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खाने के बाद तुरंत बैठना Digestion को कैसे प्रभावित करता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

खाने के तुरंत बाद बैठना आम बात है, लेकिन क्या लंच या भारी डिनर करने के बाद भी आप घंटों सोफे या कुर्सी पर जमे रहते हैं? हम अक्सर इसे 'आराम' या 'थकान मिटाना' मानकर इग्नोर कर देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पेट (Stomach) हमारे शरीर का ऊर्जा केंद्र है? जब खाने के तुरंत बाद हम बैठ जाते हैं, तो शरीर के अंदरूनी सिस्टम में पाचन तंत्र (Digestive System) सुस्त पड़ जाता है और आँतों (Intestines) की गति धीमी हो जाती है। यह पेट का भारीपन और गैस असल में शरीर की खामोश चीख-पुकार है जो बता रही है कि खाना पच नहीं रहा, बल्कि पेट में सड़ रहा है। इस खतरे को समय रहते पहचानना ही गंभीर बीमारियों से बचने की चाबी है। इस ब्लॉग में हम गहराई से समझेंगे कि खाने के तुरंत बाद बैठना भविष्य की किन भयंकर बीमारियों की वॉर्निंग (Warning) है, और कैसे आयुर्वेद की मदद से आप खुद को स्वस्थ रख सकते हैं।

खाने के तुरंत बाद बैठना: क्या Digestion को खराब करता है?

अगर खाना खाने के बाद आपको तुरंत सुस्ती आती है और पेट भारी रहता है, तो यह सिर्फ ज़्यादा खाने का असर नहीं है। यह शरीर के अंदरूनी मेटाबॉलिज़्म (Metabolism) के फेल होने का संकेत है।

  • खराब पाचन (Poor Digestion): जब आप खाने के तुरंत बाद बैठ जाते हैं, तो आँतों का प्राकृतिक मूवमेंट (Peristalsis) धीमा हो जाता है। खाना सही से टूट नहीं पाता, जिससे पेट में भारीपन और एसिडिटी (Acidity) हमेशा बनी रहती है।
  • मोटापा और जिद्दी फैट (Obesity): खाना पचने से जो ऊर्जा बननी चाहिए थी, शारीरिक गतिविधि न होने के कारण वह शरीर में बर्न (Burn) नहीं होती। यही बिना जली हुई कैलोरी पेट और कमर के आस-पास जिद्दी फैट के रूप में जमा होने लगती है।
  • इंसुलिन स्पाइक (Insulin Spike): खाने के बाद ब्लड शुगर तेज़ी से बढ़ता है। अगर आप बैठ जाते हैं, तो मांसपेशियाँ उस शुगर का इस्तेमाल नहीं कर पातीं, जिससे भविष्य में डायबिटीज़ (Diabetes) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
  • सीने में जलन (GERD/Heartburn): भरे पेट तुरंत पीछे की तरफ झुक कर बैठने या लेटने से पेट का एसिड वापस भोजन नली (Food Pipe) में आ जाता है, जिससे गले और सीने में भयंकर जलन रहने लगती है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आधुनिक विज्ञान जिसे खराब मेटाबॉलिज़्म या एसिड रिफ्लक्स (Acid Reflux) कहता है, आयुर्वेद ने उसे हज़ारों साल पहले ही शरीर की 'अग्नि' (पाचन शक्ति) और 'समान वात' के बिगड़ने के रूप में बहुत गहराई से समझाया था।

  • मंदाग्नि का भयंकर प्रकोप: आयुर्वेद मानता है कि पेट में एक प्राकृतिक 'जठराग्नि' होती है जो भोजन पकाती है। खाने के बाद शारीरिक गतिविधि रोक देने से यह अग्नि मंद (कमज़ोर) पड़ जाती है और खाना पचने की जगह पेट में ही सड़ने लगता है।
  • समान वात में रुकावट: पेट और आँतों के मूवमेंट को 'समान वात' कंट्रोल करता है। लगातार बैठे रहने से इस वात की गति रुक जाती है, जिससे भयंकर गैस, कब्ज़ (Constipation) और ब्लोटिंग (Bloating) की समस्या शुरू हो जाती है।
  • आम (Toxins) से स्रोतस में रुकावट: बिना पचा हुआ खाना जब शरीर में 'आम' (ज़हर) बनाता है, तो वह पूरे शरीर की नलियों (स्रोतस) को ब्लॉक कर देता है। इसी ज़हरीले टॉक्सिन के कारण भारीपन, सुस्ती और कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है।

जीवा आयुर्वेद का समग्र प्रबंधन क्या है?

हम आपको सिर्फ एंटासिड (Antacids) की गोली देकर या चूरन खिलाकर इन चेतावनियों को दबाने का काम नहीं करते। हमारा लक्ष्य आपके शरीर की असली पुकार को सुनकर खराब पाचन की जड़ को हमेशा के लिए ठीक करना है।

  • नाड़ी से बीमारी की पहचान: हम लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि नाड़ी परीक्षा से शरीर के अंदर चल रहे वात, पित्त और कफ के असली असंतुलन को पकड़ते हैं कि आँतों में सिकुड़न है या अग्नि कमज़ोर है।
  • अग्नि दीपन और डिटॉक्स: सबसे पहले आपकी मेटाबॉलिक अग्नि को मज़बूत किया जाता है और आँतों में चिपके हुए 'आम' (गंदगी) को जड़ी-बूटियों के ज़रिए बाहर निकाला जाता है।
  • धातु पोषण (Rejuvenation): जब आँतें साफ हो जाती हैं, तब पाचन तंत्र को प्राकृतिक ताकत देने के लिए विशेष रसायन औषधियाँ दी जाती हैं।

डाइजेशन सुधारने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें सुस्त पड़े पाचन को सक्रिय करने और शरीर में मेटाबॉलिज़्म बढ़ाने के लिए बहुत ही जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं।

  • त्रिफला (Triphala): यह आँतों को साफ करने और जमे हुए 'आम' (टॉक्सिन्स) को खुरच कर बाहर निकालने की सबसे बेहतरीन औषधि है, जो बाउल मूवमेंट (Bowel Movement) को तेज़ी से सुधारती है।
  • अजवाइन और हींग (Carom Seeds & Asafoetida): खाने के बाद रुकी हुई गैस को पास करने और वात दोष को तुरंत शांत करने के लिए यह एक जादुई रक्षक है, जो पेट का फूलना बंद करता है।
  • चित्रक (Chitrak): यह पेट की 'पाचन अग्नि' को प्रज्वलित करता है। मंदाग्नि के शिकार लोगों के लिए यह भोजन को तुरंत ऊर्जा में बदलने का काम करता है।
  • सोंठ और जीरा (Dry Ginger & Cumin): ये शरीर के अंदरूनी मेटाबॉलिज़्म को तेज़ करते हैं और खाने को पचाकर गैस्ट्रिक जूस (Gastric Juices) के स्राव को तुरंत बढ़ा देते हैं।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी शरीर को कैसे नया बनाती है?

जब पेट में 'आम' और गैस बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है और हर खाने के बाद पेट गुब्बारे की तरह फूलने लगता है, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी शरीर की डीप क्लीनिंग करती है।

  • उद्वर्तन (Udvartana): हर्बल पाउडर से शरीर की सूखी मालिश करने से मेटाबॉलिज़्म तुरंत तेज़ होता है। यह बैठे रहने से जमे हुए फैट को पिघलाता है और शरीर में हल्कापन लाता है।
  • स्वेदन (Swedana): पेट और पूरे शरीर पर हर्बल भाप (Steam) देने से आँतों में जमा गंदगी पसीने के रास्ते बाहर निकल जाती है, जिससे पाचन तंत्र बिना किसी रुकावट के काम करने लगता है।
  • बस्ती (Basti): आयुर्वेद में वात और पेट के रोगों का आधा इलाज 'बस्ती' को माना गया है। औषधीय तेलों या काढ़े का एनीमा देकर बड़ी आँत (Colon) से सारा फँसा हुआ मल और गैस बाहर निकाल दी जाती है।

पाचन सुधारने के लिए अग्नि-वर्धक डाइट प्लान

आप जो खाते हैं और कैसे खाते हैं, वह सीधे आपकी पाचन अग्नि को तय करता है। खराब डाइजेशन की इस खामोश बीमारी को रोकने के लिए सही डाइट का पालन करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

आहार का सिद्धांत:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): सात्विक, ताज़ा और आसानी से पचने वाला भोजन लें। खाने के तुरंत बाद कम से कम 100 कदम (शतपावली) ज़रूर चलें या वज्रासन में बैठें।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): बहुत ज़्यादा भारी, कच्चा सलाद और राजमा-छोले जैसा गरिष्ठ भोजन जिसे पचाने के लिए शरीर को ज़्यादा मेहनत करनी पड़े। खाने के तुरंत बाद सोना या कुर्सी पर झुक कर बैठना वर्जित है।

प्राकृतिक पोषण:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): छाछ (Buttermilk) में भुना जीरा, पपीता, मूंग की दाल और गाय का शुद्ध घी शामिल करें।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): ज़्यादा मैदा, रिफाइंड तेल, और जंक फूड जो आँतों में चिपक कर 'आम' बनाते हैं।

विरुद्ध आहार से बचें:

  • क्या अपनाएँ (अनुशंसित): संतुलित और संगत (Compatible) खाद्य संयोजन अपनाएँ।
  • किनसे परहेज़ करें (वर्जित): दूध के साथ नमकीन चीज़ें या ठंडे के साथ गर्म खाना जो सीधे जठराग्नि को बुझा देता है।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

जब आप इन छोटे-छोटे संकेतों को इग्नोर करके किसी बड़ी बीमारी (जैसे फैटी लिवर या क्रोनिक एसिडिटी) का शिकार हो जाते हैं, तब हम आपकी परेशानी की जड़ तक पहुँचने के लिए गहराई से जाँच करते हैं।

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले पल्स चेक करके यह गहराई से समझना कि आपके अंदर 'वात', 'पित्त', और 'कफ' का स्तर कितना बिगड़ चुका है और पाचन कहाँ रुक रहा है।
  • शारीरिक मूल्याँकन: डॉक्टर आपके पेट का कड़कपन, जीभ पर सफेद परत (टॉक्सिन्स का निशान), और वज़न को बहुत बारीकी से चेक करते हैं ताकि मंदाग्नि का सही पता चल सके।
  • पाचन का विश्लेषण: यह देखना कि आपका पेट साफ रहता है या नहीं, डकारें कैसी आती हैं, क्योंकि कब्ज़ और मंदाग्नि ही बीमारियों को पैदा करते हैं।
  • लाइफस्टाइल चेक: आपके काम करने के तरीके (लगातार कुर्सी पर बैठे रहना), तनाव और खाने की टाइमिंग को बहुत गहराई से समझा जाता है, क्योंकि बीमारी का ट्रिगर यहीं है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी जादुई हाज़मे की गोली नहीं है जो एक रात में गैस खत्म कर दे। शरीर की अंदरूनी मशीनरी और आँतों को दोबारा रिपेयर होने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपका पेट साफ होगा; गैस कम होने से शरीर में प्राकृतिक हल्कापन आने लगेगा। ब्लोटिंग कम होगी और सुस्ती दूर होने लगेगी।
  • 1 से 3 महीने तक: पाचन सुधरने से खाने के बाद भारीपन काफी हद तक कम हो जाएगा। एसिडिटी खत्म होने लगेगी और शरीर में नई ऊर्जा (Energy) आएगी।
  • 3 से 6 महीने और उससे अधिक: आपकी पूरी आंतें अंदर से डिटॉक्स हो जाएँगी। जठराग्नि पूरी तरह पुष्ट हो जाएगी और आप खराब पाचन के डर से मुक्त होकर एक स्वस्थ जीवन जी सकेंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

खराब पाचन के इलाज के लिए सही चिकित्सा पद्धति का चुनाव करना बहुत ज़रूरी है। आइए समझते हैं कि प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को लेकर दोनों दृष्टिकोण कैसे अलग हैं।

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद चिकित्सा
इलाज का मुख्य लक्ष्य एसिड दबाना और पेट साफ़ करने के लिए एंटासिड/लैक्सेटिव्स देना अग्नि संतुलित करना और ‘आम’ निकालकर पाचन तंत्र को मज़बूत करना
शरीर को देखने का नज़रिया एसिडिटी, कब्ज़, फैटी लिवर को अलग-अलग बीमारियाँ मानना ‘अग्नि’ और ‘वात दोष’ के असंतुलन को एक साथ समझना
डाइट और जीवनशैली की भूमिका दवाइयों पर निर्भरता, सिर्फ़ मसाले कम करने की सलाह अग्नि-वर्धक सात्विक आहार, वज्रासन, और जड़ी-बूटियाँ मुख्य आधार
लंबा असर दवा बंद करते ही गैस/एसिडिटी दोबारा, साइड इफेक्ट्स का जोखिम आँतों को मज़बूत कर दीर्घकालिक संतुलन और आराम

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

खाने के बाद भारीपन और गैस को सिर्फ लाइफस्टाइल की वज़ह मानकर इग्नोर न करें। अगर आपको शरीर में ये गंभीर संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

  • लगातार उल्टियाँ और मतली (Nausea): अगर खाने के बाद हमेशा ऐसा महसूस हो कि खाना गले में आ रहा है या उल्टियाँ होने लगें, तो यह गंभीर एसिड रिफ्लक्स (GERD) का संकेत है।
  • मल में खून आना: अगर कब्ज़ के साथ-साथ मल त्यागते समय खून आए या मल बिल्कुल काला हो, तो यह आँतों में अल्सर (Ulcer) का अलार्म है।
  • पेट में भयंकर दर्द: अगर खाना खाने के कुछ देर बाद पेट के ऊपरी हिस्से या दाईं तरफ असहनीय दर्द हो, तो यह गॉलब्लैडर (Gallbladder) में पथरी का संकेत हो सकता है।
  • बिना वज़ह तेज़ी से वज़न गिरना: अगर आप ठीक से खा रहे हैं लेकिन फिर भी शरीर कमज़ोर हो रहा है और वज़न गिर रहा है, तो इसका मतलब है आँतें खाने से पोषण नहीं सोख पा रही हैं।

निष्कर्ष

हमारा शरीर एक बेहतरीन मशीन है जो हर रुकावट का संकेत देता है। खाने के तुरंत बाद पेट का फूलना या भारीपन महज़ भारी खाने का असर नहीं, बल्कि यह धीमी पड़ी जठराग्नि, खराब पाचन और वात दोष के बेक़ाबू होने का स्पष्ट अलार्म है। जब हम इन संकेतों को इग्नोर करते हैं और रोज़ाना खाने के बाद घंटों बैठे रहते हैं, तो हम असल में अपनी बीमारी को अंदर ही अंदर मोटापे या फैटी लिवर तक पहुँचने का मौक़ा दे रहे होते हैं। आयुर्वेद आपको शरीर की भाषा समझने का बेहद सुरक्षित रास्ता दिखाता है। चित्रक और त्रिफला जैसी जड़ी-बूटियों, रात को हल्का भोजन और खाने के बाद वज्रासन को अपनाकर आप अपने पाचन तंत्र को दोबारा तेज़ कर सकते हैं। अपने पेट की पुकार को सुनें, खाने के बाद थोड़ी वॉक करें, और जीवा आयुर्वेद के साथ अपने शरीर को हमेशा के लिए ऊर्जावान और स्वस्थ बनाएँ।

FAQs

खाने के बाद बैठने से शारीरिक गतिविधि शून्य हो जाती है, जिससे आँतों का मूवमेंट धीमा पड़ जाता है। खाना पचने की बजाय किण्वित (Ferment) होने लगता है, जिससे गैस बनती है और पेट फूलता है।

आयुर्वेद के अनुसार, खाने के तुरंत बाद कम से कम 100 कदम (शतपावली) टहलना चाहिए या 5-10 मिनट के लिए वज्रासन में बैठना चाहिए। इससे पाचन अग्नि तेज़ होती है।

बिल्कुल! आयुर्वेद के अनुसार, जब पेट की अग्नि कमज़ोर होती है, तो पेट में बनने वाला ज़हरीला आम (Toxins) खून के ज़रिए पूरे शरीर के जोड़ों में पहुँच जाता है, जिससे दर्द और जकड़न होती है।

लगातार बैठे रहने और ग़लत खानपान से जब समान वात बढ़ता है, तो यह आँतों की गति को अनियमित कर देता है। इससे गैस, कब्ज़ और पेट में मरोड़ जैसी समस्याएँ शुरू हो जाती हैं।

जी हाँ! भरे पेट लेटने से एसिड वापस चेस्ट की तरफ आता है जिससे भयंकर हार्टबर्न (Heartburn) होता है। लगातार ऐसा करने से स्लीप एप्निया और हृदय पर दबाव बढ़ने का खतरा रहता है।

त्रिफला और अजवाइन पाचन के लिए सबसे बेहतरीन हैं। खाने के बाद गुनगुने पानी से अजवाइन और काला नमक लेने से रुकी हुई गैस बाहर निकलती है और वात दोष शांत होता है।

जी हाँ! खाने के तुरंत बाद बहुत तेज़ी से ठंडा पानी पीने से पेट की अग्नि तुरंत बुझ जाती है। यह फैट को जमा देता है और पाचन प्रक्रिया को पूरी तरह से रोक देता है।

सोंठ (सूखा अदरक) और जीरा शरीर की अग्नि को तेज़ करते हैं। इनकी तासीर गर्म होती है, जो आँतों में जमे आम को पिघलाती है और पाचक रसों के स्राव को तुरंत बढ़ाती है।

जी हाँ! बस्ती और विरेचन जैसी पंचकर्म थेरेपी आँतों और लिवर से सारे ज़हरीले तत्वों को बाहर निकाल देती हैं। यह पेट की सूजन को दूर कर पाचन तंत्र को पूरी तरह नया बना देती हैं।

सही आयुर्वेदिक डाइट (सुपाच्य भोजन), खाने के बाद टहलने की आदत और जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल से कुछ ही हफ्तों में पेट का भारीपन कम होने लगता है। पाचन को पूरी तरह सुधरने में 3 से 6 महीने लग

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