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Piles का Operation करवाया, फिर भी वापस आ गया — क्यों?

Information By Dr. Keshav Chauhan

​लेज़र सर्जरी (Laser Surgery) या स्टेपलर (Stapler) ऑपरेशन का इस्तेमाल बवासीर (Piles) की समस्या में काफी आम है। ये सर्जरी मलाशय की सूजी हुई नसों (मस्सों) को काटकर निकाल देती हैं या जला देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि उसकी परेशानी खत्म हो गई है और बीमारी हमेशा के लिए जड़ से साफ हो गई है। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि सर्जरी के 1-2 साल बाद या कब्ज़ की दवाइयों का असर खत्म होने के तुरंत बाद फिर से टॉयलेट में भयंकर दर्द, मल के साथ खून आने और नए मस्से बनने की समस्या शुरू हो जाती है। यह बीमारी पहले से भी भयंकर रूप में वापस आ जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे मल का कड़ा होना, सिर्फ मलहम और सिरप पर निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण—शरीर के अंदर मौजूद बिगड़ा हुआ 'अपान वात', कमज़ोर पाचन तंत्र और टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना बहुत ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और आँतों को बार-बार सर्जरी की चीर-फाड़ से बचाया जा सके।

​बवासीर (Piles) की समस्या क्या है और सर्जरी के बाद यह क्यों भड़कती है?

बवासीर (Hemorrhoids) गुदा (Anus) और मलाशय (Rectum) के निचले हिस्से में सूजी हुई नसें होती हैं। एक सामान्य इंसान में मल त्याग एक सहज प्रक्रिया है, लेकिन जब कोई व्यक्ति खराब डाइट लेता है और पानी कम पीता है, तो मल कड़ा (Hard stool) हो जाता है। इस कड़े मल को बाहर निकालने के लिए जब बहुत ज़्यादा ज़ोर (Straining) लगाया जाता है, तो गुदा की बारीक नसों पर भारी दबाव पड़ता है और वे सूजकर मस्सों का रूप ले लेती हैं।

ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर सिर्फ उन फूले हुए मस्सों को काटकर बाहर निकालते हैं। लेकिन वे उस 'मशीन' (पाचन तंत्र और आँतों) को ठीक नहीं करते जो कब्ज़ और कड़ा मल बना रही है। सर्जरी के बाद जब व्यक्ति फिर से वही गलत खान-पान शुरू करता है, तो मल फिर से कड़ा हो जाता है। इस बार ज़ोर लगाने पर जो नसें बच गई थीं, वे सूज जाती हैं और नई बवासीर (Recurrence) बन जाती है। बिना सोचे-समझे बार-बार ऑपरेशन कराना गुदा के रास्ते को सिकोड़ सकता है।

​गुदा और मल मार्ग की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

पाचन तंत्र की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से इन बीमारियों को देखा जाता है:

  • ​खूनी बवासीर (Internal Piles): ये मलाशय के अंदर होती हैं। इनमें आमतौर पर दर्द नहीं होता, लेकिन मल त्यागते समय टप-टप करके ताज़ा खून आता है।
  • ​बादी बवासीर (External Piles): ये गुदा के बाहर होती हैं। इनमें खून नहीं आता, लेकिन मल त्यागते समय और बाद में भयंकर चुभन, दर्द और खुजली होती है।
  • ​फिशर (Anal Fissure): कड़े मल के कारण गुदा के रास्ते में चीरा या कट (Tear) लग जाना, जिससे घंटों तक जलन और टीस उठती है।
  • ​भगंदर (Fistula): गुदा के अंदर एक इन्फेक्शन की वजह से एक नई नली (Tunnel) बन जाना, जिससे लगातार मवाद (Pus) और खून बहता रहता है।

​सर्जरी के बाद Piles वापस आने के लक्षण और संकेत

ऑपरेशन के बाद अगर ये लक्षण फिर से लौट आएँ, तो यह बवासीर के वापस लौटने का संकेत है:

  • ​मल के साथ खून आना: टॉयलेट पॉट में या पेपर पर ताज़ा लाल खून का दिखाई देना।
  • ​गुदा के बाहर गाँठ (Lump): मल त्यागते समय या बैठे हुए गुदा के पास मांस का एक नया टुकड़ा (मस्सा) महसूस होना।
  • ​भयंकर जलन और टीस: मल त्यागने के बाद घंटों तक गुदा में आग लगने जैसी जलन और सुई चुभने जैसा दर्द होना।
  • ​लगातार कब्ज़ रहना: पेट साफ न होना और टॉयलेट में बहुत ज़्यादा समय लगना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

​बार-बार Piles बनने (Recurrence) के मुख्य कारण क्या हैं?

सर्जरी के बाद भी बार-बार यह समस्या होने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • ​जठराग्नि का कमज़ोर होना: आयुर्वेद के अनुसार जब 'अग्नि' (पाचन) कमज़ोर होती है, तो खाना ठीक से पचता नहीं और 'आम' (गंदगी) बनता है, जो आँतों की गति को धीमा कर कब्ज़ (Constipation) पैदा करता है।
  • ​अपान वात का बिगड़ना: नीचे की ओर बहने वाली वायु (Apana Vata) के बिगड़ने से मल सूखकर पत्थर जैसा कड़ा हो जाता है और नसों को फाड़ देता है।
  • ​गलत डाइट (Low Fiber Diet): सर्जरी के बाद भी मैदे वाली चीज़ें, चाय-कॉफी और फास्ट फूड का ज़्यादा सेवन आँतों को सुखा देता है।
  • ​ज़्यादा देर तक बैठे रहना: लगातार एक जगह कुर्सी या टॉयलेट सीट पर बैठकर मोबाइल देखने से गुदा की नसों पर भारी गुरुत्वाकर्षण (Gravity) और दबाव पड़ता है।

​बार-बार सर्जरी कराने के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

अगर स्थायी समाधान (Permanent Solution) न मिले और बार-बार ऑपरेशन कराया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • ​मल पर नियंत्रण खत्म होना (Fecal Incontinence): बार-बार सर्जरी से गुदा को बंद रखने वाली मांसपेशियों (Sphincters) डैमेज हो जाती हैं, जिससे मल और गैस अपने आप निकल जाती हैं।
  • ​गुदा मार्ग का सिकुड़ना (Anal Stricture): ऑपरेशन के घाव भरने पर जो स्कार (Scar) टिश्यू बनते हैं, वे मल के रास्ते को इतना संकरा कर देते हैं कि टॉयलेट पास करना भयंकर दर्दनाक हो जाता है।
  • ​खून की भारी कमी (Anemia): रोज़-रोज़ ब्लीडिंग होने से शरीर में खून बहुत कम हो जाता है, जिससे हमेशा कमज़ोरी और चक्कर आते हैं।

​आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से बवासीर सिर्फ सूजी हुई नसें नहीं हैं। आयुर्वेद में इसे 'अर्श' (Arsha) कहा जाता है और इसे इंसान के शरीर का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। यह माना जाता है कि जब गलत खान-पान और जीवनशैली के कारण जठराग्नि कमज़ोर हो जाती है, तो शरीर के तीनों दोष (विशेषकर वात) बिगड़ जाते हैं। यह बिगड़ा हुआ वात मल को कड़ा कर देता है और 'गुदा वली' (नसों की परतों) में रुकावट पैदा कर मस्से बना देता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं आँतों में 'आम' तो नहीं जमा हो गया है, जिसने मल त्यागने की प्राकृतिक प्रक्रिया को बिगाड़ दिया है। जब तक यह रूखापन और कब्ज़ रहेगा, सर्जरी के बाद भी बवासीर बार-बार बनती रहेगी। आयुर्वेद में बस मस्सों को काटना मकसद नहीं है, वे चाहते हैं कि बीमारी का स्थायी समाधान हो, पाचन तंत्र इतना मज़बूत बने और मल इतना मुलायम हो कि नसों पर कोई दबाव पड़े ही नहीं।

​जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • ​कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति की प्रकृति और बवासीर का प्रकार (बादी या खूनी) अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • ​लक्षणों की पहचान: दर्द के समय, ब्लीडिंग की मात्रा और खुजली की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • ​पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पिछली सर्जरी की रिपोर्ट और कब्ज़ के लिए इस्तेमाल किए गए सीरप का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • ​वातावरण और डाइट: मरीज़ के पानी पीने की आदत, चाय-कॉफी की लत और भारी काम करने की आदत को परखा जाता है।
  • ​सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का विश्लेषण करने के बाद ही जठराग्नि को सुधारने और आँतों को साफ करने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

​Permanent Solution के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में मस्सों को सुखाने, दर्द-ब्लीडिंग रोकने और पाचन मज़बूत करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • ​हरड़ (Haritaki): आयुर्वेद में हरड़ को आँतों का सबसे अच्छा दोस्त माना गया है। यह कब्ज़ को जड़ से खत्म करती है और मल को मुलायम (Soft) बनाकर अपान वात को सही दिशा देती है।
  • ​सूरण / जिमीकंद (Suran): इसका नाम ही 'अर्शोघ्न' (बवासीर का नाश करने वाला) है। यह नसों की सूजन को खींचता है और मस्सों को प्राकृतिक रूप से सुखा देता है।
  • ​नागकेसर (Nagkesar): खूनी बवासीर (Bleeding Piles) में यह सबसे शक्तिशाली औषधि है। यह नसों से बहने वाले खून को कुछ ही दिनों में पूरी तरह रोक देती है।
  • ​त्रिफला (Triphala): यह आँतों की सफाई करता है, 'आम' (टॉक्सिन्स) को पकाता है और शरीर के दोषों को संतुलित करता है।

​आयुर्वेदिक पंचकर्म और प्राकृतिक सिकाई

  • ​गहरी सफाई और दर्द निवारण: जब बवासीर बहुत दर्दनाक हो और व्यक्ति टॉयलेट जाने से डरता हो, तो जीवा आयुर्वेद में विरेचन और अवगाह स्वेद जैसी प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है।
  • ​विरेचन (Virechana): औषधीय जड़ी-बूटियों से पेट साफ कराया जाता है। इससे शरीर का बढ़ा हुआ पित्त और आँतों की गंदगी बाहर निकल जाती है।
  • ​अवगाह स्वेद (Sitz Bath): एक टब में गुनगुना औषधीय काढ़ा (जैसे त्रिफला का पानी) भरकर मरीज़ को उसमें बैठाया जाता है। इससे गुदा की मांसपेशियों का तनाव तुरंत खुलता है, सूजन घटती है और भयंकर टीस में जादुई आराम मिलता है।

​Piles के रोगी के लिए शुद्ध आहार (कौन सी चीज़ें बिल्कुल Avoid करनी चाहिए)

​जीवा आयुर्वेद के अनुसार, बवासीर के बाद Permanent Solution के लिए आँतों को हाइड्रेटेड रखना और मल को कड़ा करने वाली चीज़ों से बचना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है:

​कौन सी चीज़ें बिल्कुल Avoid करनी चाहिए?

  • ​लाल मिर्च और तीखा खाना: हरी और लाल मिर्च सीधे तौर पर मस्सों को जला देती हैं, जिससे टॉयलेट के बाद घंटों तक भयंकर आग लगती है। इसे पूरी तरह बंद कर दें।
  • ​मैदा और फास्ट फूड: पिज़्ज़ा, सफेद ब्रेड, बर्गर और मैदे से बनी चीज़ों में फाइबर बिल्कुल नहीं होता। ये आँतों में सीमेंट की तरह चिपककर मल को पत्थर बना देती हैं।
  • ​राजमा, कटहल और भारी चीज़ें: जो चीज़ें पचने में बहुत भारी होती हैं (जैसे उड़द की दाल, छोले), वे भयंकर वात (गैस) बनाती हैं और आँतों पर दबाव डालती हैं।
  • ​रेड मीट और जंक फूड: मांसाहारी भोजन पचने में बहुत समय लेता है। इससे आँतों में सड़न और कब्ज़ पैदा होती है, जो बवासीर को तेज़ी से भड़काती है।
  • ​चाय और कॉफी: कैफीन आँतों को डिहाइड्रेट (सूखा) कर देता है। सुबह खाली पेट चाय पीने से आँतों का प्राकृतिक मल त्यागने का सिस्टम खराब हो जाता है।

​क्या खाएँ?

  • ​ताज़ा छाछ (Buttermilk): खाने के बाद एक गिलास छाछ में भुना जीरा और अजवायन डालकर पिएँ। यह आयुर्वेद में बवासीर की सबसे बेहतरीन दवा बताई गई है।
  • ​पपीता और फाइबर वाली सब्ज़ियाँ: पका हुआ पपीता, लौकी, तोरई, परवल और रेशेदार (Fibrous) फल मल को तुरंत मुलायम करते हैं।
  • ​गाय का घी और दूध: रात को सोते समय एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच शुद्ध गाय का घी डालकर पिएँ। यह आँतों को अंदर से चिकनाहट देता है, जिससे सुबह मल बिना किसी ज़ोर के आसानी से पास हो जाता है।

​जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है?

यहाँ मरीज़ की जाँच सिर्फ ऊपर-ऊपर से लक्षण देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है।

  • ​सबसे पहले आपकी परेशानी, दर्द के समय और पिछली सर्जरी के अनुभव को आराम से सुना जाता है।
  • ​मल के प्रकार (कड़ा, सूखा या चिपचिपा) और ब्लीडिंग की मात्रा को बारीकी से समझा जाता है।
  • ​आपके खाने-पीने, पानी पीने की आदतों और टॉयलेट में लगाए जाने वाले समय को गहराई से समझा जाता है।
  • ​आपकी नींद, बैठे रहने की ड्यूटी और कब्ज़ की स्थिति को परखा जाता है।
  • ​नाड़ी जाँच से शरीर की प्रकृति (Prakriti) और बिगड़े हुए वात-पित्त को जाना जाता है।

​इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो बवासीर को जड़ से खत्म कर सके।

​जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

​ठीक होने में कितना समय लगता है?

ठीक होने का समय मुख्य रूप से बवासीर की स्टेज और पाचन तंत्र पर निर्भर करता है:

  • ​हल्की समस्या (Grade 1 & 2): अगर ब्लीडिंग या दर्द अभी शुरू हुआ है, तो जड़ी-बूटियों और सही डाइट से आमतौर पर 3 से 6 हफ्तों में ही ब्लीडिंग रुक जाती है और दर्द खत्म हो जाता है।
  • ​पुरानी बीमारी (Grade 3 & 4): अगर मस्से बड़े हैं, बाहर आ गए हैं और आप सर्जरी के बाद भी परेशान हैं, तो मस्सों के सिकुड़ने और पाचन को पूरी तरह मज़बूत होने में 3 से 6 महीने भी लग सकते हैं।
  • ​स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट (छाछ और फाइबर) का कड़ाई से पालन करता है, तो भविष्य में कब्ज़ नहीं होती और बवासीर दोबारा बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।

​मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम शरवन है और मैं गुरुग्राम से हूँ। मैं काफी समय से ब्लीडिंग पाइल्स की समस्या से पीड़ित था। मैंने पहले ऑपरेशन भी करवाया था, लेकिन समस्या पूरी तरह ठीक नहीं हुई। कुछ समय बाद दोबारा ऑपरेशन की सलाह दी गई, लेकिन किसी कारणवश मैंने वह नहीं करवाया। इसके बाद मुझे जीवा आयुर्वेद के बारे में पता चला। मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया और वहाँ डॉक्टरों से बात करके इलाज शुरू कराया। मुझे दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़ी सही सलाह दी गई। मैंने लगभग 4–5 महीने तक नियमित दवाइयाँ लीं। धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा और लगभग 15 दिनों में ही ब्लीडिंग बंद हो गई। अब मुझे काफी राहत महसूस हो रही है और मैं पहले से बेहतर हूँ।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

​आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
इलाज का मुख्य लक्ष्य लेज़र या स्टेपलर सर्जरी से सूजी हुई नसों (बवासीर) को हटाना वात दोष और कमजोर पाचन को संतुलित कर मूल कारण पर काम करना
नज़रिया समस्या को मुख्य रूप से सूजी हुई नसों और रक्तस्राव तक सीमित माना जाता है इसे वात असंतुलन, कब्ज़ और कमजोर जठराग्नि से जोड़कर देखा जाता है
उपचार तरीका सर्जरी, दवाओं और दर्द नियंत्रित करने वाले उपचारों का उपयोग सूरण, हरड़ जैसी जड़ी-बूटियों और पाचन सुधार पर ज़ोर
डाइट और लाइफस्टाइल फाइबर और पानी बढ़ाने की सलाह दी जाती है सुपाच्य आहार, नियमित दिनचर्या और मल को मुलायम रखने वाले भोजन को आधार माना जाता है
लंबा असर कब्ज़ और लाइफस्टाइल न सुधरने पर समस्या दोबारा लौट सकती है पाचन और मल त्याग में सुधार लाकर लंबे समय तक राहत बनाए रखने का लक्ष्य रखा जाता है

​डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

समय पर सलाह लेने से आँतों को डैमेज होने और बार-बार सर्जरी की जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

  • ​मल के साथ बहुत ज़्यादा मात्रा में लाल खून बहने लगे जिससे चक्कर या कमज़ोरी आ जाए।
  • गुदा में दर्द इतना भयंकर हो कि बैठने या सोने में भी दिक्कत हो।
  • ​गुदा के बाहर मस्सों का एक बड़ा गुच्छा आ जाए जो उँगली से भी अंदर न जा रहा हो।
  • ​बुखार के साथ भयंकर कंपकंपी महसूस हो और गुदा से मवाद (Pus) निकलने लगे (यह फिस्टुला का संकेत है)।

​निष्कर्ष

​आयुर्वेद के अनुसार, सर्जरी के बाद भी बवासीर का बार-बार वापस आना जठराग्नि के कमज़ोर होने, अपान वात के बिगड़ने और पुरानी कब्ज़ का परिणाम है। सर्जरी सिर्फ बने हुए मस्सों को निकालती है, लेकिन शरीर की कड़ा मल बनाने वाली प्रवृत्ति को ठीक नहीं करती। स्थायी समाधान के लिए आँतों को अंदर से मज़बूत करना और मल को मुलायम रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। हरड़, नागकेसर और सूरण जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ, छाछ का प्रयोग और सही फाइबर वाली डाइट अपनाने से यह बीमारी हमेशा के लिए जड़ से खत्म हो जाती है।

डॉक्टर की सलाह सीधे अपने फोन पर — WhatsApp Channel से जुड़ें।

FAQs

सर्जरी सिर्फ सूजी हुई नसों (मस्सों) को काटकर निकालती है, लेकिन यह आपके खराब पाचन तंत्र और कब्ज़ को ठीक नहीं करती। अगर सर्जरी के बाद भी मल कड़ा रहता है और आप ज़ोर लगाते हैं, तो बची हुई नसें सूजकर नई बवासीर बना देती हैं।

नहीं। बार-बार सर्जरी कराने से गुदा की माँसपेशियाँ (Sphincters) डैमेज हो सकती हैं, जिससे भविष्य में मल या गैस रोकने की क्षमता खत्म हो सकती है, या मल का रास्ता हमेशा के लिए सिकुड़ (Stricture) सकता है।

हाँ, आयुर्वेद में सूरण, नागकेसर और हरड़ जैसी जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल से पाचन को सुधारा जाता है। इससे मल मुलायम होता है और मस्से अंदर ही अंदर प्राकृतिक रूप से सूखकर झड़ जाते हैं।

आयुर्वेद में छाछ को बवासीर की सबसे उत्तम दवा माना गया है। यह पेट को ठंडा रखती है, पाचन अग्नि को भड़काती है और मल को मुलायम बनाकर गुदा की नसों पर दबाव कम करती है।

बिल्कुल। लाल मिर्च और तेज़ मसाले सीधे तौर पर पित्त (गर्मी) को बढ़ाते हैं और कटी-फटी नसों को जला देते हैं, जिससे टॉयलेट करते समय भयंकर जलन और ब्लीडिंग शुरू हो जाती है।

टॉयलेट सीट पर बैठकर मोबाइल देखने या 15-20 मिनट तक बैठे रहने से गुदा की नसों पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) और शरीर का पूरा दबाव पड़ता है, जिससे नसें तेज़ी से फूलकर बाहर आ जाती हैं।

कच्चा या ठंडा दूध कब्ज़ कर सकता है, लेकिन रात को सोते समय गर्म दूध में एक चम्मच गाय का घी मिलाकर पीने से आँतों में चिकनाहट आती है और सुबह पेट आसानी से साफ हो जाता है।

खूनी बवासीर गुदा के अंदर होती है और इसमें मल के साथ बिना दर्द के ताज़ा खून गिरता है। बादी बवासीर गुदा के बाहर होती है, जिसमें खून नहीं आता लेकिन भयंकर खुजली, दर्द और सूजन रहती है।

हाँ, एक चौड़े टब में हल्का गर्म पानी (जिसमें त्रिफला या फिटकरी मिली हो) भरकर उसमें 10-15 मिनट बैठने से गुदा की जकड़न खुलती है, दर्द कम होता है और मस्सों की सूजन तुरंत सिकुड़ जाती है।

कब्ज़ से बचने के लिए शरीर को हमेशा हाइड्रेटेड रखना ज़रूरी है। मरीज़ों को दिन भर में कम से कम 3 से 4 लीटर (12-15 गिलास) पानी ज़रूर पीना चाहिए ताकि मल कभी सूखे नहीं।

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