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IBS, Anxiety और Low Energy — क्या आपके शरीर में भी यही pattern है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

कई बार लोगों को लगता है कि पेट की परेशानी और मन की बेचैनी दो अलग चीजें हैं। लेकिन सच यह है कि जब मन तनाव में होता है, तो उसका असर सबसे पहले पेट पर दिखाई देने लगता है। ऐसे समय में कभी कब्ज़, कभी ढीला पेट, कभी गैस और कभी पेट में मरोड़ जैसी दिक्कतें महसूस हो सकती हैं। इसके साथ शरीर की ताकत भी धीरे-धीरे कम होने लगती है। 

व्यक्ति बिना ज़्यादा काम किए भी थका हुआ महसूस करता है और मन शांत नहीं रह पाता। आयुर्वेद में शरीर और मन को अलग नहीं माना गया है। माना जाता है कि जब पाचन और मानसिक संतुलन दोनों बिगड़ने लगते हैं, तब शरीर में सुस्ती, बेचैनी और कमजोरी जैसे संकेत दिखाई देने लगते हैं।

आखिर ये IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) क्या है?

IBS एक ऐसी अजीब सी बीमारी है जिसमें आपके पेट की मशीनरी ठीक से काम नहीं करती, लेकिन जब आप डॉक्टर के पास जाकर सारे टेस्ट करवाते हैं, तो रिपोर्ट एकदम नॉर्मल आती है। इंसान महीनों-सालों तक पेट की दिक्कतों से जूझता रहता है, लेकिन समझ ही नहीं आती कि गड़बड़ कहां है।

इसमें आपका पेट और दिमाग दोनों एक साथ डिस्टर्ब होते हैं। कभी लगता है सब ठीक है, तो कभी अचानक से गैस और मरोड़ शुरू हो जाती है। इसीलिए इसे सिर्फ 'पेट खराब होना' नहीं कहा जा सकता।

IBS के साफ इशारे (लक्षण)

ये घबराहट और बेचैनी बार-बार क्यों बढ़ने लगती है?

हमेशा चिंता करना या हर वक्त स्ट्रेस में रहना सिर्फ दिमाग तक नहीं रुकता। जब आप लंबे समय तक टेंशन में रहते हैं, तो आपका शरीर हर वक्त एक 'अलर्ट मोड' (खतरे की घंटी) में रहता है।

दिमाग शांत न होने पर पेट इतना नाजुक (Sensitive) हो जाता है कि हल्का सा तीखा खाने पर या छोटी सी टेंशन होने पर भी पेट में आग सी लग जाती है।

ऐसे में अक्सर ये चीजें महसूस होती हैं:

धीरे-धीरे ये एक ऐसा चक्कर बन जाता है जिसमें टेंशन से पेट खराब होता है, और खराब पेट की वजह से और ज़्यादा टेंशन होने लगती है।

हर वक्त की ये थकान सिर्फ 'खून की कमी' नहीं होती

अगर आप 24 घंटे थका हुआ महसूस करते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपमें खून या विटामिन कम है। कई बार असली दिक्कत ये होती है कि आप जो खा रहे हैं, आपका शरीर उसे निचोड़कर ताकत ही नहीं बना पा रहा है। जब पाचन सुस्त पड़ जाता है, तो शरीर का इंजन भी धीमा हो जाता है। ऐसे में बिना किसी पत्थर को तोड़े भी इंसान थका हुआ रहता है। शरीर भारी लगता है और मन एकदम उदास सा रहता है।

ऐसे लोगों के साथ अक्सर ऐसा होता है:

ये कोई आपका आलस नहीं है; ये शरीर का अलार्म है कि आपका अंदरूनी सिस्टम और पाचन दोनों बुरी तरह क्रैश हो रहे हैं।

पेट और दिमाग का वो रिश्ता जो दिखाई नहीं देता (Gut-Brain Connection)

पेट और दिमाग के बीच एक सीधा तार जुड़ा होता है। ये दोनों हर वक्त एक-दूसरे से बातें करते हैं। यही वजह है कि जब दिमाग में टेंशन होती है, तो पेट में हलचल शुरू हो जाती है, और जब पेट खराब होता है, तो इंसान चिड़चिड़ा हो जाता है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि आपको खुश और शांत रखने वाले ज़्यादातर 'हार्मोन' (रसायन) दिमाग में नहीं, बल्कि आपकी आंतों (पेट) में बनते हैं। इसलिए पेट खराब रहने पर इंसान को ज़्यादा घबराहट, चिड़चिड़ापन और उदासी घेर लेती है। और ठीक ऐसे ही, जब आप लंबे समय तक टेंशन लेते हैं, तो वो टेंशन पेट की पूरी मशीनरी को जाम कर देती है।

IBS, घबराहट और सुस्ती: इन सबका असली कारण क्या है?

ये तीनों बीमारियां अक्सर एक साथ ही हमला करती हैं। जाने-अनजाने में हम रोज़ कुछ ऐसी गलतियां करते हैं, जो इस पूरी मशीनरी को खराब कर देती हैं:

  • हर वक्त की टेंशन: 24 घंटे किसी न किसी बात का स्ट्रेस पालना पाचन को खत्म कर देता है।
  • खाने का कोई टाइम न होना: रात को 11 बजे खाना, बाहर का जंक फूड खाना या घंटों भूखे रहना पेट में तेज़ाब बनाता है।
  • रातों की नींद खराब होना: नींद पूरी न होने से शरीर खुद को रिपेयर नहीं कर पाता और दिमाग चिड़चिड़ा रहता है।
  • चाय-कॉफी की लत: दिनभर चाय, कॉफी या बहुत ज़्यादा तीखा खाना से पेट छिल जाता है और गैस बनती है।
  • कुर्सी से चिपके रहना: दिनभर बैठे रहने से पाचन बिल्कुल सुस्त पड़ जाता है।
  • बातें दिल में दबाना: अपनी परेशानी किसी से न कहना और मन ही मन घुटते रहना अंदर ही अंदर टेंशन पैदा करता है, जो सीधे पेट पर वार करती है।
  • मरा हुआ पाचन (कमजोर अग्नि): जब खाना पचेगा ही नहीं, सड़ेगा, तो शरीर को ताकत कहां से मिलेगी?

किन लोगों को ये दिक्कत सबसे ज़्यादा होती है?

जिन लोगों का रूटीन और लाइफस्टाइल पूरी तरह से बिगड़ा हुआ होता है, वो लोग सबसे जल्दी इस बीमारी की चपेट में आते हैं:

  • जो लोग हर वक्त दिमागी टेंशन में रहते हैं।
  • जो रात-रात भर जागते हैं (खासकर मोबाइल देखते हुए)।
  • जिनके खाने का कोई फिक्स टाइम नहीं होता।
  • जो दिनभर में 5-7 कप चाय या कॉफी पी जाते हैं।
  • जो छोटी-छोटी बातों का बहुत ज़्यादा लोड (Overthinking) लेते हैं।
  • जो कोई एक्सरसाइज या मेहनत का काम नहीं करते।

आजकल की इस भागदौड़ और टेंशन वाली जिंदगी में ये बीमारी घर-घर की कहानी बन गई है।

आयुर्वेद इस IBS, घबराहट और थकावट को कैसे देखता है?

आयुर्वेद में इस IBS को हम 'ग्रहणी' रोग कहते हैं। इसमें आपकी पेट की आग (पाचन अग्नि) पगला जाती है। कभी भूख ऐसी लगेगी कि सब खा जाए, कभी बिल्कुल मन नहीं करेगा। कभी खाना तुरंत पच जाएगा, तो कभी पत्थर की तरह पेट में पड़ा रहेगा। आयुर्वेद कहता है कि जब पाचन बिगड़ता है और शरीर में 'वात' (हवा) हावी हो जाता है, तब पेट और दिमाग दोनों एक साथ हिल जाते हैं। इसी भड़के हुए वात की वजह से गैस, कब्ज़, पेट फूलना, नींद उड़ जाना और घबराहट एक साथ शुरू होती है।

जब खाना ठीक से नहीं पचता, तो वो पेट में सड़कर एक जहरीला कचरा (आम) बन जाता है। यही कचरा खून में मिलकर पूरे शरीर की एनर्जी को सोख लेता है। इसीलिए इंसान हमेशा थका हुआ, भारी और दिमागी तौर पर परेशान रहता है। आयुर्वेद इसे सिर्फ पेट की बीमारी नहीं मानता, बल्कि इसे आपके पेट, दिमाग और पूरे शरीर के 'सिस्टम क्रैश' होने का नतीजा मानता है।

उपचार में उपयोग की जाने वाली आयुर्वेदिक औषधियां

IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम), पेट की गड़बड़ी, हर वक्त की घबराहट और सुस्ती को दूर करने के लिए आयुर्वेद में कुछ खास कुदरती औषधियों का इस्तेमाल होता है। इनका काम सिर्फ ऊपर से दर्द दबाना नहीं, बल्कि आपके पाचन को वापस पटरी पर लाना, भड़की हुई हवा (वात) को शांत करना और शरीर की बैटरी को दोबारा चार्ज करना है। आपकी तासीर देखकर ये औषधियां दी जाती हैं:

  • अविपत्तिकर चूर्ण: पेट की आग (एसिडिटी), सीने की जलन और भारीपन को बुझाने में यह बहुत असरदार है।
  • हिंग्वाष्टक चूर्ण: पेट में गैस का गोला बनना, अफारा (पेट फूलना) और खाना न पचने जैसी दिक्कतों में यह रामबाण है।
  • ब्राह्मी: जब दिमाग में हर वक्त विचारों की आंधी चल रही हो और टेंशन हो, तो ब्राह्मी दिमाग को एकदम शांत कर देती है।
  • अश्वगंधा: शरीर की अंदरूनी कमजोरी और पुरानी थकान को मिटाकर फौलादी ताकत देने में इसका कोई मुकाबला नहीं।
  • शंखपुष्पी: रात-रात भर नींद न आना और अजीब सी बेचैनी रहने पर यह बहुत काम आती है।

उपयोग की जाने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

जब पेट और दिमाग दोनों बुरी तरह थक जाएं, तो सिर्फ गोलियां खाने से बात नहीं बनती। ऐसे में आयुर्वेद की कुछ खास थेरेपी आपके पूरे शरीर और दिमाग को एक गहरा सुकून देती हैं:

  • अभ्यंग (ऑयल मसाज): खास जड़ी-बूटियों वाले गर्म तेल से जब पूरे शरीर की मालिश होती है, तो शरीर की सारी जकड़न खुलती है और बिगड़ा हुआ 'वात' शांत हो जाता है।
  • शिरोधारा: माथे पर जब एक लय में औषधीय तेल या काढ़ा गिरता है, तो दिमाग की सारी टेंशन, स्ट्रेस और घबराहट पानी की तरह बह जाती है।
  • स्वेदन (हर्बल भाप): हल्की-हल्की भाप से सिकाई करने पर पसीने के रास्ते शरीर का भारीपन और महीनों की सुस्ती बाहर निकल जाती है।
  • पंचकर्म: अगर बीमारी बहुत पुरानी हो गई है, तो शरीर के अंदर जमे सालों पुराने कचरे (टॉक्सिन्स) को निकालने के लिए पंचकर्म की डीप-क्लीनिंग की जाती है।

IBS, मानसिक बेचैनी और थकान में सहायक आहार

आपकी रसोई ही आपका सबसे बड़ा अस्पताल है। इस बीमारी में ऐसा खाना खाना चाहिए जो पेट पर बिल्कुल बोझ न डाले और शरीर को ताकत दे:

  • ताजा और गरमा-गरम खाना: हमेशा रसोई से सीधा थाली में आने वाला खाना ही खाएं। फ्रिज का रखा बासी खाना पेट की मशीनरी को जाम कर देता है।
  • टाइम से खाना: खाने का एक रूटीन बनाएं। बे-टाइम खाने या घंटों भूखे रहने से पेट में भयंकर गैस और तेज़ाब बनने लगता है।
  • मूंग दाल और खिचड़ी: जब पाचन खराब हो, तो मूंग दाल की पतली खिचड़ी पेट के लिए किसी अमृत से कम नहीं है। ये तुरंत पचती है और ताकत देती है।
  • हल्का गर्म पानी: दिनभर सिर्फ हल्का गुनगुना पानी और हर्बल चाय पिएं। यह पेट को अंदर से साफ रखता है।
  • मिर्च-मसाले और तले हुए से तौबा: ज़्यादा तीखा और बाहर का तला-भुना खाना पेट को अंदर से छील देता है, इनसे बिल्कुल दूरी बना लें।
  • चाय-कॉफी पर ब्रेक: दिनभर चाय या कॉफी पीने से दिमाग की बेचैनी बढ़ती है और पेट में गैस भड़कती है। इन्हें एकदम कम कर दें।
  • चबा-चबा कर खाना: जल्दबाजी में खाना निगलने की बजाय उसे तसल्ली से चबाकर खाएं, ताकि आधा खाना आपके मुंह में ही पच जाए।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम दक्ष मलिक है, मैं 23 वर्ष का हूँ और नोएडा का रहने वाला हूँ। कुछ समय पहले मुझे पेट से जुड़ी समस्या शुरू हुई, इंडाइजेशन, पेट में जलन और लंबे समय तक ठीक से मल न आना जैसी परेशानी होने लगी। मेरे कुछ टेस्ट भी हुए, जिनमें पता चला कि मेरे पेट में कुछ घाव (ulcers) हैं। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद मैंने टीवी पर डॉ. प्रताप चौहान का कार्यक्रम देखा और उनसे प्रेरित होकर जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया। मैंने डॉक्टर से फोन पर भी बात की और फिर वहाँ से दवाइयाँ व उपचार शुरू किया। धीरे-धीरे मेरी हालत में सुधार आने लगा और अब मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ।

डॉक्टर के पास जाने में देरी कब न करें?

"अरे, बस थोड़ी गैस ही तो है" सोचकर पेट की इन दिक्कतों को टालना भारी पड़ सकता है। अगर ये इशारे मिलें तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं:

  • पेट में मरोड़ उठना और मीठा-मीठा दर्द हमेशा बना रहना।
  • कभी कब्ज़, तो कभी दस्त, पेट का कोई एक रूटीन न रहना।
  • पेट का हर वक्त गुब्बारे की तरह फूला हुआ लगना।
  • बिना कोई भारी काम किए हर वक्त थकान और कमजोरी महसूस होना।
  • कुछ भी थोड़ा सा खाते ही पेट एकदम से भारी हो जाना।
  • जरा सी टेंशन या गुस्सा आते ही सीधे पेट का खराब हो जाना।
  • रात की नींद उड़ जाना और हर वक्त मन में एक अजीब सी घबराहट रहना।

निष्कर्ष

आपका खराब पेट, हर वक्त की घबराहट और शरीर की थकावट ये तीनों कोई अलग-अलग बीमारियाँ नहीं हैं। यह आपके पूरे शरीर के सिस्टम के हिल जाने का एक बड़ा अलार्म है। मॉडर्न साइंस इसे 'गट-ब्रेन कनेक्शन' (आंतों और दिमाग का रिश्ता) कहता है, जबकि आयुर्वेद इसे आपका सुस्त पाचन, भड़का हुआ 'वात' और पेट में जमा गंदगी (आम) मानता है।

जब आपका पेट महीनों तक खराब रहता है, तो उसका सीधा असर आपकी एनर्जी, नींद, और दिमागी शांति पर पड़ता है। इसलिए सिर्फ गैस की कोई गोली खाकर काम न चलाएं। असली जड़ यानी अपने पाचन को सुधारें। सही डाइट, एक अच्छा रूटीन, पूरी नींद और दिमाग को रिलैक्स रखने से आप इस पूरी बीमारी को हमेशा के लिए जड़ से उखाड़ फेंक सकते हैं!

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, लंबे समय तक मानसिक तनाव रहने पर पाचन तंत्र लगातार प्रभावित हो सकता है। ऐसे में पेट में भारीपन, गैस, कब्ज या बार-बार शौच जाने जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं। तनाव शरीर की प्राकृतिक पाचन प्रक्रिया को धीमा या अस्थिर बना सकता है। यही कारण है कि मानसिक स्थिति और पेट की परेशानी अक्सर साथ-साथ दिखाई देती हैं।

हाँ, लंबे समय तक खाली पेट रहने से पाचन की लय बिगड़ सकती है। इससे पेट में जलन, गैस और असहजता बढ़ सकती है। अनियमित भोजन शरीर को भ्रमित कर देता है, जिससे कभी भूख ज्यादा लगती है और कभी बिल्कुल नहीं लगती। समय पर भोजन करना पाचन संतुलन के लिए जरूरी माना जाता है।

हाँ, लगातार चिंता और ज्यादा सोचने से शरीर हमेशा तनाव की स्थिति में बना रह सकता है। इसका सीधा असर पेट की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। कई लोगों में तनाव बढ़ने के साथ पेट दर्द, गैस और मल त्याग की समस्या भी बढ़ने लगती है। इसलिए मानसिक शांति पाचन के लिए भी जरूरी मानी जाती है।

हाँ, कम नींद शरीर और पाचन दोनों को प्रभावित कर सकती है। जब शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिलता, तो पाचन की प्रक्रिया भी असंतुलित होने लगती है। इससे सुबह भारीपन, थकान और पेट खराब रहने जैसी दिक्कतें महसूस हो सकती हैं। अच्छी नींद शरीर की रिकवरी के लिए जरूरी होती है।

बार-बार गैस बनना केवल खाने की वजह से नहीं होता। कई बार कमजोर पाचन, तनाव और अनियमित दिनचर्या भी इसका कारण हो सकते हैं। यदि लंबे समय तक यह समस्या बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन का संकेत हो सकता है।

हाँ, जब पाचन लंबे समय तक खराब रहता है, तो व्यक्ति चिड़चिड़ापन, बेचैनी और मानसिक थकान ज्यादा महसूस कर सकता है। पेट और मन का संबंध गहरा माना जाता है। इसलिए पेट की स्थिति बिगड़ने पर मानसिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है।

हाँ, यदि भोजन सही तरह नहीं पचता और शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता, तो सुबह उठते समय भी थकान महसूस हो सकती है। कई लोग पूरी नींद के बाद भी शरीर में भारीपन और कमजोरी महसूस करते हैं। यह केवल आलस नहीं, बल्कि शरीर की ऊर्जा प्रक्रिया के धीमे होने का संकेत हो सकता है।

हाँ, बहुत ज्यादा तीखा, तला और मसालेदार भोजन कुछ लोगों में पेट की परेशानी बढ़ा सकता है। इससे जलन, गैस और पेट में असहजता महसूस हो सकती है। लगातार ऐसा भोजन लेने से पाचन धीरे-धीरे कमजोर भी पड़ सकता है।

हाँ, कम शारीरिक गतिविधि से पाचन की गति धीमी पड़ सकती है। लंबे समय तक बैठे रहने से शरीर भारी और सुस्त महसूस हो सकता है। हल्की नियमित गतिविधि पाचन को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकती है।

कई लोगों में सही आहार, नियमित दिनचर्या, मानसिक संतुलन और समय पर ध्यान देने से काफी सुधार देखा जा सकता है। हालांकि हर व्यक्ति की स्थिति अलग होती है, इसलिए सुधार की गति भी अलग हो सकती है। लंबे समय तक संतुलित आदतें बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

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