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IT Professional में Uric Acid क्यों आम होता जा रहा है? Sedentary Life और Pitta

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 21 May, 2026
  • category-iconUpdated on 15 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5037

आज की डिजिटल और बैठकर काम करने वाली जीवनशैली में यूरिक एसिड की समस्या तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। खासकर आईटी क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं में यह स्थिति पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रही है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर काम करना, लगातार मानसिक दबाव, अनियमित खानपान और नींद की कमी शरीर के अंदरूनी संतुलन को धीरे-धीरे प्रभावित करने लगते हैं।

शुरुआत में यह समस्या हल्के लक्षणों के रूप में दिखाई देती है जैसे पैर के अंगूठे में दर्द, सुबह उठते समय अकड़न या शरीर में भारीपन। लेकिन समय के साथ यह दर्द और सूजन में बदल सकती है। आयुर्वेद के अनुसार लंबे समय तक बैठने की आदत, पाचन की कमजोरी और शरीर में पित्त का बढ़ना शरीर में ऐसे बदलाव पैदा कर सकता है जो यूरिक एसिड बढ़ने की स्थिति से जुड़े होते हैं।

यूरिक एसिड आखिर होता क्या है?

यूरिक एसिड शरीर में बनने वाला एक प्राकृतिक अपशिष्ट पदार्थ है। यह “प्यूरीन” नामक तत्व के टूटने से बनता है, जो कुछ खाद्य पदार्थों और शरीर की कोशिकाओं में मौजूद होता है। सामान्य स्थिति में यह पदार्थ गुर्दों के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाता है। लेकिन जब इसका निर्माण अधिक होने लगे या शरीर इसे ठीक से बाहर न निकाल पाए, तब इसका स्तर बढ़ने लगता है। धीरे-धीरे यह अतिरिक्त मात्रा रक्त में जमा होकर जोड़ों में सूक्ष्म क्रिस्टल के रूप में इकट्ठा हो सकती है। इसी कारण समय के साथ दर्द, सूजन और चलने-फिरने में असहजता जैसी समस्याएं शुरू हो सकती हैं।

IT Professional में यूरिक एसिड बढ़ने के कारण

आईटी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में यूरिक एसिड बढ़ने की समस्या तेजी से देखने को मिल रही है। इसका मुख्य कारण केवल भोजन नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली का असंतुलन है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, लगातार मानसिक दबाव और अनियमित दिनचर्या शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

  • लंबे समय तक बैठे रहना: लगातार एक ही जगह बैठकर काम करने से शरीर की गतिविधि कम हो जाती है, जिससे अपशिष्ट पदार्थ ठीक से बाहर नहीं निकल पाते।
  • अनियमित और असंतुलित भोजन: समय पर भोजन न करना, जंक फूड और भारी भोजन का अधिक सेवन शरीर में पाचन और अपशिष्ट संतुलन को बिगाड़ सकता है।
  • लगातार मानसिक तनाव: काम का दबाव और तनाव शरीर के हार्मोन और चयापचय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, जिससे असंतुलन बढ़ सकता है।
  • नींद की कमी: देर रात तक काम करना और पूरी नींद न लेना शरीर की मरम्मत और सफाई प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
  • पानी की कमी: कम पानी पीने से शरीर से अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकलने में कठिनाई हो सकती है।
  • शारीरिक गतिविधि की कमी: व्यायाम या चलने-फिरने की कमी से चयापचय धीमा हो जाता है, जिससे यूरिक एसिड बढ़ने की संभावना बढ़ सकती है।
  • अधिक चाय, कॉफी और प्रोसेस्ड भोजन:  इनका अधिक सेवन शरीर में गर्मी और असंतुलन बढ़ा सकता है, जो यूरिक एसिड के स्तर को प्रभावित कर सकता है।

शरीर कौन-कौन से शुरुआती संकेत देता है? 

आजकल की डिजिटल दुनिया और दिन भर कुर्सी पर बैठकर काम करने वाली लाइफस्टाइल ने यूरिक एसिड की दिक्कत बहुत बढ़ा दी है। खास तौर पर IT सेक्टर के नौजवानों में ये समस्या बहुत ज़्यादा देखने को मिल रही है। घंटों एक ही जगह बैठे रहना, हर वक्त की दिमागी टेंशन, खाने का कोई टाइम न होना और कच्ची नींद ये सब मिलकर शरीर का पूरा सिस्टम अंदर से बिगाड़ देते हैं। शुरुआत में बस पैर के अंगूठे में दर्द, सुबह की अकड़न या भारीपन लगता है, जिसे लोग अक्सर थकान समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन बाद में यही दर्द और सूजन बन जाते हैं। आयुर्वेद कहता है कि लगातार बैठने, ढीले पाचन और शरीर में गर्मी (पित्त) बढ़ने से ही यूरिक एसिड की बीमारी जन्म लेती है।

यूरिक एसिड आखिर होता क्या है? 

यूरिक एसिड हमारे शरीर में बनने वाला एक तरह का कुदरती कचरा है। यह 'प्यूरीन' नाम के तत्व के टूटने से बनता है जो हमारे खाने में मौजूद होता है। आम तौर पर हमारी किडनी इस कचरे को छानकर पेशाब के रास्ते बाहर फेंक देती है। लेकिन जब यह बहुत बनने लगे या किडनी इसे बाहर न निकाल पाए, तो यह खून में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे ये फालतू कचरा हमारे जोड़ों में छोटे-छोटे क्रिस्टल (नुकीले कणों) के रूप में इकट्ठा हो जाता है। इसी वजह से बाद में जोड़ों में दर्द, सूजन और उठने-बैठने में भारी परेशानी शुरू हो जाती है।

IT Professionals में यूरिक एसिड बढ़ने के कारण 

आईटी वालों में यूरिक एसिड बढ़ने की सबसे बड़ी वजह सिर्फ खाना नहीं, बल्कि उनका पूरा बेढंगा रूटीन है।

  • लंबे समय तक बैठे रहना: रोज़ 8-10 घंटे कुर्सी पर चिपके रहने से शरीर की हलचल खत्म हो जाती है और गंदगी बाहर नहीं निकल पाती।
  • उल्टा-सीधा खाना: वक़्त पर खाना न खाना, जंक फूड और भारी खाना से आपका पाचन एकदम सुस्त पड़ जाता है।
  • लगातार दिमागी टेंशन: काम के भारी दबाव से शरीर का अंदरूनी बैलेंस बिगड़ जाता है।
  • नींद की कमी: लेट नाइट काम करने और अधूरी नींद से शरीर खुद की सफाई नहीं कर पाता।
  • पानी कम पीना: पानी की कमी से शरीर की गंदगी को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता।
  • कसरत की कमी: बिल्कुल न चलने-फिरने से शरीर सुस्त हो जाता है और यूरिक एसिड बढ़ने लगता है।
  • ज़्यादा चाय-कॉफी: नींद भगाने के लिए दिन भर चाय-कॉफी पीने से शरीर में गर्मी बढ़ती है, जो इस दिक्कत को और भड़काती है।

शरीर कौन-कौन से शुरुआती संकेत देता है? 

शरीर शुरू में छोटे-छोटे इशारे देता है, लेकिन हम उन्हें मामूली दर्द मानकर टाल देते हैं।

  • अंगूठे या जोड़ों में दर्द: पैर के अंगूठे या एड़ी में अचानक तेज़ दर्द होना इसका सबसे पक्का इशारा है।
  • जोड़ों में सूजन और लालपन: दर्द वाली जगह का सूज जाना, गर्म होना और लाल पड़ जाना।
  • सुबह की अकड़न: सोकर उठने के बाद जोड़ों में जकड़न और भारीपन महसूस होना।
  • चलने में दिक्कत: दर्द की वजह से नॉर्मल चलना-फिरना भी सज़ा लगने लगता है।
  • बार-बार दर्द का लौटना: दर्द का कभी कम होना और कभी अचानक बहुत बढ़ जाना।
  • शरीर में भारीपन: बिना मेहनत किए भी थकावट और शरीर टूटा-टूटा लगना।
  • जोड़ों में हल्की जलन: कभी-कभी जोड़ों के अंदर सुई चुभने जैसी जलन महसूस होना।

अगर ये सब बार-बार हो रहा है, तो चेकअप कराना बहुत ज़रूरी है।

Sedentary Lifestyle शरीर को अंदर से कैसे प्रभावित करता है? हमारा शरीर चलने-फिरने के लिए बना है, लेकिन आईटी की जॉब ने हमें कुर्सी से बांध दिया है। लगातार बुत बनकर बैठे रहने से शरीर की अंदरूनी मशीनरी सुस्त पड़ जाती है। खून का दौरा धीमा हो जाता है, हाज़मा बैठ जाता है और एनर्जी ब्लॉक हो जाती है। इसी वजह से शरीर हमेशा भारी-भारी और अंदर से कमज़ोर लगने लगता है।

यूरिक एसिड बढ़ने के नुकसान 

अगर यूरिक एसिड लंबे समय तक बढ़ा रहे, तो ये सिर्फ हल्का दर्द नहीं रहता, बल्कि शरीर को बुरी तरह डैमेज करता है।

  • तेज़ दर्द और सूजन: जोड़ों में क्रिस्टल जमने से अचानक भयंकर दर्द और सूजन आ जाती है।
  • चलने-फिरने में लाचारी: सीढ़ियां चढ़ना या कुर्सी से उठना भी बहुत मुश्किल हो जाता है।
  • जोड़ों की कमज़ोरी: लंबे समय तक ध्यान न देने से जोड़ हमेशा के लिए डैमेज हो जाते हैं।
  • दर्द का लौटकर आना: रूटीन न बदलने पर ये बीमारी बार-बार वापस आती है।
  • नींद की बर्बादी: रात में दर्द उठने से नींद टूट जाती है और शरीर को आराम नहीं मिल पाता।
  • काम पर असर: हर वक्त दर्द और बेचैनी से ऑफिस के काम में फोकस करना नामुमकिन हो जाता है।
  • दिमागी उलझन: लगातार दर्द और परेशानी इंसान को चिड़चिड़ा बना देती है।

केवल Painkiller से आगे क्यों सोचना ज़रूरी है?

 पेनकिलर सिर्फ कुछ घंटों की राहत देते हैं, ये बीमारी की जड़ खत्म नहीं करते। अगर आप रोज़ 10 घंटे कुर्सी पर बैठ रहे हैं, भारी टेंशन ले रहे हैं, नींद पूरी नहीं कर रहे और खाना भी गलत खा रहे हैं, तो ये दर्द बार-बार लौटेगा। इसलिए सिर्फ दर्द की गोली खाने से काम नहीं चलेगा। अपने शरीर के बिगड़े हुए सिस्टम को समझना और अपनी लाइफस्टाइल को अंदर से मज़बूत बनाना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

यूरिक एसिड को लेकर आयुर्वेद क्या कहता है?

यूरिक एसिड बढ़ने को आयुर्वेद कमज़ोर पाचन और पेट की अग्नि से जोड़ता है। जब पेट खाने को सही से पचा नहीं पाता, तो अंदर एक चिपचिपा ज़हरीला कचरा बनने लगता है। इसी कचरे को आयुर्वेद में 'आम' (Ama) कहते हैं। यही गंदगी धीरे-धीरे जोड़ों में जाकर बैठ जाती है और दर्द शुरू हो जाता है।

  • वात गड़बड़ाता है: शरीर के अंदर सूखापन बढ़ने लगता है। जोड़ों में इतनी अकड़न और दर्द होता है कि पैर आगे बढ़ाना भी भारी लगने लगता है।
  • पित्त का रोल: जब शरीर में पित्त बढ़ जाता है, तो जोड़ों में तेज़ गर्मी और जलन होने लगती है। वहाँ साफ-साफ सूजन दिखाई देने लगती है।
  • टॉक्सिन्स यानी 'आम' का जमना: पाचन खराब होने से जो कचरा जोड़ों के बीच अटक जाता है, वही हर समय रहने वाले भारीपन और दर्द की असली वजह है।

इलाज को लेकर क्या है हमारा नज़रिया?

यहाँ हमारा फोकस सिर्फ यूरिक एसिड के लेवल को किसी तरह नीचे लाना नहीं है। हम शरीर के अंदर बिगड़े हुए पूरे सिस्टम को दोबारा पटरी पर लाते हैं:

  • पेट की अग्नि को जगाना: सबसे पहला काम पाचन को दुरुस्त करना है। इससे आप जो भी खाएँगे, वो अच्छे से पचेगा और दोबारा कोई ज़हरीला कचरा नहीं बन पाएगा।
  • अंदरूनी गंदगी की सफाई: जोड़ों में जो टॉक्सिन्स पहले से जमे बैठे हैं, उन्हें साफ करने पर पूरा ज़ोर दिया जाता है ताकि जकड़न में तुरंत आराम मिल सके।
  • वात और पित्त को शांत करना: दर्द के ज़िम्मेदार वात को और जलन बढ़ाने वाले पित्त को सही जड़ी-बूटियों से बैलेंस किया जाता है।
  • किडनी को सहारा देना: शरीर का कचरा बाहर फेंकने का ज़िम्मा किडनी का है। हम उसे अंदर से ताक़त देते हैं ताकि यूरिक एसिड आसानी से पेशाब के रास्ते निकल जाए।
  • डाइट और रूटीन सेट करना: बिना सही खान-पान और एक्टिव लाइफस्टाइल के इस बीमारी को हराना मुमकिन नहीं है। इसलिए सही मात्रा में पानी पीना और एक्टिव रहना ज़रूरी है।

यूरिक एसिड में काम आने वाली कुछ मुख्य जड़ी-बूटियाँ

अगर आपका यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है, तो आयुर्वेद में कुछ ऐसी कमाल की बूटियां हैं जो न सिर्फ आपका पाचन सुधारती हैं, बल्कि जोड़ों के दर्द को भी खींच लेती हैं:

  • गिलोय: जोड़ों की सूजन उतारने में इसका कोई जवाब नहीं। यह शरीर के अंदर की सारी गर्मी और बिगड़े हुए सिस्टम को एकदम सेट कर देती है।
  • त्रिफला: अगर पेट साफ नहीं है, तो बीमारियां तो आएंगी ही। त्रिफला आपके पाचन को बिल्कुल दुरुस्त कर देता है, जिससे शरीर में फालतू गंदगी रुकती ही नहीं।
  • पुनर्नवा: इसका मेन काम है किडनी की सफाई करना और शरीर का एक्स्ट्रा पानी बाहर निकालना। इसी वजह से जोड़ों पर आई सूजन तेज़ी से उतरने लगती है।
  • गुग्गुल: यूरिक एसिड में जोड़ों के अंदर जो जकड़न और भारीपन आ जाता है, उसे खोलने के लिए गुग्गुल बहुत बढ़िया काम करता है।
  • अश्वगंधा: लगातार दर्द सहने से शरीर अंदर से टूट जाता है और कमज़ोरी आ जाती है। ऐसे में अश्वगंधा आपकी खोई हुई ताक़त वापस लौटाता है।

राहत पहुँचाने वाली कुछ आयुर्वेदिक थेरेपी

सिर्फ जड़ी-बूटियां ही नहीं, जोड़ों को तुरंत आराम देने और शरीर की गहराई से सफाई करने के लिए आयुर्वेद में कुछ खास तरीके भी मौजूद हैं:

  • अभ्यंग (तेल मालिश): जब खास जड़ी-बूटियों वाले गुनगुने तेल से हल्के हाथों की मालिश होती है, तो सूजे हुए जोड़ों को गज़ब का आराम मिलता है और दर्द काफी हद तक दब जाता है।
  • स्वेदन (भाप देना): जड़ी-बूटियों के पानी से जो भाप दी जाती है, वह जोड़ों की पुरानी जकड़न को खोल देती है। इससे शरीर का भारीपन एकदम गायब सा लगने लगता है।
  • पंचकर्म: आप इसे शरीर की पूरी 'सर्विसिंग' कह सकते हैं। यह अंदर गहराई तक बैठी सारी गंदगी और ज़हरीले तत्वों को शरीर से बाहर फेंकने का काम करता है।

यूरिक एसिड में सहायक आहार

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • पर्याप्त पानी और प्राकृतिक तरल पदार्थ
  • हरी सब्जियां और मौसमी फल
  • मूंग दाल और हल्का सुपाच्य भोजन
  • सीमित मात्रा में घी
  • नारियल पानी और हल्के पेय

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • अत्यधिक मसालेदार भोजन
  • बहुत ज्यादा मांसाहार
  • पैकेट बंद और कृत्रिम खाद्य पदार्थ
  • बहुत ज्यादा मीठे पेय
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

कब डॉक्टर से सलाह लें?

यूरिक एसिड की समस्या को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, खासकर जब लक्षण लगातार बढ़ने लगें।

  • जोड़ों में अचानक बहुत तेज़ दर्द होना
  • सूजन और लालिमा लगातार बढ़ना
  • चलने-फिरने में अत्यधिक परेशानी होना
  • पैर के अंगूठे, घुटनों या टखनों में तीव्र जकड़न महसूस होना
  • बार-बार सूजन और दर्द के दौरे आना
  • बुखार या अत्यधिक कमजोरी महसूस होना
  • आराम और आहार सुधार के बाद भी राहत न मिलना
  • हाथों या पैरों के जोड़ों का आकार बदलता महसूस होना

निष्कर्ष

यूरिक एसिड की समस्या केवल एक लैब रिपोर्ट तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह शरीर के भीतर चल रहे पाचन, रक्त और दोषों के असंतुलन से जुड़ी हो सकती है। आधुनिक दृष्टिकोण इसे शरीर में यूरिक एसिड के बढ़े हुए स्तर और जोड़ों में क्रिस्टल जमाव के रूप में देखता है, जबकि आयुर्वेद इसे वात, पित्त और पाचन कमजोरी से संबंधित गहरी स्थिति मानता है।

यदि शुरुआती संकेतों को समय पर समझकर जीवनशैली, खानपान और दिनचर्या में सुधार किया जाए, तो समस्या को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। लंबे समय तक संतुलन बनाए रखने के लिए केवल लक्षणों पर नहीं, बल्कि शरीर के मूल कारणों पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

यूरिक एसिड बढ़ना केवल उम्र से जुड़ी समस्या नहीं है। आज यह युवा लोगों में भी देखा जा रहा है। इसका संबंध जीवनशैली, खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी से भी होता है। लंबे समय तक असंतुलित दिनचर्या शरीर की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इसे केवल उम्र की समस्या मानना सही नहीं माना जाता।

पर्याप्त पानी न पीने से शरीर से अपशिष्ट पदार्थ ठीक से बाहर नहीं निकल पाते। इससे यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने की संभावना हो सकती है। पानी शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया में मदद करता है। यदि पानी कम लिया जाए तो यह संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए हाइड्रेशन को महत्वपूर्ण माना जाता है।

शुरुआत में यह समस्या मुख्य रूप से जोड़ों में दिखाई देती है, लेकिन इसका असर पूरे शरीर पर भी पड़ सकता है। लंबे समय तक रहने पर यह चलने-फिरने और दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। लगातार दर्द मानसिक थकान का कारण भी बन सकता है। इसलिए इसे केवल स्थानीय समस्या नहीं माना जाता।

लगातार तनाव शरीर के हार्मोन और चयापचय पर असर डाल सकता है। इससे शरीर की संतुलन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। कुछ लोगों में तनाव के साथ दर्द और सूजन अधिक महसूस हो सकती है। मानसिक दबाव शरीर की रिकवरी क्षमता को भी कम कर सकता है। इसलिए तनाव नियंत्रण को महत्वपूर्ण माना जाता है।

कई बार यूरिक एसिड अचानक बढ़ा हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन इसके पीछे कारण धीरे-धीरे बनते हैं। अनियमित भोजन, कम पानी और शारीरिक गतिविधि की कमी इसका कारण हो सकते हैं। शुरुआत में लक्षण हल्के होते हैं जिन्हें लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं। इसलिए यह स्थिति अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे विकसित होती है।

कुछ लोगों में सूजन और दर्द के साथ शरीर में गर्मी या असहजता महसूस हो सकती है। यह शरीर की प्रतिक्रिया का हिस्सा हो सकता है। हालांकि हर व्यक्ति में लक्षण अलग हो सकते हैं। यदि यह स्थिति बार-बार हो, तो इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। सही मूल्यांकन ज़रूरी माना जाता है।

अत्यधिक वज़न शरीर की चयापचय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इससे यूरिक एसिड का संतुलन बिगड़ने की संभावना बढ़ सकती है। कम शारीरिक गतिविधि भी इस स्थिति को बढ़ा सकती है। इसलिए शरीर का संतुलित वज़न बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अप्रत्यक्ष रूप से असर डाल सकता है।

हल्की शारीरिक गतिविधि शरीर के लिए उपयोगी हो सकती है। इससे रक्त संचार और ऊर्जा प्रवाह बेहतर हो सकता है। लेकिन अत्यधिक दर्द की स्थिति में आराम की आवश्यकता भी हो सकती है। इसलिए संतुलित गतिविधि महत्वपूर्ण मानी जाती है। शरीर की स्थिति के अनुसार ही चलना-फिरना चाहिए।

यह स्थिति जीवनशैली और शरीर के संतुलन पर निर्भर करती है। यदि कारणों को नियंत्रित किया जाए तो लक्षणों में सुधार देखा जा सकता है। नियमित देखभाल और सही आदतें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसे लंबे समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है। पूर्ण सुधार व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है।

यदि इसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया जाए, तो जोड़ों की समस्या बढ़ सकती है। दर्द और सूजन बार-बार होने लग सकती है। इससे दैनिक जीवन प्रभावित हो सकता है। शुरुआती संकेतों को समझना जरूरी माना जाता है। समय पर ध्यान देना बेहतर परिणाम दे सकता है।

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