Diseases Search
Close Button
 
 

30 की उम्र में हाथ -पैर सुन्न होना - क्या यह Multiple Sclerosis का संकेत है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

30 की उम्र आते-आते अगर हाथ-पैर सुन्न होने लगें, तो लोग अक्सर घबरा जाते हैं। खासकर जब इंटरनेट पर पढ़कर दिमाग में मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS) जैसी बीमारी का खौफ बैठ जाए। हर बार हाथ-पैरों का सो जाना कोई बड़ी दिमागी बीमारी नहीं होती। कई बार गलत तरीके से बैठने, नसों के दबने, विटामिन बी की कमी या दिन भर की थकान से भी ऐसा हो जाता है। ये सब कुछ वक्त की दिक्कतें हैं। हां, अगर ये दिक्कत रोज़-रोज़ होने लगे और लंबी चले, तो इसे नज़रअंदाज़ करना भी ठीक नहीं। असली कारण का पता लगाना बहुत ज़रूरी है, ताकि फालतू का डर खत्म हो और शरीर अंदर से मज़बूत बने रहें।

Multiple Sclerosis (MS) क्या होता है? 

मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS) नसों की एक लंबी बीमारी है। इसमें हमारे शरीर की रक्षा करने वाला सिस्टम ही पगला जाता है और अपने ही दिमाग व नसों पर हमला करने लगता है। नसों के ऊपर एक सुरक्षा की परत होती है (जिसे मायलिन कहते हैं), वो धीरे-धीरे खराब होने लगती है। यही परत नसों के बीच संदेशों को बहुत तेज़ और सही तरीके से भेजने का काम करती है। जब ये परत ही उजड़ जाए, तो दिमाग और शरीर का तालमेल टूट जाता है। इसी वजह से शरीर सुन्न पड़ने लगता है, इंसान कमज़ोर हो जाता है और चलने-फिरने में उसका बैलेंस डगमगाने लगता है।

30 की उम्र में MS का खतरा क्यों चर्चा में रहता है? 

एमएस एक ऐसी बीमारी है जो अक्सर 20 से 40 की उम्र के बीच अचानक सामने आ जाती है। इसीलिए 30 की उम्र को लेकर लोग थोड़ा डरे रहते हैं।

  • उम्र का हाई-रिस्क पीरियड: 20 से 40 की उम्र में इसके मामले सबसे ज़्यादा देखने को मिलते हैं, इसलिए 30 का पड़ाव काफी अहम होता है।
  • शुरुआती लक्षण बहुत हल्के होते हैं: शुरू में बस हल्की सी सुन्नता या थकान लगती है, जिसे लोग अक्सर थकावट समझकर टाल देते हैं।
  • दूसरी समस्याओं से कन्फ्यूजन: इसके लक्षण बिल्कुल विटामिन की कमी, नींद न आने या खराब पाचन जैसी आम दिक्कतों से मिलते-जुलते हैं।
  • पहचान में देरी होना आम बात है: लक्षण इतने आम होते हैं कि असली बीमारी पकड़ने में काफी वक्त लग जाता है।
  • नर्वस सिस्टम पर धीरे-धीरे असर: यह शरीर की नसों को बहुत धीरे-धीरे खाती है, इसलिए शुरू में कुछ खास पता ही नहीं चलता।
  • समय पर पहचान से बेहतर मैनेजमेंट: अगर शुरू में ही बीमारी पकड़ में आ जाए, तो इसे आसानी से संभाला जा सकता है।

हाथ-पैर सुन्न होने के सामान्य और गैर-गंभीर कारण 

हाथ-पैरों का सो जाना बहुत ही आम बात है। ज़्यादातर मामलों में यह बस गलत तरीके से लेटने या खून का दौरा रुकने से होता है।

  • गलत तरीके से बैठना या सोना: अगर आप बहुत देर तक एक ही करवट सोते रहें या गलत ढंग से बैठें, तो नस दब जाती है और हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं। उठते ही ये ठीक भी हो जाता है।
  • लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना: एक ही जगह पर घंटों बुत बनकर बैठे रहने से खून का बहाव सुस्त पड़ जाता है और झनझनाहट होने लगती है।
  • मसल्स पर दबाव पड़ना: कई बार हमारी ही मांसपेशियों के भारीपन से नस दब जाती है, जिससे थोड़ी देर के लिए सुन्नपन आ जाता है।
  • ब्लड फ्लो का अस्थायी रुकना: अगर शरीर के किसी हिस्से में थोड़ी देर के लिए खून न पहुंचे, तो वहां सुन्नपन आ जाता है।
  • लंबी ड्राइव या ट्रैवल: घंटों लगातार गाड़ी चलाने या सफर करने से पैरों में भारीपन आ जाता है, जो ज़रा सा टहलने पर खुल जाता है।

MS में सुन्नपन कैसे महसूस होता है? 

एमएस वाली सुन्नता आम सुन्नपन से एकदम अलग होती है। इसमें नसों पर सीधा असर पड़ता है, इसलिए यह अजीब तरीके से सामने आती है।

  • एक तरफ या अलग-अलग हिस्सों में सुन्नपन: इसमें शरीर का कोई एक हिस्सा या अलग-अलग जगहें अचानक से सुन्न पड़ जाती हैं।
  • बार-बार या लगातार बना रहना: ये सुन्नपन हिलाने-डुलाने से ठीक नहीं होता, बल्कि लंबे समय तक चिपका रहता है या बार-बार लौटकर आता है।
  • अचानक सुन्नपन बढ़ जाना: कई बार बिना किसी बात के सुन्नपन इतना ज़्यादा बढ़ जाता है कि इंसान तड़प जाता है।
  • आंखों और नज़र पर असर: इसके साथ-साथ कुछ लोगों की नज़र भी धुंधली पड़ने लगती है।
  • बैलेंस और चलने में दिक्कत: शरीर का बैलेंस ऐसा बिगड़ता है कि सीधे चलने में भी भारी परेशानी होती है।
  • सामान्य सुन्नपन से अलग प्रकृति: यह सिर्फ गलत तरीके से बैठने का नतीजा नहीं है, बल्कि नसों के डैमेज होने की वजह से होता है जो लगातार बना रहता है।

MS के अन्य शुरुआती लक्षण कौन से होते हैं? 

एमएस के लक्षण बहुत ही दबे पांव आते हैं और शुरू में इन्हें पकड़ना बहुत मुश्किल होता है।

  • धुंधला या कम दिखाई देना: अचानक से या धीरे-धीरे आंखों के आगे धुंधलापन छाने लगता है।
  • लगातार थकान महसूस होना: बिना कोई भारी काम किए भी शरीर बुरी तरह टूट जाता है और आराम करने के बाद भी ताज़गी नहीं मिलती।
  • मांसपेशियों में कमजोरी: हाथ-पैर इतने कमज़ोर हो जाते हैं कि रोज़मर्रा के छोटे-मोटे काम करने में भी जान निकल जाती है।
  • संतुलन बिगड़ना: चलते वक्त बैलेंस बिगड़ना और पैर डगमगाना इसका एक बड़ा इशारा है।
  • ध्यान लगाने में कठिनाई: किसी भी काम में ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है और भूलने की बीमारी लग जाती है।
  • बोलने या तालमेल में हल्का बदलाव: जुबान लड़खड़ाने लगती है और हाथ-पैरों का आपस में तालमेल बिल्कुल खत्म हो जाता है।

आयुर्वेद में एमएस को कैसे समझा जाता है? 

आयुर्वेद में हाथ-पैरों का सुन्न पड़ना सीधे तौर पर वात के बिगड़ने का नतीजा है। जब शरीर में वात बहुत ज़्यादा भड़क जाता है, तो शरीर की चाल-ढाल और नसों का सारा काम अटक जाता है। ये कोई मामूली बीमारी नहीं है, बल्कि आपके शरीर की अंदरूनी ऊर्जा का रास्ता रुक जाना है। इसी वजह से हाथ-पैरों में झुनझुनी, सुन्नपन या अजीब सी बेचैनी होने लगती है। वात का असल काम शरीर में हर हलचल को एकदम तेज़ और सही रखना है। इसके बिगड़ने पर नसें सूख जाती हैं और इंसान को झटके या सुन्नपन महसूस होता है। आयुर्वेद में 'ओजस' को हमारे शरीर की सबसे बड़ी ताक़त माना गया है। जब ओजस कमज़ोर पड़ता है, तो शरीर बीमारी नहीं झेल पाता। इसलिए नसों को शांत करना और अंदरूनी ताक़त को दोबारा मज़बूत बनाना बहुत ज़रूरी है।

आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण 

इस एमएस को सिर्फ नसों की बीमारी नहीं मानता। यह तो बस वात के बुरी तरह उखड़ जाने का नतीजा है। हम सिर्फ दर्द मिटाने पर नहीं, बल्कि शरीर, मन और ऊर्जा को एक साथ ठीक करने पर काम करते हैं ताकि बीमारी जड़ से खत्म हो जाए।

  • बिगड़े वात को शांत करना: वात बढ़ने से ही नसें सूखती हैं और सुन्नपन आता है, इसलिए सबसे पहले इसी हवा को काबू किया जाता है।
  • नसों को ताक़त देना: शरीर का तालमेल बिठाने के लिए नसों की रुकी हुई ताक़त को वापस लाया जाता है ताकि वे अपना काम सही से कर सकें।
  • सुन्नपन और भारीपन मिटाना: शरीर के जिस भी हिस्से में सुन्नपन है, उसे वात के हिसाब से ही ठीक किया जाता है।
  • बैलेंस सुधारना: इस बीमारी में अक्सर चलते-फिरते बैलेंस बिगड़ता है, तो शरीर को दोबारा स्थिर करने पर पूरा ज़ोर रहता है।
  • दिमागी शांति: टेंशन और थकान इस बीमारी को और भड़काते हैं, इसलिए मन को एकदम शांत रखा जाता है।
  • ताक़त बढ़ाना: शरीर की टूटती हुई ऊर्जा को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है ताकि इंसान थका हुआ महसूस न करे।

इलाज में काम आने वाली देसी जड़ी-बूटियाँ

अक्सर हम काम करते-करते थक जाते हैं या नसें कमजोर लगने लगती हैं। ऐसे में आयुर्वेद की कुछ पुरानी और परखी हुई जड़ी-बूटियां बहुत काम आती हैं। ये सिर्फ शरीर को ही ताकत नहीं देतीं, बल्कि उलझे और थके हुए दिमाग को भी एकदम शांत कर देती हैं:

  • अश्वगंधा: अगर बदन टूट रहा हो या पुरानी से पुरानी थकान हो, तो ये उसे पूरी तरह सोख लेती है। स्ट्रेस और दिमागी उलझन को दूर भगाने के लिए इसे सबसे तगड़ा टॉनिक माना जाता है। इससे शरीर को एकदम नई ऊर्जा मिलती है।
  • ब्राह्मी: बेचैनी और दिमाग की खुश्की दूर करने में इसका कोई सानी नहीं है। ये नसों को अंदर से ठंडक देती है ताकि आपका फोकस बना रहे और दिमाग पूरी तरह से रिलैक्स महसूस करे।
  • शंखपुष्पी: ये बूटी हमारे नर्वस सिस्टम का पूरा कामकाज सुधारती है। दिमागी बैलेंस को ठीक रखने के लिए इसका इस्तेमाल हमारे घरों में बरसों से होता आ रहा है।
  • गुग्गुल: शरीर के किसी भी जोड़ या हिस्से में सूजन आ गई हो, या पुरानी जकड़न आपको परेशान कर रही हो, तो उसे खींचकर बाहर निकालने में गुग्गुल का कोई जवाब नहीं है।
  • त्रिफला: ये पेट और शरीर की अंदर से सफाई (डिटॉक्स) कर देता है। कहा भी जाता है कि अगर पेट साफ और हाज़मा चकाचक है, तो आधी बीमारियाँ वैसे ही भाग जाती हैं। पूरी सेहत को सुधारने में ये कमाल की चीज है।

सुकून देने वाली कमाल की आयुर्वेदिक थेरेपी

इन पुराने देसी तरीकों का बस एक ही मकसद है दिनभर की थकावट को निचोड़ना, तनी हुई नसों को ढीला करना और दिमाग को पूरी तरह से सुकून देना:

  • अभ्यंग (तेल मालिश): जब जड़ी-बूटियों में पके हुए हल्के गर्म तेल से पूरे बदन की मालिश होती है, तो खून का दौरा एकदम तेज हो जाता है। इससे शरीर की हर मांसपेशी और नस की जकड़न तुरंत खुल जाती है।
  • स्वेदन (औषधीय भाप): अगर आपको अपना बदन बहुत भारी और जकड़ा हुआ लग रहा है, तो ये खास भाप लेकर देखिए। नसों का सारा तनाव और खिंचाव पसीने के साथ बह जाते हैं और इसके बाद शरीर रुई की तरह हल्का लगने लगता है।
  • शिरोधारा: इसमें माथे के बिल्कुल बीच में हल्के गर्म तेल की एक पतली सी धार लगातार गिराई जाती है। अगर आपको रात में नींद नहीं आती, बेचैनी रहती है या हद से ज्यादा टेंशन है, तो ये थेरेपी सच में आपके लिए किसी जादू से कम नहीं है।

सहायक आहार: क्या खाएं/क्या न खाएं

सही आहार शरीर को हल्का, संतुलित और नर्व सिस्टम को सपोर्ट करने में मदद कर सकता है।

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • हरी सब्जियां और मौसमी फल
  • मूंग दाल और सुपाच्य भोजन
  • पर्याप्त पानी और हल्के पेय
  • सीमित मात्रा में घी
  • सूखे मेवे और पौष्टिक आहार

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • अत्यधिक मीठा और भारी भोजन
  • पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड
  • बहुत ज्यादा चाय और कॉफी
  • देर रात भोजन करना
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम राज मोहम्मद है, मेरी उम्र 43 वर्ष है और मैं इलाहाबाद से हूँ। मुझे स्क्लेरोसिस की समस्या है, जिसके लिए मैं काफी समय से मॉडर्न मेडिसिन से इलाज करवा रहा था, लेकिन मुझे कोई खास राहत नहीं मिल रही थी। मेरी स्थिति ऐसी हो गई थी कि मुझे चलने-फिरने में बहुत दिक्कत होती थी और कई बार व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता था। इस वजह से मेरी रोजमर्रा की जिंदगी काफी प्रभावित हो गई थी। फिर मैंने जीवा आयुर्वेद से इलाज शुरू किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी स्थिति को समझकर मुझे आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़ी सलाह दी। धीरे-धीरे मुझे आराम मिलने लगा। अब मुझे चलने-फिरने में पहले से काफी आसानी महसूस होती है और मेरी स्थिति में अच्छा सुधार आया है।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

MS के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब वे बार-बार या लंबे समय तक बने रहें। सही समय पर जांच और सलाह लेना बहुत जरूरी होता है।

  • शरीर में बार-बार सुन्नपन या झुनझुनी महसूस होना
  • चलने में असंतुलन या बार-बार लड़खड़ाना
  • नजर धुंधली होना या एक आंख से देखने में दिक्कत
  • लगातार मांसपेशियों में कमजोरी महसूस होना
  • बिना कारण बहुत ज्यादा थकान बने रहना
  • हाथ-पैरों में ताकत कम महसूस होना
  • याददाश्त या फोकस में लगातार परेशानी होना
  • लक्षणों का कई हफ्तों तक लगातार बने रहना

निष्कर्ष

MS यानी मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक ऐसी स्थिति है जो नसों और शरीर के नर्व सिस्टम को प्रभावित करती है। आधुनिक चिकित्सा इसे एक ऑटोइम्यून न्यूरोलॉजिकल बीमारी के रूप में देखती है, जबकि आयुर्वेद इसे मुख्य रूप से वात दोष असंतुलन, कमजोर नर्व फंक्शन और मानसिक तनाव से जुड़ी स्थिति मानता है।

लगातार तनाव, गलत दिनचर्या, नींद की कमी और शरीर की अनदेखी इस स्थिति को और बढ़ा सकती है। इसलिए सिर्फ लक्षणों को दबाने के बजाय शरीर, मन और जीवनशैली के संतुलन पर ध्यान देना लंबे समय तक बेहतर स्वास्थ्य के लिए जरूरी माना जाता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

MS एक लंबे समय तक चलने वाली न्यूरोलॉजिकल स्थिति मानी जाती है, इसलिए इसे पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होता। हालांकि सही इलाज, देखभाल और जीवनशैली के साथ इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। कई लोग लंबे समय तक सामान्य जीवन भी जी पाते हैं अगर स्थिति को समय पर समझकर मैनेज किया जाए। इसमें नियमित देखभाल और फॉलो-अप बहुत अहम भूमिका निभाते हैं।

 नहीं, MS हर व्यक्ति में अलग तरीके से दिखाई देता है। किसी में सुन्नपन ज्यादा होता है तो किसी में बैलेंस या नजर की समस्या ज्यादा हो सकती है। इसकी तीव्रता और लक्षण समय के साथ बदल भी सकते हैं। इसलिए हर मरीज का अनुभव अलग होता है और उसी के अनुसार मैनेजमेंट किया जाता है।

MS कई मामलों में धीरे-धीरे शुरू होता है और शुरुआती लक्षण हल्के हो सकते हैं। कुछ लोगों में यह अचानक तेज लक्षणों के साथ भी सामने आ सकता है। शुरुआत में लोग इसे सामान्य थकान या कमजोरी समझ लेते हैं। समय के साथ लक्षण ज्यादा स्पष्ट हो सकते हैं और पहचान आसान हो जाती है।

तनाव को सीधे MS का कारण नहीं माना जाता, लेकिन यह इसके लक्षणों को बढ़ा सकता है। ज्यादा मानसिक दबाव से थकान, सुन्नपन और कमजोरी ज्यादा महसूस हो सकती है। इसलिए मानसिक शांति बनाए रखना बहुत जरूरी माना जाता है। तनाव कम करने से शरीर को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद मिल सकती है।

हर व्यक्ति में यह समस्या हमेशा नहीं रहती, यह लक्षणों की गंभीरता पर निर्भर करता है। कुछ लोगों में यह कभी-कभी होता है और समय के साथ बेहतर भी हो सकता है। बैलेंस और मसल कंट्रोल प्रभावित होने पर चलने में दिक्कत आ सकती है। सही देखभाल और सपोर्ट से इसमें सुधार संभव है।

MS में होने वाली थकान सामान्य थकान से अलग होती है। यह बिना ज्यादा काम किए भी महसूस हो सकती है और लंबे समय तक बनी रह सकती है। आराम करने पर भी यह पूरी तरह खत्म नहीं होती। यह नर्व सिस्टम की कार्यक्षमता से जुड़ी मानी जाती है।

नहीं, नजर की समस्या हर समय नहीं रहती और यह बदल भी सकती है। कभी धुंधला दिखना या आंखों में दबाव जैसा महसूस हो सकता है। कुछ समय बाद यह लक्षण कम या बेहतर भी हो सकते हैं। यह नर्व सिस्टम पर असर के कारण होता है और समय के साथ बदल सकता है।

डाइट सीधे MS को खत्म नहीं करती, लेकिन यह शरीर को सपोर्ट कर सकती है। संतुलित और हल्का भोजन शरीर की ऊर्जा बनाए रखने में मदद कर सकता है। बहुत भारी और प्रोसेस्ड फूड से थकान ज्यादा महसूस हो सकती है। इसलिए सही खानपान को सपोर्टिव माना जाता है।

MS सिर्फ उम्र से जुड़ी बीमारी नहीं है और यह किसी भी वयस्क उम्र में हो सकता है। हालांकि यह अक्सर 20 से 40 वर्ष के बीच ज्यादा देखा जाता है। इसके पीछे कई फैक्टर हो सकते हैं, सिर्फ उम्र नहीं। इसलिए इसे केवल बढ़ती उम्र से जोड़कर नहीं देखा जाता।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us