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Ulcerative Colitis में Flare-up क्यों बढ़ता है और उसे कैसे समझें?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

एक ऐसा समय जब आपको लगता है कि आपकी बीमारी आखिरकार शांत हो गई है, आपका पेट ठीक काम कर रहा है और आप अपनी पसंदीदा चीज़ें खा पा रहे हैं। आप चैन की साँस लेते हैं कि अब ज़िंदगी सामान्य हो गई है। लेकिन अचानक, एक दिन आपको मल में खून दिखाई देता है, पेट में भयंकर मरोड़ उठती है और आपको दिन में दस बार वॉशरूम की तरफ भागना पड़ता है। यह कोई नया इन्फेक्शन नहीं है, बल्कि यह आपकी पुरानी बीमारी, अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis), की एक भयानक वापसी है। मेडिकल भाषा में इस अचानक हुई वापसी को 'फ्लेयर-अप' (Flare-up) कहा जाता है। अल्सरेटिव कोलाइटिस से जूझ रहे मरीज़ों के लिए यह फ्लेयर-अप किसी बुरे सपने से कम नहीं होता। यह न सिर्फ शरीर को निचोड़ देता है, बल्कि इंसान के आत्मविश्वास और मानसिक शांति को भी पूरी तरह तोड़ देता है। मरीज़ हमेशा इसी डर में जीता है कि जाने कब यह बीमारी दोबारा भड़क उठे। आखिर ऐसा क्या होता है कि शांत पड़ी आंतें अचानक फिर से खून और पस से भर जाती हैं? आप अनजाने में ऐसी कौन सी गलतियाँ कर रहे हैं जो इस बीमारी को ट्रिगर कर रही हैं? इस ब्लॉग में हम गहराई से समझेंगे कि अल्सरेटिव कोलाइटिस में फ्लेयर-अप क्या है, यह क्यों होता है, इसके शुरुआती संकेतों को कैसे पहचानें, और कैसे आयुर्वेद की मदद से आप अपनी आंतों को हमेशा के लिए इस भयंकर अटैक से बचा सकते हैं।

अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis) असल में क्या है?

अल्सरेटिव कोलाइटिस (UC) पाचन तंत्र की एक बहुत ही गंभीर और पुरानी (Chronic) बीमारी है, जिसे 'इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज' (IBD) का एक प्रमुख प्रकार माना जाता है। यह बीमारी मुख्य रूप से हमारी बड़ी आंत (Colon) और मलाशय (Rectum) की सबसे अंदरूनी परत (Mucosa) को नुकसान पहुँचाती है। यह एक ऑटोइम्यून (Autoimmune) बीमारी है, जिसका मतलब है कि आपके शरीर की अपनी ही रोग प्रतिरोधक क्षमता कंफ्यूज़ होकर आपकी अपनी आंतों को दुश्मन समझ बैठती है और उन पर हमला कर देती है। इस लगातार हमले के कारण बड़ी आंत की दीवारों में भारी सूजन और लालिमा आ जाती है। सूजन बढ़ने पर आंतों की अंदरूनी परत जगह-जगह से छिल जाती है और वहाँ गहरे घाव (Ulcers) बन जाते हैं। इन अल्सर से खून, पस और चिपचिपा आंव (Mucus) रिसने लगता है, जो मल के साथ बाहर आता है। यह बीमारी इंसान को अंदर से खोखला कर देती है।

फ्लेयर-अप (Flare-up) का असली मतलब क्या है?

अल्सरेटिव कोलाइटिस एक ऐसी बीमारी है जो चक्रों (Cycles) में चलती है। इसमें दो मुख्य अवस्थाएं होती हैं: 'रेमिशन' (Remission) और 'फ्लेयर-अप' (Flare-up)।

जब आप दवाइयाँ खा रहे होते हैं और आपकी आंतों की सूजन दब जाती है, तो आपके सभी लक्षण (जैसे खून आना, दर्द होना) गायब हो जाते हैं। इस शांत अवस्था को रेमिशन कहते हैं। लेकिन बीमारी अंदर ही अंदर मौजूद रहती है। जब किसी ट्रिगर (जैसे गलत खान-पान या तनाव) के कारण आपकी इम्युनिटी अचानक फिर से भड़क उठती है और आंतों पर बहुत ज़ोरदार हमला करती है, तो सारे लक्षण भयानक रूप में एक साथ वापस लौट आते हैं। इस अचानक हुए भयंकर अटैक को ही फ्लेयर-अप कहा जाता है। फ्लेयर-अप के दौरान आंतों के पुराने घाव फिर से हरे हो जाते हैं और नए अल्सर बहुत तेज़ी से बनने लगते हैं।

फ्लेयर-अप के शुरुआती संकेत: शरीर की चेतावनियों को कैसे समझें?

अल्सरेटिव कोलाइटिस का फ्लेयर-अप रातों-रात भयानक रूप नहीं लेता, शरीर पहले से ही कई अलार्म बजाता है। अगर आप इन शुरुआती लक्षणों को सही समय पर पहचान लें, तो बीमारी को एक भयंकर अटैक में बदलने से रोका जा सकता है।

  • मल में बदलाव: फ्लेयर-अप की सबसे पहली आहट मल का पतला होना है। अगर आपको अचानक दिन में 3-4 बार लूज़ मोशन्स (Loose motions) होने लगें और मल में सफेद रंग का चिपचिपा पदार्थ (Mucus) दिखाई देने लगे, तो सतर्क हो जाएँ।
  • खून की हल्की बूंदें: मल त्यागते समय पॉट में या टिशू पेपर पर ताज़ा लाल खून की एक-दो बूंदें दिखना इस बात का पक्का संकेत है कि आंतों के अल्सर फिर से फटने लगे हैं।
  • पेट में ऐंठन और मरोड़: खाना खाने के तुरंत बाद या मल त्यागने से पहले नाभि के नीचे एक अजीब सी मरोड़ (Cramps) और तेज़ दर्द का उठना फ्लेयर-अप का एक बड़ा संकेत है।
  • अत्यधिक थकान: अगर आपको बिना किसी भारी काम के भी हर समय भयंकर कमज़ोरी और थकान महसूस हो रही है, तो इसका मतलब है कि आंतों के अंदर सूजन बढ़ रही है और शरीर की ऊर्जा उस सूजन से लड़ने में खर्च हो रही है।
  • वॉशरूम जाने की जल्दबाज़ी (Urgency): मल को रोक पाने की क्षमता का अचानक से खत्म हो जाना और महसूस होना कि एक सेकंड की देरी से भी कपड़े खराब हो जाएंगे।

फ्लेयर-अप ट्रिगर करने वाले मुख्य कारण: आपकी कौन सी गलतियाँ भारी पड़ रही हैं?

जब आप रेमिशन (शांत अवस्था) में होते हैं, तो अक्सर आप बेपरवाह हो जाते हैं और पुरानी गलतियाँ दोहराने लगते हैं। कुछ विशेष कारण हैं जो शांत पड़ी आंतों में अचानक तेज़ाब और सूजन पैदा कर देते हैं।

  • गलत खान-पान (Dietary Triggers): बहुत ज़्यादा मसालेदार खाना, बाहर का जंक फूड, रिफाइंड चीनी, और डेयरी प्रोडक्ट्स (दूध, पनीर) आंतों में भारी सूजन पैदा करते हैं। कुछ लोगों में बहुत ज़्यादा कच्चा सलाद (कच्चा फाइबर) भी छिले हुए अल्सर पर रगड़ खाकर फ्लेयर-अप ला सकता है।
  • दवाइयों का अनियमित सेवन: रेमिशन में आने के बाद ज़्यादातर लोग अपनी मर्जी से दवाइयाँ खानी बंद कर देते हैं। जैसे ही दवा का असर खत्म होता है, इम्युनिटी फिर से आंतों पर हमला कर देती है।
  • पेनकिलर्स का इस्तेमाल: सिरदर्द या बदन दर्द के लिए बार-बार दर्द निवारक दवाइयाँ (NSAIDs जैसे इबुप्रोफेन) खाना आंतों की सुरक्षा परत को सीधा डैमेज करता है और 48 घंटे के अंदर फ्लेयर-अप ला सकता है।
  • नींद की कमी: शरीर की हीलिंग रात में होती है। लगातार नींद पूरी न होने से शरीर की इम्युनिटी कंफ्यूज़ हो जाती है और आंतों पर हमला तेज़ कर देती है।

तनाव (Stress) और गट-ब्रेन एक्सिस का सीधा कनेक्शन

यह सुनकर आपको हैरानी हो सकती है, लेकिन आपका मानसिक तनाव (Stress) फ्लेयर-अप का सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक ट्रिगर है। हमारे दिमाग और आंतों का बहुत ही गहरा संबंध है जिसे विज्ञान 'गट-ब्रेन एक्सिस' (Gut-Brain Axis) कहता है। जब आप ऑफिस, परिवार या बीमारी को लेकर बहुत ज़्यादा चिंता (Anxiety) में रहते हैं, तो शरीर 'कॉर्टिसोल' (Cortisol) नाम का स्ट्रेस हार्मोन छोड़ता है। यह हार्मोन सीधे आपकी आंतों की गति को बिगाड़ देता है और वहाँ भारी मात्रा में एसिड और सूजन पैदा करता है। कई बार आपकी डाइट बिल्कुल सही होती है, लेकिन सिर्फ एक बड़े मानसिक झटके या भारी तनाव के कारण ही अगले दिन मल में खून आना शुरू हो जाता है।

एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध इस्तेमाल: आंतों की तबाही

हल्का सा बुखार या खांसी होने पर बिना सोचे-समझे भारी एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) खा लेना अल्सरेटिव कोलाइटिस के मरीज़ों के लिए एक बहुत बड़ी भूल है। हमारी आंतों में करोड़ों 'गुड बैक्टीरिया' (Gut Flora) होते हैं जो आंतों को शांत रखते हैं और सूजन से बचाते हैं। एंटीबायोटिक्स बीमारी के कीटाणुओं के साथ-साथ इन गुड बैक्टीरिया को भी पूरी तरह मार देते हैं। गुड बैक्टीरिया के मरते ही आंतों का इकोसिस्टम तबाह हो जाता है और सूजन (Inflammation) भड़क उठती है, जो एक भयंकर फ्लेयर-अप को जन्म देती है।

आयुर्वेद अल्सरेटिव कोलाइटिस और फ्लेयर-अप को कैसे समझता है? (पित्त और आम)

आधुनिक विज्ञान जिसे ऑटोइम्यून बीमारी का अचानक भड़कना कहता है, आयुर्वेद ने उसे 'रक्तातिसार' और 'पित्तज ग्रहणी' के प्रकोप के रूप में बहुत गहराई से समझा है।

  • पाचन अग्नि का मंद होना: आयुर्वेद के अनुसार, जब हमारी पाचन अग्नि (Agni) कमज़ोर हो जाती है, तो खाया हुआ भोजन ठीक से पचता नहीं है और वह पेट में सड़कर 'आम' (टॉक्सिन्स) बनाता है।
  • पित्त दोष का भयंकर प्रकोप: गलत खान-पान और तनाव के कारण शरीर में 'पित्त दोष' (गर्मी/तेज़ाब) बहुत ज़्यादा भड़क जाता है। यही बढ़ा हुआ पित्त फ्लेयर-अप लाता है।
  • आंतों का जलना: जब यह बढ़ा हुआ तेज़ पित्त और 'आम' (टॉक्सिन्स) बड़ी आंत में मिलते हैं, तो इनकी अत्यधिक गर्मी आंतों की अंदरूनी परत को जलाकर अल्सर कर देती है, जिससे मल में खून (रक्तातिसार) आने लगता है।

आंतों को हील करने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें आंतों की सूजन और घावों को भरने के लिए अत्यंत सुरक्षित और असरदार जड़ी-बूटियाँ दी हैं। ये दवाइयाँ बिना किसी साइड इफेक्ट के आपकी आंतों को शांत करती हैं।

  • कुटज यह फ्लेयर-अप के दौरान होने वाले बार-बार के डायरिया के लिए आयुर्वेद की सबसे चमत्कारी दवा है। यह आंतों के इन्फेक्शन को खत्म करती है और मल को प्राकृतिक रूप से बांधती है।
  • बिल्व बेल का फल आंतों की सूजन को खींचने और चिपचिपे आंव (Mucus) को रोकने में सबसे ज़्यादा असरदार है। यह आंतों की अंदरूनी परत को भारी मज़बूती देता है।
  • मुलेठी यह आंतों के छिले हुए घावों पर एक ठंडी परत (Mucus lining) बना देती है, जिससे अल्सर तेज़ी से सूखता है और जलन शांत होती है।
  • शतावरी यह भड़के हुए पित्त को तुरंत शांत करती है और आंतों की नाज़ुक नसों को अंदरूनी ताक़त व पोषण देती है, जिससे कमज़ोरी दूर होती है।

आयुर्वेदिक थेरेपी IBD के घावों को कैसे भरती है?

जब सिर्फ दवाइयों से खून और सूजन कंट्रोल न हो और फ्लेयर-अप का दर्द असहनीय हो, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी आंतों की गहराई में जाकर घावों को धोती और भरती है।

  • पिच्छा बस्ती (Piccha Basti): यह अल्सरेटिव कोलाइटिस के फ्लेयर-अप के लिए सबसे अचूक इलाज है। इसमें मोचरस और औषधीय घी-तेल को एनिमा के रास्ते सीधे बड़ी आंत में पहुँचाया जाता है। यह दवा सीधे अल्सर वाले घावों पर लगती है, जिससे खून आना तुरंत रुकता है और आंतों की परत तेज़ी से हील (Heal) होती है।
  • तक्रधारा (Takradhara): अगर फ्लेयर-अप का कारण भारी मानसिक तनाव है, तो माथे पर औषधीय छाछ (तक्र) की लगातार धारा गिराई जाती है। यह दिमाग और पेट दोनों को इतना शांत कर देती है कि तनाव के कारण आंतों में होने वाली मरोड़ पूरी तरह रुक जाती है।

फ्लेयर-अप को रोकने वाला पित्त-शामक डाइट प्लान

आप जो खाते हैं, वही आपकी आंतों के लिए दवा या ज़हर बनता है। फ्लेयर-अप को ट्रिगर होने से रोकने और उसे शांत करने के लिए सही डाइट का पालन करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

श्रेणी क्या अपनाएँ (अनुशंसित) किनसे परहेज़ करें (वर्जित)
आहार का सिद्धांत हल्का, सुपाच्य और ठंडा भोजन; फ्लेयर-अप में नरम/पका हुआ आहार कच्चा फाइबर (कच्चा सलाद, साबुत अनाज) और पित्त बढ़ाने वाला भोजन
पोषक तत्व पुराना चावल, मूंग दाल का पानी, गाय का शुद्ध घी: आंतों को चिकनाई देकर घाव भरने में सहायक मिर्च-मसाले और बाहर का खाना
डेयरी और चीनी से परहेज़ हल्का, आसानी से पचने वाला आहार दूध, भारी डेयरी प्रोडक्ट्स और रिफाइंड चीनी
दैनिक पेय मीठा छाछ (तक्र), अनार का जूस, सौंफ-धनिया का पानी चाय, कॉफी, शराब, कोल्ड ड्रिंक
जीवनशैली सहयोग समय पर थोड़ा-थोड़ा भोजन: आंतों पर दबाव कम करता है एक साथ अधिक भोजन: सूजी हुई आंतों पर दबाव बढ़ाता है

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई जादू नहीं है जो एक दिन में आंतों के पुराने अल्सर को गायब कर दे। गहरे घावों को भरने और बिगड़े हुए रेमिशन साइकिल को सेट करने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपकी आंतों की आग शांत होगी; पेट की मरोड़, गैस और बार-बार वॉशरूम भागने की ज़रूरत काफी कम होने लगेगी।
  • 1 से 3 महीने तक: भड़का हुआ पित्त शांत होने से मल में खून और म्यूकस आना लगभग बंद हो जाएगा। आंतों का घाव धीरे-धीरे भरने लगेगा और भूख खुलकर लगेगी।
  • 3 से 6 महीने तक: आपकी आंतों की सुरक्षा परत अंदर से पूरी तरह दोबारा बन जाएगी। अल्सर भर जाएगा, आपका वज़न वापस बढ़ने लगेगा और फ्लेयर-अप के बार-बार आने की प्रवृत्ति (Tendency) लगभग खत्म हो जाएगी।

मरीज़ों के अनुभव

मेरा नाम खुशबीर कौर है। मुझे दिसंबर 2009 में अल्सरेटिव कोलाइटिस हुआ था। कुछ वर्षों तक मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन 2017 में समस्या बढ़ गई। स्टेरॉइड्स के कारण मैं कमजोर हो गई थी और मेरा वजन भी कम हो रहा था।

2018 में मैंने जीवा से आयुर्वेदिक उपचार शुरू किया। अब मेरी दवाइयाँ धीरे-धीरे बंद हो रही हैं और मुझे काफी लाभ मिला है। इसके लिए मैं जीवा का धन्यवाद करती हूँ।

खुशबीर कौर

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए सही चिकित्सा पद्धति का चुनाव करना ज़रूरी है। आइए समझते हैं कि दोनों दृष्टिकोण कैसे अलग हैं।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य स्टेरॉयड्स व इम्यूनोसप्रेसेन्ट्स से इम्युनिटी दबाकर फ्लेयर-अप को अस्थायी रूप से शांत करना पित्त को शांत कर और आंतों के घावों को भरकर जड़ से समाधान करना
शरीर को देखने का नज़रिया ऑटोइम्यून बीमारी मानकर जीवनभर भारी दवाइयों पर निर्भरता ‘रक्तातिसार’ मानकर पंचकर्म व जड़ी-बूटियों से प्राकृतिक हीलिंग को बढ़ावा
डाइट और जीवनशैली की भूमिका डाइट पर सीमित ध्यान, मुख्य फोकस दवाओं पर पित्त-शामक डाइट, छाछ और तनाव-मुक्ति को उपचार का मुख्य आधार
लंबा असर दवाइयाँ बंद होते ही फ्लेयर-अप वापस आने की संभावना जड़ी-बूटियों से आंतों को मजबूत कर स्थायी समाधान और फ्लेयर-अप की रोकथाम

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? (Red Flags of Flare-up)

फ्लेयर-अप को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। अगर शरीर में कुछ विशेष गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें, क्योंकि आंत फटने का खतरा हो सकता है।

  • मल में बेतहाशा खून: अगर आपको लगातार कई दिनों तक मल के साथ बहुत ज़्यादा मात्रा में साफ लाल खून या बड़े-बड़े थक्के आ रहे हों।
  • असहनीय और भयंकर दर्द: अगर पेट में अचानक से चाकू चुभने जैसा बहुत तेज़ दर्द उठे जो मल त्यागने के बाद भी कम न हो और पेट बिल्कुल सख्त (Tight) हो जाए।
  • लगातार तेज़ बुखार: अगर फ्लेयर-अप के साथ आपको लगातार 101 डिग्री से ऊपर का तेज़ बुखार रहने लगे, जो आंतों में भयंकर इन्फेक्शन फैलने का संकेत हो सकता है।
  • दिल की धड़कन बढ़ना: अगर आपको बिना कोई काम किए बहुत ज़्यादा कमज़ोरी, चक्कर आना और दिल की धड़कन (Palpitations) बहुत तेज़ महसूस हो (यह भारी ब्लड लॉस का संकेत है)।
  • मल का पूरी तरह रुक जाना: अगर पेट में भयंकर दर्द है और मल या गैस पास होना बिल्कुल बंद हो गया है (यह आंतों में खतरनाक ब्लॉकेज का संकेत है)।

निष्कर्ष

अल्सरेटिव कोलाइटिस में फ्लेयर-अप (Flare-up) का आना सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं है; यह आपके शरीर की चीख है जो बता रही है कि आंतों के अंदर का माहौल बहुत ज़्यादा गर्म और डैमेज हो चुका है। जब हम गलत खान-पान, भयंकर मानसिक तनाव और पेनकिलर्स के सहारे इस बीमारी को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो शांत पड़ी आंतें अचानक खून और अल्सर से भर जाती हैं। सिर्फ स्टेरॉयड्स खाकर इस सूजन को बार-बार दबाना समस्या का पक्का समाधान नहीं है, क्योंकि हर बार फ्लेयर-अप पिछली बार से ज़्यादा भयंकर होकर लौटता है। आयुर्वेद आपको इस डर के साए से बाहर निकलने का एक सुरक्षित और प्राकृतिक समाधान देता है। सही आयुर्वेदिक उपचार, कुटज और मुलेठी जैसी जड़ी-बूटियों, पंचकर्म की पिच्छा बस्ती थेरेपी और सही वात-पित्त शामक जीवनशैली को अपनाकर आप अपनी आंतों की भड़की हुई आग को हमेशा के लिए शांत कर सकते हैं। अपने शरीर के शुरुआती संकेतों को सुनें, तनाव को अपने ऊपर हावी न होने दें, और जीवा आयुर्वेद के साथ अपने पाचन तंत्र को एक स्थायी रेमिशन (Remission) और स्वस्थ जीवन की ओर ले जाएं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जब बीमारी दवाइयों से शांत (रेमिशन में) होती है, लेकिन अचानक किसी ट्रिगर के कारण आंतों में भारी सूजन आ जाती है और मल में खून, मरोड़ और दस्त वापस लौट आते हैं, तो इस भयानक अटैक को फ्लेयर-अप कहते हैं।

मल का अचानक पतला होना, उसमें सफेद आंव (Mucus) या खून की बूंदें दिखाई देना, हर समय भयंकर थकान रहना और नाभि के नीचे तेज़ मरोड़ उठना फ्लेयर-अप की सबसे पहली चेतावनियाँ हैं।

जी हाँ, 100%। बहुत ज़्यादा तनाव लेने से कॉर्टिसोल हार्मोन रिलीज़ होता है जो गट-ब्रेन एक्सिस के ज़रिए आंतों की गति को बिगाड़ देता है और वहाँ भारी मात्रा में एसिड पैदा करके शांत पड़े अल्सर को भड़का देता है।

कच्चा सलाद, साबुत अनाज (जैसे चना, राजमा), तीखे मसाले, रिफाइंड चीनी, भारी डेयरी प्रोडक्ट्स और बाहर का जंक फूड बिल्कुल बंद कर दें। ये चीज़ें छिले हुए अल्सर पर रगड़ खाती हैं और सूजन को तुरंत भड़काती हैं।

बिल्कुल। दर्द निवारक दवाइयाँ (NSAIDs) आंतों की सुरक्षा परत को डैमेज करती हैं और एंटीबायोटिक्स आंतों के गुड बैक्टीरिया को मार देते हैं। ये दोनों ही चीज़ें अल्सरेटिव कोलाइटिस के मरीज़ में तुरंत फ्लेयर-अप ट्रिगर कर सकती हैं।

हाँ, आयुर्वेद में बिना खट्टा, ताज़ा और मीठा छाछ (तक्र) आंतों के लिए अमृत माना गया है। यह आंतों की गर्मी (पित्त) को शांत करता है और गुड बैक्टीरिया को बढ़ाकर घावों को भरने में मदद करता है।

जी हाँ। आयुर्वेद सिर्फ सूजन नहीं दबाता, बल्कि पिच्छा बस्ती नामक पंचकर्म थेरेपी और कुटज, मुलेठी जैसी जड़ी-बूटियों से आंतों के घावों (Ulcers) को प्राकृतिक रूप से भरता है जिससे फ्लेयर-अप दोबारा नहीं आता।

फ्लेयर-अप में आंतों में हर जगह सूजन और अल्सर होते हैं, जिससे वे भोजन से ज़रूरी विटामिन्स और मिनरल्स को सोख (Absorb) नहीं पातीं। शरीर को पोषण न मिलने के कारण वज़न तेज़ी से गिरने लगता है।

यह एक बहुत गंभीर स्थिति (Red Flag) है। अगर मल में बेतहाशा खून या बड़े थक्के आ रहे हों और आपको चक्कर आ रहे हों, तो बिना किसी घरेलू नुस्खे का इंतज़ार किए तुरंत नज़दीकी अस्पताल या डॉक्टर से संपर्क करें।

सही आयुर्वेदिक डाइट और जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल से खून आना और मरोड़ तो कुछ ही हफ्तों में शांत हो जाते हैं। लेकिन आंतों के अंदरूनी घावों को पूरी तरह भरने और बीमारी को जड़ से कंट्रोल करने में 3 से 6 महीने लग सकते हैं।

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