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Pitta Imbalance के 10 Symptoms - गर्मी में आपको पहचानने चाहिए

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

गर्मियां शुरू होते ही शरीर में अजीब सी घबराहट होने लगती है और त्वचा पर एक अजीब सा भारीपन छा जाता है। बाहर की ये झुलसाती गर्मी आपके भीतर छिपे 'पित्त' को इस कदर बढ़ा देती है कि मानो पूरा शरीर अंदर ही अंदर सुलगने लगता है।

यह मामला सिर्फ पसीने या चुभती धूप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साफ इशारा है कि आपके शरीर का मेटाबॉलिज्म और हार्मोन्स पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। शरीर के भीतर सुलगती इस आग को वक्त रहते भांपना और कुदरती तरीकों से इसे शांत करना बेहद जरूरी है, ताकि आप खुद को सेहतमंद और एनर्जेटिक बनाए रख सकें।

गर्मी के मौसम में शरीर के अंदर पित्त बढ़ने पर क्या होता है?

शरीर में पित्त दोष मुख्य रूप से पाचन, ऊष्मा गर्मी और चयापचय Metabolism का नियंत्रण करता है। जब गर्मियों में यह पित्त नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तो अंदरूनी तौर पर शरीर में ये बड़े बदलाव होते हैं:

  • रक्त में अत्यधिक गर्मी Toxins: बढ़ा हुआ पित्त सीधे तौर पर आपके रक्त Blood को अशुद्ध कर देता है। खून में मौजूद यह गर्मी लिवर पर भारी दबाव डालती है और पूरे शरीर में विषैले तत्व फैलने लगते हैं।
  • जठराग्नि का तीक्ष्ण होना Hyperacidity: सामान्य जठराग्नि और पाचन खाना पचाता है, लेकिन भड़का हुआ पित्त पेट में इतना एसिड बनाता है कि वह भोजन को पचाने के बजाय जलाने लगता है, जिससे सीने में आग लग जाती है।
  • हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव: पित्त की गर्मी एंडोक्राइन ग्रंथियों को सीधे प्रभावित करती है। इससे थायरॉइड और अन्य हॉर्मोन्स का संतुलन बिगड़ता है, जिससे अत्यधिक थकान और कमज़ोरी महसूस होती है।
  • नसों में रूखापन: लगातार गर्मी शरीर की प्राकृतिक नमी को सोख लेती है। इससे मस्तिष्क की नसें उत्तेजित हो जाती हैं और व्यक्ति गहरे मानसिक तनाव का शिकार होने लगता है।

गर्मियों में होने वाला पित्त असंतुलन किन प्रकारों का हो सकता है?

पित्त का असंतुलन केवल पेट की गैस या एसिडिटी तक सीमित नहीं होता। शरीर के किस हिस्से में पित्त भड़का है, उसके आधार पर इसे इन मुख्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:

  • पाचक पित्त विकृति Digestive Imbalance: यह सबसे आम प्रकार है जहाँ पित्त पेट और आंतों में भड़कता है। इसमें व्यक्ति को भयंकर एसिड रिफ्लक्स, खट्टी डकारें और पेट में भारी जलन का सामना करना पड़ता है।
  • भ्राजक पित्त विकृति Skin Imbalance: यह पित्त त्वचा के नीचे रहता है। जब यह गर्मियों में असंतुलित होता है, तो पसीने के साथ चेहरे पर अचानक सूजन, लाल चकत्ते और मुहाँसे पूरे शरीर पर उभर आते हैं।
  • साधक पित्त विकृति Mental Imbalance: यह हृदय और मस्तिष्क से जुड़ा है। इसके भड़कने पर व्यक्ति को छोटी-छोटी बातों पर भयंकर गुस्सा आता है और वह एंग्जायटी Anxiety का शिकार हो जाता है।

शरीर में पित्त बिगड़ने के वे 10 मुख्य लक्षण Symptoms क्या हैं?

जब शरीर की यह आग ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाती है, तो वह शांत रहने के बजाय कई तरह के अलार्म बजाती है। गर्मी के मौसम में आपको इन 10 संकेतों को बिल्कुल नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए:

  • सीने और पेट में भयंकर जलन Heartburn: खाना खाने के तुरंत बाद सीने के बीचों-बीच और गले तक तेज़ जलन महसूस होना, जो बढ़ा हुआ एसिड रिफ्लक्स है।
  • त्वचा पर लाल दाने और रैशेज़: तेज़ धूप में जाते ही या पसीना आते ही शरीर पर भयंकर खुजली और इन्फेक्शन वाले लाल दाने Hives उभर आना।
  • अत्यधिक पसीना और दुर्गंध: सामान्य से बहुत ज़्यादा पसीना आना और पसीने में एक बहुत ही तेज़, तीखी और खट्टी बदबू आना, जो ब्लड टॉक्सिन्स का संकेत है।
  • आँखों में लालिमा और जलन: सुबह उठने पर या दिन भर आँखों में तेज़ जलन महसूस होना, जैसे आँखों में रेत पड़ी हो, और उनका लगातार लाल रहना।
  • बालों का तेज़ी से सफेद होना और झड़ना: सिर की त्वचा Scalp में पित्त की गर्मी बढ़ने से बालों की जड़ें कमज़ोर हो जाती हैं और कम उम्र में ही बाल सफेद होकर गिरने लगते हैं।
  • अत्यधिक चिड़चिड़ापन और क्रोध: बिना किसी ठोस कारण के बहुत जल्दी गुस्सा आना, सहनशक्ति Patience का पूरी तरह खत्म हो जाना और बात-बात पर झुंझलाहट होना।
  • मुँह में बार-बार छाले पड़ना Ulcers: पेट की गर्मी मुँह के रास्ते बाहर आती है, जिससे जीभ, होठों और गालों के अंदर बार-बार दर्दनाक छाले पड़ जाते हैं।
  • रात को नींद न आना या बेचैनी: शरीर में गर्मी इतनी बढ़ जाती है कि रात भर करवटें बदलनी पड़ती हैं और व्यक्ति अनिद्रा का शिकार हो जाता है।
  • बार-बार लूज़ मोशन या डायरिया: पित्त की अधिकता के कारण आंतें भोजन को रोक नहीं पातीं, जिससे दिन में कई बार पानी जैसा पतला मल Loose stools आने लगता है।
  • यूरिन पेशाब में तेज़ पीलापन और जलन: पर्याप्त पानी पीने के बावजूद यूरिन का रंग बहुत गहरा पीला आना और पास करते समय मूत्र मार्ग में भयंकर जलन होना।

पित्त को शांत करने में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और इनसे क्या जटिलताएँ होती हैं?

शरीर की गर्मी को तुरंत शांत करने के लालच में लोग अक्सर अज्ञानता में ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो इस आग को बुझाने के बजाय उसमें घी डालने का काम करते हैं:

  • बर्फ का ठंडा पानी पीना: गर्मी से राहत पाने के लिए लोग सीधा फ्रिज का पानी पीते हैं। यह जठराग्नि को बुझाकर शरीर को शॉक देता है, जिससे पित्त और भी ज़्यादा भड़क जाता है और कमज़ोर पाचन का कारण बनता है।
  • एंटासिड्स Antacids की लत: सीने की जलन मिटाने के लिए रोज़ाना गैस की गोलियां खाना पेट के प्राकृतिक एसिड को खत्म कर देता है, जिससे पाचन संबंधी बीमारियों की एक लंबी क्रोनिक सीरीज़ शुरू हो जाती है।
  • खट्टा और मसालेदार भोजन जारी रखना: पित्त के लक्षण दिखने के बावजूद अचार, नींबू, टमाटर और लाल मिर्च का अत्यधिक सेवन करना रक्त को और दूषित कर देता है।
  • गंभीर चर्म रोग का जन्म: इस गर्मी को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करने से यह रक्त में इतनी गहराई तक समा जाती है कि भविष्य में यह सोरायसिस Psoriasis जैसे भयंकर चर्म रोगों का रूप ले लेती है।

पित्त के इस प्रकोप को लेकर आयुर्वेद का क्या गहरा नज़रिया है?

आधुनिक विज्ञान जिसे केवल एसिडिटी या बाहरी एलर्जी मानता है, आयुर्वेद उसे शरीर के तीनों दोषों में से अग्नि तत्व पित्त के भयंकर असंतुलन के रूप में देखता है:

  • पित्त का संचय और प्रकोप: गर्मियों ग्रीष्म ऋतु में स्वाभाविक रूप से पित्त का संचय होता है। जब हम अनुचित आहार लेते हैं, तो यह संचित पित्त प्रकोप अवस्था में आ जाता है और शरीर की नाड़ियों में उबलने लगता है।
  • रक्त धातु की अशुद्धि: पित्त और रक्त का आश्रय-आश्रयी संबंध है। जब पित्त दूषित होता है, तो वह सीधे रक्त धातु को सड़ा देता है, जिससे शरीर में गंभीर दाने, खुजली और फोड़े-फुंसियां निकलते हैं।
  • ओजस Ojas का जलना: भयंकर पित्त शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी ओजस को अंदर ही अंदर जलाकर राख कर देता है, जिससे व्यक्ति हमेशा थका हुआ और बीमार महसूस करता है।
  • वात का जुड़ जाना: कई बार जब पित्त के साथ वात हवा जुड़ जाती है, तो यह आग पूरे शरीर में भयंकर तेज़ी से फैलती है। इसलिए सही समय पर वात दोष को कम करने के उपाय करना भी आवश्यक हो जाता है।

पित्त को तुरंत शांत करने वाला वात-पित्त शामक आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

आपकी थाली में रखा भोजन ही आपकी इस भड़कती हुई अग्नि की सबसे बड़ी दवा या ज़हर बन सकता है। गर्मी में पित्त को शांत करने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट चार्ट का सख़्ती से पालन करें:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - पित्त शांत करने वाले शीतल आहार) क्या न खाएं (नुकसानदायक - पित्त और गर्मी बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) जौ (Barley) का सत्तू, पुराना चावल, ओट्स, गेहूं। बाज़ार का मैदा, किण्वित (Fermented) अनाज, सफेद ब्रेड।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, परवल, खीरा, पुदीना (भाप में पकी हुई)। टमाटर, शिमला मिर्च, बैंगन, तीखी हरी मिर्च, कच्चा लहसुन और प्याज़।
फल (Fruits) ताज़ा नारियल पानी, मीठे सेब, पपीता, तरबूज, अनार, नाशपाती। खट्टे फल (नींबू, संतरा, मौसंबी), कच्चा आम, अनानास, डिब्बाबंद जूस।
पेय पदार्थ (Beverages) सौंफ और धनिए का पानी, पुदीने की चाय, ताज़ी पतली छाछ (मीठी)। चाय, कड़क कॉफी (कैफीन पित्त भड़काता है), शराब, कोल्ड ड्रिंक्स।
मसाले और वसा जीरा, धनिया, थोड़ी मात्रा में हल्दी, और शुद्ध देसी गाय का घी। गरम मसाला, लाल मिर्च पाउडर, रिफाइंड तेल, डीप फ्राई चीज़ें।

पित्त की गर्मी को सोखने वाली जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे कई शीतवीर्य ठंडी तासीर वाले रसायन दिए हैं, जो बिना किसी साइड इफेक्ट के खून की गर्मी को शांत करते हैं और शरीर को अंदरूनी ठंडक देते हैं:

  • शतावरी Shatavari: यह एक बेहतरीन और जादुई कूलिंग हर्ब है। शतावरी Shatavari पेट के भड़के हुए पित्त को शांत करती है और डैमेज हुई कोशिकाओं Cells की प्राकृतिक रूप से मरम्मत करती है।
  • गिलोय Giloy: शरीर की हर तरह की सूजन और बढ़ी हुई गर्मी को कम करने के लिए गिलोय Giloy एक फौलादी रसायन है जो रक्त को भी शुद्ध करता है।
  • ब्राह्मी Brahmi: साधक पित्त दिमाग की गर्मी और गुस्से को शांत करने के लिए ब्राह्मी Brahmi नर्वस सिस्टम को बहुत गहरा रिलैक्सेशन देती है और नींद लाती है।
  • आंवला Amla: यह विटामिन सी का भंडार है और पित्त दोष का सबसे बड़ा नाशक है। यह पेट के एसिड को तुरंत शांत करता है और बालों का झड़ना रोकता है।

पित्त दोष के शमन के लिए बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब पित्त खून और नसों में बहुत गहराई तक उतर जाता है, तो केवल जड़ी-बूटियों के साथ-साथ पंचकर्म की ये विशेष थेरेपीज़ शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • विरेचन थेरेपी Virechana: यह बढ़े हुए पित्त को शरीर से बाहर निकालने की सबसे शक्तिशाली प्रक्रिया है। विरेचन थेरेपी Virechana treatment के ज़रिए आंतों और लिवर से भयंकर एसिड और पित्त को मल मार्ग से बाहर निकाला जाता है, जिससे सीने की जलन तुरंत शांत हो जाती है।
  • तक्रधारा थेरेपी Takradhara: माथे पर औषधीय छाछ की लगातार धारा गिराने की यह तक्रधारा थेरेपी Takradhara नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करती है और स्ट्रेस-इंड्यूस्ड गर्मी व माइग्रेन को रोकती है।
  • अभ्यंग मालिश Abhyanga: ठंडी तासीर वाले तेलों जैसे चंदन या नारियल तेल से की जाने वाली अभ्यंग मालिश Abhyanga Massage त्वचा की लालिमा को शांत करती है और शरीर को गहरी ठंडक देती है।
  • मुख/अंग लेपम Lepam: पित्त के कारण जली हुई त्वचा और चकत्तों पर मुल्तानी मिट्टी, चंदन और गुलाब जल का औषधीय लेप लगाया जाता है, जो आग को तुरंत बुझाता है।

पित्त के प्राकृतिक रूप से शांत होने में कितना समय लगता है?

महीनों से उबल रहे खून और बिगड़े हुए चयापचय को दोबारा शीतल और संतुलित होने में एक अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 हफ्ते: सही आयुर्वेदिक डाइट लौकी, सौंफ का पानी और ठंडी औषधियों के प्रयोग से सीने की जलन, खट्टी डकारें और अत्यधिक पसीना काफी हद तक शांत होने लगेगा।
  • 1-2 महीने: जठराग्नि के सुधरने से रक्त शुद्ध होना शुरू हो जाएगा। आपका गुस्सा शांत होगा, त्वचा के दाने खत्म होंगे और रात की नींद बहुत गहरी और अच्छी आने लगेगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म विरेचन और रसायनों के नियमित प्रभाव से आपके शरीर का मेटाबॉलिक स्विच पूरी तरह से रीसेट हो जाएगा। आप बिना किसी एंटासिड गोली के गर्मी के मौसम का खुलकर आनंद ले सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में बुनियादी अंतर

पित्त के असंतुलन के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है:

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य एसिड को रोकने के लिए एंटासिड्स, त्वचा के रैशेज़ के लिए एंटी-एलर्जिक गोलियां और क्रीम देना। जठराग्नि को संतुलित करना, पित्त का शोधन (विरेचन) करना और रक्त धातु को प्राकृतिक रूप से शीतल करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल पेट में अधिक एसिड बनने या त्वचा की एक बाहरी एलर्जी की स्थानीय (Local) समस्या मानना। इसे अग्निमांद्य, बिगड़े हुए पित्त दोष और पूरे शरीर के चयापचय (Metabolism) का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल अक्सर केवल मिर्च कम करने को कहा जाता है, लेकिन डाइट की तासीर (ठंडी/गर्म) पर कोई विशेष फोकस नहीं होता। खाने में 'पित्त शामक' (ठंडी तासीर वाले) आहार, ध्यान, और तनाव मुक्त दिनचर्या पर गहरा ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर गोलियाँ छोड़ने पर एसिडिटी (Rebound Acidity) और एलर्जी दोगुनी तेज़ी से वापस आ जाती है। शरीर का पाचन और रक्त अंदर से इतना शुद्ध हो जाता है कि बाहरी गोलियों की ज़रूरत हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस पित्त और गर्मी को पूरी तरह शांत कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल इमरजेंसी में जाना ज़रूरी हो जाता है:

  • भयंकर उल्टी में खून आना Hematemesis: अगर आपको लगातार उल्टियां आएं और उसमें ताज़ा लाल खून या कॉफी के रंग जैसा गहरे भूरे रंग का खून दिखाई दे यह पेट में भयंकर अल्सर का संकेत है।
  • चक्कर खाकर बेहोश होना Heat Stroke: अगर तेज़ धूप में आपको अचानक चक्कर आएं, त्वचा एकदम लाल और सूखी पड़ जाए, पसीना आना बंद हो जाए और आप बेहोश हो जाएं।
  • त्वचा और आँखों का गहरा पीला पड़ना Jaundice: अगर शरीर में पित्त लिवर को डैमेज कर दे और आपकी आँखें व पेशाब बहुत गहरे पीले रंग का आने लगे।
  • पेशाब का पूरी तरह बंद हो जाना: अगर भयंकर गर्मी और डिहाइड्रेशन के कारण आपके शरीर में पूरे दिन एक बूंद भी यूरिन पास न हो।

निष्कर्ष

गर्मियों के मौसम में आपके शरीर का उबलना केवल एक मौसमी परेशानी नहीं है; यह आपके शरीर का एक एसओएस SOS अलार्म है कि आपका आंतरिक कूलिंग सिस्टम लिवर और रक्त पूरी तरह से हांफ रहा है। रोज़ाना खाली पेट एंटासिड्स की गोलियां खाकर इस आग को दबाना कोई समाधान नहीं है, यह सिर्फ आपके शरीर के रक्षा तंत्र को कमज़ोर बनाने का एक शॉर्टकट है। पित्त बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि आपको हमेशा जलन और गुस्से के साथ ही जीना पड़ेगा।

अपनी दिनचर्या को बदलें, मसालेदार और खट्टे जंक फूड की आदत छोड़ें, और अपनी डाइट में ठंडी तासीर वाली चीज़ों जैसे जौ का सत्तू, लौकी और धनिए के पानी को शामिल करें। आयुर्वेद की गहराई से इस भड़के हुए पित्त को शांत करें। विरेचन जैसी डिटॉक्स थेरेपी से अपने खून की गंदगी को बाहर निकालें। अपनी कोशिकाओं को स्थायी रूप से प्राकृतिक शीतलता देने और इस गर्मी की बेचैनी से राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार, नींबू स्वभाव में खट्टा (अम्ल) और पचने के बाद पित्त को भड़काने वाला होता है। अगर आपको एसिडिटी और सीने में भयंकर जलन है, तो खाली पेट नींबू पानी आपकी इस आग को और बढ़ा देगा। इसकी जगह आपको सौंफ या धनिए का पानी पीना चाहिए।

पित्त को शांत करने के लिए कभी भी फ्रिज का बर्फ वाला पानी न पिएं, यह आपकी जठराग्नि को मार देता है। हमेशा मिट्टी के घड़े (मटके) का पानी पिएं। घड़े का पानी प्राकृतिक रूप से अल्कलाइन (क्षारीय) होता है जो शरीर की एसिडिटी को तुरंत काटता है।

बिल्कुल। जब आप भयंकर मानसिक तनाव में होते हैं, तो शरीर का नर्वस सिस्टम साधक पित्त को ट्रिगर कर देता है। इससे पेट में एसिड का स्राव तेज़ी से बढ़ जाता है, जिससे बिना कुछ गलत खाए भी आपको सीने में जलन और खट्टी डकारें आने लगती हैं।

जी हाँ। आयुर्वेद में अकाल पलित (कम उम्र में बाल सफेद होना) सीधे तौर पर शरीर में बढ़ी हुई पित्त की गर्मी से जुड़ा है। जब सिर (Scalp) की त्वचा में गर्मी बढ़ती है, तो वह बालों की जड़ों (Follicles) के रंग (Melanin) को जला देती है।

कच्चा टमाटर बहुत अधिक खट्टा और एसिडिक होता है, और कच्चा प्याज़ तासीर में बेहद गर्म होता है। ये दोनों चीज़ें पित्त को भयंकर रूप से बढ़ाती हैं। पित्त प्रकृति वालों को इन दोनों को अपनी डाइट से बिल्कुल हटा देना चाहिए।

जौ का सत्तू गर्मियों में पित्त के लिए एक जादुई और अमृत समान आहार है। इसकी तासीर बेहद ठंडी होती है। यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी को सोख लेता है, पेट को लंबे समय तक भरा रखता है और एसिडिटी को प्राकृतिक रूप से खत्म करता है।

विरेचन आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली डिटॉक्स प्रक्रिया है। यह लिवर और रक्त में गहराई तक जमे हुए पुराने पित्त और टॉक्सिन्स को आंतों के ज़रिए मल से बाहर निकाल फेंकती है। शरीर के शुद्ध होने के बाद त्वचा की एलर्जी और जलन जड़ से शांत हो जाती है।

गर्मियों (ग्रीष्म ऋतु) को छोड़कर, आयुर्वेद में दिन में सोना (दिवास्वप्न) कफ और पित्त दोनों को दूषित करने वाला माना गया है। लेकिन भयंकर गर्मी के मौसम में पित्त प्रकृति वाले लोग दोपहर में थोड़ी देर के लिए झपकी ले सकते हैं ताकि उनका शरीर रिलैक्स रहे।

हाँ। पसीना शरीर का प्राकृतिक मल है। जब खून में पित्त (गर्मी और टॉक्सिन्स) बहुत बढ़ जाता है, तो शरीर उसे पसीने के रास्ते बाहर फेंकता है। इसी बढ़े हुए ब्लड टॉक्सिन्स के कारण पसीने में एक बहुत ही तेज़ और तीखी बदबू आती है।

रात को सोने से पहले आधा गिलास हल्का गुनगुना दूध (अगर दूध पचता हो) या थोड़ा सा ताज़ा नारियल पानी पीना बहुत फायदेमंद है। आप सोने से पहले पैरों के तलवों पर थोड़ा सा शुद्ध गाय का घी या नारियल तेल भी मल सकते हैं, इससे शरीर की गर्मी तुरंत सिर से नीचे आ जाती है और अच्छी नींद आती है।

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