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एक पैर में Pain जो Calf तक जाता है - Sciatica या Piriformis Syndrome?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 18 May, 2026
  • category-iconUpdated on 18 May, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5011

आजकल कमर से लेकर एक पैर की पिंडली (Calf) तक जाने वाले भयंकर दर्द की शिकायत बहुत आम हो गई है। लोग अक्सर इस बात को लेकर भयंकर उलझन में रहते हैं कि उन्हें स्लिप डिस्क वाला 'साइटिका' (Sciatica) है या सिर्फ मांसपेशियों का 'पिरिफोर्मिस सिंड्रोम' (Piriformis Syndrome)। इस गलतफहमी में वे गलत पेनकिलर्स (Painkillers) खाते रहते हैं और यूट्यूब देखकर गलत स्ट्रेचिंग करते हैं, जिससे नसें और भड़क जाती हैं। एलोपैथी में इस दर्द को दबाने के लिए अक्सर स्टेरॉयड के इंजेक्शन या रीढ़ की हड्डी की सर्जरी की सलाह दे दी जाती है। ये चीज़ें कुछ समय के लिए दर्द को सुन्न ज़रूर कर देती हैं, लेकिन जड़ पर काम न करने से शरीर अंदर से कमज़ोर हो जाता है और नसें सूखने लगती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यह समस्या 'वात' दोष के भड़कने और नसों (स्नायु) के दबने से जुड़ी है। जीवा आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से आपके दर्द के असली कारण को पकड़कर इस भयंकर खतरे को जड़ से मिटाता है ताकि आप बिना डरे चल-फिर सकें।

Sciatica और Piriformis Syndrome में 'असली पहचान' क्या है?

पैर में जाने वाला यह भयंकर दर्द मुख्य रूप से शरीर की सबसे लंबी और मोटी नस—साइटिक नर्व (Sciatic Nerve)—के दबने से होता है। लेकिन यह नस कहाँ दब रही है, यही असली पहचान है:

  • साइटिका (Sciatica): यह रीढ़ की हड्डी (Spine) की बीमारी है। जब L4-L5 या L5-S1 की डिस्क घिसकर या खिसक कर (Slip disc) साइटिक नस की जड़ को दबाने लगती है, तो दर्द सीधे कमर के निचले हिस्से (Lower back) से शुरू होकर कूल्हे, जांघ और पिंडली (Calf) से होता हुआ पैरों की उँगलियों तक बिजली के झटके की तरह जाता है।
  • पिरिफोर्मिस सिंड्रोम (Piriformis Syndrome): यह मांसपेशियों (Muscles) की बीमारी है। हमारे कूल्हे (Buttock) में पिरिफोर्मिस नाम की एक मांसपेशी होती है जिसके ठीक नीचे से साइटिक नस गुज़रती है। जब यह  मांसपेशी भयंकर रूप से सिकुड़ (Spasm) जाती है, तो नस दब जाती है। इसमें दर्द कमर में नहीं होता, बल्कि सीधे कूल्हे (Buttocks) से शुरू होकर पिंडली तक जाता है। इसे 'वॉलेट साइटिका' (Wallet Sciatica) भी कहते हैं।

पेनकिलर का इस्तेमाल सिर्फ बाहरी इलाज है, जबकि असली गड़बड़ी शरीर के अंदर दबी हुई नस और वात के भयंकर प्रकोप में चल रही होती है।

नसों के दबने के भयंकर प्रकार

साइटिक नस के दबने और दर्द को मुख्य रूप से इस तरह बाँटा जा सकता है:

  • एक्यूट नर्व कम्प्रेशन (Acute Nerve Compression): अचानक भारी वज़न उठाने या गलत तरीके से झुकने पर नस का भयंकर रूप से दब जाना, जिससे इंसान उसी जगह पर सुन्न होकर गिर जाता है।
  • क्रोनिक वात प्रकोप (Chronic Neuropathy): सालों तक वात बढ़ने से नस का सूख जाना, जिससे पैरों में हर समय मीठा-मीठा दर्द और भयंकर झुनझुनाहट बनी रहती है।
  • फॉल्स साइटिका (False Sciatica): पिरिफोर्मिस सिंड्रोम को फॉल्स साइटिका भी कहते हैं, क्योंकि इसमें डिस्क बिल्कुल सुरक्षित होती है, लेकिन दर्द साइटिका जैसा ही भयंकर होता है।

पैर की नसों के डैमेज होने के भयंकर शारीरिक संकेत

शरीर द्वारा दिए जाने वाले डरावने लक्षण इस प्रकार हैं:

  • करंट जैसा दर्द (Shooting Pain): उठते या बैठते समय कूल्हे से लेकर पिंडली तक ऐसा भयंकर दर्द होना जैसे बिजली का करंट लगा हो।
  • पैर में सुन्नपन और झुनझुनाहट (Numbness & Tingling): एक पैर का हमेशा भारी रहना, पिंडलियों में चींटियाँ चलने जैसा महसूस होना और पैर का सुन्न पड़ जाना।
  • पैर ज़मीन पर न रखा जाना: सुबह सोकर उठने पर पैर ज़मीन पर रखते ही भयंकर टीस उठना और लंगड़ा कर चलना।
  • पैर का कमज़ोर होना: धीरे-धीरे पैर की ताकत खत्म होना और चलते-चलते अचानक पैर का मुड़ जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत पेनकिलर्स रोकें और अपनी जाँच कराएँ।

Sciatica और Piriformis Syndrome को बुलाने वाले असली और छिपे हुए कारण

इस भयंकर दर्द के पीछे गहरे अंदरूनी कारण ये होते हैं:

  • गलत पॉश्चर और भयंकर वात: घंटों तक एक ही जगह पर गलत तरीके से बैठने और वात बढ़ाने वाला भोजन खाने से रीढ़ की हड्डी और माँसपेशियाँ सूखकर कड़क हो जाती हैं।
  • वॉलेट (Wallet) रखने की आदत: पुरुष अक्सर अपनी पीछे वाली जेब में मोटा पर्स (Wallet) रखकर घंटों बैठते हैं। यह पर्स सीधे पिरिफोर्मिस मांसपेशी को कुचलता है, जिससे नस दब जाती है।
  • भारी वज़न उठाना: अचानक झटके से भारी सामान उठाने पर डिस्क अपनी जगह से खिसक कर नस पर भयंकर दबाव डाल देती है।
  • जठराग्नि की कमज़ोरी (आम): पाचन खराब होने से शरीर में भयंकर 'आम' (गंदगी) बनता है, जो नसों में जाकर सूजन पैदा करता है।

इन 'Hidden Risks' को अनदेखा करने के गंभीर जोखिम

इस स्थिति को अगर सिर्फ 'सामान्य थकावट' मानकर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • फुट ड्रॉप (Foot Drop): नस के पूरी तरह डैमेज होने से पैर का पंजा ऊपर नहीं उठ पाता, जिससे इंसान हमेशा के लिए लंगड़ा हो जाता है।
  • पैरों का लकवा (Paralysis): भयंकर दबाव के कारण कमर से नीचे के हिस्से में लकवा मार सकता है।
  • मल-मूत्र पर से कंट्रोल खत्म होना: अगर नसें बहुत ज़्यादा दब जाएँ (Cauda Equina Syndrome), तो पेशाब और मल पर से शरीर का कंट्रोल हमेशा के लिए खत्म हो जाता है, जो एक भयंकर मेडिकल इमरजेंसी है।

नसों के दर्द पर आयुर्वेद का क्या चमत्कारी नज़रिया है?

आयुर्वेद में साइटिका को 'गृध्रसी' (गिद्ध की तरह चाल) कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, वात दोष के भयंकर प्रकोप से स्नायु (नसों) और कण्डरा (Ligaments) में भयंकर जकड़न आ जाती है। जब दूषित वात कमर से पैरों की ओर जाता है, तो वह पूरे रास्ते की नसों को सुखा देता है। जीवा आयुर्वेद के डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं कि दर्द रीढ़ की हड्डी (L4-L5) से आ रहा है या पिरिफोर्मिस मांसपेशी के तनाव से। आयुर्वेद में बस नसों को सुन्न करना मकसद नहीं है, बल्कि वो चाहते हैं कि नसों को अंदरूनी चिकनाहट मिले, सूजन खत्म हो और वात हमेशा के लिए शांत हो।

जीवा आयुर्वेद साइटिका को सुरक्षित रखने के लिए कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य (प्रकृति) अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: मरीज़ को होने वाले दर्द की जगह, झुनझुनाहट और सुन्नपन की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: मरीज़ की एमआरआई (MRI) रिपोर्ट और ली जा रही भारी पेनकिलर्स का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: कुपित वात दोष को पकड़ने के बाद ही नसों की अंदरूनी सूजन कम करने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

नसों को प्राकृतिक रूप से हील करने वाली अचूक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में नसों को ताकत देने, सूजन कम करने और वात को शांत करने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • निर्गुण्डी (Nirgundi): यह नसों के दर्द (Neuropathic pain) के लिए आयुर्वेद का सबसे बड़ा प्राकृतिक पेनकिलर है। यह भयंकर सूजन को सोख लेती है और दर्द को तुरंत खत्म करती है।
  • रास्ना (Rasna): यह बढ़ा हुआ वात शांत करने की सबसे अचूक दवा है। यह सूखी हुई नसों और मांसपेशियों में दोबारा जान डालती है।
  • शल्लकी (Shallaki): यह रीढ़ की हड्डी और जोड़ों के लिए चमत्कारी है। यह स्लिप डिस्क की सूजन को कम कर साइटिक नस को दबाव से आज़ाद करती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह पिरिफोर्मिस मांसपेशि की भयंकर ऐंठन को खोलता है और कमर की कमज़ोर हो चुकी नसों को फौलाद जैसी ताकत देता है।

कमर और पैरों को ताकत देने वाली पंचकर्म चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, नसों को 'रीसेट' (Reset) करने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • कटि बस्ती (Kati Basti): यह साइटिका के लिए सबसे चमत्कारी थेरेपी है। कमर पर उड़द की दाल का घेरा बनाकर गर्म औषधीय तेल भरा जाता है। यह तेल सीधे घिसी हुई डिस्क और दबी हुई नस तक जाकर भयंकर सूखेपन को मिटाता है।
  • पत्र पोटली स्वेद (Patra Potli Sweda): ताज़ी जड़ी-बूटियों की गर्म पोटली से कमर और कूल्हों की सिकाई की जाती है, जो पिरिफोर्मिस मांसपेशी की जकड़न को तुरंत खोल देती है।
  • बस्ती (Basti/Enema): यह बढ़े हुए वात दोष को जड़ से खत्म करने का सबसे शक्तिशाली तरीका है। औषधीय काढ़े का एनीमा देने से नसों को सीधा पोषण मिलता है।

वात को शांत करने वाला शुद्ध आहार

आयुर्वेदिक वेलनेस में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस भयंकर दर्द में आहार ही आपकी सबसे बड़ी दवा है:

क्या खाएँ?

  • गाय का शुद्ध घी: रोज़ाना अपने खाने में और रात को गर्म दूध में डालकर गाय का शुद्ध घी पिएँ। यह वात को शांत कर सूखी नसों को चिकनाहट (Lubrication) देता है।
  • गर्म और सुपाच्य भोजन: मूंग दाल, दलिया और ताज़ा बना गर्म भोजन लें, जो पचने में हल्का हो।
  • लहसुन और अजवायन: सुबह खाली पेट 2 कली लहसुन चबाने से भयंकर वात दर्द तुरंत शांत होता है।

क्या न खाएँ?

  • वात बढ़ाने वाली दालें और सब्ज़ियाँ: राजमा, छोले, मटर, गोभी और भिंडी शरीर में भयंकर गैस (वात) बनाते हैं, जो सीधे नसों को जकड़ लेती है।
  • ठंडी और बासी चीज़ें: फ्रिज का ठंडा पानी, दही, आइसक्रीम और बासी खाना वात भड़काते हैं, इन्हें तुरंत बंद कर दें।
  • जंक फूड: यह शरीर में 'आम' बनाता है जिससे जड़ी-बूटियाँ काम नहीं कर पातीं।

जीवा आयुर्वेद में रोगी की गहराई से जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ MRI की रिपोर्ट देखकर नहीं, बल्कि पूरे शरीर की समझ के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, दर्द की रफ्तार और सुन्नपन को आराम से सुना जाता है।
  • आपके द्वारा अनुभव किए गए दर्द के बढ़ने के समय (चलने या बैठने पर) की हिस्ट्री के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके आहार, पॉश्चर (Wallet रखने की आदत) और पेट साफ (कब्ज़) होने की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जानकर जमे 'आम' और वात दोष के भयंकर स्तर का पता लगाया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

दर्द को पूरी तरह खत्म होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में साइटिका का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर पिरिफोर्मिस मांसपेशी में जकड़न अभी शुरू हुई है, तो अश्वगंधा और सही पॉश्चर से 3 से 4 हफ्तों में ही भयंकर दर्द खत्म हो जाता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर डिस्क घिस चुकी है और नस सालों से दबी है, तो कटि बस्ती और जड़ी-बूटियों से उन्हें 'रीसेट' होने में 3 से 6 महीने लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर जड़ी-बूटियों और शुद्ध आहार का कड़ाई से पालन करता है, तो भविष्य में यह भयंकर दर्द कभी लौटकर नहीं आता।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक चिकित्सा (Allopathy) और आयुर्वेदिक उपचार में क्या बड़ा अंतर है?

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द कम करना, नस पर दबाव घटाना और रोज़मर्रा की गतिविधियों को आसान बनाना वात संतुलन और रीढ़-नसों की प्राकृतिक मजबूती पर ध्यान देना
नज़रिया समस्या को डिस्क, नस दबने या संरचनात्मक बदलाव के रूप में देखना इसे गृध्रसी, वात असंतुलन और शरीर की समग्र कमजोरी से जोड़कर देखना
उपचार तरीका पेनकिलर्स, फिजियोथेरेपी, इंजेक्शन और आवश्यकता पड़ने पर सर्जरी कटि बस्ती, निर्गुण्डी, तेल चिकित्सा, योग और आयुर्वेदिक सपोर्ट पर ज़ोर
डाइट और लाइफस्टाइल एक्सरसाइज़, सही पॉश्चर और वजन नियंत्रण की सलाह वात-शामक आहार, नियमित दिनचर्या, हल्की स्ट्रेचिंग और पर्याप्त आराम को महत्वपूर्ण मानना
लंबा असर कुछ लोगों में दोबारा दर्द या लंबे समय तक उपचार की आवश्यकता हो सकती है जीवनशैली संतुलन और शरीर की मजबूती के माध्यम से दीर्घकालिक आराम पर ज़ोर

डॉक्टर की सलाह कब लें?

नसों के दर्द में अगर ये भयंकर संकेत दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • पेशाब या मल त्याग पर से शरीर का कंट्रोल अचानक खत्म हो जाए (Cauda Equina Syndrome)।
  • पैर का पंजा ऊपर की तरफ न उठे और चलते समय ज़मीन पर घिसटने लगे (Foot Drop)।
  • पैर में सुन्नपन इतना बढ़ जाए कि सुई चुभने पर भी कोई दर्द या अहसास न हो।
  • दर्द कमर या पैर के साथ-साथ भयंकर बुखार और कंपकंपी लाए (इन्फेक्शन का संकेत)।

निष्कर्ष

निष्कर्ष के तौर पर, कमर से पिंडली तक जाने वाला भयंकर दर्द चाहे साइटिका (Sciatica) हो या पिरिफोर्मिस सिंड्रोम, दोनों ही शरीर में वात दोष के भड़कने और नसों के दबने का डरावना परिणाम हैं। सिर्फ पेनकिलर खाकर दर्द को सुन्न करना या सीधा सर्जरी करवा लेना आपकी नसों को हमेशा के लिए कमज़ोर कर सकता है। असली पहचान करके शरीर को अंदर से पोषण देना, कटि बस्ती जैसी चमत्कारी थेरेपी लेना, निर्गुण्डी-रास्ना जैसी अचूक जड़ी-बूटियाँ अपनाना और गाय के घी का शुद्ध वात-नाशक आहार ही इसका सबसे सुरक्षित इलाज है। जीवा आयुर्वेद आपकी नसों को प्राकृतिक रूप से इतना ताकतवर बना देता है कि आप बिना किसी दर्द और झुनझुनाहट के अपनी ज़िंदगी मज़े से जी सकें।

FAQs

साइटिका रीढ़ की हड्डी (L4-L5) की बीमारी है, जिसमें दर्द कमर से शुरू होकर पैर तक जाता है। जबकि पिरिफोर्मिस सिंड्रोम कूल्हे की मांसपेशी की जकड़न है, जिसमें दर्द कमर में नहीं, बल्कि सीधे कूल्हे (Buttocks) से शुरू होकर पैर में जाता है।

हाँ, इसे 'वॉलेट साइटिका' (Wallet Sciatica) कहते हैं। जब आप मोटा पर्स रखकर बैठते हैं, तो वह पिरिफोर्मिस मांसपेशी पर दबाव डालता है, जिससे साइटिक नस दब जाती है और भयंकर दर्द होता है।

बिल्कुल। जब नस भयंकर रूप से दब जाती है और दिमाग तक सिग्नल नहीं पहुँचता, तो पैर सुन्न होने लगता है और झुनझुनाहट होती है। इसे तुरंत ठीक न करने पर पैर लकवाग्रस्त (Paralyze) हो सकता है।

जी हाँ। राजमा, छोले और मटर शरीर में भयंकर गैस (वात) बनाते हैं। यह वात नसों के दर्द को भड़का देता है, जिससे साइटिका की टीस कई गुना बढ़ जाती है।

बिल्कुल। कटि बस्ती में इस्तेमाल होने वाला गर्म औषधीय तेल सूखी हुई डिस्क और नसों को अंदरूनी चिकनाहट (Lubrication) देता है, सूजन खत्म करता है और डिस्क को वापस अपनी जगह पर आने में मदद करता है।

लहसुन वात को शांत करने वाली सबसे प्राकृतिक और चमत्कारी औषधि है। रोज़ सुबह 2 कली लहसुन खाली पेट चबाने से नसों की भयंकर सूजन और दर्द तुरंत कम होता है।

शुरुआती भयंकर दर्द में 2-3 दिन आराम ठीक है, लेकिन लंबे समय तक बेड रेस्ट करने से माँसपेशियाँ और ज़्यादा कमज़ोर व जकड़ (Stiff) जाती हैं, जिससे दर्द और बढ़ जाता है। सही मार्गदर्शन में वात-शामक मूवमेंट ज़रूरी है।

हाँ। अश्वगंधा कमज़ोर नसों को फौलाद जैसी ताकत देता है और पिरिफोर्मिस मांसपेशी की ऐंठन को खोलकर साइटिक नस को दबाव से आज़ाद करता है।

नहीं। आयुर्वेद के अनुसार बर्फ से वात दोष और जकड़न भयंकर रूप से बढ़ जाती है। साइटिका में हमेशा गर्म तेल या पत्र पोटली स्वेद (गर्म सिकाई) का इस्तेमाल करना चाहिए।

जी हाँ। अगर समय रहते आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों (निर्गुण्डी, रास्ना), कटि बस्ती और शुद्ध वात-नाशक डाइट को अपना लिया जाए, तो 90% से ज़्यादा मामलों में बिना सर्जरी के दर्द हमेशा के लिए खत्म हो जाता है।

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