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बार-बार Infection होना Gut Issue का संकेत हो सकता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

मौसम हल्का सा बदलता नहीं कि आपको ज़ुकाम और खाँसी जकड़ लेते हैं। कभी बार-बार यूरिन इन्फेक्शन (UTI) हो जाता है, तो कभी स्किन पर फंगल इन्फेक्शन या पेट में दर्द शुरू हो जाता है। जब भी आप बीमार पड़ते हैं, तो डॉक्टर के पास जाते हैं, एंटीबायोटिक्स का एक भारी कोर्स खाते हैं और कुछ दिनों के लिए ठीक हो जाते हैं। लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद कोई नया इन्फेक्शन फिर से आप पर हमला कर देता है। आप परेशान होकर इम्युनिटी बढ़ाने वाले महंगे विटामिन्स, काढ़े और सप्लीमेंट्स खाना शुरू कर देते हैं, लेकिन शरीर की कमज़ोरी जस की तस बनी रहती है।

क्या आपने कभी सोचा है कि आपका शरीर बार-बार इन्फेक्शन्स का शिकार क्यों हो रहा है? हम अक्सर अपनी कमज़ोर इम्युनिटी का कारण मौसम, प्रदूषण या बाहर के कीटाणुओं को मानते हैं, लेकिन सच्चाई इससे बहुत अलग और गहरी है। विज्ञान साबित कर चुका है कि आपकी 70 से 80 प्रतिशत इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) आपके पेट यानी गट (Gut) में रहती है। अगर आपका पाचन तंत्र अंदर से खराब है, आंतों में सूजन है या अच्छे बैक्टीरिया मर चुके हैं, तो दुनिया का कोई भी विटामिन आपको इन्फेक्शन से नहीं बचा सकता।

पेट और इम्युनिटी का सीधा कनेक्शन 

हमारा पेट सिर्फ खाना पचाने की मशीन नहीं है; यह हमारे शरीर का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। आंतों और इम्युनिटी का यह जादुई तालमेल कैसे काम करता है, इसे समझना बहुत ज़रूरी है।

  • इम्यून सेल्स का घर: हमारी आंतों की दीवारों के ठीक नीचे इम्यून सिस्टम का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है, जिसे GALT (Gut-Associated Lymphoid Tissue) कहा जाता है। शरीर के लगभग 80% इम्यून सेल्स यहीं रहते हैं और बाहरी बीमारियों से लड़ने की ट्रेनिंग लेते हैं।
  • माइक्रोबायोम (Gut Microbiome): हमारी आंतों में खरबों अच्छे बैक्टीरिया (Good bacteria) रहते हैं। ये बैक्टीरिया एक फौज की तरह काम करते हैं। जब भी कोई बाहरी वायरस या खराब बैक्टीरिया शरीर में घुसता है, तो ये अच्छे बैक्टीरिया हमारे इम्यून सेल्स को अलर्ट कर देते हैं और उस वायरस को खत्म करने में मदद करते हैं।
  • म्यूकस लाइनिंग (Mucus Lining): आंतों के अंदर एक चिपचिपी सुरक्षा परत होती है जो खराब कीटाणुओं को खून में जाने से रोकती है। जब पेट स्वस्थ होता है, तो यह दीवार एक मज़बूत ढाल की तरह काम करती है।

खराब गट हेल्थ इम्युनिटी को कैसे तोड़ती है?

जब हम खराब डाइट और तनाव के कारण अपने पेट को डैमेज करते हैं, तो शरीर का सुरक्षा तंत्र पूरी तरह बिखर जाता है।

  • गुड बैक्टीरिया का मरना (Dysbiosis): बहुत ज़्यादा जंक फूड, रिफाइंड चीनी और स्ट्रेस से आंतों के अच्छे बैक्टीरिया मर जाते हैं और खराब बैक्टीरिया हावी हो जाते हैं। रक्षक बैक्टीरिया के न होने से कोई भी मामूली वायरस आसानी से शरीर को बीमार कर देता है।
  • लीकी गट सिंड्रोम (Leaky Gut): जब आंतों की अंदरूनी परत डैमेज होकर कमज़ोर हो जाती है, तो उसमें बारीक छेद हो जाते हैं। इन छेदों से अधपचा खाना और कीटाणु सीधे खून में मिल जाते हैं। इससे इम्यून सिस्टम कंफ्यूज़ हो जाता है और अपनी पूरी ताकत पेट की सूजन से लड़ने में लगा देता है, जिससे वह बाहरी इन्फेक्शन से नहीं लड़ पाता।
  • पोषक तत्वों की कमी: अगर पाचन खराब है, तो आप चाहे कितना भी पौष्टिक खाना खा लें, शरीर उसे सोख (Absorb) नहीं पाएगा। विटामिन सी, जिंक और आयरन की कमी से इम्युनिटी अपने आप गिर जाती है।

एंटीबायोटिक्स का खतरनाक दुष्चक्र

बार-बार बीमार पड़ने पर हम जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह है बिना सोचे-समझे एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) खाना। यह दवा इन्फेक्शन को तो मारती है, लेकिन यह आपके पेट को बंजर बना देती है।

  • अच्छे और बुरे में फर्क न करना: एंटीबायोटिक्स एक न्यूक्लियर बम की तरह काम करते हैं। वे बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं के साथ-साथ आपके पेट के खरबों गुड बैक्टीरिया को भी पूरी तरह खत्म कर देते हैं।
  • इम्युनिटी का ज़ीरो होना: गुड बैक्टीरिया के मरने से आपकी इम्युनिटी बिल्कुल ज़ीरो हो जाती है। यही कारण है कि एक बार एंटीबायोटिक का कोर्स खत्म करने के कुछ हफ्तों बाद आप पहले से भी ज़्यादा भयंकर इन्फेक्शन की चपेट में आ जाते हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जो इंसान को अंदर से खोखला कर देता है।

आयुर्वेद इस कमज़ोर इम्युनिटी को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे गट माइक्रोबायोम और इम्युनिटी कहता है, आयुर्वेद ने उसे हज़ारों साल पहले अग्नि और ओजस के विज्ञान के रूप में स्पष्ट किया था।

  • पाचन अग्नि (Jatharagni): आयुर्वेद मानता है कि सभी बीमारियों से लड़ने की ताकत हमारी पाचन अग्नि पर निर्भर करती है। जब यह अग्नि तेज़ और संतुलित होती है, तो खाना सही से पचता है और शरीर को ताकत मिलती है।
  • आम (Toxins) का निर्माण: जब अग्नि मंद (सुस्त) पड़ जाती है, तो खाना पचने के बजाय पेट में सड़ता है और एक ज़हरीला चिपचिपा पदार्थ बनाता है जिसे आम कहते हैं। यह आम शरीर की नसों (स्रोतों) को ब्लॉक कर देता है और इन्फेक्शन्स को पनपने के लिए एक आदर्श माहौल देता है।
  • ओजस (Ojas) की कमी: आयुर्वेद में इम्युनिटी को ओज कहा जाता है। ओज शरीर में सातों धातुओं (रस, रक्त, मांस आदि) के सही पोषण का अंतिम परिणाम है। खराब पाचन के कारण जब धातुएं ही कमज़ोर बनती हैं, तो ओज (इम्युनिटी) अपने आप सूख जाता है और शरीर रोगों का घर बन जाता है।

पेट और इम्युनिटी के लिए जड़ी-बूटियाँ

  • गिलोय: यह आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली इम्युनिटी बूस्टर और डिटॉक्स औषधि है। यह शरीर से आम को बाहर निकालती है और बार-बार आने वाले बुखार व वायरल इन्फेक्शन्स को जड़ से खत्म करती है।
  • आंवला: विटामिन सी से भरपूर आंवला एक बेहतरीन रसायन है। यह पेट की गर्मी (एसिडिटी) को शांत करता है, आंतों को ताकत देता है और शरीर का ओज (ओजस) बढ़ाता है।
  • त्रिफला: पेट की पुरानी कब्ज़ और आंतों की गंदगी को साफ करने के लिए त्रिफला का कोई मुकाबला नहीं है। पेट साफ रहने से इम्युनिटी अपने आप बढ़ जाती है।
  • तुलसी और हल्दी: इनमें भयंकर एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं। ये रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट (सांस की नली) और पेट के इन्फेक्शन्स को बहुत तेज़ी से हील करते हैं।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी गट डिटॉक्स में कैसे काम करती है?

जब शरीर में एंटीबायोटिक्स का कचरा बहुत ज़्यादा भर चुका हो और इम्युनिटी बिल्कुल काम न कर रही हो, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी शरीर की डीप क्लीनिंग करती है।

  • विरेचन: यह बढ़े हुए पित्त और आंतों की गंदगी के लिए सबसे अचूक इलाज है। इसमें औषधीय जड़ी-बूटियों से दस्त लगाकर लिवर और आंतों में जमा भयंकर टॉक्सिन्स को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे पेट बिल्कुल नया हो जाता है।
  • बस्ती: यह इम्युनिटी और वात दोष के लिए अर्ध-चिकित्सा (आधा इलाज) मानी जाती है। इसमें औषधीय काढ़े और तेल का एनिमा दिया जाता है, जो आंतों के नर्वस सिस्टम को मज़बूत करता है और गट फ्लोरा को रिस्टोर करता है।

इम्युनिटी बढ़ाने वाला गट-फ्रेंडली डाइट और लाइफस्टाइल प्लान

आप जो खाते हैं, वही आपके आंतों के गुड बैक्टीरिया का भोजन बनता है। बार-बार बीमार पड़ने से बचने के लिए अपनी डाइट में बदलाव करना बेहद ज़रूरी है।

पहलू क्या करें कैसे करें (व्यावहारिक तरीका)
प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ शामिल करें रोज़ाना घर का बना ताज़ा छाछ (मट्ठा) लें; साथ में लहसुन, प्याज़, सेब और केला जैसे फाइबरयुक्त फल खाएं
प्रोबायोटिक्स लेने का सही समय सही समय पर सेवन से अधिक लाभ मिलता है दोपहर के भोजन के बाद या लंच के साथ छाछ लें; बहुत ठंडा न लें, हल्का सामान्य तापमान पर रखें
बासी और रिफाइंड भोजन से बचाव टॉक्सिन (आम) बनाने वाले भोजन को हटाएं फ्रिज में रखा बासी खाना, रिफाइंड चीनी, मैदा और डीप-फ्राइड चीज़ों को पूरी तरह कम या बंद करें
ताज़ा और प्राकृतिक भोजन शरीर को साफ और हल्का रखने वाला आहार अपनाएं रोज़ ताज़ा बना हुआ, हल्का और सुपाच्य भोजन खाएं; पैकेटबंद चीज़ों से दूरी रखें
सही हाइड्रेशन शरीर में पर्याप्त और सही तरीके से पानी बनाए रखें दिन भर में 2.5–3 लीटर हल्का गुनगुना पानी पिएं; सुबह खाली पेट तांबे के बर्तन का पानी या जीरा-सौंफ का पानी लें
पानी पीने का तरीका पानी पीने की आदत सुधारें पानी हमेशा बैठकर, धीरे-धीरे (घूंट-घूंट) पिएं; बहुत ठंडा पानी न लें
नींद का महत्व शरीर को रोज़ाना रिपेयर का समय दें हर दिन 7–8 घंटे की गहरी और नियमित नींद लें; सोने का समय तय रखें
तनाव प्रबंधन मानसिक शांति बनाए रखें रोज़ाना 10–15 मिनट ध्यान, गहरी सांसें (Deep breathing) या हल्का योग करें

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसी एंटीबायोटिक गोली नहीं है जो एक रात में बुखार उतार दे लेकिन शरीर को अंदर से खोखला कर दे। शरीर की इम्युनिटी और गट हेल्थ को दोबारा रिसेट होने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपका पेट साफ होगा; गैस, एसिडिटी और शरीर का भारीपन काफी कम होने लगेगा। आपको अपनी भूख में सुधार दिखेगा और एनर्जी लेवल बढ़ेगा।
  • 1 से 3 महीने तक: आंतों की हीलिंग शुरू हो जाएगी। बार-बार होने वाले छोटे-मोटे इन्फेक्शन्स (जैसे सर्दी-ज़ुकाम) की फ्रीक्वेंसी बहुत कम हो जाएगी। आप मौसम बदलने पर तुरंत बीमार नहीं पड़ेंगे।
  • 3 से 6 महीने और उससे अधिक: आपका गट माइक्रोबायोम पूरी तरह रिस्टोर हो जाएगा। शरीर का ओजस (इम्युनिटी) इतना मज़बूत हो जाएगा कि आपका शरीर खुद बाहरी बीमारियों से लड़ना सीख जाएगा।

मरीज़ों के अनुभव

मुझे मुख्य रूप से हाइपरएसिडिटी की समस्या पिछले 21 सालों से थी। इसकी वजह से मुझे गैस फॉर्मेशन, जोड़ों में दर्द जैसी तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। जब एसिडिटी बहुत बढ़ गई थी, तो मेरे चेहरे पर ब्लैक पैचेज आ गए थे और चेहरा काला पड़ने लगा था। 

तभी मेरे एक साथी ने मुझे जीवा से इलाज कराने की सलाह दी। मैं न्यू बॉम्बे में जीवा आयुर्वेद क्लीनिक के डॉक्टर शिरोडकर से मिला। उन्होंने बताया कि मुझे मुख्य रूप से वात और पित्त की समस्या है। उन्होंने मेरे लिए एक पर्सनलाइज़्ड ट्रीटमेंट शुरू किया और साथ ही डाइट कंट्रोल करने के लिए कहा। 

शुरू में मैंने एलोपैथी और आयुर्वेद दोनों को साथ रखा, लेकिन डॉक्टर की सलाह से धीरे-धीरे एलोपैथी कम करना शुरू किया। लगभग एक महीने बाद मैं पूरी तरह से एलोपैथी दवाएं बंद कर चुका था। पिछले 3 महीने के ट्रीटमेंट से मुझे 90% से ज्यादा फायदा हुआ है। इतने वंडरफुल रिजल्ट्स आ सकते हैं, यह मुझे पहले पता नहीं था। थैंक्स टू जीवा पर्सनलाइज्ड आयुर्वेद।

AB Mukharjee

Navi Mumbai

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

बार-बार होने वाले इन्फेक्शन्स को रोकने के लिए सही चिकित्सा पद्धति का चुनाव करना सबसे ज़रूरी है। आइए समझते हैं कि दोनों दृष्टिकोण कैसे अलग हैं।

पहलू आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine) आयुर्वेद (Ayurveda)
इलाज का मुख्य लक्ष्य इन्फेक्शन पैदा करने वाले बैक्टीरिया को मारने के लिए एंटीबायोटिक्स का उपयोग; फोकस त्वरित नियंत्रण पर गट हेल्थ को सुधारना, ‘ओजस’ (इम्युनिटी) बढ़ाना और शरीर की प्राकृतिक रक्षा क्षमता को मजबूत करना
शरीर को देखने का नज़रिया इन्फेक्शन को बाहरी कीटाणुओं का हमला मानकर सीधे उन्हें खत्म करने पर ज़ोर इन्फेक्शन को ‘आम’ (टॉक्सिन्स) और कमजोर ‘अग्नि’ का परिणाम मानता है, जो बैक्टीरिया को पनपने का मौका देते हैं
गट माइक्रोबायोम पर प्रभाव एंटीबायोटिक्स अच्छे और बुरे दोनों बैक्टीरिया को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे गट बैलेंस बिगड़ सकता है छाछ, जड़ी-बूटियों और संतुलित आहार से अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा दिया जाता है
डाइट और जीवनशैली की भूमिका दवाइयों के मुकाबले डाइट की भूमिका सीमित; सपोर्टिव एडवाइस दी जाती है सात्विक आहार, प्रोबायोटिक्स (जैसे छाछ), सही दिनचर्या को ही मुख्य उपचार माना जाता है
इम्युनिटी पर प्रभाव दवाइयों से लक्षण नियंत्रित होते हैं, लेकिन इम्युनिटी पर सीधा फोकस कम ‘ओजस’ बढ़ाकर शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत किया जाता है
लंबे समय का असर एंटीबायोटिक्स बंद करने के बाद दोबारा इन्फेक्शन होने की संभावना बनी रह सकती है प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और गट सुधार से शरीर स्थायी रूप से मजबूत होता है
उपचार की दिशा लक्षण और कारण (बैक्टीरिया) को सीधे टार्गेट करना शरीर के अंदरूनी वातावरण (अग्नि, दोष, गट) को संतुलित करना

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

बार-बार बीमार पड़ने को सिर्फ मौसम का बदलाव मानकर इग्नोर नहीं करना चाहिए। अगर आपको ये गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:

  • अचानक और बिना कारण वज़न गिरना: अगर बार-बार इन्फेक्शन के साथ आपका वज़न तेज़ी से गिर रहा है और भयंकर कमज़ोरी है (यह टीबी या अन्य गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है)।
  • लगातार तेज़ बुखार आना: अगर बुखार दवा खाने के बाद भी कम न हो रहा हो और कई हफ्तों से लगातार बना हुआ हो।
  • शरीर पर लाल चकत्ते और जोड़ों में तेज़ दर्द: अगर इन्फेक्शन के साथ शरीर पर अजीब रैशेज़ आएं और जोड़ों में सूजन हो (यह ऑटोइम्यून बीमारी का अलार्म हो सकता है)।
  • पेशाब में खून आना या भयंकर जलन: बार-बार UTI होना और पेशाब के साथ खून आना किडनी या ब्लैडर के गंभीर इन्फेक्शन का संकेत है।
  • घाव का न भरना: अगर शरीर पर लगी कोई छोटी सी चोट या घाव हफ्तों तक हील न हो रहा हो, जो शुगर लेवल बढ़ने और खराब इम्युनिटी का सीधा संकेत है।

निष्कर्ष

"आपकी इम्युनिटी की चाबी आपके पेट में छिपी है।" जब आप बार-बार होने वाले सर्दी-ज़ुकाम, बुखार या स्किन इन्फेक्शन से परेशान होकर सिर्फ एंटीबायोटिक्स और विटामिन्स की गोलियाँ खाते हैं, तो आप शरीर की असली पुकार को अनसुना कर रहे होते हैं। आपका शरीर आपको बता रहा है कि आपके पेट का सुरक्षा चक्र (Gut Microbiome) टूट चुका है, पाचन अग्नि सुस्त पड़ गई है और आंतों में भयंकर सूजन है। एंटीबायोटिक्स का बार-बार इस्तेमाल आपके बचे-खुचे अच्छे बैक्टीरिया को भी मार देता है, जिससे आपकी इम्युनिटी पूरी तरह ज़ीरो हो जाती है और आप बीमारियों के एक अंतहीन दुष्चक्र में फँस जाते हैं। इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए आपको अपनी जड़ों (पाचन तंत्र) की ओर लौटना होगा। आयुर्वेद आपको इस समस्या का सबसे सीधा और प्राकृतिक समाधान देता है। सही आयुर्वेदिक उपचार, गिलोय और आंवला जैसी शक्तिशाली जड़ी-बूटियों, पंचकर्म की डिटॉक्स थेरेपी और गट-फ्रेंडली लाइफस्टाइल को अपनाकर आप अपने पेट को दोबारा साफ और मज़बूत बना सकते हैं। अपने शरीर की सुरक्षा दीवार को एंटीबायोटिक्स से खोखला न होने दें, अपनी अग्नि को जगाएं, और जीवा आयुर्वेद के साथ स्वस्थ रहने वाली इम्युनिटी पाएं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हमारे शरीर की 70-80% इम्युनिटी (सुरक्षा कोशिकाएं) हमारे पेट यानी आंतों में पाई जाती है। जब पेट में गुड बैक्टीरिया की कमी होती है या पाचन खराब होता है, तो इम्यून सिस्टम कमज़ोर पड़ जाता है और बाहरी कीटाणु आसानी से शरीर पर हमला कर देते हैं।

एंटीबायोटिक्स बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया के साथ-साथ पेट के अच्छे बैक्टीरिया (Good Bacteria) को भी मार देते हैं। अच्छे बैक्टीरिया ही हमारी इम्युनिटी को मज़बूत रखते हैं, इसलिए इनके मरने से शरीर भविष्य के इन्फेक्शन्स के लिए और भी कमज़ोर हो जाता है।

आयुर्वेद में ओजस शरीर की प्राकृतिक इम्युनिटी और ताकत को कहा जाता है। जब हम सही खाना खाते हैं और हमारी पाचन अग्नि उसे अच्छे से पचाती है, तो शरीर के सातों धातुओं के निर्माण के बाद जो सार (Final product) बचता है, उसे ओजस कहते हैं।

खराब पाचन के कारण जब खाना पेट में सड़ता है, तो वह एक ज़हरीला पदार्थ आम बनाता है। यह आम शरीर की नसों और इम्यून सेल्स के रास्तों को ब्लॉक कर देता है, जिससे शरीर बाहरी बीमारियों से लड़ नहीं पाता।

घर का बना ताज़ा छाछ (मट्ठा) आंतों के लिए अमृत है क्योंकि यह प्राकृतिक प्रोबायोटिक है जो अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाता है। इसके अलावा रोज़ाना गिलोय और आंवले का रस पीना इम्युनिटी को फौलादी बनाता है।

बिल्कुल, लगातार तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जो सीधे तौर पर हमारे इम्यून सिस्टम को दबा (Suppress) देता है और आंतों की कार्यक्षमता को बिगाड़ता है, जिससे इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

लीकी गट में आंतों की अंदरूनी परत में बारीक छेद हो जाते हैं, जिससे अधपचा खाना और कीटाणु सीधे खून में मिल जाते हैं। शरीर का इम्यून सिस्टम इन कीटाणुओं से लड़ते-लड़ते थक जाता है और नए इन्फेक्शन से बचाव नहीं कर पाता।

पेट और आंतों में मौजूद बैक्टीरिया (Gut flora) यूरिनरी ट्रैक्ट के बैक्टीरिया को संतुलित रखने में मदद करते हैं। जब गट में खराब बैक्टीरिया हावी हो जाते हैं, तो वे आसानी से यूरिनरी ट्रैक्ट में पहुँचकर बार-बार UTI पैदा करते हैं।

विरेचन थेरेपी आंतों और लिवर में सालों से जमा टॉक्सिन्स (आम) और एंटीबायोटिक्स के कचरे को दस्त के ज़रिए बाहर निकाल देती है। पेट के बिल्कुल साफ होने से पाचन अग्नि तेज़ होती है और इम्युनिटी अपने आप बढ़ जाती है।

प्राकृतिक डाइट और जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल से 3-4 हफ्तों में पाचन सुधरने लगता है और गैस व कब्ज़ कम होती है। पूरी तरह से इम्युनिटी (ओजस) बढ़ने और बार-बार बीमार पड़ने की आदत खत्म होने में 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

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