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"Uric Acid में Non-Veg बंद करो" — क्या यही काफ़ी है? आयुर्वेद की राय जानें

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

यूरिक एसिड बढ़ने पर सबसे पहली सलाह यही मिलती है कि "नॉन-वेज खाना तुरंत बंद कर दो।" लेकिन क्या सिर्फ एक चीज़ छोड़ देने से मामला पूरी तरह सुधर जाता है? या फिर इसके पीछे शरीर के अंदर चल रही कुछ और गड़बड़ियाँ भी ज़िम्मेदार हैं, इसे समझना बहुत ज़रूरी है। लोग अक्सर अपनी डाइट से बस एक-दो चीज़ें हटाकर सोचते हैं कि अब सब ठीक हो जाएगा, जबकि असल में शरीर का मेटाबॉलिज़्म, आपका पाचन और शरीर की गंदगी बाहर निकालने की ताकत भी इसमें बड़ा रोल निभाती है।

आयुर्वेद में यूरिक एसिड को सिर्फ खान-पान की दिक्कत नहीं माना जाता। यह शरीर में बढ़ी हुई गर्मी (पित्त), कमज़ोर पाचन और अंदर जमे हुए ज़हरीले तत्वों (आम) से जुड़ी समस्या है। इसलिए सिर्फ नॉन-वेज बंद करना पहला कदम तो हो सकता है, लेकिन इस परेशानी को जड़ से खत्म करने के लिए शरीर के अंदरूनी कारणों पर ध्यान देना और भी ज़्यादा ज़रूरी है।

यूरिक एसिड क्या है और यह क्यों बढ़ता है?

यूरिक एसिड (Uric Acid) हमारे शरीर में बनने वाला एक नेचुरल वेस्ट प्रोडक्ट (अपशिष्ट) है। जब हम खाना खाते हैं, तो उसमें मौजूद 'प्यूरीन' नाम का तत्व टूटता है, जिससे यूरिक एसिड बनता है। आम तौर पर, हमारी किडनी इसे खून से छानकर पेशाब के रास्ते बाहर निकाल देती है। लेकिन जब शरीर में यह ज़्यादा बनने लगे या फिर किडनी इसे बाहर निकालने में सुस्त पड़ जाए, तो यह खून में ही जमा होने लगता है।

धीरे-धीरे यही स्थिति हाइपरयूरिसीमिया (Hyperuricemia) का रूप ले लेती है। यही बढ़ा हुआ यूरिक एसिड आगे चलकर जोड़ों में दर्द, भारी सूजन और गठिया (Gout) जैसी परेशानियाँ खड़ी कर देता है। आसान शब्दों में कहें तो, आपका शरीर उस वक्त एक “ओवरलोडेड सिस्टम” की तरह बर्ताव करने लगता है।

शरीर में यूरिक एसिड बढ़ने के लक्षण क्या हैं?

यूरिक एसिड बढ़ने पर शरीर शुरुआत में बहुत हल्के-फुल्के इशारे देता है, जिन्हें हम अक्सर थकान या बढ़ती उम्र का असर मानकर टाल देते हैं। पर धीरे-धीरे ये संकेत बड़े होने लगते हैं और जोड़ों की परेशानी बढ़ने लगती है।

  • सुबह की जकड़न और दर्द: सुबह सोकर उठने पर उंगलियों, हाथों या पैरों में अजीब सी जकड़न और दर्द महसूस होता है। इसे यूरिक एसिड बढ़ने का सबसे शुरुआती संकेत माना जाता है।
  • पैरों के जोड़ों में दर्द: धीरे-धीरे यह दर्द टखनों (एंकल), घुटनों और खासकर पैर के अंगूठे को अपना निशाना बनाता है। इससे रोज़मर्रा के चलने-फिरने में भी तकलीफ होने लगती है।
  • सूजन और गर्माहट: जिस जोड़ में दर्द होता है, वहाँ सूजन आ जाती है और छूने पर हल्का गर्म या जलन जैसा महसूस होता है। यह सीधा इशारा है कि अंदर इन्फ्लेमेशन (सूजन) हो रही है।
  • हिलने-डुलने में परेशानी: जोड़ों का लचीलापन कम होने लगता है। थोड़ा सा भी हिलने या काम करने पर दिक्कत होती है और पूरा शरीर भारी-भारी सा लगता है।
  • लगातार थकान और बेचैनी: अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो शरीर हर वक्त थका हुआ और बेचैन रहता है। इससे दिन भर के काम निपटाना भी मुश्किल हो जाता है।

अगर समय रहते इन संकेतों पर ध्यान न दिया जाए, तो यह छोटी सी दिखने वाली समस्या धीरे-धीरे काफी गंभीर रूप ले सकती है।

यूरिक एसिड बढ़ने के कारण

यूरिक एसिड शरीर में तब बढ़ने लगता है जब उसके बनने और बाहर निकलने की प्रक्रिया में असंतुलन आ जाता है। यह केवल एक कारण से नहीं, बल्कि कई आंतरिक और जीवनशैली से जुड़े कारणों के मिलकर प्रभाव से होता है।

  • प्यूरीन युक्त भोजन का अधिक सेवन: शरीर में प्यूरीन टूटकर यूरिक एसिड बनाता है। जब इसका सेवन ज्यादा होता है तो स्तर बढ़ सकता है।
  • कम पानी पीना: पर्याप्त पानी न लेने से शरीर यूरिक एसिड को बाहर ठीक से नहीं निकाल पाता। इससे यह रक्त में जमा होने लगता है।
  • कमजोर पाचन शक्ति: जब पाचन ठीक नहीं होता, तो अपशिष्ट पदार्थ सही तरीके से नहीं निकलते। यह स्थिति यूरिक एसिड बढ़ने में योगदान कर सकती है।
  • अधिक मोटापा: शरीर में फैट बढ़ने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है। इससे यूरिक एसिड का संतुलन प्रभावित होता है।
  • शारीरिक निष्क्रियता: कम चलना-फिरना और बैठी जीवनशैली शरीर के अपशिष्ट निकास को धीमा कर देती है। यह भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।
  • शराब और असंतुलित जीवनशैली: शराब का सेवन और अनियमित दिनचर्या शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं। इससे यूरिक एसिड बढ़ने की संभावना बढ़ सकती है।

Non-Veg और यूरिक एसिड का संबंध कितना मजबूत है?

लोग मानते हैं कि नॉन-वेज और यूरिक एसिड का आपस में बहुत गहरा नाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि नॉन-वेज चीज़ों में 'प्यूरीन' नाम का तत्व ज़्यादा पाया जाता है, जो टूटकर यूरिक एसिड में बदल जाता है। खासकर रेड मीट, ऑर्गन मीट या सी-फूड खाने से यह तेज़ी से ऊपर भागता है।

पर समझने वाली बात यह है कि सारा दोष सिर्फ नॉन-वेज का ही नहीं होता। कई शाकाहारी चीज़ें जैसे कुछ दालें, मशरूम और अनाज भी ऐसे हैं जिनमें खूब प्यूरीन होता है और ये यूरिक एसिड को बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा, हर इंसान की बॉडी अलग तरह से काम करती है। किसी को थोड़ी सी ऐसी चीज़ खाने पर भी असर दिख जाता है, तो किसी पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। इसलिए केवल नॉन-वेज के सिर पर ठीकरा फोड़ना अधूरी समझ होगी।

सिर्फ Non-Veg छोड़ना क्यों पर्याप्त नहीं होता?

कई लोग यह सोच बैठते हैं कि नॉन-वेज बंद करते ही यूरिक एसिड एकदम कंट्रोल हो जाएगा। पर यह इस पूरी कहानी का बस एक छोटा सा हिस्सा है। इसके पीछे कई और बड़े कारण भी होते हैं:

  • धीमा मेटाबॉलिज़्म: अगर आपके शरीर का मेटाबॉलिज़्म सुस्त पड़ा है, तो यूरिक एसिड सही से प्रोसेस नहीं हो पाता। इससे उसका लेवल खून में बढ़ने लगता है।
  • किडनी की क्षमता: किडनी ही हमारे शरीर से सारे कचरे को बाहर फेंकती है। अगर इसकी काम करने की ताक़त कमज़ोर पड़ जाए, तो यूरिक एसिड बाहर निकलने के बजाय अंदर ही जमा होने लगता है।
  • पानी की कमी: कम पानी पीने से शरीर के टॉक्सिन्स बाहर नहीं आ पाते। पानी की यह कमी यूरिक एसिड को तेज़ी से बढ़ा सकती है।
  • कम हिलना-डुलना: सुस्त लाइफस्टाइल और कोई फिजिकल एक्टिविटी न करने से शरीर का वेस्ट निकालने का सिस्टम धीमा हो जाता है। इससे दिक्कत और बढ़ती है।
  • नींद और रूटीन की गड़बड़ी: खराब नींद और उल्टे-सीधे डेली रूटीन से शरीर का पूरा बैलेंस बिगड़ जाता है, जिससे कई बीमारियाँ पनपती हैं।

इसीलिए सिर्फ डाइट बदलने से पूरी तरह बात नहीं बनेगी। यह एक ऐसी समस्या है जिसके लिए आपको अपनी पूरी ज़िन्दगी जीने का तरीका और आदतें सुधारनी होंगी।

यूरिक एसिड बढ़ने का शरीर पर क्या असर पड़ता है?

जब बॉडी में यूरिक एसिड का लेवल बढ़ता है, तो यह सिर्फ काग़ज़ की एक रिपोर्ट तक नहीं रुकता। धीरे-धीरे इसका असर हमारे जोड़ों, मांसपेशियों और उठने-बैठने के पूरे तरीके पर दिखने लगता है।

  • जोड़ों में सूजन: इसका सबसे पहला हमला हमारे जोड़ों पर ही होता है। पैर के अंगूठे, घुटने और टखने एकदम से सूज जाते हैं। वहाँ इतना तेज़ दर्द होता है और वो जगह छूने पर इतनी गर्म लगती है कि इंसान छटपटा उठता है।
  • चलने-फिरने में भारी दिक़्क़त: जोड़ों के बीच इतनी ज़्यादा अकड़न आ जाती है कि नॉर्मल चलना-फिरना भी पहाड़ जैसा लगने लगता है। सोकर उठने पर ऐसा महसूस होता है जैसे पूरे शरीर को किसी ने बुरी तरह जकड़ लिया हो।
  • अचानक उठने वाले दौरे: इसमें दर्द हर समय एक जैसा नहीं रहता। कभी-कभी लगेगा कि सब ठीक है, और अचानक दर्द और सूजन का ऐसा झटका (फ्लेयर-अप) लगेगा कि इंसान बिस्तर पकड़ ले।
  • हर वक़्त कमज़ोरी और थकान: शरीर के अंदर जब इतना बड़ा असंतुलन चल रहा होता है, तो हमारी बची-खुची एनर्जी भी ख़त्म हो जाती है। मरीज़ बिना किसी भारी काम किए भी हर रोज़ अंदर से एकदम बेदम और थका हुआ महसूस करता है।
  • जोड़ों का हमेशा के लिए ख़राब होना: अगर कोई इस बात को बहुत दिनों तक नज़रअंदाज़ करता रहे, तो जोड़ों की पूरी बनावट ही हिल जाती है। फिर यह दर्द हमेशा के लिए बैठ जाता है और अंगों को हिलाना-डुलाना भी बेहद मुश्किल हो जाता है।

यूरिक एसिड को लेकर आयुर्वेद क्या कहता है?

यूरिक एसिड बढ़ने को आयुर्वेद कमज़ोर पाचन और पेट की अग्नि से जोड़ता है। जब पेट खाने को सही से पचा नहीं पाता, तो अंदर एक चिपचिपा ज़हरीला कचरा बनने लगता है। इसी कचरे को आयुर्वेद में 'आम' (Ama) कहते हैं। यही गंदगी धीरे-धीरे जोड़ों में जाकर बैठ जाती है और दर्द शुरू हो जाता है।

  • वात गड़बड़ाता है: शरीर के अंदर सूखापन बढ़ने लगता है। जोड़ों में इतनी अकड़न और दर्द होता है कि पैर आगे बढ़ाना भी भारी लगने लगता है।
  • पित्त का रोल: जब शरीर में पित्त बढ़ जाता है, तो जोड़ों में तेज़ गर्मी और जलन होने लगती है। वहाँ साफ-साफ सूजन दिखाई देने लगती है।
  • टॉक्सिन्स यानी 'आम' का जमना: पाचन खराब होने से जो कचरा जोड़ों के बीच अटक जाता है, वही हर समय रहने वाले भारीपन और दर्द की असली वजह है।

इलाज को लेकर क्या है हमारा नज़रिया?

यहाँ हमारा फोकस सिर्फ यूरिक एसिड के लेवल को किसी तरह नीचे लाना नहीं है। हम शरीर के अंदर बिगड़े हुए पूरे सिस्टम को दोबारा पटरी पर लाते हैं:

  • पेट की अग्नि को जगाना: सबसे पहला काम पाचन को दुरुस्त करना है। इससे आप जो भी खाएँगे, वो अच्छे से पचेगा और दोबारा कोई ज़हरीला कचरा नहीं बन पाएगा।
  • अंदरूनी गंदगी की सफाई: जोड़ों में जो टॉक्सिन्स पहले से जमे बैठे हैं, उन्हें साफ करने पर पूरा ज़ोर दिया जाता है ताकि जकड़न में तुरंत आराम मिल सके।
  • वात और पित्त को शांत करना: दर्द के ज़िम्मेदार वात को और जलन बढ़ाने वाले पित्त को सही जड़ी-बूटियों से बैलेंस किया जाता है।
  • किडनी को सहारा देना: शरीर का कचरा बाहर फेंकने का ज़िम्मा किडनी का है। हम उसे अंदर से ताक़त देते हैं ताकि यूरिक एसिड आसानी से पेशाब के रास्ते निकल जाए।
  • डाइट और रूटीन सेट करना: बिना सही खान-पान और एक्टिव लाइफस्टाइल के इस बीमारी को हराना मुमकिन नहीं है। इसलिए सही मात्रा में पानी पीना और एक्टिव रहना ज़रूरी है।

यूरिक एसिड को कंट्रोल करने वाली काम की औषधियाँ

कुछ आयुर्वेदिक औषधियाँ ऐसी हैं जो सिर्फ दर्द नहीं दबातीं, बल्कि आपका हाज़मा सुधारकर जोड़ों की सूजन को भी पूरी तरह खींच लेती हैं:

  • त्रिफला: यूरिक एसिड बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खराब हाज़मा है। त्रिफला आंतों में जमा पुरानी गंदगी को बाहर निकालता है और जठराग्नि (पाचन की आग) को तेज़ करता है। इससे शरीर में फालतू टॉक्सिन्स टिक नहीं पाते।
  • पुनर्नवा: इसके नाम का अर्थ ही है 'फिर से नया करना'। यह शरीर में रुके हुए फालतू पानी को बाहर निकाल देती है। इससे किडनी का काम आसान हो जाता है और जोड़ों की सूजन अपने आप उतरने लगती है।
  • गुग्गुल: यूरिक एसिड के कारण घुटनों और टखनों में जो जकड़न आ जाती है, गुग्गुल उसे दूर करता है। यह जोड़ों की अकड़न को कम करके उन्हें फिर से लचीला बनाता है।
  • अश्वगंधा: लंबे समय तक दर्द सहने से इंसान अंदर से कमज़ोर हो जाता है और हर वक्त थकान लगती है। अश्वगंधा इन्हीं थकी हुई मांसपेशियों में नई ऊर्जा भरता है और शरीर की कमज़ोरी को दूर करता है।

दर्द और जकड़न खोलने वाली खास थेरेपी

जड़ी-बूटियों के अलावा, आयुर्वेद में शरीर को आराम देने और पुरानी जकड़न खोलने के लिए कुछ खास थेरेपी भी दी जाती हैं:

  • अभ्यंग (हर्बल ऑयल मसाज): जब खास जड़ी-बूटियों वाले गुनगुने तेल से बदन की मालिश की जाती है, तो नसों और मांसपेशियों को गहरा सुकून मिलता है। इससे दर्द काफी हद तक दब जाता है।
  • स्वेदन (भाप से सिंकाई): मालिश के तुरंत बाद दी जाने वाली यह हर्बल भाप शरीर की पुरानी से पुरानी अकड़न को पिघला देती है। इसे लेने के बाद आप खुद को एकदम हल्का महसूस करेंगे।
  • बस्ती चिकित्सा: यूरिक एसिड के दर्द में सबसे बड़ी परेशानी बिगड़ा हुआ 'वात' होता है। बस्ती के ज़रिए इसी वात को शरीर से बाहर निकाला जाता है, जिससे घुटनों के दर्द में जल्द आराम मिलता है।

यूरिक एसिड में सहायक आहार

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • पर्याप्त पानी और प्राकृतिक तरल पदार्थ
  • हरी सब्जियां और मौसमी फल
  • मूंग दाल और हल्का सुपाच्य भोजन
  • सीमित मात्रा में घी
  • नारियल पानी और हल्के पेय

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • अत्यधिक मसालेदार भोजन
  • बहुत ज्यादा मांसाहार
  • पैकेट बंद और कृत्रिम खाद्य पदार्थ
  • बहुत ज्यादा मीठे पेय
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

कब डॉक्टर से सलाह लें?

यूरिक एसिड की समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब लक्षण लगातार बढ़ने लगें।

  • जोड़ों में अचानक बहुत तेज दर्द होना
  • सूजन और लालिमा लगातार बढ़ना
  • चलने-फिरने में अत्यधिक परेशानी होना
  • पैर के अंगूठे, घुटनों या टखनों में तीव्र जकड़न महसूस होना
  • बार-बार सूजन और दर्द के दौरे आना
  • बुखार या अत्यधिक कमजोरी महसूस होना
  • आराम और आहार सुधार के बाद भी राहत न मिलना
  • हाथों या पैरों के जोड़ों का आकार बदलता महसूस होना

निष्कर्ष

यूरिक एसिड केवल जोड़ों के दर्द की सामान्य समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के पाचन, अपशिष्ट निकास और अंदरूनी संतुलन से जुड़ी स्थिति हो सकती है। आधुनिक चिकित्सा इसे शरीर में यूरिक एसिड बढ़ने और जोड़ों में उसके जमाव से जुड़ी समस्या मानती है, जबकि आयुर्वेद इसे मुख्य रूप से वात-पित्त असंतुलन, कमजोर अग्नि और आम के संचय से जोड़कर समझता है।

गलत खानपान, कम पानी पीना, निष्क्रिय जीवनशैली और अनियमित दिनचर्या इस स्थिति को और बढ़ा सकते हैं। इसलिए केवल दर्द कम करने के बजाय शरीर को अंदर से संतुलित, पाचन को बेहतर और जीवनशैली को व्यवस्थित रखना लंबे समय तक राहत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, यह समस्या केवल बढ़ती उम्र तक सीमित नहीं है। आजकल अनियमित खानपान, लंबे समय तक बैठे रहना और कम शारीरिक गतिविधि के कारण कम उम्र के लोगों में भी यूरिक एसिड बढ़ता देखा जा रहा है। कई बार शुरुआती अवस्था में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। धीरे धीरे शरीर में जकड़न और भारीपन महसूस होने लगता है। समय रहते ध्यान देना जरूरी माना जाता है।

पर्याप्त पानी शरीर से अपशिष्ट तत्वों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को सहारा दे सकता है। जब शरीर में पानी की कमी होती है, तो यूरिक एसिड जमा होने की संभावना बढ़ सकती है। सही मात्रा में पानी पीने से शरीर हल्का महसूस हो सकता है। यह जोड़ों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में भी सहायक हो सकता है। हालांकि केवल पानी पीना ही पर्याप्त समाधान नहीं माना जाता।

अधिक वजन शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर डाल सकता है, जिससे यूरिक एसिड बढ़ने की संभावना बढ़ सकती है। पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी शरीर में सूजन और असंतुलन को बढ़ा सकती है। इससे जोड़ों पर दबाव भी अधिक महसूस हो सकता है। धीरे धीरे शरीर में भारीपन और थकान बढ़ सकती है। संतुलित वजन बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।

कई लोगों में सुबह उठते समय जोड़ों की जकड़न और दर्द ज्यादा महसूस हो सकता है। लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने से अकड़न बढ़ सकती है। खासकर पैरों के अंगूठे, टखनों और घुटनों में असहजता अधिक महसूस हो सकती है। धीरे धीरे चलने फिरने पर कुछ राहत महसूस हो सकती है। यह स्थिति शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन का संकेत हो सकती है।

लगातार मानसिक तनाव शरीर के संतुलन और पाचन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। तनाव के कारण नींद और खानपान की आदतें भी बिगड़ सकती हैं। इसका असर शरीर के मेटाबॉलिज्म और सूजन की प्रवृत्ति पर पड़ सकता है। कई लोगों में तनाव के दौरान दर्द और जकड़न बढ़ती महसूस हो सकती है। इसलिए मानसिक संतुलन भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

लंबे समय तक बैठे रहने से शरीर की सक्रियता कम हो सकती है। इससे रक्त संचार और जोड़ों की लचक प्रभावित हो सकती है। शरीर में भारीपन और अकड़न बढ़ने लग सकती है। नियमित गतिविधि की कमी मेटाबॉलिज्म को भी धीमा कर सकती है। इसलिए शरीर को हल्का सक्रिय रखना लाभकारी माना जाता है।

पर्याप्त नींद शरीर की मरम्मत और संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी मानी जाती है। लगातार कम नींद लेने से शरीर में थकान और सूजन की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। इसका असर पाचन और हार्मोन संतुलन पर भी पड़ सकता है। कई लोगों में नींद खराब होने पर दर्द और असहजता ज्यादा महसूस हो सकती है। नियमित और शांत नींद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

कुछ लोगों में मौसम बदलने के दौरान जोड़ों की जकड़न और दर्द अधिक महसूस हो सकता है। ठंड या नमी बढ़ने पर शरीर में अकड़न बढ़ सकती है। इससे चलने-फिरने में असहजता महसूस हो सकती है। मौसम के अनुसार शरीर की देखभाल और दिनचर्या में बदलाव सहायक हो सकते हैं। शरीर को गर्म और संतुलित रखना उपयोगी माना जाता है।

यदि जोड़ों में बार बार सूजन और दर्द महसूस होने लगे, तो यह शरीर में असंतुलन बढ़ने का संकेत हो सकता है। शुरुआत में दर्द कभी कभी आता है, लेकिन धीरे धीरे इसकी आवृत्ति बढ़ सकती है। कई बार चलने-फिरने और सामान्य गतिविधियों पर भी असर पड़ने लगता है। ऐसी स्थिति को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर ध्यान देना महत्वपूर्ण माना जाता है।

अनियमित समय पर भोजन करना, अत्यधिक तला हुआ खाना और बहुत ज्यादा मीठे पेय शरीर के संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। इससे पाचन कमजोर पड़ सकता है और अपशिष्ट तत्व जमा होने लग सकते हैं। लंबे समय तक ऐसी आदतें शरीर में सूजन और भारीपन बढ़ा सकती हैं। धीरे धीरे जोड़ों में असहजता महसूस होने लग सकती है। संतुलित और हल्का भोजन लाभकारी माना जाता है।

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