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Punarnava, Giloy, Gokshura - कौन सी जड़ी -बूटी Uric Acid में सच में काम करती है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 19 May, 2026
  • category-iconUpdated on 15 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5064

आजकल बढ़ा हुआ यूरिक एसिड केवल एक लैब रिपोर्ट का नंबर नहीं रह गया है। जोड़ों में दर्द, सूजन, भारीपन और चलने में असहजता जैसी समस्याएं कई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में लोग अक्सर प्राकृतिक और आयुर्वेदिक उपायों की तरफ रुख करते हैं।

पुनर्नवा, गिलोय और गोक्षुर जैसी जड़ी-बूटियों के बारे में बहुत चर्चा होती है। लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कौन-सी जड़ी-बूटी वास्तव में शरीर के संतुलन, सूजन और यूरिक एसिड से जुड़ी समस्याओं में सहायक मानी जाती है। आयुर्वेद इन औषधियों को केवल एक लक्षण तक सीमित नहीं देखता, बल्कि पूरे शरीर के पाचन, अपशिष्ट निकास और दोष संतुलन के संदर्भ में समझता है।

यूरिक एसिड क्या है और यह क्यों बढ़ता है?

यूरिक एसिड (Uric Acid) हमारे शरीर में बनने वाला एक नेचुरल वेस्ट प्रोडक्ट (अपशिष्ट) है। जब हम खाना खाते हैं, तो उसमें मौजूद 'प्यूरीन' नाम का तत्व टूटता है, जिससे यूरिक एसिड बनता है। आम तौर पर, हमारी किडनी इसे खून से छानकर पेशाब के रास्ते बाहर निकाल देती है। लेकिन जब शरीर में यह ज़्यादा बनने लगे या फिर किडनी इसे बाहर निकालने में सुस्त पड़ जाए, तो यह खून में ही जमा होने लगता है।

धीरे-धीरे यही स्थिति हाइपरयूरिसीमिया (Hyperuricemia) का रूप ले लेती है। यही बढ़ा हुआ यूरिक एसिड आगे चलकर जोड़ों में दर्द, भारी सूजन और गठिया (Gout) जैसी परेशानियाँ खड़ी कर देता है। आसान शब्दों में कहें तो, आपका शरीर उस वक्त एक “ओवरलोडेड सिस्टम” की तरह बर्ताव करने लगता है।

शरीर में यूरिक एसिड बढ़ने के लक्षण क्या हैं?

यूरिक एसिड बढ़ने पर शरीर शुरुआत में बहुत हल्के-फुल्के इशारे देता है, जिन्हें हम अक्सर थकान या बढ़ती उम्र का असर मानकर टाल देते हैं। पर धीरे-धीरे ये संकेत बड़े होने लगते हैं और जोड़ों की परेशानी बढ़ने लगती है।

  • सुबह की जकड़न और दर्द: सुबह सोकर उठने पर उंगलियों, हाथों या पैरों में अजीब सी जकड़न और दर्द महसूस होता है। इसे यूरिक एसिड बढ़ने का सबसे शुरुआती संकेत माना जाता है।
  • पैरों के जोड़ों में दर्द: धीरे-धीरे यह दर्द टखनों (एंकल), घुटनों और खासकर पैर के अंगूठे को अपना निशाना बनाता है। इससे रोज़मर्रा के चलने-फिरने में भी तकलीफ होने लगती है।
  • सूजन और गर्माहट: जिस जोड़ में दर्द होता है, वहाँ सूजन आ जाती है और छूने पर हल्का गर्म या जलन जैसा महसूस होता है। यह सीधा इशारा है कि अंदर इन्फ्लेमेशन (सूजन) हो रही है।
  • हिलने-डुलने में परेशानी: जोड़ों का लचीलापन कम होने लगता है। थोड़ा सा भी हिलने या काम करने पर दिक्कत होती है और पूरा शरीर भारी-भारी सा लगता है।
  • लगातार थकान और बेचैनी: अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो शरीर हर वक्त थका हुआ और बेचैन रहता है। इससे दिन भर के काम निपटाना भी मुश्किल हो जाता है।

अगर समय रहते इन संकेतों पर ध्यान न दिया जाए, तो यह छोटी सी दिखने वाली समस्या धीरे-धीरे काफी गंभीर रूप ले सकती है।

यूरिक एसिड बढ़ने के कारण

यूरिक एसिड शरीर में तब बढ़ने लगता है जब उसके बनने और बाहर निकलने की प्रक्रिया में असंतुलन आ जाता है। यह केवल एक कारण से नहीं, बल्कि कई आंतरिक और जीवनशैली से जुड़े कारणों के मिलकर प्रभाव से होता है।

  • प्यूरीन युक्त भोजन का अधिक सेवन: शरीर में प्यूरीन टूटकर यूरिक एसिड बनाता है। जब इसका सेवन ज्यादा होता है तो स्तर बढ़ सकता है।
  • कम पानी पीना: पर्याप्त पानी न लेने से शरीर यूरिक एसिड को बाहर ठीक से नहीं निकाल पाता। इससे यह रक्त में जमा होने लगता है।
  • कमजोर पाचन शक्ति: जब पाचन ठीक नहीं होता, तो अपशिष्ट पदार्थ सही तरीके से नहीं निकलते। यह स्थिति यूरिक एसिड बढ़ने में योगदान कर सकती है।
  • अधिक मोटापा: शरीर में फैट बढ़ने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है। इससे यूरिक एसिड का संतुलन प्रभावित होता है।
  • शारीरिक निष्क्रियता: कम चलना-फिरना और बैठी जीवनशैली शरीर के अपशिष्ट निकास को धीमा कर देती है। यह भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।
  • शराब और असंतुलित जीवनशैली: शराब का सेवन और अनियमित दिनचर्या शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं। इससे यूरिक एसिड बढ़ने की संभावना बढ़ सकती है।

यूरिक एसिड को लेकर आयुर्वेद क्या कहता है?

यूरिक एसिड बढ़ने को आयुर्वेद कमज़ोर पाचन और पेट की अग्नि से जोड़ता है। जब पेट खाने को सही से पचा नहीं पाता, तो अंदर एक चिपचिपा ज़हरीला कचरा बनने लगता है। इसी कचरे को आयुर्वेद में 'आम' (Ama) कहते हैं। यही गंदगी धीरे-धीरे जोड़ों में जाकर बैठ जाती है और दर्द शुरू हो जाता है।

  • वात गड़बड़ाता है: शरीर के अंदर सूखापन बढ़ने लगता है। जोड़ों में इतनी अकड़न और दर्द होता है कि पैर आगे बढ़ाना भी भारी लगने लगता है।
  • पित्त का रोल: जब शरीर में पित्त बढ़ जाता है, तो जोड़ों में तेज़ गर्मी और जलन होने लगती है। वहाँ साफ-साफ सूजन दिखाई देने लगती है।
  • टॉक्सिन्स यानी 'आम' का जमना: पाचन खराब होने से जो कचरा जोड़ों के बीच अटक जाता है, वही हर समय रहने वाले भारीपन और दर्द की असली वजह है।

यूरिक एसिड में चर्चित आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां और उनकी भूमिका

1. पुनर्नवा: सूजन और शरीर के द्रव संतुलन में सहायक

  • पुनर्नवा को आयुर्वेद में शरीर को पुनः संतुलित करने वाली जड़ी-बूटी माना जाता है।
  • यह विशेष रूप से सूजन, शरीर में पानी रुकने की प्रवृत्ति और भारीपन जैसी स्थितियों में उपयोगी मानी जाती है।
  • आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से यह शरीर के पानी और अपशिष्ट निकालने के रास्ते  को सहारा देने और संतुलन बनाए रखने में सहायक मानी जाती है।
  • जिन लोगों में यूरिक एसिड के साथ सूजन और शरीर में भारीपन अधिक महसूस होता है, वहां पुनर्नवा का उल्लेख अक्सर किया जाता है।

2. गिलोय: पाचन और शरीर के संतुलन को सहारा देने वाली जड़ी-बूटी

  • गिलोय को आयुर्वेद में अमृता भी कहा गया है और इसे शरीर के संतुलन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • यह शरीर में जमा अपशिष्ट तत्वों और लंबे समय से बनी सूजन की स्थिति में सहायक मानी जाती है।
  • गिलोय पाचन शक्ति को संतुलित रखने और शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को सहारा देने में उपयोगी मानी जाती है।
  • जिन लोगों में थकान, बार-बार सूजन और कमजोर पाचन साथ में दिखाई देता है, वहां गिलोय की चर्चा अधिक होती है।

3. गोक्षुर: मूत्र मार्ग और गुर्दों के सहारे से जुड़ी जड़ी-बूटी

  • गोक्षुर का संबंध विशेष रूप से मूत्र मार्ग और शरीर के जल संतुलन से जोड़ा जाता है।
  • आयुर्वेद में इसे शरीर से अपशिष्ट बाहर निकालने की प्रक्रिया को सहारा देने वाली जड़ी-बूटी माना गया है।
  • क्योंकि यूरिक एसिड का बाहर निकलना गुर्दों से जुड़ा होता है, इसलिए गोक्षुर का उल्लेख अक्सर इस संदर्भ में किया जाता है।
  • जिन लोगों में पेशाब के दौरान जलन, असहजता, शरीर में पानी रुकना या गुर्दों पर दबाव जैसे संकेत दिखाई देते हैं, वहां गोक्षुर की चर्चा अधिक होती है।

इलाज को लेकर क्या है हमारा नज़रिया?

यहाँ हमारा फोकस सिर्फ यूरिक एसिड के लेवल को किसी तरह नीचे लाना नहीं है। हम शरीर के अंदर बिगड़े हुए पूरे सिस्टम को दोबारा पटरी पर लाते हैं:

  • पेट की अग्नि को जगाना: सबसे पहला काम पाचन को दुरुस्त करना है। इससे आप जो भी खाएँगे, वो अच्छे से पचेगा और दोबारा कोई ज़हरीला कचरा नहीं बन पाएगा।
  • अंदरूनी गंदगी की सफाई: जोड़ों में जो टॉक्सिन्स पहले से जमे बैठे हैं, उन्हें साफ करने पर पूरा ज़ोर दिया जाता है ताकि जकड़न में तुरंत आराम मिल सके।
  • वात और पित्त को शांत करना: दर्द के ज़िम्मेदार वात को और जलन बढ़ाने वाले पित्त को सही जड़ी-बूटियों से बैलेंस किया जाता है।
  • किडनी को सहारा देना: शरीर का कचरा बाहर फेंकने का ज़िम्मा किडनी का है। हम उसे अंदर से ताक़त देते हैं ताकि यूरिक एसिड आसानी से पेशाब के रास्ते निकल जाए।
  • डाइट और रूटीन सेट करना: बिना सही खान-पान और एक्टिव लाइफस्टाइल के इस बीमारी को हराना मुमकिन नहीं है। इसलिए सही मात्रा में पानी पीना और एक्टिव रहना ज़रूरी है।

यूरिक एसिड को कंट्रोल करने वाली काम की औषधियाँ

कुछ आयुर्वेदिक औषधियाँ ऐसी हैं जो सिर्फ दर्द नहीं दबातीं, बल्कि आपका हाज़मा सुधारकर जोड़ों की सूजन को भी पूरी तरह खींच लेती हैं:

  • त्रिफला: यूरिक एसिड बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खराब हाज़मा है। त्रिफला आंतों में जमा पुरानी गंदगी को बाहर निकालता है और जठराग्नि (पाचन की आग) को तेज़ करता है। इससे शरीर में फालतू टॉक्सिन्स टिक नहीं पाते।
  • पुनर्नवा: इसके नाम का अर्थ ही है 'फिर से नया करना'। यह शरीर में रुके हुए फालतू पानी को बाहर निकाल देती है। इससे किडनी का काम आसान हो जाता है और जोड़ों की सूजन अपने आप उतरने लगती है।
  • गुग्गुल: यूरिक एसिड के कारण घुटनों और टखनों में जो जकड़न आ जाती है, गुग्गुल उसे दूर करता है। यह जोड़ों की अकड़न को कम करके उन्हें फिर से लचीला बनाता है।
  • अश्वगंधा: लंबे समय तक दर्द सहने से इंसान अंदर से कमज़ोर हो जाता है और हर वक्त थकान लगती है। अश्वगंधा इन्हीं थकी हुई मांसपेशियों में नई ऊर्जा भरता है और शरीर की कमज़ोरी को दूर करता है।

दर्द और जकड़न खोलने वाली खास थेरेपी

जड़ी-बूटियों के अलावा, आयुर्वेद में शरीर को आराम देने और पुरानी जकड़न खोलने के लिए कुछ खास थेरेपी भी दी जाती हैं:

  • अभ्यंग (हर्बल ऑयल मसाज): जब खास जड़ी-बूटियों वाले गुनगुने तेल से बदन की मालिश की जाती है, तो नसों और मांसपेशियों को गहरा सुकून मिलता है। इससे दर्द काफी हद तक दब जाता है।
  • स्वेदन (भाप से सिंकाई): मालिश के तुरंत बाद दी जाने वाली यह हर्बल भाप शरीर की पुरानी से पुरानी अकड़न को पिघला देती है। इसे लेने के बाद आप खुद को एकदम हल्का महसूस करेंगे।
  • बस्ती चिकित्सा: यूरिक एसिड के दर्द में सबसे बड़ी परेशानी बिगड़ा हुआ 'वात' होता है। बस्ती के ज़रिए इसी वात को शरीर से बाहर निकाला जाता है, जिससे घुटनों के दर्द में जल्द आराम मिलता है।

यूरिक एसिड में सहायक आहार

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • पर्याप्त पानी और प्राकृतिक तरल पदार्थ
  • हरी सब्जियां और मौसमी फल
  • मूंग दाल और हल्का सुपाच्य भोजन
  • सीमित मात्रा में घी
  • नारियल पानी और हल्के पेय

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • अत्यधिक मसालेदार भोजन
  • बहुत ज्यादा मांसाहार
  • पैकेट बंद और कृत्रिम खाद्य पदार्थ
  • बहुत ज्यादा मीठे पेय
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

कब डॉक्टर से सलाह लें?

यूरिक एसिड की समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब लक्षण लगातार बढ़ने लगें।

  • जोड़ों में अचानक बहुत तेज दर्द होना
  • सूजन और लालिमा लगातार बढ़ना
  • चलने-फिरने में अत्यधिक परेशानी होना
  • पैर के अंगूठे, घुटनों या टखनों में तीव्र जकड़न महसूस होना
  • बार-बार सूजन और दर्द के दौरे आना
  • बुखार या अत्यधिक कमजोरी महसूस होना
  • आराम और आहार सुधार के बाद भी राहत न मिलना
  • हाथों या पैरों के जोड़ों का आकार बदलता महसूस होना

निष्कर्ष

यूरिक एसिड केवल एक लैब रिपोर्ट का बढ़ा हुआ नंबर नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदरूनी संतुलन, पाचन शक्ति और अपशिष्ट बाहर निकालने की प्रक्रिया से जुड़ी स्थिति हो सकती है। जब शरीर में लंबे समय तक असंतुलन बना रहता है, तो जोड़ों में दर्द, सूजन और जकड़न जैसी समस्याएं धीरे-धीरे सामने आ सकती हैं।

आयुर्वेद इस स्थिति को केवल एक अलग बीमारी की तरह नहीं देखता, बल्कि इसे पूरे शरीर के वात, पाचन और द्रव संतुलन के संदर्भ में समझने पर जोर देता है। ऐसे में जीवनशैली, आहार और शरीर के प्राकृतिक संतुलन को बेहतर बनाए रखना लंबे समय तक राहत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

कई बार यूरिक एसिड धीरे-धीरे बढ़ता है लेकिन शरीर तुरंत संकेत नहीं देता। अचानक रिपोर्ट में बदलाव दिख सकता है, जबकि असली प्रक्रिया पहले से चल रही होती है। यह अक्सर आहार, पानी की कमी और जीवनशैली में छोटे बदलावों से जुड़ा होता है। इसलिए नियमित जांच महत्वपूर्ण मानी जाती है।

आहार सुधार मदद कर सकता है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं होता। शरीर की पाचन शक्ति, गुर्दों की कार्यक्षमता और जीवनशैली भी भूमिका निभाते हैं। केवल खाने में बदलाव से पूरी स्थिति नियंत्रित होना हर बार संभव नहीं होता। संतुलित दृष्टिकोण अधिक प्रभावी माना जाता है।

अधिक वज़न होने पर शरीर में अपशिष्ट तत्वों का संतुलन प्रभावित हो सकता है। इससे यूरिक एसिड बढ़ने की संभावना भी अधिक हो सकती है। कम सक्रिय जीवनशैली इस संबंध को और मजबूत कर सकती है। इसलिए वजन और गतिविधि दोनों पर ध्यान देना ज़रूरी माना जाता है।

लगातार तनाव शरीर की सामान्य चयापचय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इससे पाचन और अपशिष्ट बाहर निकालने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। लंबे समय तक तनाव रहने पर शरीर में असंतुलन बढ़ सकता है। इसलिए मानसिक संतुलन भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

पानी कम पीने से शरीर में अपशिष्ट सही तरीके से बाहर नहीं निकल पाता। इससे यूरिक एसिड जमा होने की संभावना बढ़ सकती है। पर्याप्त जल सेवन शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को सहारा देता है। यह एक महत्वपूर्ण जीवनशैली कारक माना जाता है।

हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते। कुछ लोगों में केवल रिपोर्ट में बदलाव होता है, जबकि कुछ में दर्द और सूजन दिखाई देती है। यह शरीर की संवेदनशीलता और स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए लक्षणों का आकलन ज़रूरी होता है।

यह समस्या अब केवल उम्र से जुड़ी नहीं रह गई है। युवा लोगों में भी अनियमित दिनचर्या और असंतुलित खानपान के कारण यह बढ़ती देखी जा रही है। लंबे समय तक बैठकर काम करना भी एक कारण बन सकता है। यह जीवनशैली-आधारित स्थिति बनती जा रही है।

पाचन शक्ति कमजोर होने पर शरीर अपशिष्ट को सही तरीके से प्रोसेस नहीं कर पाता। इससे यूरिक एसिड जैसे तत्वों का संतुलन प्रभावित हो सकता है। अच्छा पाचन शरीर की समग्र प्रक्रिया को सहारा देता है। इसलिए यह संबंध महत्वपूर्ण माना जाता है।

हर स्थिति में दवा ज़रूरी नहीं होती। कई मामलों में जीवनशैली और आहार सुधार से भी संतुलन में मदद मिल सकती है। लेकिन गंभीर स्थिति में चिकित्सकीय सलाह आवश्यक होती है। स्थिति की गंभीरता पर निर्णय निर्भर करता है।

यदि मूल कारण जैसे खानपान और जीवनशैली में सुधार नहीं किया जाए, तो यह दोबारा बढ़ सकता है। शरीर में असंतुलन बने रहने पर समस्या वापस आ सकती है। इसलिए दीर्घकालिक संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। नियमित देखभाल इसमें मदद कर सकती है।

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