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Lassi और Chaas में digestion के लिए क्या बेहतर है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर गर्मियां आते ही या भारी खाना खाने के बाद हम सोचते हैं कि एक गिलास ठंडी लस्सी या छाछ पी लेने से हमारा खाना तुरंत पच जाएगा और पेट को ठंडक मिलेगी। ज़्यादातर लोग लस्सी (Lassi) और छाछ  को एक ही तराजू में तौलते हैं, क्योंकि दोनों ही दही से बनते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि सुपर-ड्रिंक समझकर एक बड़ा गिलास मीठी लस्सी पीने के बाद आपको भयंकर नींद, पेट में भारीपन या ब्लोटिंग क्यों महसूस होने लगती है? वहीं, एक गिलास छाछ पीने के बाद आप खुद को हल्का और तरोताज़ा क्यों महसूस करते हैं?

सिर्फ सोशल मीडिया पर देखकर या स्वाद के चक्कर में खाने के बाद कोई भी डेयरी ड्रिंक पी लेने से पाचन की समस्या खत्म नहीं होती। शरीर के अंदर असली बदलाव का काम तो तब शुरू होता है जब हम लस्सी और छाछ की तासीर, उन्हें बनाने की प्रक्रिया और इसके पीछे के विज्ञान को समझते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि शरीर की मशीनरी को भारी खाने के बाद किस तरह के सपोर्ट की ज़रूरत होती है। दही से बनी हर चीज़ पाचन के लिए 'जादू की गोली' नहीं होती। यह आपके शरीर से सही समय, सही तापमान और सही मसालों की मांग करती है।

डाइट में लस्सी और छाछ का शरीर पर असर

जब आप मसालेदार, तला-भुना या भारी भोजन (जैसे छोले-भटूरे या पनीर) खाते हैं, तो आपके पाचन तंत्र को उसे तोड़ने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा लगानी पड़ती है।

लस्सी का असर: ऐसे में जब आप ऊपर से एक गाढ़ी, मलाईदार और चीनी से भरी लस्सी पी लेते हैं, तो शरीर की प्राकृतिक लय बिगड़ जाती है। लस्सी मूल रूप से गाढ़ा दही है जिसे मथकर चीनी और मलाई के साथ परोसा जाता है। यह पचने में बेहद भारी होती है। आपका पेट जो पहले ही भारी खाने से जूझ रहा था, अब उसे लस्सी के फैट और चीनी को पचाने के लिए ओवरवर्क्ड होना पड़ता है। यही कारण है कि लस्सी पीने के बाद शरीर की सारी ऊर्जा पेट की तरफ चली जाती है और आपका दिमाग सुस्त पड़ जाता है, जिससे आपको भयंकर नींद आती है।

छाछ का असर: दूसरी तरफ, छाछ बनाने के लिए दही में पानी डालकर उसे तब तक मथा जाता है जब तक उसका सारा मक्खन (Fat) बाहर न निकल जाए। छाछ में फैट न के बराबर होता है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) भी बहुत कम होता है। जब यह आंतों में पहुँचती है, तो यह खाने को पचाने वाले एंजाइम्स को बढ़ाती है। यह आपके पेट को 'ओवरलोड' नहीं करती, बल्कि पहले से खाए गए भारी खाने को तोड़ने में एक उत्प्रेरक (Catalyst) का काम करती है।

एक्सपर्ट डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट की विशेष सलाह

छाछ और लस्सी दोनों ही कैल्शियम और प्रोबायोटिक्स का अच्छा स्रोत हैं, लेकिन इन्हें कब और कैसे पीना है, यह हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। यदि लस्सी या डेयरी प्रोडक्ट्स लेने के बाद आपको लगातार ब्लोटिंग, खट्टी डकारें, अत्यधिक गैस, चेहरे पर मुहांसे, या अचानक सुस्ती महसूस हो, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें।

डायबिटीज़, फैटी लिवर, पीसीओएस (PCOS), या लैक्टोज़ इनटॉलरेंस वाले लोगों को मीठी और गाढ़ी लस्सी से सख्त परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि यह शुगर स्पाइक और वजन बढ़ने का कारण बनती है। ऐसे लोगों के लिए छाछ (बिना मलाई वाली) एक सुरक्षित और असरदार विकल्प है। फिर भी, डाइट में बड़े बदलाव से पहले डॉक्टर या डाइटीशियन की सलाह लेनी चाहिए। सही मात्रा और सही समय के साथ ही इनके वास्तविक लाभ मिलते हैं।

क्या सिर्फ दही से बने होने का मतलब अच्छा पाचन है?

जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कई बार लोग सोचते हैं कि "लस्सी भी तो दही है, यह भी पेट के लिए अच्छी ही होगी।" यह सबसे बड़ी गलतफहमी है। सिर्फ मूल सामग्री (दही) के एक होने का मतलब यह नहीं है कि उसका शरीर पर असर भी एक जैसा होगा।

अगर आप लस्सी को भोजन के साथ यह सोचकर पी रहे हैं कि यह खाना पचाएगी, तो फायदे की जगह आप अपने पाचन तंत्र को ब्लॉक कर रहे हैं। चीनी और मलाई से भरी लस्सी पेट में फर्मेंटेशन की प्रक्रिया को धीमा कर देती है, जिससे गैस और एसिडिटी बनती है। समस्या दही में नहीं, बल्कि हमारी आधी-अधूरी जानकारी और इसे पीने के गलत तरीके में है। लस्सी अपने आप में एक पूरा मील है, इसे भारी खाने के साथ जोड़ना पेट के लिए सज़ा बन जाता है।

गलत चुनाव से आपकी सेहत पर क्या असर पड़ता है?

जब हम बिना सोचे-समझे भारी भोजन के साथ गलत डेयरी ड्रिंक चुनते हैं, तो शरीर के अंदर अजीबोगरीब बदलाव होते हैं:

  • पाचन तंत्र का धीमा होना (Sluggish Digestion): गाढ़ी और मीठी लस्सी आंतों के मूवमेंट को धीमा कर देती है। खाने के बाद पेट में भारीपन, खट्टी डकारें या कब्ज़ की शिकायत लगातार बनी रहती है।
  • इंसुलिन स्पाइक और सुस्ती (Sugar Crash): लस्सी में मौजूद रिफाइंड चीनी तुरंत खून में घुलती है। इससे पैंक्रियाज़ पर इंसुलिन बनाने का दबाव पड़ता है। ब्लड शुगर एकदम से ऊपर जाता है और फिर तेज़ी से नीचे गिरता है। इसी क्रैश के कारण आपको लस्सी पीने के बाद ब्रेन फॉग और भयंकर सुस्ती का सामना करना पड़ता है।
  • गट माइक्रोबायोम का बिगड़ना (Gut Health Issues): ज़्यादा चीनी वाले ड्रिंक्स पेट में मौजूद खराब बैक्टीरिया (Bad Bacteria) को पनपने का मौका देते हैं। भले ही लस्सी में प्रोबायोटिक्स हों, लेकिन चीनी की अधिकता पेट में सूजन और ब्लोटिंग पैदा करती है।
  • कफ दोष का बढ़ना: गलत समय (खासकर शाम या रात) पर लस्सी पीने से शरीर में म्यूकस (बलगम) बनता है, जिससे गले में खराश और सर्दी-खांसी की समस्या हो सकती है।

प्राचीन आयुर्वेद, लस्सी और छाछ का विज्ञान

आयुर्वेद के अनुसार, दही और उससे बनी चीज़ों के नियम बहुत स्पष्ट हैं। आयुर्वेद में छाछ को 'तक्र' कहा गया है और इसे धरती का 'अमृत' माना जाता है। एक श्लोक के अनुसार: "भोजनान्ते पिबेत् तक्रं" (यानी भोजन के अंत में तक्र या छाछ पीनी चाहिए)।

  • लस्सी (गाढ़ा दही) का विज्ञान: आयुर्वेद लस्सी (मीठे दही) को गुण में 'गुरु' (भारी) और 'अभिष्यंदी' (चैनल्स को ब्लॉक करने वाला) मानता है। यह कफ और मेद (फैट) को बढ़ाता है। इसलिए इसे पचने में बहुत शक्तिशाली 'जठराग्नि' (पाचन अग्नि) की ज़रूरत होती है। कमज़ोर पाचन वालों के लिए यह कब्ज़ और गैस का कारण बनती है।
  • छाछ (तक्र) का विज्ञान: दूसरी ओर, तक्र का गुण 'लघु' (हल्का) और 'रुक्ष' (सूखा) होता है। जब दही में पानी मिलाकर उसे अच्छे से मथा जाता है, तो उसके भारी गुण नष्ट हो जाते हैं। छाछ त्रिदोष नाशक (वात, पित्त, कफ को संतुलित करने वाली) होती है। यह सीधे आपकी जठराग्नि को भड़काती है और आंतों में चिपके हुए आम (Toxins) को खुरच कर बाहर निकालती है। इसका सीधा मतलब है कि डाइजेशन के लिए लस्सी नहीं, बल्कि छाछ ही असली सुपरहीरो है।

आयुर्वेद में 'तक्र' (छाछ) को धरती का अमृत (अमृतं तक्रं) कहा गया है। लेकिन बाज़ार में मिलने वाली पैकेटबंद छाछ या मिक्सी में दो मिनट में घुमाकर बनाई गई छाछ आपको वह फायदा नहीं दे सकती जो पारंपरिक तरीके से मथकर बनाई गई छाछ देती है।

घर पर आयुर्वेदिक तरीके से तक्र बनाने की सबसे बड़ी शर्त यह है कि इसमें से मक्खन को पूरी तरह बाहर निकाला जाना चाहिए और इसमें दीपन-पाचन मसालों का सही अनुपात होना चाहिए।

यहाँ पारंपरिक और आयुर्वेदिक तरीके से मसालेदार तक्र बनाने की पूरी और प्रामाणिक विधि दी गई है:

मुख्य सामग्री

  • ताज़ा दही: 1 कप ,गाय के दूध का दही सबसे उत्तम माना जाता है।
  • पानी: 3 कप 
  • आयुर्वेदिक मसालों का सही अनुपात:
  • भुना हुआ जीरा पाउडर: ½ छोटी चम्मच ताज़ा भुना हुआ बेहतर है
  • काला नमक (सेंधा नमक): ¼ छोटी चम्मच स्वादानुसार
  • हींग: 1 चुटकी तवे पर हल्की सी भून लें
  • ताज़ा पुदीना या धनिया पत्ती: 4-5 पत्तियां बारीक तोड़कर या हल्का कूटकर
  • काली मिर्च पाउडर: 1 चुटकी

तक्र बनाने की स्टेप-बाय-स्टेप विधि पारंपरिक मंथन प्रक्रिया

  • दही को फेंटना: सबसे पहले एक गहरे बर्तन में 1 कप ताज़ा दही लें। अब एक लकड़ी की रई की मदद से इसे 1-2 मिनट तक अच्छे से मथें
  • पानी मिलाना: जब दही स्मूद हो जाए, तो इसमें 3 कप घड़े का पानी मिला दें आयुर्वेद के अनुसार श्रेष्ठ तक्र वह है जिसमें 1 हिस्सा दही और 3 से 4 हिस्सा पानी हो
  • मक्खन निकालना : अब पानी मिले हुए इस घोल को लकड़ी की रई से लगातार 5 से 10 मिनट तक मथें मथने के घर्षण से दही के फैट मॉलिक्यूल्स टूटेंगे और मक्खन हल्का होकर धीरे-धीरे ऊपर तैरने लगेगा।
  • फैट को अलग करना: जब झाग और मक्खन पूरी तरह सतह पर आ जाए, तो एक चम्मच की मदद से उस सारे मक्खन को बाहर निकाल लें। अब जो सफेद, पतला और बिना फैट वाला तरल बर्तन में बचा है, वही असली आयुर्वेदिक तक्र है।
  • मसाले मिलाना: अब इस तैयार तक्र में ऊपर बताए गए अनुपात के अनुसार भुना जीरा, काला नमक, अदरक का रस, भुनी हुई हींग और पुदीने की पत्तियां डाल दें।
  • आराम देना: मसालों को तक्र में अच्छे से मिला लें और इसे 5-10 मिनट के लिए ढककर रख दें ताकि मसालों का सारा अर्क और औषधीय गुण छाछ में अच्छी तरह घुल जाएं।

पीते समय ध्यान रखने योग्य आयुर्वेदिक नियम

  1. पीने का सही समय: तक्र पीने का सबसे बेहतरीन समय दोपहर का भोजन है। आप इसे खाने के साथ-साथ घूंट-घूंट करके या भोजन के अंत में पी सकते हैं। यह आपके द्वारा खाए गए भारी भोजन को तेज़ी से तोड़ने में मदद करता है।
  2. रात में सख्त वर्जित: सूर्यास्त के बाद या रात के डिनर के समय तक्र या छाछ भूलकर भी नहीं पीनी चाहिए। रात में यह कफ दोष और वात को बढ़ाती है, जिससे जोड़ों में दर्द, खांसी या गले में खराश हो सकती है।
  3. फ्रिज में न रखें: तक्र को बनाकर ताज़ा ही पीना चाहिए। इसे फ्रिज में रखकर कई दिनों तक इस्तेमाल करना इसके प्रोबायोटिक गुणों को खत्म कर देता है और इसे पचने में भारी बना देता है।
  4. तांबे के बर्तन का प्रयोग न करें: छाछ खट्टी होती है, इसलिए इसे कभी भी तांबे या पीतल के बर्तन में न रखें। खटाई धातु के साथ रिएक्शन करके टॉक्सिन्स (ज़हर) बना सकती है। हमेशा मिट्टी, कांच या स्टील के बर्तन का ही उपयोग करें।

इस विधि से बनाई गई छाछ आपके पेट में भारीपन नहीं लाएगी, बल्कि आंतों की सूजन कम करेगी, अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाएगी और आपकी पाचन अग्नि को प्राकृतिक रूप से तेज़ करेगी।

कब इस्तेमाल रोक दे?

डाइट सुधारने और सही तरीके से छाछ पीने के बाद भी अगर शरीर में ये लक्षण दिखें, तो आपको तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए:

  • डेयरी (दूध, दही, छाछ) लेते ही अगर त्वचा पर चकत्ते पड़ जाएं, सांस लेने में दिक्कत हो या होंठ सूज जाएं (यह गंभीर लैक्टोज़ एलर्जी या एनाफिलेक्सिस हो सकता है)।
  • छाछ पीने के बाद भी कई दिनों तक पेट में भयंकर दर्द, एसिड रिफ्लक्स (खट्टी डकारें गले तक आना) या मल में खून आने लगे।
  • लगातार भयंकर डायरिया (दस्त) जो 2-3 दिन में भी ठीक न हो रहा हो।

निष्कर्ष

हमेशा याद रखें कि आपकी डाइट आपकी ज़िंदगी को बेहतर बनाने का एक हिस्सा है, सज़ा नहीं। प्रकृति ने हमारे शरीर को खुद को ठीक करने और खाने से ऊर्जा निकालने का एक बेहतरीन मैकेनिज़्म दिया है। जब बात डाइजेशन की आती है, तो छाछ लस्सी पर भारी पड़ती है। लस्सी एक स्वादिष्ट मिठाई या फुल मील की तरह है जिसे कभी-कभार आनंद के लिए लिया जा सकता है, लेकिन रोज़मर्रा के अच्छे पाचन के लिए छाछ ही आपकी सबसे अच्छी दोस्त है।

आप छाछ को कैसे बनाते हैं, उसमें कौन से मसाले मिलाते हैं और उसे किस समय पीते हैं, इसका सीधा असर आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता है। इसलिए, सिर्फ स्वाद के पीछे भागकर अपने पेट को कूड़ेदान न बनाएं। अपनी इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अपने शरीर की आवाज़ को सुनें। जब आपका शरीर अंदर से अच्छे प्रोबायोटिक्स और सही जठराग्नि से पोषित रहेगा, तो यकीनन आप खराब पाचन को हराएंगे और अपनी ज़िंदगी में पहले से कहीं ज़्यादा एक्टिव और ऊर्जावान महसूस करेंगे।

References

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC7029383/

Effects of Buttermilk on Health

TRADITIONAL FOOD RECIPES

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं। दोनों दही से बनती हैं, लेकिन लस्सी गाढ़ी और अक्सर मीठी होती है, जबकि छाछ में अधिक पानी मिलाकर मथने के बाद मक्खन निकाल दिया जाता है।

सामान्यतः छाछ पाचन के लिए बेहतर मानी जाती है क्योंकि यह हल्की होती है और भोजन को पचाने में मदद कर सकती है।

गाढ़ी लस्सी में फैट और चीनी अधिक हो सकते हैं, जिससे कुछ लोगों को सुस्ती, भारीपन या पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है।

यदि आपको डेयरी से कोई समस्या नहीं है, तो संतुलित मात्रा में ताज़ी छाछ रोज़ाना ली जा सकती है।

दोपहर के भोजन के साथ या भोजन के बाद छाछ पीना सबसे उपयुक्त माना जाता है।

बिना चीनी वाली छाछ आमतौर पर बेहतर विकल्प मानी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत सलाह के लिए डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।

भुना जीरा, काला नमक, हींग, पुदीना और काली मिर्च जैसे मसाले स्वाद और पाचन दोनों के लिए उपयोगी माने जाते हैं।

कुछ लोगों को रात में छाछ लेने से गैस, कफ या असहजता महसूस हो सकती है, इसलिए दिन में लेना अधिक उपयुक्त माना जाता है।

लैक्टोज़ इनटॉलरेंस, डेयरी एलर्जी, गंभीर एसिडिटी या कुछ पाचन संबंधी समस्याओं वाले लोगों को सावधानी रखनी चाहिए।

यदि लगातार पेट दर्द, ब्लोटिंग, दस्त, खून वाला मल या अन्य गंभीर लक्षण बने रहें, तो डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए।

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