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बच्चे को बढ़ती उम्र में Joint Pain - Growing Pain या Juvenile Arthritis?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 26 May, 2026
  • category-iconUpdated on 12 Jun, 2026
  • category-iconChild Health
  • blog-view-icon5029

अक्सर रात के समय बच्चे अचानक रोते हुए उठते हैं और अपने पैरों, पिंडलियों या घुटनों में दर्द की शिकायत करते हैं। ज़्यादातर माता-पिता इसे दिन भर की भागदौड़ की थकान या बच्चे की बढ़ती उम्र का एक सामान्य हिस्सा मानकर पैरों को दबा देते हैं या कोई तेल मल देते हैं। बचपन से ही हमें यह समझाया जाता है कि बच्चों की हड्डियाँ जब बढ़ती हैं, तो ऐसा दर्द होना बहुत ही आम बात है।

लेकिन जब यह दर्द रात की थकान से निकलकर सुबह की जकड़न में बदल जाए, और बच्चा सुबह उठने पर बिस्तर से ठीक से पैर न रख पाए या लंगड़ा कर चलने लगे, तो यह कोई सामान्य शारीरिक विकास नहीं है। यह आपके बच्चे के नाज़ुक शरीर के अंदर छिपे 'जुवेनाइल अर्थराइटिस' (Juvenile Arthritis) का एक खौफनाक अलार्म है। जब तक आप एक साधारण ग्रोइंग पेन (Growing Pain) और इस ऑटोइम्यून (Autoimmune) बीमारी के बीच का अंतर नहीं समझेंगे, तब तक दर्द दबाकर मूल कारण को नज़रअंदाज़ करना लंबे समय में जोड़ों को नुकसान पहुँचा सकता है। 

बढ़ती उम्र में बच्चों को जोड़ों का दर्द क्यों होता है?

बच्चों के शरीर का विकास बहुत तेज़ी से होता है, लेकिन जब उनके पैरों या जोड़ों में लगातार दर्द रहने लगे, तो इसके पीछे शरीर के अंदर ये खामोश और गंभीर गतिविधियाँ ज़िम्मेदार हो सकती हैं:

  • मांसपेशियों और हड्डियों का तेज़ी से बढ़ना: सामान्य ग्रोइंग पेन के मामले में, बच्चों की हड्डियाँ (Bones) उनके आस-पास की मांसपेशियों और टेंडन्स की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ती हैं। इस असमान विकास के कारण मांसपेशियों में खिंचाव आता है, जिससे रात के समय दर्द महसूस होता है।
  • इम्यून सिस्टम का भटकना (Autoimmune Attack): जुवेनाइल अर्थराइटिस के मामले में, बच्चे का अपना ही डिफेंस सिस्टम (Immune System) भ्रमित हो जाता है। वह बाहरी कीटाणुओं से लड़ने के बजाय जोड़ों की अंदरूनी सुरक्षा परत (Synovium) पर हमला कर देता है, जिससे वहाँ सूजन और लालिमा आ जाती है।
  • पोषण की भारी कमी: आज की जीवनशैली में बच्चों को सही धूप (Vitamin D) और कैल्शियम नहीं मिल पाता। हड्डियों के विकास के लिए ज़रूरी कच्चे माल की इस कमी से हड्डियाँ खोखली और दर्दनाक हो जाती हैं।

बच्चों में होने वाले इस दर्द के मुख्य प्रकार क्या हैं?

बच्चों के पैरों या जोड़ों का दर्द केवल एक तरह का नहीं होता। इसके पीछे छिपे कारणों और लक्षणों के आधार पर मेडिकल साइंस इसे मुख्य रूप से इन अलग-अलग प्रकारों में बाँटता है:

  • सामान्य ग्रोइंग पेन (Growing Pains): यह दर्द 3 से 12 साल के बच्चों में होता है। यह हमेशा मांसपेशियों (Muscles) में होता है, जोड़ों (Joints) में नहीं। यह दर्द आमतौर पर शाम या रात को होता है और अक्सर दोनों पैरों (Bilateral) में एक साथ महसूस होता है। सुबह तक बच्चा बिल्कुल सामान्य हो जाता है।
  • ओलिगोआर्टिकुलर जेआईए (Oligoarticular JIA): यह जुवेनाइल इडियोपैथिक अर्थराइटिस (JIA) का सबसे आम प्रकार है। इसमें शरीर के एक से लेकर चार बड़े जोड़ों (जैसे घुटने या टखने) में सूजन और दर्द होता है। यह अक्सर लड़कियों में ज़्यादा देखा जाता है।
  • पॉलीआर्टिकुलर जेआईए (Polyarticular JIA): इसमें शरीर के पाँच या उससे ज़्यादा जोड़ों (छोटे और बड़े दोनों) में एक साथ दर्द और सूजन आती है। इसमें हाथों और पैरों की उंगलियों के जोड़ भी सूजकर कड़क हो जाते हैं।
  • सिस्टमिक जेआईए (Systemic JIA): यह सबसे खतरनाक प्रकार है। इसमें जोड़ों के दर्द और सूजन के साथ-साथ बच्चे को तेज़ बुख़ार आता है और शरीर पर हल्के गुलाबी रंग के चकत्ते (Rashes) पड़ जाते हैं। यह अंदरूनी अंगों को भी डैमेज कर सकता है।

किन संकेतों से पहचानें कि यह सामान्य 'ग्रोइंग पेन' नहीं है?

ग्रोइंग पेन में बच्चा सुबह उठकर दौड़ने लगता है, लेकिन अगर दर्द ऑटोइम्यून (Arthritis) है, तो शरीर कुछ ऐसे खामोश अलार्म बजाता है जिन्हें माता-पिता को तुरंत पहचानना चाहिए:

  • सुबह की जकड़न (Morning Stiffness): बच्चा जब सुबह सोकर उठता है, तो उसके जोड़ इतने कड़क होते हैं कि वह ठीक से चल नहीं पाता और लंगड़ाता (Limping) है। 1-2 घंटे बीतने और शरीर गर्म होने के बाद ही वह ठीक से चल पाता है।
  • जोड़ों में लालिमा और सूजन (Swelling & Heat): ग्रोइंग पेन में कभी सूजन नहीं आती। अगर बच्चे के घुटने, टखने या कलाई में सूजन आ गई है और छूने पर वह हिस्सा गर्म महसूस हो रहा है, तो यह सीधा अर्थराइटिस का संकेत है।
  • खेल-कूद से अचानक दूरी बनाना: जो बच्चा हमेशा दौड़ता-भागता था, वह अचानक से सीढ़ियाँ चढ़ने में रोने लगे और पूरा दिन क्रोनिक फटीग से भरा रहे।
  • अकारण बुखार और वज़न गिरना: दर्द के साथ-साथ बच्चे को बार-बार बुखार आना और उसका वज़न बिना किसी कारण के तेज़ी से कम होना, जो शरीर के अंदर चल रहे भारी इन्फेक्शन या सूजन को दर्शाता है।

बच्चों के इस दर्द को लेकर माता-पिता क्या भयंकर गलतियाँ करते हैं?

बच्चे की तकलीफ देखकर माता-पिता अक्सर घबराहट में या अज्ञानता में ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं, जो बच्चे के नर्वस सिस्टम और जोड़ों को हमेशा के लिए डैमेज कर देते हैं:

  • दर्द को 'बहाना' समझकर नज़रअंदाज़ करना: कई बार जब बच्चा स्कूल जाने के समय दर्द की शिकायत करता है, तो माता-पिता इसे उसका बहाना मानकर ज़बरदस्ती स्कूल भेज देते हैं, जिससे डैमेज हो रहे जोड़ों पर और ज़्यादा दबाव पड़ता है।
  • पेनकिलर्स (Painkillers) का अंधाधुंध इस्तेमाल: रात को बच्चा रोए तो उसे तुरंत भारी पेनकिलर या एंटी-इंफ्लेमेटरी सीरप पिला देना। ये दवाइयाँ बच्चे की नाज़ुक किडनी और लिवर को खराब कर सकती हैं और बीमारी की असली जड़ को छुपा देती हैं।
  • मालिश का गलत तरीका: अर्थराइटिस (सूजन वाले जोड़ों) पर ज़ोर से तेल मलना या मालिश करना बीमारी को आग की तरह भड़का देता है। सूजे हुए जोड़ पर कभी भी रगड़ (Friction) नहीं लगानी चाहिए।

आयुर्वेद बच्चों के इस 'जॉइंट पेन' और ऑटोइम्यून अटैक को कैसे समझता है?

आधुनिक चिकित्सा जिसे केवल जेनेटिक्स और एंटीबॉडीज़ का हमला मानती है, आयुर्वेद उसे बच्चे के शरीर में 'आम' (Toxins), कमज़ोर 'जठराग्नि' और वात दोष के असंतुलन के रूप में गहराई से समझता है:

  • अग्निमांद्य और 'आम' का निर्माण: बच्चों का पाचन तंत्र नाज़ुक होता है। जब वे अत्यधिक जंक फूड या मैदे वाली चीज़ें खाते हैं, तो खाना पचने के बजाय सड़कर एक चिपचिपा ज़हर 'आम' (Toxins) बनाता है।
  • आमवात (Amavata) का रूप लेना: जब यह 'आम' रक्त के ज़रिए शरीर में घूमता है और वात दोष के साथ मिलकर जोड़ों (Joints) की खाली जगह में जाकर फँस जाता है, तो यह वहाँ सूजन और दर्द पैदा करता है। इसे ही आयुर्वेद में आमवात (Arthritis) कहा गया है।
  • अस्थि धातु का क्षय: ग्रोइंग पेन के मामले में, जब शरीर तेज़ी से बढ़ता है, तो 'अस्थि धातु' (हड्डियों) को सही पोषण न मिलने से वात भड़क जाता है, जो मांसपेशियों में रूखापन और रात के समय ऐंठन (Cramps) पैदा करता है।

बच्चों की हड्डियाँ मज़बूत करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

बच्चे के विकास को सही दिशा देने और जोड़ों से सूजन उतारने के लिए आपको अपनी आयुर्वेदिक डाइट में 'आम' बढ़ाने वाले पदार्थों को तुरंत हटाना होगा। यह डाइट चार्ट बच्चे के लिए दवा का काम करेगा:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - हड्डियाँ मज़बूत और वात शांत करने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - सूजन और 'आम' बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, मूंग दाल की खिचड़ी, ओट्स, ज्वार, दलिया। मैदा, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद नूडल्स, भारी बिस्कुट और पिज़्ज़ा।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (हड्डियों और नसों के लिए सबसे बड़ा अमृत)। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा बाज़ार का ट्रांस फैट, डीप-फ्राइड जंक फूड।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, गाजर, कद्दू, पालक (हल्के तेल में अच्छी तरह पकी हुई)। कच्चा सलाद भारी मात्रा में, बहुत ज़्यादा आलू, कटहल, भिंडी।
फल (Fruits) उबला हुआ सेब (Stewed Apple), पपीता, मीठे अनार, मुनक्का। खट्टे फल (अगर सूजन ज़्यादा हो), बिना मौसम के ठंडे फल, डिब्बाबंद जूस।
पेय पदार्थ (Beverages) हल्दी वाला दूध (रात को घी के साथ), धनिया-जीरे का पानी, गुनगुना पानी। बर्फ का ठंडा पानी (पाचन के लिए ज़हर है), कोल्ड ड्रिंक्स, ज़्यादा चॉकलेट शेक।

बच्चों के जोड़ों और इम्युनिटी को ताकत देने वाली जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे रसायन दिए हैं जो बच्चों के नाज़ुक शरीर को बिना कोई साइड-इफेक्ट पहुँचाए उनके जोड़ों को सक्षम बनाते हैं और इन्फेक्शन को दूर रखते हैं:

  • गिलोय: यह बच्चों के ऑटोइम्यून (JIA) दर्द के लिए एक लाभदायक रसायन है। गिलोय शरीर से टॉक्सिन्स (आम) को बाहर निकालती है, इम्यूनिटी को स्मार्ट बनाती है और जोड़ों की लालिमा व सूजन को शांत करती है।
  • अश्वगंधा: जब बच्चा दर्द के कारण रात को सो नहीं पाता और दिन भर कमज़ोर व मानसिक तनाव में रहता है, तो अश्वगंधा मांसपेशियों (Muscles) को ताकत देता है और अकारण एंग्जायटी को कम करके उसे ऊर्जावान बनाता है।
  • शल्लकी (Shallaki): यह आयुर्वेद का सबसे बेहतरीन प्राकृतिक दर्द-निवारक (Natural Painkiller) है। शल्लकी की गोंद (Resin) जोड़ों के बीच की चिकनाई को बढ़ाती है और सुबह की जकड़न (Morning stiffness) को प्राकृतिक रूप से खत्म कर देती है।
  • बला (Bala): नाम के अनुसार ही यह शरीर में 'बल' (ताकत) लाती है। बच्चों के ग्रोइंग पेन में जब नसों की कमज़ोरी हावी हो जाती है, तो बला नर्वस सिस्टम और हड्डियों को गहरा पोषण देती है।

बच्चों का दर्द खींचने वाली सुरक्षित आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब बच्चे के जोड़ों में सूजन हो और वह पैर ज़मीन पर न रख पा रहा हो, तो पंचकर्म की ये सुरक्षित बाहरी थेरेपीज़ उसे तुरंत आराम पहुँचाती हैं:

  • लेपनम (Lepam): अगर जोड़ों में सूजन, गर्मी और लालिमा है (जुवेनाइल अर्थराइटिस की स्थिति), तो वहाँ मालिश नहीं की जाती। इसके बजाय दर्द और सूजन को खींचने वाली ठंडी औषधीय जड़ी-बूटियों का लेप (Paste) लगाया जाता है।
  • अभ्यंग मालिश: अगर बच्चे को केवल 'ग्रोइंग पेन' (मांसपेशियों का दर्द) है, तो रात को सोने से पहले महानारायण या क्षीरबला जैसे औषधीय तेलों से पिंडलियों और पैरों की हल्की मालिश की जाती है। यह वात को शांत करके तुरंत नींद लाती है।
  • बस्ती कर्म (Enema): आयुर्वेद में वात और आमवात (Arthritis) को जड़ से उखाड़ने के लिए बस्ती को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। बच्चों में मात्रा बस्ती (Medicated Oil Enema) देने से जोड़ों का दर्द और वज़न का बढ़ना प्राकृतिक रूप से कंट्रोल होता है।
  • पिंड स्वेद (Pinda Sweda): जब 'आम' पच चुका हो और केवल जकड़न बची हो, तो औषधीय पोटली (Herbal bags) को गर्म तेल में डुबोकर जोड़ों की सिकाई की जाती है, जिससे बच्चा तुरंत चलने-दौड़ने लगता है।

तीव्र सूजन और गर्माहट वाले जोड़ों में तेज़ मालिश से बचा जाता है; थेरेपी रोग की अवस्था देखकर तय की जाती है। 

बच्चों के प्राकृतिक रूप से रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

सालों से जमा हुए टॉक्सिन्स (आम) और भड़के हुए इम्यून सिस्टम को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और 'आम-पाचक' डाइट से बच्चे की जठराग्नि सुधरेगी। रात के समय होने वाला दर्द कम होगा और सुबह की जकड़न में गज़ब की राहत मिलेगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म (बस्ती) और रसायनों के प्रभाव से जोड़ों की लालिमा और सूजन (Swelling) पूरी तरह उतरने लगेगी। बच्चा लंगड़ाना बंद कर देगा और एक्टिव होने लगेगा।
  • 5-6 महीने: बच्चे का इम्यून सिस्टम और अस्थि धातु पूरी तरह से पोषित हो जाएंगे। आप बिना किसी स्टेरॉयड के बच्चे में एक प्राकृतिक, स्वस्थ और दौड़ते-भागते बचपन का अनुभव करेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

बच्चों के जोड़ों के दर्द (ग्रोइंग पेन बनाम जेआईए) के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द और सूजन को दबाने के लिए भारी NSAIDs (पेनकिलर्स) और इम्यूनोसप्रेसेंट दवाइयाँ देना। आम' को पचाना, वात को शांत करना और 'बस्ती' व रसायनों द्वारा प्राकृतिक रूप से ओजस (इम्यूनिटी) को एजुकेट करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक ला-इलाज ऑटोइम्यून एरर या हड्डियों के विकास का मैकेनिकल दर्द मानना। इसे कमज़ोर पाचन, 'आमवात' और दूषित अस्थि धातु का एक संपूर्ण सिंड्रोम (Syndrome) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट पर कोई खास ज़ोर नहीं दिया जाता, केवल दर्द के दौरान फिजियोथेरेपी की आम सलाह दी जाती है। डाइट में जंक फूड बंद करके सात्विक भोजन, शुद्ध गाय का घी, और अग्नि को सुधारने पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर दवाइयाँ छोड़ने पर दर्द और सूजन फिर से भयंकर रूप में वापस आ जाते हैं (Rebound effect) और इम्युनिटी गिरती है। शरीर का मेटाबॉलिज़्म और जोड़ अंदर से इतने मज़बूत हो जाते हैं कि दर्द प्राकृतिक रूप से हमेशा के लिए शांत हो जाता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालाँकि आयुर्वेद बच्चे की इम्यूनिटी को सुधारकर इस बीमारी को जड़ से उखाड़ सकता है, लेकिन अगर आपको बच्चे के शरीर में ये बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • लगातार तेज़ बुख़ार (High Fever): अगर जोड़ों के दर्द के साथ बच्चे को कई दिनों तक तेज़ बुख़ार रहे और शरीर पर गुलाबी चकत्ते (Rashes) आ जाएं (यह सिस्टमिक जेआईए का गंभीर संकेत है)।
  • जोड़ का पूरी तरह लॉक (Lock) हो जाना: अगर बच्चा अपने घुटने या कोहनी को बिल्कुल भी मोड़ या सीधा न कर पाए, और वह हिस्सा एकदम कड़क हो जाए।
  • असामान्य रूप से लंगड़ाना (Severe Limping): अगर बच्चा सुबह के अलावा दिन भर लंगड़ा कर चले और किसी एक पैर पर बिल्कुल भी वज़न न डाल पाए।
  • आँखों में लालिमा (Uveitis): जुवेनाइल अर्थराइटिस का असर अक्सर आँखों पर पड़ता है। अगर बच्चे की आँखें बिना किसी कारण के लाल रहने लगें और रोशनी चुभने लगे (Photophobia), तो यह आंखों की रोशनी छीन सकता है।

निष्कर्ष

अपने बच्चे के शरीर को एक नाज़ुक कली की तरह समझें जो अभी खिल रही है। जब हम उसके विकास के सालों में उसे जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक्स और स्क्रीन की लत दे देते हैं, तो हम अनजाने में उसकी जठराग्नि (Metabolism) को बुझा रहे होते हैं। 

इन स्टेरॉयड्स और पेनकिलर्स के ज़हरीले चक्रव्यूह से बच्चे को बाहर निकालें। बाहर के पैकेटबंद जंक फूड को छोड़कर हमेशा ताज़ा और सुपाच्य भोजन दें। उसकी डाइट में मुनक्का, ओट्स और हल्दी वाला दूध शामिल करें। गिलोय, शल्लकी और अश्वगंधा जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की बस्ती व अभ्यंग मालिश से उसके सूजे हुए जोड़ों को प्राकृतिक राहत देकर नया जीवन दें। बचपन के इस दर्द को उसकी नियति न बनने दें, और उसके भविष्य को स्थायी रूप से एक्टिव बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं। ग्रोइंग पेन हमेशा मांसपेशियों (Muscles) में होता है, विशेषकर पिंडलियों (Calves), जांघों के सामने (Thighs) या घुटनों के पीछे। अगर दर्द घुटने के जोड़ के ठीक ऊपर है या टखने (Ankle) के जोड़ में है और वहाँ सूजन है, तो वह ग्रोइंग पेन नहीं, बल्कि अर्थराइटिस या कोई अन्य इंजरी है।

बिल्कुल नहीं। जेआईए (JIA) एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जहाँ बच्चे का अपना ही इम्यून सिस्टम भ्रमित होकर जोड़ों पर हमला करता है। यह किसी वायरस या बैक्टीरिया की तरह एक बच्चे से दूसरे बच्चे में साथ खेलने या खाने से नहीं फैलती।

अगर बच्चे को केवल ग्रोइंग पेन (मांसपेशियों की ऐंठन) है, तो हल्की गर्म सिकाई से आराम मिलेगा। लेकिन अगर दर्द अर्थराइटिस का है (जोड़ों में सूजन और लालिमा है), तो गर्म सिकाई से वहाँ का पित्त (गर्मी) भड़क जाएगा और दर्द कई गुना बढ़ जाएगा। ऐसे में सिकाई से बचना चाहिए।

ग्रोइंग पेन में बच्चे को खेलने से नहीं रोकना चाहिए। लेकिन अगर बच्चे को जेआईए (अर्थराइटिस) है और जोड़ों में भयंकर सूजन (Flare-up) है, तो उस समय भारी खेल (जैसे दौड़ना या कूदना) बंद कर देना चाहिए ताकि जोड़ों पर और डैमेज न हो। सूजन कम होने पर हल्की एक्टिविटी (जैसे स्विमिंग) बहुत फायदेमंद होती है।

दूध (हड्डी के पोषण के लिए) अच्छा है, लेकिन केवल कैल्शियम देने से काम नहीं चलेगा। अगर बच्चे की जठराग्नि कमज़ोर है, तो वह कैल्शियम को सोख (Absorb) ही नहीं पाएगा। आयुर्वेद जठराग्नि को सुधारने पर ज़ोर देता है ताकि भोजन से मिलने वाला प्राकृतिक कैल्शियम हड्डियों (अस्थि धातु) तक पहुँच सके।

हाँ। कई बच्चों में जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं और आयुर्वेद के माध्यम से उनकी इम्यूनिटी (ओजस) को सही दिशा (Educate) मिलती है, वे इस बीमारी से पूरी तरह बाहर (Remission) आ जाते हैं। सही लाइफस्टाइल और आयुर्वेदिक डाइट से यह बीमारी दोबारा लौटकर नहीं आती।

बच्चों में यूरिक एसिड बढ़ना (Gout) बहुत ही दुर्लभ (Rare) है। बच्चों में जोड़ों के दर्द का मुख्य कारण आमतौर पर चोट, ग्रोइंग पेन, जुवेनाइल अर्थराइटिस (JIA) या कोई बैक्टीरियल इन्फेक्शन होता है। फिर भी, अगर शंका हो तो डॉक्टर ब्लड टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।

शत-प्रतिशत। आयुर्वेद के अनुसार ठंडक शरीर में वात दोष को भड़काती है और नसों व मांसपेशियों को सिकोड़ देती है। यही कारण है कि ग्रोइंग पेन और अर्थराइटिस दोनों का दर्द रात को एसी में सोने से या सर्दियों के मौसम में सबसे ज़्यादा भयंकर हो जाता है।

अगर बच्चा सुबह उठकर लंगड़ा रहा है, तो उसे तुरंत ज़बरदस्ती चलने या दौड़ने के लिए न कहें। उसे थोड़ी देर रिलैक्स होने दें। अगर घुटने पर कोई भारी सूजन (Swelling) नहीं है, तो महानारायण तेल से बहुत ही हल्के हाथों से मालिश कर सकते हैं और तुरंत आयुर्वेदिक डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

बिल्कुल। पैकेटबंद फूड में प्रिजर्वेटिव्स, भारी मात्रा में रिफाइंड चीनी और मैदा होता है। यह शरीर में जाकर सीधा इन्फ्लेमेशन (सूजन) पैदा करता है और इम्यूनिटी को गिरा देता है। अर्थराइटिस के बच्चों में जंक फूड खाते ही अगले दिन जोड़ों की सूजन और दर्द (Flare-up) तुरंत बढ़ जाता है।

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