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Pollution सिर्फ Lungs नहीं, Immunity और Skin को भी कैसे प्रभावित करता है

Information By Dr. Keshav Chauhan

जब भी हम हवा में फैले ज़हर या धुएँ की बात करते हैं, तो सबसे पहले खाँसी या साँस फूलने का खयाल आता है। हम सोचते हैं कि अगर हमने मास्क पहन लिया है और हमारे फेफड़े ठीक से काम कर रहे हैं, तो हम सुरक्षित हैं। लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि आजकल बिना मौसम बदले भी लोगों को जल्दी-जल्दी सर्दी-ज़ुकाम क्यों हो रहा है? या फिर तमाम महँगे लेप लगाने के बाद भी चेहरे की चमक क्यों गायब हो रही है और बाल बेजान होकर क्यों टूट रहे हैं?

दरअसल, हवा में घुला यह ज़हर बहुत खामोशी से हमारी साँसों के रास्ते हमारे खून में उतर रहा है। यह सिर्फ हमारी छाती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर के उस सुरक्षा कवच को तोड़ रहा है जिसे हम रोग प्रतिरोधक क्षमता कहते हैं, और हमारी त्वचा को समय से पहले बूढ़ा बना रहा है। लोग अक्सर अपनी थकान और बेजान त्वचा को काम के तनाव या बढ़ती उम्र का नाम दे देते हैं, जबकि असली मुजरिम वह हवा है जिसमें हम साँस ले रहे हैं।

ये प्रदूषण की समस्या असल में क्या है?

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, हवा में मौजूद बहुत ही बारीक कण हमारी साँस की नली से होते हुए फेफड़ों के सबसे भीतरी हिस्से तक पहुँच जाते हैं। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि ये फेफड़ों की जालीदार दीवार को पार करके सीधे हमारे रक्तप्रवाह (खून) में मिल जाते हैं। जब ये विषैले तत्व खून के साथ पूरे शरीर में घूमते हैं, तो हमारा रोग प्रतिरोधक तंत्र इन्हें बाहरी दुश्मन मानकर इन पर लगातार हमला करता है। इस लगातार चलने वाली जंग की वजह से शरीर की असली ताकत खत्म हो जाती है। वहीं, हवा में मौजूद हानिकारक रसायन सीधे त्वचा के रोमछिद्रों में घुसकर कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाते हैं।

आयुर्वेद इस स्थिति को 'दूषी विष' (धीमा ज़हर) और दूषित हवा के रूप में देखता है। आयुर्वेद के अनुसार, जब हम इस विषैले धुएँ में साँस लेते हैं, तो सबसे पहले हमारा 'प्राण वात' बिगड़ता है। यह दूषित वात हमारे 'रक्त धातु' (खून) को अशुद्ध कर देता है। कमज़ोर पाचन और इस ज़हरीली हवा के मिलने से शरीर में 'आम' (विषैले तत्व) बनने लगता है। यही 'आम' और अशुद्ध रक्त जब त्वचा की परतों में जाकर बैठता है, तो चेहरे की रंगत छिन जाती है और हमारी प्राकृतिक बीमारियों से लड़ने की क्षमता (ओजस) बहुत कमज़ोर हो जाती है।

ये समस्या किन रूपों में शरीर पर प्रकट होती है?

यह ज़हरीली हवा सिर्फ बाहर चौराहों या सड़कों पर नहीं, बल्कि कई अलग-अलग रूपों में हमारे आस-पास मौजूद रहती है और शरीर पर वार करती है:

  • सर्दियों का धुंध और धुआँ: यह हवा में मौजूद नमी के साथ मिलकर एक ज़हरीली चादर बना लेती है, जो सीधे त्वचा के रोमछिद्रों को बंद कर देता है और त्वचा को साँस नहीं लेने देता।
  • घर के अंदर का ज़हर: साफ-सफाई वाले रसायनों, अगरबत्ती के धुएँ और बंद कमरों की हवा में मौजूद कण, जो बाहर के धुएँ से भी ज़्यादा खतरनाक हो सकते हैं और धीमा ज़हर बनकर रोग प्रतिरोधक क्षमता को गिराते हैं।
  • धूल और निर्माण कार्य के कण: ये मोटे और बारीक कण सीधे बालों की जड़ों और त्वचा पर चिपक कर उनकी प्राकृतिक नमी सोख लेते हैं, जिससे वे रूखे और बेजान हो जाते हैं।
  • वाहनों और कारखानों का धुआँ: इसमें मौजूद भारी धातु और रसायन सीधे खून में घुलकर शरीर को हर वक्त थकान और कमज़ोरी का एहसास कराते हैं।

ये समस्या कौन से संकेत देती है?

फेफड़ों में तकलीफ़ होने से बहुत पहले ही हमारा शरीर कई अन्य तरीकों से यह बताने की कोशिश करता है कि अंदर विषैले तत्वों का हमला हो चुका है। इसके मुख्य संकेत कुछ इस तरह नज़र आते हैं:

  • त्वचा का रूखापन और दाग-धब्बे: बिना किसी कारण के चेहरे पर दाने आना, त्वचा का अचानक से बहुत रूखा हो जाना और रंगत काली पड़ जाना।
  • बालों का तेज़ी से झड़ना: हवा में मौजूद ज़हर खोपड़ी की नमी छीन लेता है, जिससे बालों की जड़ें कमज़ोर होकर टूटने लगती हैं और सिर में खुजली बनी रहती है।
  • हमेशा थकान और कमज़ोरी: रात में भरपूर नींद लेने के बाद भी अगली सुबह शरीर में ऊर्जा की भारी कमी महसूस होना और बिना काम किए थक जाना।
  • बार-बार बीमार पड़ना: मौसम में ज़रा सा बदलाव होते ही तुरंत गला खराब होना, बुखार आना या किसी भी तरह की एलर्जी का बहुत जल्दी शिकार हो जाना।

आगे चलकर ये क्या परेशानियाँ दे सकता है?

अगर हम शरीर के इन शुरुआती संकेतों को सिर्फ मौसम या काम का तनाव मानकर छोड़ दें, तो यह धीमा ज़हर भविष्य में बहुत बड़ी मुसीबतें खड़ी कर सकता है:

  • ऑटोइम्यून बीमारियाँ: खून में लगातार ज़हर रहने से रोग प्रतिरोधक तंत्र इतना भ्रमित और कमज़ोर हो जाता है कि वह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर ही हमला करने लगता है।
  • समय से पहले बुढ़ापा: त्वचा की अंदरूनी परतें टूट जाती हैं, जिससे कम उम्र में ही चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ, झाइयाँ और ढीलापन नज़र आने लगता है।
  • त्वचा के गंभीर रोग: लंबे समय तक ज़हरीले कणों के संपर्क में रहने से एक्जिमा और सोरायसिस जैसी भयंकर बीमारियाँ पनप सकती हैं जिनका इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है।
  • हार्मोन का असंतुलन: खून में मिले रसायन शरीर की ग्रंथियों के काम में रुकावट डालते हैं, जिससे पूरा शारीरिक चक्र बिगड़ जाता है और मानसिक अवसाद भी घेर सकता है।

आयुर्वेद इस समस्या को कैसे देखता है और कौन से उपाय मदद कर सकते हैं?

आयुर्वेद इसे केवल बाहर से आई गंदगी नहीं मानता, जिसे साबुन से धोया जा सके। आयुर्वेद का नज़रिया है कि जब शरीर के अंदर का वातावरण (तीनों दोष, वात, पित्त, कफ) मज़बूत होता है, तो बाहरी ज़हर आसानी से नुकसान नहीं पहुँचा सकता। आयुर्वेद शरीर की जठराग्नि को मज़बूत करने और 'ओजस' (परम रोग प्रतिरोधक क्षमता) को बढ़ाने पर काम करता है ताकि शरीर खुद इस ज़हर को बाहर निकाल फेंके।

इम्युनिटी, स्किन हेल्थ और एलर्जी कंट्रोल के लिए आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

समय क्या खाएँ संभावित लाभ
सुबह उठते ही 1–2 गिलास हल्का गुनगुना पानी शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालने और इम्युनिटी सिस्टम को एक्टिव करने में मदद
खाली पेट हल्का जीरा/धनिया/सौंफ पानी या गुनगुना नींबू रहित पानी पाचन सुधारकर स्किन एलर्जी ट्रिगर कम करने में सहायक
नाश्ता (7–9 AM) दलिया, पोहा, उपमा, मूंग दाल चीला या ओट्स + भीगे बादाम हल्का, एँटी-इंफ्लेमेटरी और ऊर्जा देने वाला भोजन
मिड-मॉर्निंग पपीता, सेब, नाशपाती या नारियल पानी स्किन डिटॉक्स और प्राकृतिक हाइड्रेशन
दोपहर का भोजन 2 रोटी (घी लगी), मूंग दाल, लौकी/तोरी/कद्दू की सब्ज़ी, सलाद पाचन संतुलन और शरीर की गर्मी कम करने में मदद
भोजन के बाद 5–10 मिनट हल्की वॉक ब्लड शुगर और पाचन को स्थिर रखने में मदद
शाम का नाश्ता भुना मखाना, भुना चना या हर्बल चाय एलर्जी ट्रिगर करने वाले स्नैक्स से बचाव
रात का भोजन (7–8 PM) मूंग दाल खिचड़ी या हल्का सूप + सब्ज़ियाँ इम्युनिटी रिकवरी और स्किन हीलिंग में सहायक
सोने से पहले हल्का गुनगुना पानी या सौंफ पाचन शांत करने और रात की एलर्जी कम करने में मदद

इस स्थिति को सुधारने के लिए लाभदायक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमारे आस-पास ही कई ऐसी जादुई जड़ी-बूटियाँ बिखेर रखी हैं। ये हमारे शरीर की अंदर से सफाई करती हैं। साथ ही, उसे नई ताकत भी देती हैं:

  • गिलोय: जोड़ों की पुरानी सूजन को कम करने और इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए गिलोय का उपयोग जादू की तरह असर करता है। यह खून में मौजूद विषैले तत्वों को भी साफ़ करता है।
  • त्रिफला: पाचन से जुड़ी दिक्कतें दूर करने के लिए त्रिफला बहुत काम आता है। यह आपके पेट को अच्छे से साफ़ रखता है। इससे शरीर में नई गंदगी या 'आम' (टॉक्सिन्स) जमा नहीं हो पाती। हम सब जानते हैं कि जब पेट साफ़ रहता है, तो त्वचा पर भी अपने आप चमक आ जाती है।
  • हल्दी (हरिद्रा): यह खून को साफ़ करने वाली सबसे बेहतरीन जड़ी-बूटी है। यह त्वचा की एलर्जी को खत्म करती है और शरीर को अंदर से शुद्ध करती है।
  • अश्वगंधा: हड्डियों को ताकत देने और मांसपेशियों की कमज़ोरी को दूर करने के लिए अश्वगंधा सबसे बेहतरीन औषधि है। यह प्रदूषण से होने वाले मानसिक और शारीरिक तनाव को भी कम करता है।

इस समस्या के लिए सबसे अच्छी आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब शरीर की नसों और रोमछिद्रों (Pores) में बहुत ज़्यादा गंदगी या टॉक्सिन्स जमा हो जाते हैं, तो सिर्फ दवाएँ काफी नहीं होतीं। ऐसे में जड़ी-बूटियों के साथ-साथ कुछ बाहरी थेरेपीज़ की भी मदद ली जाती है:

  • नस्य कर्म: नाक के दोनों छिद्रों में औषधीय तेल या घी की दो-दो बूँदें डालना। आयुर्वेद में नाक को दिमाग का दरवाज़ा माना गया है। यह श्वसन तंत्र को साफ़ करता है और दूषित कणों को अंदर जाने से रोकता है।
  • अभ्यंग मालिश: शरीर पर औषधीय तेलों से मालिश की जाती है। यह अभ्यंग मालिश शरीर की नसों को रिलैक्स करती है और वात दोष को कंट्रोल करती है। यह त्वचा पर एक सुरक्षा परत भी बनाती है।
  • स्वेदन थेरेपी: इसमें मालिश के बाद शरीर को जड़ी-बूटियों वाली भाप दी जाती है। यह थेरेपी जोड़ों की पुरानी और गहरी जकड़न को तोड़ती है। इससे शरीर का लचीलापन वापस लौट आता है। साथ ही, यह हमारी त्वचा के बंद रोमछिद्रों को भी खोल देती है। फिर पसीने के रास्ते शरीर का सारा ज़हर बाहर निकल जाता है।

आयुर्वेदिक उपचार में सुधार का टाइमलाइन

प्राकृतिक इलाज हमेशा शरीर की अपनी रफ्तार के हिसाब से काम करता है। शरीर में जमा हुआ कोई भी ज़हर एक दिन में बाहर नहीं निकलता। इसमें थोड़ा समय लगता है। लेकिन अगर पूरे नियम और अनुशासन से इलाज किया जाए, तो शरीर के ठीक होने का असर बिल्कुल साफ़ नज़र आने लगता है:

  • शुरुआती 1 से 2 हफ़्ते: सही जड़ी-बूटियाँ लेने और खान-पान सुधारने से काफी फायदा होता है। इससे शरीर का भारीपन धीरे-धीरे कम होने लगता है। सुबह उठते ही जो बेवजह की थकान महसूस होती है, वह दूर हो जाती है। आंखों की जलन शांत होती है। साथ ही, बार-बार छींक आने जैसी दिक्कतों से भी तुरंत राहत मिल जाती है।
  • 1 से 2 महीने: रक्त शुद्ध होने की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है। त्वचा की खोई हुई चमक वापस लौटने लगती है। चेहरे के मुँहासे और खुजली शांत हो जाती हैं, और बालों का टूटना भी काफी हद तक रुक जाता है।
  • 3 से 6 महीने: इतने समय में शरीर का 'ओजस' (अंदरूनी ताकत) पूरी तरह से बन जाता है। आपकी इम्युनिटी काफी मज़बूत हो जाती है। इसके बाद, बाहर की ज़हरीली हवा या प्रदूषण आपको आसानी से बीमार नहीं कर पाता। और आप पूरी एनर्जी के साथ अपनी ज़िंदगी जी पाते हैं।

प्रदूषण के प्रभावों से निपटने के लिए आयुर्वेद बेहतर क्यों है?

जब ज़हरीली हवा के कारण त्वचा खराब होती है या एलर्जी होती है, तो लोग अक्सर बाहरी महँगी क्रीम लगाते हैं या एलर्जी दबाने वाली दवाइयाँ (एँटी-एलर्जिक) खा लेते हैं। ये दवाइयाँ कुछ समय के लिए लक्षणों को छुपा देती हैं, आपको नींद दिला देती हैं, लेकिन खून में घुला वह ज़हर वहीं का वहीं रहता है और शरीर को अंदर से खोखला करता रहता है।

आयुर्वेद इसलिए बेहतर है क्योंकि यह आपकी त्वचा पर कोई कृत्रिम परत नहीं चढ़ाता, बल्कि यह खून को अंदर से साफ़ करने (रक्त शोधन) का काम करता है। यह आपके शरीर की खुद की लड़ने की क्षमता को इतना बढ़ा देता है कि आपको छोटी-छोटी परेशानियों के लिए जीवन भर दवाइयों का मोहताज नहीं होना पड़ता। यह केवल खाँसी या दानों को नहीं दबाता, बल्कि आपके खान-पान और दिनचर्या में सुधार करवाकर पूरे शरीर की प्राकृतिक रूप से सर्विसिंग कर देता है।

डॉक्टर से कब सलाह लें?

हालाँकि अपनी दिनचर्या सुधारकर शरीर को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है, लेकिन कुछ गंभीर स्थितियों में बिना देरी किए विशेषज्ञ से मिलना ज़रूरी हो जाता है:

  • जब त्वचा पर अचानक से भयंकर लाल चकत्ते पड़ जाएँ, त्वचा छिलने लगे और उनमें बहुत तेज़ खुजली या जलन हो।
  • अगर लगातार कई हफ़्तों तक कमज़ोरी बनी रहे और हल्का सा काम करने पर भी चक्कर आने लगें या बुखार महसूस हो।
  • जब आपको लगे कि आपके बाल बहुत तेज़ी से गुच्छों में टूट रहे हैं और सिर की त्वचा पर दाने या पपड़ी निकल आई है।
  • अगर साँस लेने में भारीपन महसूस हो और छाती में लगातार जकड़न बनी रहे, जो किसी साधारण उपाय से कम न हो रही हो।

निष्कर्ष

ज़हरीली हवा और धुएँ से पूरी तरह बचना शायद आज के समय में हमारे हाथ में न हो, लेकिन अपने शरीर को अंदर से एक मज़बूत किला बनाना बिल्कुल हमारे हाथ में है। जीवा आयुर्वेद में हम यह मानते हैं कि हर इंसान का शरीर, उसकी प्रकृति और दोष अलग होते हैं, इसलिए प्रदूषण हर किसी पर अलग तरह से वार करता है। किसी की त्वचा सबसे पहले खराब होती है, तो किसी का पेट या फेफड़े। इसलिए एक ही साधारण सी दवा सब पर काम नहीं कर सकती।

हमारे विशेषज्ञ डॉक्टर सबसे पहले आपकी नाड़ी और दोषों की गहराई से जाँच करके आपके लिए शुद्ध जड़ी-बूटियों, पंचकर्म और सही आहार का चुनाव करते हैं। अगर आप भी रोज़ाना गिरती हुई सेहत, झड़ते बालों, थकावट और चेहरे की उड़ती हुई रंगत से परेशान हैं, तो इसे केवल मौसम का बहाना न दें। अपने शरीर को अंदर से शुद्ध और मज़बूत बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद के अनुभवी डॉक्टरों से संपर्क करें। अपने स्वास्थ्य को फिर से सँवारने के लिए आज ही हमारे नंबर +919266714040 पर कॉल करें और अपनी परेशानी साझा करें।

FAQs

आयुर्वेद में गुड़ को एक बेहतरीन रक्तशोधक (खून साफ़ करने वाला) माना गया है। रोज़ाना थोड़ा सा शुद्ध गुड़ खाने से यह साँस की नली और फेफड़ों में जमे धूल के कणों को मल के रास्ते बाहर निकालने में बहुत मदद करता है।

तुलसी, एलोवेरा और स्नेक प्लांट जैसे पौधे घर के अंदर की हवा से ज़हरीले रसायनों को सोख लेते हैं। जब आप साफ़ हवा में साँस लेते हैं, तो शरीर को लगातार ज़हर से नहीं लड़ना पड़ता, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता अपने आप बढ़ जाती है।

बहुत ज़्यादा बार साबुन या फेस वॉश से चेहरा धोने से त्वचा की प्राकृतिक नमी (प्राकृतिक तेल) खत्म हो जाती है, जिससे त्वचा और ज़्यादा रूखी होकर प्रदूषण के प्रति संवेदनशील हो जाती है। दिन में दो बार चेहरा धोना और फिर थोड़ा सा नारियल तेल या एलोवेरा लगाना पर्याप्त है।

जब खून में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और विषैले रसायनों की मात्रा बढ़ जाती है, तो यह सीधा हमारे तंत्रिका तंत्र (दिमाग की नसों) पर असर डालता है। इससे चिड़चिड़ापन, अनिद्रा और बिना बात के तनाव रहने लगता है।

बाहर की ज़हरीली हवा से घर लौटने के बाद सादे पानी या उसमें एक बूँद नीलगिरी (Eucalyptus) का तेल डालकर भाप लेने से साँस की नली में जमे हुए कण ढीले होकर बाहर निकल जाते हैं और छाती को तुरंत आराम मिलता है।

विटामिन सी (जैसे आँवला, संतरा, नींबू) बहुत अच्छे एँटीऑक्सीडेंट होते हैं। ये शरीर की कोशिकाओं को ज़हरीले कणों द्वारा होने वाले नुकसान से बचाते हैं और त्वचा की चमक को भी बरकरार रखने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं।

एयर प्यूरीफायर हवा में तैर रहे बड़े और बारीक कणों (PM 2.5) को कम करने में मदद ज़रूर करते हैं, लेकिन वे ताज़ी हवा और शरीर की अंदरूनी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकल्प नहीं हो सकते। अंदरूनी ताक़त जड़ी-बूटियों और आहार से ही आती है।

भरपूर मात्रा में गुनगुना पानी पीने से शरीर के विषैले तत्व पेशाब के रास्ते बहुत आसानी से बाहर निकल जाते हैं। इससे खून साफ़ रहता है और त्वचा को अंदर से हाइड्रेशन (नमी) मिलता है, जिससे वह बेजान नहीं होती।

नहीं, रोज़ाना केमिकल वाले शैम्पू का इस्तेमाल करने से बालों की जड़ें कमज़ोर हो जाती हैं। बालों को बचाने के लिए बाहर निकलते समय सिर को सूती कपड़े से ढँकना चाहिए और हफ़्ते में दो बार हल्के गुनगुने तेल से मालिश करनी चाहिए।

जब हवा का ज़हर हमारे खून में मिलता है, तो यह शरीर की जठराग्नि (पाचन अग्नि) को धीमा कर देता है। यही कारण है कि भारी धुंध और प्रदूषण वाले दिनों में अक्सर लोगों को पेट फूलने, गैस और अपच की शिकायत होने लगती है।

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