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Pregnancy में acidity और constipation क्यों common होते हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 06 Jul, 2026
  • category-iconUpdated on 06 Jul, 2026
  • category-iconWomen's Health
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अक्सर हम सोचते हैं कि प्रेगनेंसी का मतलब सिर्फ एक नन्ही सी जान का पेट में पलना और एक खूबसूरत सा 'प्रेगनेंसी ग्लो' है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि इस खूबसूरत सफर के पीछे गर्भवती महिला को किन शारीरिक परेशानियों से गुज़रना पड़ता है? सुबह उठते ही सीने में भयंकर जलन, कुछ भी खाने पर खट्टी डकारें आना, और वॉशरूम में घंटों कब्ज़ से जूझना ये आज के समय में लगभग हर गर्भवती महिला की आम शिकायतें हैं। सिर्फ एक एंटासिड की गोली खाकर या कोई चूर्ण फांक कर इस समस्या को दबा देने से परेशानी खत्म नहीं होती। शरीर के अंदर असली बदलाव तो तब समझ आता है जब हम प्रेगनेंसी में होने वाली इस एसिडिटी और कब्ज़ की जड़ को समझते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि यह कोई बीमारी या वहम नहीं है, बल्कि आपके यह शरीर द्वारा गर्भावस्था के अनुरूप किए जा रहे स्वाभाविक बदलावों का परिणाम है।

प्रेगनेंसी के दौरान शरीर और पाचन तंत्र में होने वाले बदलाव

जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसके शरीर में शरीर में कई महत्वपूर्ण हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, आपके शरीर में 'प्रोजेस्टेरोन' नाम के हॉर्मोन का स्तर तेज़ी से बढ़ता है। प्रोजेस्टेरोन का मुख्य काम गर्भाशय की मांसपेशियों को आराम देना है ताकि बच्चा सुरक्षित रहे, लेकिन इसका असर पूरे शरीर की मांसपेशियों पर पड़ता है, जिसमें आपकी आंतें भी शामिल हैं। जिस तरह किसी बहती हुई नदी का बहाव अचानक धीमा कर दिया जाए, ठीक उसी तरह आंतों की गति धीमी पड़ जाती है। खाना आंतों में सामान्य से ज़्यादा देर तक रुकता है, जिससे शरीर ज़्यादा से ज़्यादा पानी सोख लेता है और मल कठोर होकर कब्ज़ का रूप ले लेता है।

इसके साथ ही, जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, आपका गर्भाशय फैलने लगता है। यह फैलता हुआ गर्भाशय आपके पेट और आंतों पर नीचे से भारी दबाव डालता है। इस दबाव और रिलैक्स हो चुके वाल्व (पेट और भोजन नली के बीच का हिस्सा) के कारण, पेट का एसिड आसानी से ऊपर की तरफ भोजन नली में वापस आ जाता है। यही कारण है कि थोड़ा सा खाने के बाद भी आपको सीने में तेज़ जलन और खट्टी डकारें महसूस होती हैं।

क्या सिर्फ एंटासिड या चूर्ण लेने से समस्या जड़ से खत्म हो जाती है? 

जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कई बार महिलाएं सोचती हैं कि जब भी जलन हो, बस एक एंटासिड सिरप पी लो या कब्ज़ होने पर कोई भी ओवर-द-काउंटर लैक्सेटिव (पेट साफ करने वाली दवा) खा लो। प्रेगनेंसी में बिना डॉक्टर की सलाह के इन चीज़ों का ज़्यादा इस्तेमाल करने का मतलब सिर्फ इतना है कि आपने अपने शरीर के अलार्म को थोड़ी देर के लिए बंद कर दिया है। लगातार लैक्सेटिव लेने से आंतों की अपनी प्राकृतिक काम करने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है और कुछ एंटासिड्स आयरन और अन्य पोषक तत्वों के अवशोषण (Absorption) को प्रभावित कर सकते हैं। अगर आप इस क्रॉनिक समस्या में यह सोचकर काम चला रही हैं कि 'डिलीवरी के बाद सब ठीक हो जाएगा', तो आप अपने पाचन तंत्र को और भी सुस्त बना रही हैं। समस्या आपके शरीर में नहीं, बल्कि इस दौरान होने वाले बदलावों के प्रति हमारी लापरवाही और खानपान की गलत आदतों में है।

प्रेगनेंसी की इस लगातार एसिडिटी और कब्ज़ से आपकी सेहत पर क्या असर पड़ता है?

जब हम बिना सोचे-समझे इस पाचन संबंधी समस्या को नज़रअंदाज़ करते हैं या इसे 'प्रेगनेंसी का नॉर्मल हिस्सा' मानकर सहते रहते हैं, तो शरीर में कई और तकलीफदेह बदलाव होते हैं

  • सीने और गले में भयंकर जलन: पेट का एसिड बार-बार ऊपर आने से गले और सीने में लगातार जलन रहती है, जिससे खाना निगलने में भी दर्द और असुविधा महसूस होती है।
  • बवासीर का खतरा: कब्ज़ के कारण मल त्यागते समय लगातार ज़ोर लगाने और पेल्विक हिस्से पर बढ़ते दबाव के कारण नसों में सूजन आ जाती है, जो प्रेगनेंसी में बवासीर का एक बहुत बड़ा कारण बनती है।
  • भूख न लगना और कुपोषण का डर: जब पेट हमेशा भरा-भरा और भारी महसूस होता है, तो खाने की इच्छा खत्म हो जाती है। इसके चलते माँ और बच्चे दोनों को पर्याप्त पोषण मिलने में रुकावट आ सकती है।
  • नींद की कमी और चिड़चिड़ापन: रात के समय एसिडिटी का बढ़ना और पेट साफ न होने की बेचैनी रातों की नींद छीन लेती है। पर्याप्त आराम न मिलने से अगले दिन भयंकर थकावट, सिरदर्द और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन होने लगता है।

प्राचीन आयुर्वेद प्रेगनेंसी की इस समस्या को किस नज़रिए से देखता है?

आयुर्वेद के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान शरीर में 'दोषों' (वात, पित्त, कफ) का संतुलन स्वाभाविक रूप से बदलता है। प्रेगनेंसी में कब्ज़ मुख्य रूप से बढ़े हुए 'वात दोष', विशेषकर 'अपान वात' (जो शरीर से मल-मूत्र बाहर निकालने का काम करता है) के असंतुलन के कारण होता है। वात का गुण सूखापन है, जो आंतों की नमी को सोख लेता है। दूसरी ओर, एसिडिटी बढ़े हुए 'पित्त दोष' और कमज़ोर 'जठराग्नि' (पाचन अग्नि) का परिणाम है।

आयुर्वेद मानता है कि जब पेट में गर्भ का आकार बढ़ता है, तो जठराग्नि पर दबाव पड़ता है और वह मंद (कमज़ोर) हो जाती है। जब पाचन अग्नि कमज़ोर होती है, तो भारी खाना पच नहीं पाता औरयुर्वेद के अनुसार, अपचित भोजन 'आम' बनने में योगदान दे सकता है, जिसे पाचन संबंधी असुविधाओं से जोड़ा जाता है। आयुर्वेद सिर्फ दवाइयां खाने की सलाह नहीं देता, बल्कि 'वात' को शांत करने के लिए स्निग्ध (चिकनाई युक्त) आहार, पित्त को शांत करने के लिए ठंडी तासीर वाली चीज़ें, और जठराग्नि को वापस संतुलित करने वाली आदतों पर ज़ोर देता है।

पाचन को सुधारने और एसिडिटी-कब्ज़ मिटाने वाली बेहतरीन आदतें

प्रकृति और सही दिनचर्या में कुछ ऐसी बेहतरीन आदतें छिपी हैं, जो प्रेगनेंसी में इन समस्याओं को काफी हद तक कम कर सकती हैं

  • थोड़ा-थोड़ा और कई बार खाएं (Small, Frequent Meals): एक ही बार में पेट भर कर खाने के बजाय, अपने दिन भर के भोजन को 5-6 छोटे हिस्सों में बाँट लें। इससे कमज़ोर पाचन तंत्र पर एक साथ बोझ नहीं पड़ता और पेट में एसिड का निर्माण भी नियंत्रित रहता है।
  • फाइबर और सही हाइड्रेशन का तालमेल: अपनी डाइट में ओट्स, दलिया, ताज़े फल और हरी पत्तेदार सब्ज़ियां शामिल करें। लेकिन याद रखें, सिर्फ फाइबर खाना काफी नहीं है; इसके साथ दिन भर में कम से कम 8-10 गिलास पानी ज़रूर पिएं। पानी के बिना फाइबर कब्ज़ को और बढ़ा सकता है।
  • खाने के बाद तुरंत न लेटें: दोपहर या रात का खाना खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर लेटने से गुरुत्वाकर्षण के कारण एसिड सीधे गले तक आ जाता है। खाने के बाद कम से कम 30-40 मिनट सीधा बैठें या बहुत ही धीमी गति से टहलें।
  • बाईं करवट सोना (Left-Side Sleeping): रात को सोते समय हमेशा बाईं करवट सोने की आदत डालें। शारीरिक बनावट के कारण, बाईं करवट सोने से पेट का एसिड भोजन नली में वापस नहीं जा पाता और प्लेसेंटा तक रक्त संचार भी बेहतरीन होता है।

वो आम गलतियाँ जो प्रेगनेंसी में एसिडिटी और कब्ज़ को और बढ़ा देती हैं

हम अक्सर प्रेगनेंसी में अनजाने में कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो परेशानी बढ़ा देता है:

  • 'दो लोगों के लिए खाना' वाला वहम: यह एक बहुत बड़ा मिथक है कि गर्भवती महिला को दो लोगों के बराबर खाना चाहिए। ज़रूरत से ज़्यादा खाने (Overeating) से पहले से ही जगह की कमी से जूझ रहे पेट पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जो भयंकर एसिडिटी का कारण बनता है।
  • मसालेदार और जंक फूड की क्रेविंग: चटपटा, बहुत ज़्यादा तला-भुना, कैफीन (कॉफी/चाय), या बाहर का जंक फूड खाने से पित्त दोष तुरंत भड़क जाता है, जिससे सीने में आग लग जाती है।
  • शारीरिक गतिविधि बिल्कुल बंद कर देना: प्रेगनेंसी कोई बीमारी नहीं है। अगर डॉक्टर ने बेड रेस्ट नहीं बोला है, तो दिन भर एक ही जगह पर बैठे या लेटे रहने से आंतें पूरी तरह सुस्त हो जाती हैं और कब्ज़ पुरानी (Chronic) हो जाती है।
  • खाली पेट सप्लीमेंट्स लेना: कई बार आयरन और कैल्शियम की गोलियां खाली पेट या बहुत कम पानी के साथ लेने से भयंकर कब्ज़ और पेट में जलन होती है। इन्हें हमेशा डॉक्टर की सलाह के अनुसार सही समय पर लें।

दवाइयों पर निर्भर रहने की जगह इन आसान तरीकों से पाएं प्राकृतिक राहत

आप कुछ बहुत ही आसान और प्राकृतिक तरीके अपनाकर अपने पाचन तंत्र को वापस आराम पहुँचा सकती हैं:

  • रात की भीगी हुई मुनक्का या प्रून (Prunes): रात को 4-5 मुनक्का या प्रून (सूखे आलूबुखारे) पानी में भिगो दें और सुबह खाली पेट इन्हें चबाकर खाएं और पानी पी लें।यह कई महिलाओं में कब्ज़ से राहत दिलाने में मदद कर सकता है। 
  • नारियल पानी और सौंफ का अर्क: सीने में तेज़ जलन होने पर ठंडा दूध घूंट-घूंट करके पिएं या ताज़ा नारियल पानी लें। सौंफ का हल्का गुनगुना पानी कुछ लोगों में एसिडिटी की असुविधा कम करने में मदद कर सकता है। और खाना आसानी से पचता है।
  • हल्का प्रीनेटल योगा (Prenatal Yoga): किसी विशेषज्ञ की देखरेख में तितली आसन या हल्की स्ट्रेचिंग करने से पेल्विक एरिया में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और आंतों की फंसी हुई गैस आसानी से बाहर निकल जाती है।
  • गाय का घी (Cow's Ghee): रात को सोते समय एक कप हल्के गर्म दूध में आधा चम्मच शुद्ध गाय का घी मिलाकर पीने से आंतों में चिकनाई आती है और सुबह पेट आसानी से साफ होता है (इसे डॉक्टर की सलाह के बाद ही शुरू करें, खासकर अगर वज़न ज़्यादा हो)।

प्रेगनेंसी के दौरान डॉक्टर से तुरंत संपर्क करने की आवश्यकता कब पड़ सकती है? 

आराम करने और खानपान सुधारने के बाद भी अगर शरीर में ये लक्षण दिखें, तो आपको तुरंत अपने गायनेकोलॉजिस्ट (Gynecologist) के पास जाना चाहिए

  • जब कब्ज़ इतनी भयंकर हो जाए कि कई दिनों तक मल त्याग न हो और पेट में तेज़ असहनीय दर्द उठने लगे।
  • मल के साथ खून आने लगे या मल का रंग बिल्कुल काला (Black tarry) हो जाए।
  • एसिडिटी और उल्टी इतनी ज़्यादा हो कि आप पानी का एक घूंट भी न पचा पा रही हों और डिहाइड्रेशन के कारण चक्कर आने लगें।
  • सीने में होने वाला दर्द हाथ या जबड़े तक जाने लगे (इसे सिर्फ एसिडिटी समझ कर नज़रअंदाज़ न करें, यह ब्लड प्रेशर या हृदय संबंधी समस्या भी हो सकती है)।

निष्कर्ष

हमेशा याद रखें कि प्रेगनेंसी एक बेहद खूबसूरत लेकिन शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण सफर है। प्रकृति ने महिला के शरीर को एक नया जीवन बनाने की अद्भुत शक्ति दी है, और इस बड़े काम के लिए शरीर को अपने कई सिस्टम्स में बदलाव करने पड़ते हैं। एसिडिटी और कब्ज़ उसी बदलाव का हिस्सा हैं। आप दिन भर में क्या खाती हैं, कितना पानी पीती हैं, और कैसे सोती हैं, इसका सीधा असर आपके और आपके होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसलिए, सिर्फ दवाइयां खाकर इन समस्याओं को टालने की लापरवाही न करें। अपने शरीर की आवाज़ को सुनें। उसे सही पोषण दें, आयुर्वेद के अनुसार सही और सात्विक आहार चुनें, और खुद को शारीरिक रूप से सक्रिय रखें। जब आपका पाचन तंत्र अंदर से पूरी तरह से शांत, हाइड्रेटेड और तनाव-मुक्त रहेगा, तो सही आहार, पर्याप्त पानी, नियमित गतिविधि और डॉक्टर की सलाह के साथ इन समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। और मातृत्व के इस सफर का पूरी ऊर्जा और खुशी के साथ आनंद उठा पाएंगी।


References

Treating constipation during pregnancy - PMC

FOGSI-Focus_Constipation-in-Women.pdf

Constipation in Pregnancy and Breastfeeding

Training Manual on Care During Pregnancy and Child Birth

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बढ़ने से पेट और भोजन नली के बीच का वाल्व ढीला हो जाता है, जिससे एसिड ऊपर आ सकता है।

हार्मोनल बदलाव आंतों की गति को धीमा कर देते हैं, जिससे मल सख्त हो सकता है।

हाँ, ये गर्भावस्था की बहुत आम समस्याएँ हैं और अधिकांश महिलाओं को किसी न किसी स्तर पर होती हैं।

हाँ, पर्याप्त पानी और फाइबर का सही संतुलन कब्ज़ कम करने में मदद करता है।

कुछ एंटासिड डॉक्टर की सलाह पर सुरक्षित हो सकते हैं, लेकिन स्वयं दवा लेना उचित नहीं है।

हाँ, कई महिलाओं में आयरन सप्लीमेंट्स कब्ज़ की समस्या बढ़ा सकते हैं।

छोटे-छोटे भोजन, नारियल पानी, सौंफ का पानी और हल्का भोजन मददगार हो सकते हैं।

हल्की वॉक और प्रीनेटल योगा आंतों की गतिविधि बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं।

अगर मल में खून आए, कई दिनों तक मल त्याग न हो या लगातार उल्टी हो तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।

अधिकतर मामलों में हार्मोन और शारीरिक दबाव सामान्य होने पर राहत मिलने लगती है।

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