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तनाव के साथ पेट की समस्या बढ़ना: Brain–Gut Axis IBS में कैसे काम करता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

क्या आपने कभी गौर किया है कि किसी ज़रूरी इंटरव्यू या परीक्षा से ठीक पहले आपके पेट में मरोड़ होने लगती है? या जब आप बहुत ज़्यादा तनाव में होते हैं तो आपका हाज़मा अचानक बिगड़ जाता है? यह कोई इत्तेफाक नहीं है। दरअसल हमारा दिमाग और हमारा पेट एक 'अदृश्य तार' से जुड़े हुए हैं जिसे विज्ञान की भाषा में ब्रेन-गट एक्सिस (Brain–Gut Axis) कहा जाता है।

जब हम मानसिक रूप से परेशान होते हैं तो उसका सीधा असर हमारी आंतों पर पड़ता है। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में चिड़चिड़ापन और पेट की खराबी एक साथ चलती है जिसे मेडिकल भाषा में IBS (इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) कहते हैं। समय पर इसका इलाज करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह समस्या न केवल आपके शरीर को कमज़ोर करती है बल्कि आपके मानसिक स्वास्थ्य को भी पूरी तरह अवरुद्ध (Block) कर सकती है।

IBS (इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) क्या होता है?

बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो IBS आंतों से जुड़ी एक ऐसी समस्या है जिसमें आपकी आंतें बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो जाती हैं। इसमें आंतों की बनावट में कोई खराबी नहीं आती बल्कि उनके काम करने के तरीके में गड़बड़ी हो जाती है। जब दिमाग से पेट को मिलने वाले सिग्नल 'कन्फ्यूज़' हो जाते हैं तो पेट या तो बहुत तेज़ काम करने लगता है या बहुत सुस्त पड़ जाता है।

IBS के प्रकार 

मरीज़ों के लक्षणों के आधार पर इसे मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा गया है

IBS-D (Diarrhea) इसमें मरीज़ को बार-बार दस्त लगने और पेट में मरोड़ की शिकायत रहती है।

IBS-C (Constipation) इसमें मरीज़ को गंभीर कब्ज़ रहती है और पेट साफ़ होने में बहुत दिक़्क़त आती है।

IBS-M (Mixed) इसमें कभी दस्त तो कभी कब्ज़ की स्थिति बनी रहती है।

IBS के लक्षण 

पेट में मरोड़ और दर्द अक्सर शौच (Stool) जाने के बाद दर्द में हल्का आराम मिलता है।

पेट का फूलना (Bloating) हर वक़्त पेट में भारीपन और गैस महसूस होना।

शौच की आदतों में बदलाव मल का बहुत सख़्त या बहुत पतला होना।

अधूरेपन का अहसास पेट साफ़ होने के बाद भी ऐसा लगना कि अभी पेट पूरी तरह साफ़ नहीं हुआ है।

मानसिक लक्षण पेट खराब होने के साथ-साथ बेचैनी चिंता और नींद की कमी होना।

IBS के कारण

ब्रेन-गट सिग्नलिंग दिमाग और आंतों के बीच तालमेल का बिगड़ना।

अत्यधिक तनाव (Stress) तनाव आंतों की मांसपेशियों में संकुचन पैदा करता है जिससे दर्द तेज़ (Intense) हो जाता है।

आंतों में सूजन संक्रमण के बाद आंतों की दीवारों में हल्की सूजन रह जाना।

बैक्टीरियल ओवरग्रोथ आंतों में 'गुड बैक्टीरिया' का कम होना और हानिकारक बैक्टीरिया का बढ़ना।

खान-पान ज़्यादा मिर्च-मसाले मैदा या कैफीन का सेवन करना।

जोखिम और जटिलताएं 

जोखिम बढ़ाने वाले मुख्य कारण 

किन लोगों को इस बीमारी का ख़तरा सबसे अधिक होता है?

कम उम्र (Youth) सांख्यिकी के अनुसार IBS अक्सर 45 साल से कम उम्र के लोगों में ज़्यादा देखा जाता है। आज की युवा पीढ़ी की भागदौड़ भरी ज़िंदगी इसका बड़ा कारण है।

लिंग (Gender) महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले IBS होने की संभावना ज़्यादा होती है। हार्मोनल बदलाव जैसे पीरियड्स के दौरान आंतों की संवेदनशीलता को और बढ़ा देते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य का इतिहास  जिन लोगों को पहले से ही चिंता डिप्रेशन या अत्यधिक मानसिक तनाव की शिकायत रही है उनका 'ब्रेन-गट एक्सिस' जल्दी प्रभावित होता है।

गंभीर संक्रमण (Infection)यदि आपको पहले कभी बहुत तेज़ फूड पॉइजनिंग या गैस्ट्रोएंटेराइटिस हुआ है तो आंतों में रहने वाली 'अच्छी' बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है जो आगे चलकर IBS का रूप ले लेता है।

भविष्य की जटिलताएं (Complications)

यदि IBS के लक्षणों को नज़रअंदाज़ किया जाए तो यह निम्नलिखित समस्याओं को जन्म दे सकता है

बवासीर (Piles/Hemorrhoids)  लगातार रहने वाली कब्ज़ (IBS-C) या बार-बार होने वाले दस्त (IBS-D) के कारण गुदा (Anus) की नसों पर बहुत ज़ोर पड़ता है जिससे बवासीर जैसी पीड़ादायक स्थिति पैदा हो सकती है।

पोषक तत्वों की कमी (Malnutrition)  बार-बार दस्त लगने या बहुत ज़्यादा परहेज करने की वजह से शरीर भोजन से ज़रूरी विटामिन और मिनरल्स नहीं सोख पाता जिससे शरीर में हर वक़्त कमज़ोरी और थकान बनी रहती है।

क्वालिटी ऑफ लाइफ (जीवन की गुणवत्ता) पेट की अनिश्चितता के कारण व्यक्ति बाहर जाने सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने या दफ़्तर के काम पर ध्यान देने में असमर्थ महसूस करता है। इससे उसका आत्मविश्वास अवरुद्ध (Blocked) हो जाता है।

मानसिक विकार पेट का लगातार खराब रहना दिमाग को ज़्यादा तनाव देता है जिससे व्यक्ति 'हेल्थ एंग्जायटी' का शिकार हो जाता है। उसे हर वक़्त डर लगा रहता है कि कब उसे शौचालय भागना पड़ जाए।

जाँच कैसे होती है? 

IBS के लिए कोई एक विशेष ब्लड टेस्ट नहीं है डॉक्टर इसे 'एलिमिनेशन' के आधार पर पहचानते हैं

लक्षणों का इतिहास डॉक्टर देखते हैं कि समस्या कितने वक़्त से बनी हुई है।

स्टूल टेस्ट इंफेक्शन की जाँच करने के लिए।

कोलोनोस्कोपी यह सुनिश्चित करने के लिए कि आंतों में कोई गंभीर घाव या गांठ तो नहीं है।

ब्रीथ टेस्ट यह जाँचना कि आंतों में बैक्टीरिया तो नहीं बढ़ गए हैं।

आयुर्वेद में IBS क्या है ?

आयुर्वेद में IBS को 'ग्रहणी' कहा जाता है। यह आयुर्वेद के सबसे गहरे सिद्धांतों पर आधारित है

अग्निमांद्य (Weak Digestion) आयुर्वेद के अनुसार जब आपकी 'जठराग्नि' कमज़ोर हो जाती है तो भोजन ठीक से नहीं पचता और 'आम' (Toxins) बनने लगते हैं। यही टॉक्सिन्स आंतों को अवरुद्ध (Block) कर देते हैं।

मनोवाही स्रोत (Mind Channels) आयुर्वेद मानता है कि पेट का सीधा संबंध 'सत्व' (मन) से है। जब मन में 'रज' और 'तम' गुण बढ़ते हैं (तनाव) तो वे 'व्यान वायु' को बिगाड़ देते हैं जिससे आंतों की गति अनियंत्रित हो जाती है।

दोषों का खेल IBS-D में 'पित्त' की अधिकता होती है जबकि IBS-C में 'वात' दोष ज़्यादा बढ़ा हुआ होता है

IBS में क्या खाएं और क्या न खाएं

IBS के मरीज़ों के लिए आहार ही सबसे बड़ी औषधि है। 

क्या खाएं (Dos)

छाछ (Buttermilk) भुना हुआ जीरा और काला नमक डालकर ताज़ा छाछ पिएं। यह प्रोबायोटिक्स का सबसे अच्छा प्राकृतिक स्रोत है।

चावल और मूंग दाल खिचड़ी या मांड वाला चावल आसानी से पच जाता है और आंतों पर ज़ोर (Pressure) नहीं डालता।

अनार (Pomegranate) यह आंतों की सूजन को कम करता है और दस्त में राहत देता है।

अदरक और सौंफ भोजन से पहले अदरक का एक छोटा टुकड़ा सेंधा नमक के साथ लें या भोजन के बाद सौंफ चबाएं यह गैस और मरोड़ को कम करता है।

लौकी और कद्दू ये सब्ज़ियाँ हल्की और शीतल होती हैं जो 'पित्त' और 'वात' को शांत रखती हैं।

क्या न खाएं (Don'ts)

दूध और डेयरी उत्पाद कई IBS मरीज़ों को दूध पचाने में बहुत दिक़्क़त होती है (Lactose Intolerance) जिससे दस्त बढ़ सकते हैं।

ज़्यादा मिर्च-मसाले और तला हुआ खाना ये आंतों की संवेदनशील परत को उत्तेजित करते हैं और जलन पैदा करते हैं।

कैफीन और शराब चाय कॉफी और शराब आंतों की गति को तेज़ (Fast) कर देते हैं जिससे मरोड़ और बेचैनी बढ़ती है।

कच्ची सब्ज़ियाँ और सलाद IBS के मरीज़ों को कच्चा सलाद पचाने में वक़्त (Time) और मेहनत ज़्यादा (More) लगती है। हमेशा सब्ज़ियों को पकाकर या उबालकर ही खाएं।

मैदा और जंक फूड पिज्ज़ा पास्ता या मैदा से बनी चीज़ें आंतों में चिपक जाती हैं और 'आम' (टॉक्सिन) पैदा करती हैं।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आधुनिक (Allopathy) इलाज आयुर्वेदिक (Ayurveda) इलाज
नज़रिया मुख्य रूप से दर्द के लक्षणों (Pain) को दबाने पर ज़ोर देता है नज़रिया दर्द की जड़ 'वात दोष' और 'अग्नि' को संतुलित करने पर काम करता है
दवाइयाँ पेनकिलर्स स्टेरॉयड इंजेक्शन या मसल रिलैक्सेंट्स दवाइयाँ जड़ी-बूटियाँ (जैसे शल्लकी अश्वगंधा) जो नसों को पोषण देती हैं
प्रक्रिया गंभीर मामलों में सीधे सर्जरी (Discectomy) की सलाह दी जाती है प्रक्रिया पंचकर्म (कटि बस्ती स्नेहन) के ज़रिए बिना सर्जरी सुधार का प्रयास
दुष्प्रभाव लंबे समय तक पेनकिलर्स लेने से किडनी और पेट पर असर पड़ सकता है दुष्प्रभाव सामान्यतः प्राकृतिक उपचार जो पूरे शरीर के संतुलन पर काम करते हैं
नतीजा तुरंत राहत मिल सकती है लेकिन समस्या दोबारा होने का खतरा रहता है नतीजा सुधार में समय लगता है पर लंबे समय तक राहत मिल सकती है

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए? 

IBS के साथ कुछ ऐसे 'खतरे के निशान' हो सकते हैं जिन्हें कभी नज़रअंदाज़ (Ignore) नहीं करना चाहिए

तेज़ी से वज़न गिरना यदि बिना किसी कोशिश के आपका वज़न कम हो रहा हो।

मल में खून आना यह आंतों में किसी गंभीर सूजन या घाव का संकेत हो सकता है।

रात में दस्त होना यदि सोते समय आपकी नींद दस्त के कारण खुल रही है।

खून की कमी (Anemia) यदि चेहरा पीला पड़ रहा है और बहुत ज़्यादा (Excessive) कमज़ोरी महसूस हो रही है।

तेज़ बुखार पेट दर्द के साथ लगातार बुखार बना रहना।

निष्कर्ष 

IBS या ग्रहणी कोई लाइलाज बीमारी नहीं है बल्कि यह आपके शरीर की ओर से दिया गया एक संकेत है कि आपको अपनी ज़िंदगी और खान-पान में बदलाव की ज़रूरत है। ब्रेन-गट एक्सिस हमें याद दिलाता है कि हमारा स्वास्थ्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम क्या खाते हैं बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं।

आयुर्वेद का होलिस्टिक हीलिंग नज़रिया आपके पेट को पोषण और मन को शांति देकर इस समस्या को जड़ से उखाड़ सकता है। जल्दी इलाज शुरू करने से आप न केवल शारीरिक कष्ट से बचते हैं बल्कि अपनी रफ़्तार को दोबारा आज़ाद कर पाते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जी हाँ, दिमाग और आंतें नसों के ज़रिए जुड़ी होती हैं। तेज़  तनाव आपके पेट की गति को बिगाड़ देता है।

IBS में कई लोगों को 'लैक्टोज' से दिक़्क़त होती है। शुरुआत में इसे बंद करना बेहतर है, लेकिन पाचन सुधरने के बाद डॉक्टर की सलाह पर दोबारा शुरू किया जा सकता है।

बिल्कुल! 'अनुलोम-विलोम' और 'भ्रामरी' जैसे प्राणायाम तनाव कम करते हैं, जो सीधे तौर पर आपके आंतों को सुकून पहुँचाते हैं।

नहीं, IBS से कैंसर का कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों की जाँच कराना ज़रूरी है ताकि अन्य गंभीर बीमारियों का पता चल सके।

जी हाँ, आयुर्वेद के अनुसार यदि आप अपनी जीवनशैली और खान-पान में अनुशासन लाते हैं, तो 'ग्रहणी' को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। इसमें दवाइयों से ज़्यादा आपकी दिनचर्या की अहमियत होती है।

हर मरीज़ को ग्लूटेन से दिक़्क़त नहीं होती, लेकिन कुछ लोगों में गेहूँ आंतों की सूजन बढ़ा सकता है। यदि आपको गेहूँ खाने के बाद ज़्यादा गैस या मरोड़ महसूस होती है, तो कुछ वक़्त के लिए इसके विकल्प के तौर पर रागी या पुराना चावल चुनना बेहतर है।

नहीं, IBS के मरीज़ों की 'अग्नि' कमज़ोर होती है। कच्चा सलाद या कच्ची सब्ज़ियाँ पचाने में बहुत वक़्त लेती हैं और आंतों पर दबाव डालती हैं। हमेशा सब्ज़ियों को अच्छे से पकाकर या सूप के रूप में लेना ही फ़ायदा पहुँचाता है।

बिल्कुल! ब्रेन-गट एक्सिस के कारण, यदि आपकी नींद पूरी नहीं होती है, तो तनाव का स्तर बढ़ जाता है। यह तनाव अगले दिन आपके पेट की जकड़न और मरोड़ को तेज़ (Intense) कर सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार, बहुत ठंडी चीज़ें जठराग्नि को बुझा देती हैं। इससे भोजन पचने के बजाय सड़ने लगता है और 'आम' (टॉक्सिन्स) पैदा होते हैं, जो आंतों की संवेदनशीलता को और ज़्यादा बढ़ा देते हैं।

जी हाँ, इसे 'IBS-M' कहते हैं। इसमें मरीज़ को कुछ दिन कब्ज़ रहती है और फिर अचानक दस्त लगने लगते हैं। यह इस बात का संकेत है कि आपके शरीर में 'वात' दोष बहुत ज़्यादा अस्थिर है और उसे तुरंत संतुलन की ज़रूरत) है।

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