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Hives (Urticaria) अचानक क्यों निकलती है? Pitta और आयुर्वेदिक इलाज

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

कभी-कभी ऐसा होता है कि स्किन पर अचानक से लाल रंग के, उभरे हुए चकत्ते निकल आते हैं जिनमें भयंकर खुजली होती है। समझ ही नहीं आता कि ये अचानक क्यों और कहाँ से आ गए। इसी परेशानी को मेडिकल भाषा में 'हाइव्स' या 'अर्टिकेरिया' (Urticaria) कहा जाता है। यह बीमारी किसी को बताकर नहीं आती; यह अचानक से हमला करती है और हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को पूरी तरह से डिस्टर्ब कर देती है।

इसकी तेज़ खुजली, जलन और बार-बार चकत्तों का आना-जाना न सिर्फ शरीर को परेशान करता है, बल्कि इंसान को मानसिक तौर पर भी बहुत बेचैन कर देता है। ज़्यादातर लोग इसे बस एक मामूली 'स्किन एलर्जी' समझकर कोई क्रीम या लोशन लगा लेते हैं। लेकिन सच तो यह है कि इसका असली कारण अक्सर हमारे शरीर के अंदर छुपा होता है।

हाइव्स क्या होते हैं?

हाइव्स स्किन की एक ऐसी हालत है जहाँ अचानक लाल, सूजे हुए चकत्ते (जिन्हें Wheals कहते हैं) निकल आते हैं और उनमें बहुत ज़्यादा खुजली होती है। इनकी सबसे अजीब बात इनका 'अनप्रेडिक्टेबल' होना हैयानी ये जितनी तेज़ी से आते हैं, उतनी ही तेज़ी से कुछ मिनटों या घंटों में गायब भी हो सकते हैं।

ये अचानक क्यों निकल आते हैं?

आयुर्वेद मानता है कि जब कुछ बाहरी चीज़ें हमारे शरीर के 'पित्त' को भड़का देती हैं, तो स्किन ऐसा रिएक्शन देती है। हर इंसान के लिए इसके कारण (Triggers) अलग-अलग हो सकते हैं:

  • खाना-पीना: बहुत तीखा, मसालेदार खाना, पैकेटबंद चीज़ें या दही और सिरके जैसी फर्मेंटेड चीज़ें खाने से पित्त अचानक भड़क सकता है।
  • मौसम की मार: एकदम से ठंडी हवा लगना या बहुत तेज़ गर्मी में पसीना आना भी इन चकत्तों को ट्रिगर कर सकता है।
  • स्ट्रेस: बहुत ज़्यादा टेंशन या चिंता करने से शरीर का बैलेंस बिगड़ता है जो सीधे स्किन पर नज़र आता है।
  • केमिकल और कॉस्मेटिक्स: तेज़ साबुन, परफ्यूम या मेकअप का सामान भी सेंसिटिव स्किन पर तुरंत रिएक्शन कर सकता है।
  • दवाएं और एलर्जी: किसी खास दवा, कीड़े के काटने या मूंगफली-अंडे जैसे खाने से इम्यून सिस्टम अचानक भड़क सकता है।
  • इन्फेक्शन: कई बार पेट के कीड़े या कोई अंदरूनी वायरल इन्फेक्शन भी इसका छुपा हुआ कारण होता है।

क्या यह सिर्फ स्किन की ही बीमारी है?

देखने में भले ही यह सिर्फ स्किन का लाल होना लगे, लेकिन बात इससे कहीं गहरी है। हाइव्स असल में हमारे इम्यून सिस्टम का एक ओवर-रिएक्शन (हाइपरसेंसिटिव रिस्पॉन्स) है। जब शरीर के अंदर कोई हलचल होती है चाहे वो पित्त का भड़कना हो या हाजमे का बिगड़ना तो स्किन बस उस अंदरूनी तूफान का एक 'सिग्नल' बाहर दिखाती है।

इसके लक्षण कैसे पहचानें?

आयुर्वेद में इसे 'शीतपित्त' कहते हैं। इसे आप इसके खास लक्षणों से पहचान सकते हैं:

  • लाल चकत्ते: स्किन पर मच्छर या कीड़े के काटने जैसे लाल या गुलाबी रंग के उभरे हुए घेरे बन जाते हैं।
  • तेज़ खुजली: इनमें बहुत भयंकर खुजली होती है और कभी-कभी सुइयां चुभने जैसी जलन भी होती है।
  • सूजन: कई बार चकत्तों के साथ होंठों, पलकों या हाथ-पैरों पर सूजन (Angioedema) आ जाती है।
  • सफेद पड़ना: अगर आप इन लाल चकत्तों के बीच में उंगली से दबाएं, तो वे कुछ देर के लिए सफेद पड़ जाते हैं।
  • जगह बदलना: ये चकत्ते स्किन के एक हिस्से से अचानक गायब होकर किसी दूसरी जगह पर निकल आते हैं।

Acute vs Chronic: क्या फर्क है?

हाइव्स को उनके रहने के समय के हिसाब से दो हिस्सों में बाँटा जाता है:

  • Acute (शॉर्ट-टर्म): यह अचानक आता है और कुछ घंटों या दिनों में ठीक हो जाता है। यह अक्सर किसी खाने या कीड़े के काटने से होता है।
  • Chronic (लॉन्ग-टर्म): अगर हाइव्स बार-बार हों और 6 हफ्ते से ज़्यादा समय तक चलते रहें, तो इसे क्रोनिक कहते हैं। यह कई महीनों या सालों तक परेशान कर सकता है।

अगर ध्यान न दें, तो क्या खतरे हो सकते हैं?

अगर हाइव्स को सही समय पर कंट्रोल न किया जाए, तो यह गंभीर रूप भी ले सकता है:

  • एंजियोएडेमा: यह स्किन के अंदर गहरी सूजन है जो आंख, होंठ या गले में हो सकती है।
  • एनाफिलेक्सिस: यह एक जानलेवा हालत है जहाँ गले में सूजन आने से सांस लेने में तकलीफ हो सकती है या बीपी अचानक गिर सकता है।
  • मानसिक परेशानी: खुजली और चकत्तों की वजह से नींद न आना, चिड़चिड़ापन और भारी स्ट्रेस हो सकता है।
  • लाइफस्टाइल डिस्टर्बेंस: बार-बार चकत्ते आने से इंसान अपना रोज़ का काम या सोशल लाइफ ठीक से जी नहीं पाता।
  • इन्फेक्शन का डर: लगातार खुजलाने से स्किन छिल सकती है और वहां खतरनाक बैक्टीरिया घुस सकते हैं।

आयुर्वेद की नज़र में हाइव्स (शीतपित्त) क्या है?

आयुर्वेद में हाइव्स को "शीतपित्त" नाम दिया गया है। यह नाम ही बता रहा है कि जब शरीर में 'शीत' (ठंडक) और 'पित्त' (गर्मी) का बैलेंस बिगड़ जाता है, तब यह बीमारी पैदा होती है। खून और स्किन के अंदर जब दोषों में गड़बड़ी होती है, तो यह सब शुरू होता है। इसमें शरीर के तीनों दोषों का अपना-अपना रोल होता है:

  • पित्त: पित्त की तासीर गर्म और तेज़ होती है। जब यह भड़कता है, तो शरीर में भारी गर्मी और सूजन आ जाती है, जिससे स्किन लाल होती है और उसमें भयंकर खुजली और जलन होने लगती है।
  • वात: हाइव्स का अचानक से आना और फिर कुछ ही देर में गायब हो जाना यह सब वात दोष के कारण होता है।
  • कफ: स्किन का मोटा होना, सूज जाना या चकत्तों में जो भारीपन लगता है, उसके पीछे कफ दोष का हाथ होता है।

इसके अलावा, जब हमारी पाचन अग्नि कमज़ोर होती है, तो खाना ठीक से पच नहीं पाता। यह अधपका खाना शरीर में 'आम' (ज़हरीला कचरा) बना देता है। यही कचरा खून में मिलकर स्किन के रास्ते बाहर आने की कोशिश करता है, जिससे हाइव्स भयंकर रूप ले लेते हैं।

पित्ती (हाइव्स) का आयुर्वेदिक इलाज

अगर आपको बार-बार पित्ती होती  है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि बस कोई ठंडी क्रीम लगाई और काम हो गया। आयुर्वेद बीमारी को सिर्फ ऊपर से दबाने में यकीन नहीं रखता।:

  • हाज़मा ठीक करना: इलाज की शुरुआत हमेशा पेट से ही होती है। अगर आपका हाज़मा सुस्त है, तो खाया-पीया अंदर सड़ेगा और टॉक्सिन्स (गंदगी) बनेंगे। जब पेट एकदम साफ रहने लगेगा, तो नई एलर्जी उभरना अपने आप बंद हो जाएगी।
  • खून की सफाई: नीम और हल्दी जैसी कड़वी औषधियाँ खून की अशुद्धियों को काटती हैं। जैसे ही खून साफ होता है, त्वचा के लाल और गर्म चकत्ते खुद-ब-खुद बैठने लगते हैं।
  • बढ़े हुए पित्त को शांत करना: चकत्तों में जो आग जैसी जलन होती है, वो असल में शरीर की बढ़ी हुई गर्मी यानी 'पित्त' है। आपकी तासीर को देखकर ऐसी दवाएं तय की जाती हैं जो इस गर्मी को कम कर सकें।
  • विरेचन (अंदरूनी सफाई): अगर बीमारी सालों पुरानी है, तो 'विरेचन' थेरेपी सबसे बढ़िया काम करती है। समझ लीजिए कि यह लिवर और पेट की गहरी धुलाई है, जो जमे हुए खराब पित्त को मल के ज़रिए बाहर निकाल फेंकती है।
  • खान-पान और परहेज़: आप कितनी भी महंगी दवा खा लें, बिना परहेज़ के बीमारी नहीं जाएगी। इलाज के वक्त उन सभी चीज़ों पर रोक लगा दी जाती है जो शरीर में गर्मी या एलर्जी पैदा करती हैं।

पित्ती में काम आने वाली असरदार औषधियाँ

आयुर्वेद की ये बूटियां खून साफ करने के साथ-साथ भड़के हुए पित्त को शांत करने का काम बेहतरीन तरीके से करती हैं:

  • नीम: स्किन की किसी भी दिक्कत में नीम का कोई सानी नहीं है। यह खून साफ करके खुजली और बाहरी इन्फेक्शन को तेज़ी से खत्म करता है।
  • गिलोय: बार-बार पित्ती उछलने का मतलब है कि आपकी इम्युनिटी कमज़ोर पड़ गई है। गिलोय इसी इम्यून सिस्टम को सुधारता है ताकि शरीर हर छोटी बात पर रिएक्ट करना बंद कर दे।
  • हल्दी: त्वचा की लाली और सूजन को कम करने के लिए हल्दी सबसे असरदार है। चकत्तों की चुभन और जलन को यह बहुत जल्दी दबा देती है।
  • कांचनार: शरीर के अंदर जो भी टॉक्सिन्स या हानिकारक तत्व जम गए हैं, कांचनार उन्हें गलाकर बाहर निकालता है। जब अंदर का कचरा साफ होता है, तो स्किन भी साफ दिखने लगती है।

आराम देने वाली खास थेरेपी

दवाओं और पेट की सफाई के साथ-साथ, स्किन की जलन को बाहर से शांत करने के लिए कुछ खास आयुर्वेदिक थेरेपी काम आती हैं:

  • अभ्यंग (तेल मालिश): इसमें नारियल या पित्त को कम करने वाले खास औषधीय तेलों से हल्के हाथों मालिश की जाती है। इससे रूखी स्किन को नमी मिलती है और खुजली की परेशानी काफी घट जाती है।
  • उद्वर्तन: इस तरीके में जड़ी-बूटियों के सूखे पाउडर से बदन पर हल्की-हल्की मालिश की जाती है। इससे त्वचा के ब्लॉक हो चुके रोमछिद्र खुल जाते हैं और अंदर फंसी हुई गर्मी आराम से बाहर निकल आती है।
  • लेप लगाना: जहां भी लाल चकत्ते पड़े हैं, वहां नीम, चंदन और हल्दी का ठंडा पेस्ट लगाया जाता है। यह लेप स्किन की तपिश को तुरंत सोख लेता है और लगाते ही बड़ा सुकून मिलता है।

हाइव्स के लिए आहार: क्या खाएं/क्या न खाएं 

श्रेणी क्या खाएं (शामिल करें) क्या न खाएं (परहेज करें)
अनाज और दालें पुराने चावल, मूंग दाल, दलिया, ओट्स और रागी। मैदा, सफेद ब्रेड, नूडल्स और भारी उड़द की दाल।
सब्जियां लौकी, तोरई, कद्दू, परवल और मौसमी हरी सब्जियां। कच्ची सब्जियां (ज्यादा सलाद), फूलगोभी और भारी तली सब्जियां।
डेयरी और वसा शुद्ध A2 गाय का घी, गुनगुना दूध (हल्दी के साथ) और ताजा छाछ। ठंडा दूध, पनीर (रात में), और रिफाइंड तेल।
मसाले अदरक, हल्दी, जीरा, धनिया, सोंठ और अजवाइन। बहुत ज्यादा लाल मिर्च, गरम मसाला और अत्यधिक नमक।
पेय पदार्थ गुनगुना पानी, हर्बल टी और ताजे फलों का जूस (बिना चीनी)। कोल्ड ड्रिंक्स, ज्यादा चाय/कॉफी और शराब।
मीठा और स्नैक्स गुड़, खजूर, शहद और भुने हुए मखाने। सफेद चीनी, पेस्ट्री, चॉकलेट और डिब्बाबंद स्नैक्स।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम अमेय है। मुझे पीठ पर रैशेज के साथ स्किन से जुड़ी समस्याएँ हो गई थीं, जिनमें फंगल इंफेक्शन, खुजली और जलन की परेशानी शामिल थी। मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया, जहाँ डॉक्टरों ने मेरी समस्या को समझकर मेरे लिए पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट पैक तैयार किया। साथ ही मुझे जीवा बेसिल सोप के उपयोग की सलाह दी गई। इसके अलावा एक कस्टमाइज्ड डाइट प्लान भी दिया गया, जिससे मेरी स्किन कंडीशन में काफी सुधार हुआ। परिणाम बहुत अच्छे रहे और मुझे काफी राहत मिली।

डॉक्टर के पास भागने में देरी कब करें?

भले ही हाइव्स आम बात लगें, लेकिन अगर शरीर में ये सिग्नल दिखें तो तुरंत किसी डॉक्टर को दिखाना चाहिए:

  • सांस लेने में दिक्कत: छाती में भारीपन लगे, सांस फूले या गले से घरघराहट की आवाज़ आए।
  • चेहरे पर गहरी सूजन: अगर चकत्तों के साथ-साथ होंठों, आंखों या जीभ पर भारी सूजन आ जाए।
  • बीमारी का टिक जाना: अगर यह परेशानी 6 हफ्ते से ज़्यादा समय तक आपको तंग करती रहे।
  • नींद हराम होना: जब खुजली इतनी जानलेवा हो जाए कि रात की नींद उड़ जाए और आप दिन में अपना काम भी न कर पाएं।
  • बुखार या चक्कर: चकत्तों के साथ अगर तेज़ बुखार, जोड़ों में दर्द या चक्कर आने लगें।

निष्कर्ष

सच तो यह है कि हाइव्स सिर्फ स्किन की ऊपरी बीमारी नहीं है; यह अंदर से कमज़ोर हो चुके इम्यून सिस्टम और बिगड़े हुए हाजमे का अलार्म है। मॉडर्न दवाइयां आपको उस पल के लिए चकत्तों और खुजली से आराम ज़रूर दे देंगी, लेकिन आयुर्वेद उस 'जड़' को खत्म करता है जहाँ से यह एलर्जी बार-बार पैदा हो रही है। असली इलाज रोज़-रोज़ खुजली की गोली खाना नहीं है, बल्कि पेट की अग्नि को सुधारना और खून को अंदर से साफ़ करना है। जब आप सही आयुर्वेदिक इलाज के साथ एक अच्छी लाइफस्टाइल अपना लेते हैं, तो न सिर्फ हाइव्स हमेशा के लिए दूर होते हैं, बल्कि पूरी बॉडी अंदर से मज़बूत बन जाती है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

Hives में खुजली बहुत तेज होती है, इसलिए बार-बार खुजलाने का मन करता है। लेकिन ज्यादा खुजलाने से त्वचा में जलन और लालिमा बढ़ सकती है। इससे सूजन भी ज्यादा हो सकती है और कभी-कभी त्वचा पर हल्की चोट भी लग सकती है। इसलिए सीधे खुजलाने के बजाय ठंडक देने वाले उपाय अपनाना बेहतर होता है।

Hives कोई संक्रामक बीमारी नहीं है, इसलिए यह एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलते। यह शरीर की अंदरूनी प्रतिक्रिया होती है, जो किसी खास कारण से होती है। कई बार लोगों को लगता है कि यह छूने से फैल रहा है, लेकिन ऐसा नहीं होता। हर व्यक्ति में इसके कारण अलग हो सकते हैं।

Hives में ठंडा या हल्का गुनगुना पानी त्वचा को आराम देता है। गर्म पानी से शरीर की गर्मी बढ़ सकती है, जिससे खुजली और जलन बढ़ जाती है। बहुत ज्यादा ठंडा पानी भी कुछ लोगों में परेशानी कर सकता है। इसलिए सामान्य तापमान का पानी सबसे अच्छा माना जाता है।

हाँ, कपड़े Hives की परेशानी को बढ़ा या कम कर सकते हैं। तंग और कृत्रिम कपड़े त्वचा को रगड़ते हैं और गर्मी बढ़ाते हैं, जिससे दाने ज्यादा उभर सकते हैं। ढीले और सूती कपड़े त्वचा को ठंडक देते हैं और आराम पहुंचाते हैं। इसलिए कपड़ों का चुनाव बहुत मायने रखता है।

कई लोगों में Hives रात के समय ज्यादा महसूस होते हैं। रात में शरीर का तापमान थोड़ा बदलता है और दिनभर की थकान भी असर डालती है। इस वजह से खुजली ज्यादा तेज लगती है और नींद भी खराब हो सकती है।

तेज धूप और गर्मी Hives को बढ़ा सकती है। शरीर में गर्मी बढ़ने से दाने और खुजली ज्यादा हो सकती है। हर व्यक्ति में इसका असर अलग हो सकता है, लेकिन ज्यादा देर धूप में रहने से बचना बेहतर होता है।

कम पानी पीने से शरीर में सूखापन और गर्मी बढ़ सकती है, जिससे Hives की परेशानी बढ़ सकती है। पर्याप्त पानी पीने से शरीर साफ रहता है और त्वचा को भी राहत मिलती है। इसलिए दिनभर में पर्याप्त पानी लेना जरूरी है।

हल्का व्यायाम शरीर के लिए अच्छा होता है, लेकिन बहुत ज्यादा मेहनत वाला व्यायाम शरीर में गर्मी बढ़ा सकता है। इससे Hives के दाने उभर सकते हैं। इसलिए संतुलित और हल्का व्यायाम करना ही बेहतर होता है।

हाँ, मौसम बदलने पर कई लोगों में Hives बढ़ सकते हैं। खासकर गर्मी या नमी बढ़ने पर दाने ज्यादा उभर सकते हैं। शरीर को नए मौसम के अनुसार ढलने में समय लगता है, इसलिए इस समय ज्यादा सावधानी जरूरी होती है।

 लगातार खुजली और परेशानी से व्यक्ति मानसिक रूप से भी परेशान हो सकता है। नींद पूरी न होने से चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। बार-बार दाने निकलने से चिंता भी बढ़ सकती है। इसलिए मन को शांत रखना और आराम करना भी जरूरी होता है।

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