उसके बदले में अपने शरीर की बलि दे दें। पैंतीस की उम्र के बाद आने वाला यह स्वास्थ्य संकट कोई सज़ा नहीं है, बल्कि आपके शरीर की एक चेतावनी है कि अब उसे आपकी देखभाल की ज़रूरत है। पेनकिलर्स की अंधी दौड़ छोड़कर, अगर आप अपनी जठराग्नि और वात दोष को संतुलित करने पर फोकस करते हैं, तो आपका शरीर वापस एक नई ऊर्जा से भर सकता है।

जीवा आयुर्वेद में हम यह समझते हैं कि आपकी नौकरी की कुछ मजबूरियाँ हैं, इसलिए हम आपकी दिनचर्या में ऐसे प्राकृतिक बदलाव और औषधियाँ शामिल करते हैं जो आसानी से आपके काम के साथ फिट हो जाएँ। सर्वाइकल, तनाव और जोड़ों के दर्द को अपना भाग्य न मानें। इस स्वास्थ्य संकट से हमेशा के लिए बाहर निकलने और एक दर्द-मुक्त जीवन की शुरुआत करने के लिए आज ही सीधे हमारे नंबर +919266714040 पर कॉल करें और जीवा आयुर्वेद के विशेषज्ञों से संपर्क करें।

FAQs

जी हाँ, हर 45 से 60 मिनट में अपनी कुर्सी से उठकर 2-3 मिनट स्ट्रेचिंग करने से शरीर में वात दोष इकट्ठा नहीं हो पाता और रक्त संचार सामान्य बना रहता है।

बिल्कुल नहीं। चाय और कॉफी शरीर में गर्मी (पित्त) और रूखापन (वात) बढ़ाते हैं। खाली पेट इन्हें पीने से गैस्ट्रिक अल्सर और लिवर की गंभीर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

गर्दन दर्द के रोगियों को सोते समय बहुत पतला तकिया इस्तेमाल करना चाहिए या फिर बिना तकिए के सीधे सोने की आदत डालनी चाहिए ताकि रीढ़ की हड्डी अपनी प्राकृतिक सीध में रहे।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार रात का समय शरीर के सोने और वात के शांत होने का होता है। रात-रात भर जागने से शरीर की प्राकृतिक घड़ी बिगड़ जाती है, जिससे रूखापन और मानसिक रोग बढ़ते हैं।

जी हाँ, स्क्रीन के कारण आँखों में पित्त (गर्मी) बढ़ जाती है। दिन में दो-तीन बार मुँह में पानी भरकर आँखों पर साफ़ ठंडे पानी के छींटे मारने से बहुत आराम मिलता है।

नहीं, अगर आपका शरीर पाँच दिन से अकड़ा हुआ है और आप अचानक से वीकेंड पर भारी कसरत करते हैं, तो लिगामेंट्स फटने और जोड़ों में गंभीर चोट लगने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। रोज़ाना हल्का व्यायाम ज़्यादा बेहतर है।

लगातार घंटों तक खड़े रहना भी शरीर के वज़न का सारा दबाव घुटनों पर डालता है। इसलिए कुर्सी पर बैठने और खड़े रहने के बीच एक सही संतुलन होना चाहिए।

काम के बीच में कलाई को गोल घुमाना और रात को सोने से पहले कलाई पर हल्के गर्म तिल के तेल की मालिश करना नसों की सिकुड़न और दर्द को दूर करने का बेहतरीन उपाय है।

नहीं, जिन लोगों के घुटने घिस चुके हैं या कार्टिलेज डैमेज है, उन्हें सीढ़ियाँ चढ़ने-उतरने से बचना चाहिए क्योंकि यह जोड़ों पर शरीर के वज़न का कई गुना ज़्यादा दबाव डालता है और वात दोष को बहुत तेज़ी से भड़काता है।

बिल्कुल। आपका हर एक किलो बढ़ा हुआ वज़न आपके घुटनों पर चलते समय लगभग 4-5 किलो का अतिरिक्त दबाव डालता है, इसलिए थोड़ा सा वज़न कम करने से भी घुटनों और रीढ़ की हड्डी को बहुत बड़ी राहत मिलती है।

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