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Working Mother को Period Irregular– Stress, Sleep, Skip Meal

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 08 May, 2026
  • category-iconUpdated on 08 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
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सुबह 6 बजे उठकर बच्चों का टिफिन बनाना, उन्हें स्कूल के लिए तैयार करना और फिर एक हाथ में लैपटॉप बैग और दूसरे में अपना अधूरा नाश्ता पकड़े हुए ऑफिस के लिए भागना। ऑफिस पहुँचते ही मीटिंग्स का दबाव, टारगेट्स का स्ट्रेस और शाम को घर लौटकर फिर से परिवार की ज़िम्मेदारियों में डूब जाना। एक 'वर्किंग मदर' (Working Mother) की ज़िंदगी इसी घड़ी की सुई के साथ भागती रहती है। इस भागदौड़ में अगर कोई चीज़ सबसे पीछे छूट जाती है, तो वह है उसकी अपनी सेहत, उसकी अपनी नींद और उसका अपना भोजन (Skip Meals)।

जब महीनों तक पीरियड्स (Periods) नहीं आते, या आते हैं तो असहनीय दर्द और अनियमितता के साथ, तो अक्सर महिलाएँ इसे 'नॉर्मल स्ट्रेस' समझकर टाल देती हैं या कुछ हॉर्मोनल पिल्स खाकर शरीर को धोखा दे देती हैं। लेकिन यह केवल एक तारीख का आगे-पीछे होना नहीं है; यह आपके शरीर के सबसे नाज़ुक प्रजनन तंत्र (Reproductive System) की चीख है जो लगातार बढ़ते कॉर्टिसोल (Stress), अधूरी नींद (Sleep  deprivation) और खाली पेट काम करने की वजह से कुचला जा रहा है। जब यह अनियमितता आपकी रोज़ की आदत बन जाए, तो समझ लीजिए कि आपका शरीर एक गहरे हार्मोनल डैमेज की तरफ बढ़ रहा है, जिसे अगर नज़रअंदाज़ किया गया, तो यह आगे चलकर आपकी पूरी सेहत को खोखला कर सकता है।

वर्किंग मदर्स में अनियमित पीरियड्स शरीर में क्या संकेत देते हैं?

लगातार तनाव, नींद की कमी और भोजन छोड़ने (Skip Meals) की आदत एक महिला के शरीर के नाज़ुक एंडोक्राइन सिस्टम पर एक ऐसा भारी दबाव डालती है, जिसके लिए प्राकृतिक रूप से शरीर नहीं बना है। यह दबाव सीधे ओवरीज़ (Ovaries) और गर्भाशय को प्रभावित करता है।

  • स्ट्रेस और कॉर्टिसोल का प्रहार (Stress & Hormonal Imbalance): जब आप ऑफिस और घर के दोहरे दबाव में होती हैं, तो शरीर सर्वाइवल मोड (Survival mode) में चला जाता है। ऐसे में कॉर्टिसोल (Stress hormone) तेज़ी से बढ़ता है, जो एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे ज़रूरी फीमेल हार्मोन्स के उत्पादन को पूरी तरह रोक देता है।
  • अधूरी नींद (Sleep Deprivation): लगातार रात को देर तक काम करना या बच्चों के कारण नींद पूरी न होना शरीर के सर्कैडियन रिदम (Circadian Rhythm) को तोड़ देता है। इससे थायरॉयड और पिट्यूटरी ग्रंथि का काम बिगड़ जाता है, जो पीरियड्स के चक्र को नियंत्रित करती हैं।
  • भोजन छोड़ना (Skipping Meals) और कुपोषण: सुबह का नाश्ता छोड़ना या काम के चक्कर में लंच न करना शरीर को भूखमरी के संकेत देता है। पोषण की कमी से शरीर ऊर्जा बचाने के लिए सबसे पहले प्रजनन तंत्र (Reproductive functions) को बंद कर देता है, जिससे ओव्यूलेशन (Ovulation) रुक जाता है और पीरियड्स मिस हो जाते हैं।

अनियमित पीरियड्स और हार्मोनल असंतुलन किन प्रकारों में सामने आता है?

हर महिला का शरीर और उसकी जीवनशैली अलग होती हैं। तनाव और डाइट की कमी से पड़ने वाला यह दबाव शरीर के दोषों के आधार पर मुख्य रूप से तीन प्रकारों में देखा जा सकता है:

  • वात-प्रधान असंतुलन: भागदौड़, रूखा खाना खाने और तनाव लेने से शरीर में वात भड़क जाता है। इस स्थिति में पीरियड्स बहुत कम (Scanty bleeding) आते हैं, महीनों तक डिले (Delayed) हो जाते हैं और पेट के निचले हिस्से व कमर में भयंकर ऐंठन (Cramps) और दर्द होता है। महिला को हर समय एंग्जायटी (Anxiety) और घबराहट महसूस होती है।
  • पित्त-प्रधान असंतुलन: लगातार गुस्सा, चिड़चिड़ापन और कैफीन/कॉफी का ज़्यादा सेवन पित्त को भड़काता है। इसमें पीरियड्स जल्दी-जल्दी आते हैं, ब्लीडिंग बहुत हेवी (Heavy bleeding) होती है और शरीर में भयंकर गर्मी, पसीना और चेहरे पर मुहांसे निकलने लगते हैं
  • कफ-प्रधान असंतुलन: डेस्क जॉब में लगातार बैठे रहने और शारीरिक गति कम होने से शरीर का मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है। इसमें PCOD/PCOS जैसे लक्षण दिखते हैं। वज़न तेज़ी से बढ़ता है, पीरियड्स महीनों तक नहीं आते और शरीर में हमेशा भारीपन और क्रोनिक फटीग (Chronic fatigue) बनी रहती है।

क्या आपको भी हार्मोनल डैमेज के ये शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं?

अनियमित पीरियड्स रातों-रात नहीं होते। शरीर बहुत पहले से अलार्म बजाता है, जिसे महिलाएँ अक्सर अपनी व्यस्त दिनचर्या की थकावट मानकर टाल देती हैं। अगर आपको रोज़ाना ये संकेत दिख रहे हैं, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • बालों का गुच्छों में टूटना: कंघी करते समय या बाल धोते समय अचानक बालों का भारी मात्रा में झड़ना, जो पोषण की कमी और बिगड़े हुए थायरॉयड/हार्मोन का सीधा संकेत है।
  • भयंकर मूड स्विंग्स (PMS): पीरियड्स की तारीख से हफ्तों पहले बिना बात के रोने का मन करना, अचानक बहुत ज़्यादा गुस्सा आना या गहरी उदासी से घिर जाना।
  • अचानक वज़न का बढ़ना या घटना: बिना डाइट बदले अचानक से पेट के आस-पास चर्बी जमा होने लगना (Belly fat) या शरीर का बिना कारण सूखते जाना।
  • थकान जो सोने से भी न जाए: सुबह उठने के बाद भी ऐसा महसूस होना जैसे शरीर में कोई जान ही नहीं है और दिनभर काम करने के लिए कॉफी पर निर्भर रहना।

इस अनियमितता को नज़रअंदाज़ करने में महिलाएँ क्या गलतियाँ करती हैं और उनकी जटिलताएँ क्या हैं?

पीरियड्स को 'नियमित' दिखाने और अपने ऑफिस का काम चालू रखने की जल्दबाज़ी में, वर्किंग मदर्स अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेती हैं जो उनके प्रजनन तंत्र को स्थायी रूप से डैमेज कर देते हैं:

  • हार्मोनल पिल्स (OCP) का अंधाधुंध सेवन: पीरियड्स लाने के लिए बिना सोचे-समझे बर्थ कंट्रोल या हार्मोनल पिल्स खाना। ये गोलियाँ सिर्फ एक 'फेक ब्लीडिंग' (Withdrawal bleeding) करवाती हैं, जबकि असल ओव्यूलेशन अंदर से पूरी तरह बंद रहता है।
  • कॉफी और कैफीन पर निर्भरता: थकान को भगाने और नींद भगाने के लिए दिनभर में कई कप कॉफी पीना, जो शरीर के वात दोष को भड़काकर गर्भाशय को अंदर से सुखा देता है।
  • भोजन को वज़न कम करने का टूल समझना: स्ट्रेस में बढ़ा हुआ वज़न कम करने के लिए 'क्रैश डाइट' करना और मील्स (Meals) स्किप करना, जिससे शरीर में खून की भयंकर कमी (Anemia) हो जाती है।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएँ: अगर इस स्ट्रेस और अनियमित चक्र को ठीक न किया जाए, तो यह समस्या आगे चलकर इनफर्टिलिटी (Infertility), PCOD, थायरॉयड विकार और अर्ली मेनोपॉज़ (Early Menopause) का भयंकर रूप ले लेती है।

आयुर्वेद महिलाओं के इस स्ट्रेस और अनियमित चक्र को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे हार्मोनल इम्बैलेंस (Hormonal Imbalance) या एमेनोरिया (Amenorrhea) कहता है, आयुर्वेद उसे 'रस धातु क्षय', 'आर्तव दोष' और 'अपान वात' के गंभीर प्रकोप के विज्ञान से गहराई से समझता है।

  • रस धातु और आर्तव का सूखना: आप जो भी खाते हैं, उससे सबसे पहले 'रस धातु' (Plasma/Nutrition) बनती है। जब आप खाना स्किप करती हैं या स्ट्रेस में खाती हैं, तो रस धातु ही नहीं बनती। आयुर्वेद के अनुसार, इसी रस धातु का उपधातु 'आर्तव' (Menstrual Blood) है। जब मूल पोषण ही नहीं होगा, तो पीरियड्स कैसे आएंगे?
  • अपान वात में रुकावट: आयुर्वेद में गर्भाशय और पेल्विक क्षेत्र (Pelvic region) का नियंत्रण 'अपान वात' करता है, जिसका काम शरीर से दूषित रक्त को नीचे की ओर बाहर निकालना है। स्ट्रेस, भागदौड़ और नींद की कमी से अपान वात अपनी दिशा भूल जाता है और ऊपर की ओर बहने लगता है (ऊर्ध्व गति), जिससे पीरियड्स रुक जाते हैं या अत्यधिक दर्द के साथ आते हैं।
  • जठराग्नि और 'आम' (Toxins): गलत समय पर खाने और लगातार बैठे रहने से पाचन अग्नि कमज़ोर पड़ जाती है। इससे बना हुआ कच्चा रस या 'आम' (Toxins) शरीर के नाज़ुक स्रोतों (Channels) को ब्लॉक कर देता है, जिससे ओवरीज़ तक पोषण नहीं पहुँचता और सिस्ट (Cysts) बनने लगते हैं।
  • हार्मोन्स को संतुलित करने और वात शांत करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

आपका खाना ही आपके हार्मोन्स को बिगाड़ भी सकता है और उन्हें दोबारा संतुलित भी कर सकता है। स्ट्रेस से बचने और पीरियड्स को नियमित करने के लिए वर्किंग मदर्स को इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन में अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - आर्तव बढ़ाने वाले और वात शामक) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - रूखापन और स्ट्रेस बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, मूंग दाल की खिचड़ी, ओट्स, रागी, जो। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद जंक फूड, रिफाइंड कार्ब्स।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (हार्मोन बनाने के लिए अमृत), तिल का तेल। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, बहुत अधिक डालडा।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, पालक, चुकंदर, गाजर (सभी अच्छी तरह पकी हुई)। कच्चा सलाद (विशेषकर रात में), गोभी, भारी कटहल।
फल और मेवे (Fruits & Nuts) पपीता (पीरियड्स लाने में मददगार), अनार, भीगे हुए बादाम, मुनक्का, अंजीर। डिब्बाबंद जूस, बिना मौसम के फल, बाज़ार के रोस्टेड नमकीन नट्स।
पेय पदार्थ (Beverages) शतावरी और हल्दी वाला दूध (रात में), सौंफ-जीरा पानी, तिल का काढ़ा। बहुत ज़्यादा कैफीन/कॉफी (गर्भाशय को सुखाती है), कोल्ड ड्रिंक्स।

गर्भाशय को ताक़त देने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के स्ट्रेस को खत्म करते हैं और फीमेल हार्मोन्स को प्राकृतिक रूप से रीसेट कर देते हैं:

  • शतावरी (Shatavari): इसे महिलाओं के लिए जड़ी-बूटियों की रानी कहा जाता है। यह फीमेल हार्मोन्स (एस्ट्रोजन) को संतुलित करती है, सूखे हुए आर्तव (रक्त) को बढ़ाती है और गर्भाशय को गहरी ताक़त देती है।
  • अशोका (Ashoka): अशोक की छाल गर्भाशय (Uterus) के लिए एक अचूक टॉनिक है। यह हेवी ब्लीडिंग को रोकती है, पीरियड्स के दर्द को खींच लेती है और ओवरीज़ के काम को नियमित करती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): वर्किंग मदर्स के मानसिक तनाव (कॉर्टिसोल) को गिराने और नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी दूर करने के लिए अश्वगंधा एक अद्भुत रसायन है। यह नींद की गुणवत्ता को भी सुधारता है।
  • कुमारी (Aloe Vera): एलोवेरा वात और पित्त दोनों को शांत करता है। यह ओव्यूलेशन को ट्रिगर करने और रुके हुए पीरियड्स को प्राकृतिक रूप से वापस लाने में बहुत मददगार है।
  • दशमूल (Dashmoola): दस जड़ी-बूटियों का यह मिश्रण अपान वात को शांत करने और पेल्विक हिस्से की जकड़न व सूजन को जड़ से खत्म करने का सबसे बेहतरीन उपाय है।

तनाव मिटाने और गर्भाशय को पोषण देने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब स्ट्रेस बहुत गहरा हो और दवाइयों से भी पीरियड्स नियमित न हो रहे हों, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर और हार्मोन्स को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • शिरोधारा (Shirodhara): माथे पर औषधीय तेल या मट्ठे की लगातार धार गिराने की यह शिरोधारा थेरेपी सीधे दिमाग के पिट्यूटरी ग्लैंड पर काम करती है। यह भारी स्ट्रेस, एंग्जायटी और अधूरी नींद की समस्या को जादुई तरीके से खत्म करती है, जिससे शरीर दोबारा हार्मोन बनाने लगता है।
  • बस्ती कर्म (Basti Karma): आयुर्वेद में वात को जड़ से खत्म करने के लिए बस्ती (मेडिकेटेड एनीमा) को आधा इलाज माना गया है। यह सीधे अपान वात के स्थान (बड़ी आंत और पेल्विक एरिया) पर काम करती है और गर्भाशय के भारी दर्द और अनियमितता को रोकती है।
  • अभ्यंग (Abhyanga): गुनगुने वात-शामक तेलों से की जाने वाली संपूर्ण शारीरिक मालिश शरीर की थकावट को खत्म करती है और रक्त संचार तेज़ी से बढ़ाती है, जिससे शरीर में पोषण का प्रवाह सुधरता है।
  • नस्य (Nasya): नाक के ज़रिए औषधीय तेल डालने की यह थेरेपी सीधे दिमाग को शांत करती है और 'प्राण वात' को संतुलित कर हार्मोनल सिग्नलिंग को सुधारती है।

हार्मोन्स के पूरी तरह रिपेयर होने और पीरियड्स नियमित होने में कितना समय लगता है?

बरसों से स्ट्रेस, अधूरी नींद और गलत खान-पान के कारण बिगड़े हुए हार्मोन्स को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और पेट साफ होने से आपकी जठराग्नि सुधरेगी। मानसिक तनाव कम होगा और रात की नींद बेहतर होगी। शरीर भारीपन छोड़कर हल्का महसूस करेगा।
  • 3-4 महीने: रसायन और वात-शामक जड़ी-बूटियों के प्रभाव से 'रस धातु' का पोषण होगा। पीरियड्स का फ्लो सुधरने लगेगा और दर्द (Cramps) में भारी कमी आएगी।
  • 5-6 महीने: आपका एंडोक्राइन सिस्टम पूरी तरह रीबूट हो जाएगा। बिना किसी बाहरी हार्मोनल पिल के आपके पीरियड्स प्राकृतिक रूप से हर महीने नियमित आने लगेंगे और आप ऊर्जावान महसूस करेंगी।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

वर्किंग मदर्स के अनियमित पीरियड्स के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य कृत्रिम ओव्यूलेशन (Artificial Ovulation) या फेक ब्लीडिंग के लिए हार्मोनल पिल्स (OCPs) देना। तनाव कम करना, जठराग्नि सुधारना और गर्भाशय को प्राकृतिक रूप से काम करने के लिए पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल ओवरीज़ और एस्ट्रोजन/प्रोजेस्टेरोन के गणित का खेल मानना। इसे स्ट्रेस, कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए अपान वात और रस धातु के सूखने का परिणाम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल दवाइयों पर ज़ोर, तनाव कम करने या खाने के समय को सुधारने पर बहुत ज़्यादा ज़ोर नहीं। शुद्ध डाइट, घी का सेवन, समय पर भोजन और दिनचर्या को ही इलाज का सबसे बड़ा आधार माना जाता है।
लंबा असर पिल्स छोड़ने पर पीरियड्स दोबारा रुक जाते हैं और भविष्य में इनफर्टिलिटी का रिस्क रहता है। शरीर अंदर से मज़बूत होता है और रिप्रोडक्टिव सिस्टम खुद को हील कर लेता है, जिससे परिणाम स्थायी होते हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद जीवनशैली की इन समस्याओं को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • लगातार महीनों तक अत्यधिक हेवी ब्लीडिंग: अगर पीरियड्स शुरू होने के बाद हफ्तों तक रुकें ही ना और आपको दिन में कई पैड्स बदलने पड़ें (Menorrhagia), जिससे चक्कर आने लगें।
  • असहनीय पेल्विक दर्द: अगर पेट के निचले हिस्से में दर्द इतना भयंकर हो कि आप सीधे खड़े भी न हो सकें या बेहोशी छाने लगे।
  • अचानक चेहरे और शरीर पर बालों का आना: अगर आवाज़ भारी होने लगे और चेहरे (Hirsutism) या छाती पर अनचाहे बाल बहुत तेज़ी से बढ़ने लगें।
  • स्तनों से स्राव (Discharge): अगर बिना प्रेगनेंसी के स्तनों से सफेद या लाल स्राव होने लगे, जो प्रोलैक्टिन हार्मोन के बहुत ज़्यादा बिगड़ने का संकेत है।

निष्कर्ष

ऑफिस की डेडलाइंस पूरी करना और परिवार को संभालना एक वर्किंग मदर की ज़िम्मेदारी हो सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया में खुद को भूखा रखना, रातों की नींद खराब करना और अपने शरीर को मशीन समझ लेना समझदारी नहीं है। अनियमित पीरियड्स आपके शरीर का वह चीखता हुआ अलार्म है जो बता रहा है कि आपकी 'रस धातु' सूख चुकी है, आपका स्ट्रेस लेवल आपके हार्मोन्स को निगल रहा है और आपका प्रजनन तंत्र दम तोड़ रहा है। जब आप इस अलार्म को रोज़ाना कॉफी और कृत्रिम हार्मोनल पिल्स से दबाती हैं, तो आप अपनी ओवरीज़ को हील करने के बजाय उन्हें स्थायी रूप से कमज़ोर कर रही होती हैं। इस स्ट्रेस के खतरनाक चक्र से बाहर निकलें। अपने भोजन (Meals) को कभी स्किप न करें, अपनी डाइट में शुद्ध गाय का घी और पपीता शामिल करें। शतावरी, अशोका और अश्वगंधा जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और शिरोधारा व बस्ती से अपने थके हुए नर्वस सिस्टम को नया जीवन दें। स्ट्रेस और काम के दबाव के कारण अपने शरीर को कमज़ोर न पड़ने दें, और अपने हार्मोन्स को स्थायी रूप से प्राकृतिक बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, बिल्कुल। बहुत ज़्यादा स्ट्रेस लेने से शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ कॉर्टिसोल दिमाग से ओवरीज़ को जाने वाले सिग्नल्स को ब्लॉक कर देता है, जिससे ओव्यूलेशन रुक जाता है और पीरियड्स डिले हो जाते हैं।

सुबह का नाश्ता छोड़ने (Skipping meals) से शरीर में रस धातु ठीक से नहीं बनती, जिससे कुपोषण होता है। आयुर्वेद में माना गया है कि जब शरीर को पोषण नहीं मिलता, तो वह सबसे पहले प्रजनन तंत्र (Reproductive system) को शटडाउन कर देता है, जिससे पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं।

हाँ। रात में जागने से शरीर का वात दोष भड़कता है और हमारा नेचुरल बायोलॉजिकल क्लॉक (Circadian Rhythm) टूट जाता है। इसके कारण मेलाटोनिन और अन्य प्रजनन हार्मोन्स का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है, जो PCOD और अनियमित पीरियड्स का मुख्य कारण है।

जी हाँ। कॉफी शरीर में वात (रूखापन) बढ़ाती है और गर्भाशय को अंदर से ड्राई कर देती है। ज़्यादा कैफीन से एस्ट्रोजन लेवल भी प्रभावित होता है, जिससे ब्लीडिंग बहुत कम (Scanty periods) हो सकती है और क्रैम्प्स बढ़ जाते हैं।

शतावरी महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित और बेहतरीन आयुर्वेदिक टॉनिक है। यह शरीर को प्राकृतिक रूप से एस्ट्रोजन बनाने में मदद करती है, ओवरीज़ को ताक़त देती है और बिना किसी साइड इफ़ेक्ट के हार्मोन्स को बैलेंस करती है।

हाँ, आप आयुर्वेदिक इलाज शुरू कर सकती हैं। आयुर्वेद आपकी जीवनशैली, दोषों और बीमारी की जड़ (Root cause) पर काम करता है। जीवा आयुर्वेद के डॉक्टर आपकी वर्तमान एलोपैथिक दवाइयों और स्थिति को देखकर सही और सुरक्षित आयुर्वेदिक प्रोटोकॉल तैयार करेंगे।

पीरियड्स के दौरान वात दोष प्राकृतिक रूप से बढ़ा हुआ होता है। इसलिए हल्का, गर्म और सुपाच्य भोजन (जैसे खिचड़ी, गर्म सूप, अजवाइन-जीरे का पानी) लेना चाहिए। ठंडी चीज़ें, कच्चा सलाद और जंक फूड बिल्कुल नहीं खाना चाहिए क्योंकि ये वात को और भड़काकर दर्द बढ़ाते हैं।

शिरोधारा सीधे आपके नर्वस सिस्टम और दिमाग (पिट्यूटरी ग्रंथि) पर काम करती है, जो सभी हार्मोन्स का मास्टर कंट्रोलर है। यह स्ट्रेस हार्मोन (कॉर्टिसोल) को कम करके दिमाग को गहरी शांति देती है, जिससे शरीर अपने आप ओव्यूलेशन और पीरियड्स के चक्र को नियमित करने लगता है।

यह एक बहुत बड़ा मिथक है। शुद्ध देसी गाय का घी फैट नहीं बढ़ाता, बल्कि यह गुड कोलेस्ट्रॉल देता है जो फीमेल हार्मोन्स (एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन) के निर्माण के लिए कच्चा माल (Raw material) है। यह शरीर का रूखापन खत्म करके ओवरीज़ को पोषण देता है।

दर्द कम करने के लिए पेनकिलर की जगह, आप एक चम्मच गर्म घी में चुटकी भर हींग और अजवाइन भूनकर खा सकती हैं। इसके अलावा, तिल के तेल को हल्का गर्म करके पेट के निचले हिस्से (पेल्विक एरिया) पर हल्के हाथों से मालिश करें और हॉट वॉटर बैग से सिकाई करें। यह अपान वात को तुरंत शांत करता है।

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