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Antacid खाते-खाते थक गए? Acidity बार-बार लौटती है तो ये समझें

Information By Dr. Keshav Chauhan

सुबह उठते ही खाली पेट एक छोटी सी गैस की गोली निगलना आज लाखों लोगों की दिनचर्या का पहला हिस्सा बन चुका है। थोड़ा सा तीखा खा लिया, तो सीने में जलन; रात को किसी समारोह में भारी भोजन कर लिया, तो गले तक खट्टा पानी आना, ये ऐसी परेशानियाँ हैं जिन्हें हम अब अपनी ज़िंदगी का एक बहुत ही सामान्य हिस्सा मान चुके हैं। हम एक एँटासिड चबाते हैं, कुछ देर के लिए जलन ठंडी होती है, और हम फिर से अपनी उसी भागदौड़ भरी ज़िंदगी में वापस लौट जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी शांति से बैठकर यह सोचा है कि जिस भयंकर जलन को आप चुटकियों में दबाने की कोशिश कर रहे हैं, वह कुछ ही घंटों बाद या अगले दिन दोगुनी ताकत के साथ वापस क्यों आ जाती है? सालों तक ये महँगी दवाइयाँ खाते रहने के बावजूद आपका पेट हमेशा फूला हुआ और सीना भारी क्यों रहता है? वास्तव में, यह गोलियाँ खाना आग पर पानी डालने जैसा नहीं, बल्कि एक सुलगते हुए ज्वालामुखी को ऊपर से ढकने जैसा है। अंदर ही अंदर यह लावा और भी भयानक रूप ले रहा होता है।

एसिडिटी की समस्या असल में क्या है?

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, हमारे पेट में भोजन को पचाने और खतरनाक कीटाणुओं को मारने के लिए हाइड्रोक्लोरिक एसिड बनता है। जब हमारे पेट और भोजन नली के बीच का एक छोटा सा प्राकृतिक वाल्व कमज़ोर हो जाता है, तो यह तेज़ एसिड ऊपर की ओर गले तक उछलने लगता है। इसे विज्ञान की भाषा में जीईआरडी या एसिड रिफ्लक्स कहा जाता है। आधुनिक दवाइयाँ सीधे पेट में जाकर इस प्राकृतिक एसिड को न्यूट्रलाइज़ कर देती हैं या इसके बनने की प्रक्रिया को ही पूरी तरह रोक देती हैं, जिससे कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है।

वहीं, आयुर्वेद इस पूरी स्थिति को 'अम्लपित्त' के रूप में बहुत सूक्ष्मता और गहराई से समझता है। आयुर्वेद के अनुसार, जब हम लगातार तीखा, खट्टा, बासी या विरुद्ध आहार (जैसे दूध के साथ खट्टे फल) खाते हैं, तो हमारे पेट की 'जठराग्नि' (पाचन अग्नि) विकृत हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, शरीर का 'पित्त' दोष भड़क जाता है। यह दूषित और बढ़ा हुआ पित्त जब पेट में मौजूद भोजन के साथ मिलता है, तो वह खाना पचने के बजाय वहीं पड़े-पड़े सड़ने लगता है। इस सड़न से जो खट्टा और ज़हरीला रस उत्पन्न होता है, वही असल में सीने और पेट में आग जैसी जलन पैदा करता है। इसलिए, जब आप एँटासिड खाते हैं, तो आप केवल उस खट्टेपन को कुछ देर के लिए सुन्न करते हैं, लेकिन उस सड़े हुए 'आम' (टॉक्सिन) और भड़के हुए पित्त का जड़ से इलाज नहीं करते। यही कारण है कि दवाई का असर खत्म होते ही समस्या फिर से लौट आती है।

एसिडिटी किन रूपों में प्रकट होती है?

एसिडिटी केवल सीने की एक सामान्य जलन तक ही सीमित नहीं रहती। शरीर के भीतर पित्त और वात के असंतुलन के आधार पर यह समस्या कई अलग-अलग और परेशान करने वाले रूपों में सामने आती है:

  • ऊर्ध्वग अम्लपित्त: यह सबसे आम रूप है, जिसमें छाती और गले की तरफ खट्टा और कड़वा पानी आता है। मुँह का स्वाद पूरे दिन अजीब सा रहता है और बार-बार खट्टी डकारें गले को छीलती हुई बाहर आती हैं।
  • अधोग अम्लपित्त: इस रूप में एसिडिटी का प्रभाव ऊपर के बजाय नीचे की ओर आंतों में होता है। पेट में गैस बनती है, मलद्वार में जलन महसूस होती है और कई बार पतले दस्त या मरोड़ की समस्या भी बनी रहती है।
  • मौन एसिडिटी (साइलेंट रिफ्लक्स): इसमें सीने में कोई स्पष्ट जलन महसूस नहीं होती, लेकिन खट्टा पानी गले की सूक्ष्म नलियों को नुकसान पहुँचाता है। इसके कारण आवाज़ बैठ जाती है, गले में लगातार कुछ अटका हुआ सा महसूस होता है और रात के समय बिना बलगम वाली सूखी खाँसी आती है।
  • नर्वस डिस्प्सीप्सिया: अत्यधिक मानसिक तनाव और चिंता के कारण जब पेट का नर्वस सिस्टम बिगड़ जाता है, तो पानी पीने या थोड़ा सा भी सादा भोजन करते ही पेट ढोलक की तरह फूल जाता है और छाती में भारीपन के कारण सांस लेने में भी तकलीफ होने लगती है।

यह समस्या कौन से संकेत देती है?

पेट की अंदरूनी परतें जब इस दूषित एसिड और सड़े हुए भोजन से छिलने लगती हैं, तो आपका शरीर बहुत पहले से ही आपको अलार्म देना शुरू कर देता है। अम्लपित्त के मुख्य और खामोश संकेत इस प्रकार हैं:

  • छाती और गले में आग जैसी जलन: भोजन करने के तुरंत बाद, झुकने पर या रात को लेटते समय सीने के बीचों-बीच और गले की नली में तेज़ जलन होना जो पानी पीने से भी शांत नहीं होती।
  • मुँह में बार-बार छाले आना: पेट की अत्यधिक गर्मी और खट्टे पानी का प्रभाव मुँह तक पहुँचता है, जिससे जीभ और गालों के अंदर बार-बार दर्दनाक छाले निकलते हैं और साँसों से एक अजीब सी खट्टी दुर्गंध आती है।
  • पेट में भारीपन और अफारा: खाना खाने के बाद ऐसा महसूस होना कि जैसे किसी ने पेट में पत्थर रख दिए हों। खाना पचता नहीं है, बल्कि पेट तन जाता है और कपड़ों को ढीला करने की इच्छा होती है।
  • अकारण सिरदर्द और जी मिचलाना: सुबह सोकर उठने पर भारी सिरदर्द होना, बिना किसी कारण के उल्टी जैसी इच्छा (मतली) महसूस होना और पूरे दिन शरीर में एक बेचैनी और चिड़चिड़ापन छाए रहना।

आगे चलकर यह क्या परेशानियाँ दे सकती है?

सालों तक रोज़ाना ठंडी गोलियाँ खाकर इस बीमारी के लक्षणों को दबाते रहना शरीर को अंदर ही अंदर बहुत गंभीर और जानलेवा बीमारियों की ओर धकेलने का काम करता है:

  • पेट और आंतों के अल्सर: जब तेज़ और दूषित एसिड लगातार पेट और आंतों की नाज़ुक परतों को छीलना शुरू करता है, तो वहां गहरे घाव बन जाते हैं। कई बार इन छिले हुए अल्सर से खून भी रिसने लगता है जो मल के रास्ते बाहर आता है।
  • भोजन नली का डैमेज होना: लगातार खट्टा पानी ऊपर आने से भोजन नली की दीवारें डैमेज होकर अपनी प्राकृतिक संरचना बदलने लगती हैं। चिकित्सा विज्ञान में इसे 'बैरेट्स इसोफेगस' कहते हैं, जो भविष्य में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का रूप भी ले सकती है।
  • हड्डियों का भुरभुरापन और कमज़ोरी: लंबे समय तक एसिड ब्लॉकर्स का इस्तेमाल पेट के उस ज़रूरी एसिड को पूरी तरह खत्म कर देता है जो कैल्शियम, आयरन और विटामिन बी-12 को पचाने के लिए अति आवश्यक होता है। इसके परिणामस्वरूप हड्डियाँ भीतर से खोखली होने लगती हैं और नसों में दर्द बैठ जाता है।
  • आंतों की पुरानी सूजन और आईबीएस: बिना पचा हुआ और सड़ा हुआ भोजन जब पेट से खिसक कर आगे आंतों में जाता है, तो वह वहां के अच्छे बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है। इससे आंतों की पुरानी सूजन और इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम जैसी लाइलाज बीमारियाँ जन्म लेती हैं।

आयुर्वेद इस समस्या को कैसे देखता है और कौन से उपाय मदद कर सकते हैं?

आधुनिक दवाइयाँ पेट के प्राकृतिक एसिड को आपका दुश्मन मानती हैं और उसे खत्म करने पर अपना पूरा ज़ोर लगाती हैं। लेकिन आयुर्वेद मानता है कि पेट का यह एसिड (पाचक पित्त) ही हमारे शरीर की ऊर्जा और सेहत का मुख्य स्रोत है। आयुर्वेद एसिड को कभी नहीं मारता, बल्कि उस 'विकृति' या गंदगी को ठीक करता है जिसके कारण वह एसिड ज़हरीला हो गया है।

जब आप बहुत ज़्यादा तीखा, मसालेदार, नमकीन, अत्यधिक गर्म और बेमेल भोजन लगातार खाते हैं, तो शरीर का पित्त दूषित होकर अपनी प्राकृतिक गर्मी से कई गुना ज़्यादा तीक्ष्ण (तेज़) हो जाता है। आयुर्वेद इस भड़के हुए पित्त को शांत करने के लिए 'शीत' (ठंडी) और 'मधुर' (मीठी) जड़ी-बूटियों का प्रयोग करता है। इसके साथ ही, जठराग्नि को एक संतुलित अवस्था में लाया जाता है ताकि खाना पेट में पड़े-पड़े सड़े नहीं, बल्कि उसका सही तरीके से रस बने। जब पेट में सड़ा हुआ 'आम' (गंदगी) बनना बंद हो जाता है, तो एसिडिटी की जड़ अपने आप सूख जाती है और पेट का वातावरण प्राकृतिक रूप से शांत हो जाता है।

एसिडिटी में राहत देने वाली आयुर्वेदिक आहार योजना

समय क्या खाएँ कैसे लाभ मिलता है
सुबह उठते ही 1–2 गिलास हल्का गुनगुना पानी या धनिया/सौंफ का पानी पेट की जलन शांत होती है और पाचन अग्नि संतुलित रहती है
सुबह खाली पेट भीगे हुए किशमिश या मीठे फल जैसे पपीता/सेब पेट पर हल्का रहता है और एसिडिटी नहीं बढ़ाता
नाश्ता (7–9 AM) ओट्स, दलिया, पोहा, मूंग चीला या इडली पेट को बिना भारी किए स्थिर ऊर्जा देता है
मिड-मॉर्निंग नारियल पानी या ताज़ा मीठा छाछ शरीर को ठंडक देता है और पित्त शांत करता है
दोपहर का भोजन घी लगी रोटी, मूंग दाल, लौकी/तोरी/परवल की सब्ज़ी, थोड़ा चावल पाचन को आराम देता है और एसिड बनने से रोकता है
भोजन के बाद 100 कदम हल्की वॉक (शतपावली) एसिड रिफ्लक्स और गैस बनने की संभावना कम होती है
शाम का हल्का स्नैक मखाना, खीरा, मीठे फल या हर्बल चाय शाम की भूख शांत करता है बिना एसिडिटी बढ़ाए
रात का भोजन (7–8 PM) मूंग दाल खिचड़ी, हल्की सब्ज़ियाँ या ओट्स रात में पेट पर दबाव नहीं पड़ता और एसिडिटी कम रहती है
सोने से पहले ठंडा दूध या मुलेठी वाला हल्का दूध पेट की म्यूकोसा परत को आराम देता है और जलन कम करता है

कौन सी जड़ी-बूटियाँ इस स्थिति को सुधारने में मदद करती हैं?

प्रकृति ने हमें ऐसे कई चमत्कारिक रसायन और वनस्पतियाँ दी हैं जो पेट की परतों को आराम पहुँचाती हैं और बिना पाचक रस को सुखाए एसिडिटी को जड़ से शांत करती हैं:

  • मुलेठी: यह पुरानी एसिडिटी के लिए एक जादुई जड़ी-बूटी है। मुलेठी पेट की अंदरूनी परत पर एक सुरक्षात्मक और चिकना लेप बना देती है, जिससे अल्सर तेज़ी से ठीक होते हैं और सीने की जलन तुरंत शांत हो जाती है।
  • आँवला: विटामिन सी और बेहतरीन एँटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर आँवला पित्त दोष को शांत करने की सबसे उत्तम औषधि है। यह पेट को गहरी ठंडक देता है, जठराग्नि को सम करता है और शरीर से एसिडिक गंदगी को बाहर निकालता है।
  • गिलोय: यह चमत्कारी बेल शरीर के बढ़े हुए तापमान और अंदरूनी सूजन को स्पंज की तरह सोख लेती है। गिलोय आंतों की इम्युनिटी को बढ़ाती है और दूषित पित्त के प्रभाव को बेअसर कर देती है।
  • धनिया और सौंफ: ये हमारी रसोई में रखे हुए दिव्य रसायन हैं। रात भर पानी में भीगे हुए साबुत धनिया और सौंफ का पानी सुबह खाली पेट पीने से यह शरीर की अत्यधिक गर्मी को चमत्कारिक रूप से शांत करता है और खट्टी डकारों पर तुरंत लगाम लगाता है।

इस समस्या के लिए सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक थेरेपीज़ कौन सी हैं?

जब वर्षों पुरानी एसिडिटी ने पेट, छाती और आंतों में बहुत गहराई तक पित्त को जमा कर दिया हो, तो पंचकर्म की ये बाहरी और आंतरिक थेरेपीज़ पूरे सिस्टम की बहुत गहरी डीप-क्लीनिंग कर देती हैं:

  • विरेचन थेरेपी: यह अम्लपित्त के लिए सबसे उत्तम और प्रधान चिकित्सा मानी गई है। इसमें कुछ दिन औषधीय घी पिलाने के बाद विशेष जड़ी-बूटियों के माध्यम से आंतों और लिवर में जमे हुए पुराने व दूषित पित्त को मल के रास्ते बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे शरीर तुरंत हल्का और ठंडा हो जाता है।
  • वमन कर्म: यदि खट्टा पानी बहुत ज़्यादा गले तक उछलता है, तो नियंत्रित उल्टी के माध्यम से पेट में जमे हुए दूषित कफ और सड़े हुए खट्टे पानी को बाहर निकाला जाता है। इससे भोजन नली और पेट की परतें एकदम साफ़ हो जाती हैं।
  • शिरोधारा: कई बार एसिडिटी का सीधा कारण आपका मानसिक तनाव होता है, क्योंकि हमारा पेट और दिमाग सीधे आपस में जुड़े हुए हैं। माथे पर औषधीय तेल की लगातार धारा गिराने से तनाव हॉर्मोन्स पिघल जाते हैं, जिससे पेट का नर्वस सिस्टम तुरंत रिलैक्स हो जाता है।
  • तक्रधारा: यह शिरोधारा का ही एक विशेष रूप है, लेकिन इसमें तेल की जगह औषधीय और ठंडी छाछ का इस्तेमाल होता है। यह सिर के ज़रिए पूरे शरीर की गर्मी और पित्त को खींचकर शांत कर देती है।

आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से इस समस्या में सुधार का समयकाल क्या है?

दवा की एक ठंडी गोली खाते ही भले आपको दस मिनट में आराम महसूस हो जाए, लेकिन बीमारी आपकी वहीं की वहीं रहती है। आयुर्वेद उस बीमारी को जड़ों से उखाड़ने के लिए एक प्राकृतिक और अनुशासित समय लेता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: सही आयुर्वेदिक डाइट और प्राकृतिक औषधियों के सेवन से आपका सीने का भारीपन, खाने के बाद की जलन और खट्टी डकारें आना काफी हद तक सामान्य हो जाएँगी। आपको सुबह उठते ही किसी गैस की गोली का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से पेट और भोजन नली में जो घाव या अंदरूनी लालिमा (सूजन) आ गई थी, वह धीरे-धीरे पूरी तरह से हील होने लगेगी। आपका मल बंधा हुआ और साफ़ आने लगेगा।
  • 5-6 महीने और आगे: आपका पूरा पाचन तंत्र एकदम नया होकर 'रीबूट' हो जाएगा। पेट की जठराग्नि इतनी मज़बूत और संतुलित हो जाएगी कि वह भोजन को सड़ाने के बजाय उसे ऊर्जा में बदल देगी। आप बिना किसी डर के, प्राकृतिक रूप से स्वस्थ और ऊर्जावान जीवन जी पाएँगे।

बार बार होने वाली एसिडिटी के इलाज में आयुर्वेद बेहतर कैसे है?

एलोपैथी मुख्य रूप से केवल लक्षणों को दबाने पर काम करती है। यदि आप सालों तक इन एसिड ब्लॉकर्स को खाते रहते हैं, तो आपका पेट वह ज़रूरी एसिड बनाना ही बंद कर देता है जो प्रोटीन और विटामिन्स को पचाने के लिए अति आवश्यक है। इसका परिणाम यह होता है कि आपका शरीर कुपोषण का शिकार हो जाता है, बाल झड़ने लगते हैं और इम्युनिटी बिल्कुल खत्म हो जाती है।

आयुर्वेद आपके पेट के स्वाभाविक एसिड को कोई दुश्मन नहीं मानता। यह आपको जीवन भर के लिए दवाइयों के कमज़ोर मोहताज नहीं बनाता। आयुर्वेद आपके खाने-पीने की गलत आदतों को सुधारता है, आपकी बिगड़ी हुई 'अग्नि' को ठीक करता है और पेट के उस पूरे वातावरण को प्राकृतिक रूप से इतना मज़बूत कर देता है कि शरीर को खुद ही पता चल जाता है कि कब और कितना एसिड बनाना है। यह कोई कृत्रिम और खोखली राहत नहीं है, बल्कि स्थायी, सुरक्षित और जड़ से किया गया उपचार है।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

हालांकि आयुर्वेद और सही आहार-विहार एसिडिटी को पूरी तरह से रिवर्स करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन यदि आपको अपने शरीर में ये कुछ बेहद खतरनाक और चेतावनी वाले बदलाव दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत मेडिकल जाँच करवानी चाहिए:

  • मल में खून आना या डामर जैसा मल: यदि आपका मल बिल्कुल डामर की तरह काला आ रहा है, तो यह पेट या आंतों में किसी गंभीर अल्सर के फटने और अंदरूनी रक्तस्राव (ब्लीडिंग) का बहुत स्पष्ट संकेत है।
  • निगलने में गंभीर परेशानी होना: यदि खाना या पानी निगलते समय गले में कुछ अटका हुआ महसूस हो या दर्द उठे, तो यह भोजन नली के अत्यधिक सिकुड़ने या डैमेज होने का गंभीर लक्षण है।
  • बिना कोशिश के वज़न का तेज़ी से गिरना: लगातार एसिडिटी के रहने के साथ अगर आपका वज़न अचानक और तेज़ी से कम हो रहा है, तो यह कैंसर या किसी बड़ी क्रॉनिक बीमारी का सीधा अलार्म हो सकता है।
  • लगातार और खून की उल्टियाँ होना: यदि आपको उल्टी में कॉफी पाउडर जैसा गहरे रंग का पदार्थ (जमा हुआ खून) दिखे या लगातार उल्टियाँ रुक ही न रही हों, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

एसिडिटी को अपनी बढ़ती उम्र या जीवन का एक सामान्य हिस्सा मानकर उसके साथ जीना बंद कीजिए। जब आप अपनी गलत दिनचर्या, अत्यधिक तनाव और विरुद्ध आहार को नज़रअंदाज़ करके रोज़ाना केवल एक ठंडी गोली निगल लेते हैं, तो आप अपनी बीमारी का इलाज नहीं कर रहे होते, बल्कि अपने शरीर के बचाव तंत्र और अलार्म सिस्टम को म्यूट कर रहे होते हैं। बिना सही 'अग्नि' और बिना मजबूत पाचन तंत्र के, आपके पेट में गया हुआ सबसे पौष्टिक और महँगा भोजन भी पचने के बजाय महज़ एक ज़हर के समान बन जाता है।दवाइयों के इस कृत्रिम जाल से बाहर निकलें। अपने शरीर को भीतर से ठंडा करने और भड़के हुए पित्त को शांत करने के लिए मुलेठी, आँवला, गिलोय और सौंफ जैसी शुद्ध व दिव्य जड़ी-बूटियों पर भरोसा करें। अपनी जठराग्नि को प्राकृतिक रूप से रीसेट करें ताकि वह भोजन को सड़ाने के बजाय उससे ऊर्जा बनाए।

डॉक्टर की सलाह सीधे अपने फोन पर — WhatsApp Channel से जुड़ें।

FAQs

सुबह के समय पेट बिल्कुल खाली होता है और उसमें रात भर का एसिड मौजूद होता है। चाय और कॉफी में मौजूद कैफीन सीधे तौर पर पेट की परतों को उत्तेजित करता है और पित्त दोष को भड़काता है, जिससे एसिड का स्तर अचानक बढ़ जाता है और गैस व जलन पैदा होती है।

तत्काल राहत के लिए ठंडा दूध गले और सीने की जलन को कुछ मिनटों के लिए शांत कर सकता है। लेकिन दूध पचने में बहुत भारी होता है। जैसे ही यह पेट में पहुँचकर पचना शुरू होता है, शरीर को इसे पचाने के लिए और भी अधिक एसिड बनाना पड़ता है, जिससे एसिडिटी बाद में कई गुना बढ़ जाती है।

हमारा शरीर एक निर्धारित समय पर भोजन पचाने के लिए पाचक रस (एसिड) छोड़ता है। जब आप लंबे समय तक कुछ नहीं खाते, तो वह एसिड पेट की अंदरूनी खाली परतों को ही छीलना शुरू कर देता है, जिसके कारण सीने में तेज़ जलन और गैस बनने लगती है।

हमारा पेट और दिमाग एक विशेष नर्वस सिस्टम से जुड़े होते हैं। जब आप बहुत अधिक तनाव में होते हैं, तो शरीर स्ट्रेस हॉर्मोन छोड़ता है जो पेट की जठराग्नि को धीमा कर देते हैं। इससे खाना ठीक से नहीं पचता और पेट में सड़ांध पैदा होती है जो एसिडिटी का मुख्य कारण बनती है।

भोजन करने के बाद पेट में एसिड और खाने का मिश्रण होता है। जब आप तुरंत लेट जाते हैं, तो गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) के अभाव में पेट का वाल्व कमज़ोर पड़ जाता है और यह खट्टा तरल पदार्थ आसानी से पीछे की ओर भोजन नली और गले में वापस बहने लगता है।

आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों के अनुसार, रात का भोजन सोने से कम से कम तीन घंटे पहले कर लेना चाहिए। इससे भोजन को पचने और पेट से आगे आंतों में खिसकने का पूरा समय मिल जाता है, जिससे सोते समय एसिड रिफ्लक्स की संभावना लगभग खत्म हो जाती है।

एसिडिटी में मीठी और पतली छाछ (जिसमें भुना जीरा और धनिया हो) सबसे बेहतरीन होती है, क्योंकि यह पचने में हल्की होती है और पेट को ठंडक देती है। वहीं, खट्टा दही पित्त को बढ़ाता है और पचने में बहुत भारी होता है, जिससे एसिडिटी और ज़्यादा भड़क सकती है।

शरीर को भोजन से मिलने वाले कैल्शियम को सोखने (एब्जॉर्ब करने) के लिए पेट में एक निश्चित मात्रा में एसिड की ज़रूरत होती है। रोज़ाना ये दवाइयाँ खाने से एसिड बनना बंद हो जाता है, जिससे कैल्शियम शरीर को नहीं मिल पाता और हड्डियाँ भुरभुरी होकर कमज़ोर होने लगती हैं।

अजवाइन और जीरा दोनों में ऐसे प्राकृतिक वाष्पशील तेल (Essential oils) होते हैं जो पाचक रसों के स्राव को संतुलित करते हैं। यह पानी पेट की जकड़न को खोलता है, रुकी हुई गैस को नीचे की ओर धकेलता है और पेट के भारीपन को तुरंत प्राकृतिक रूप से दूर कर देता है।

लगातार एक ही जगह बैठे रहने से आंतों की स्वाभाविक गति (पेरिस्टाल्सिस मूवमेंट) बहुत धीमी पड़ जाती है। इसके कारण खाया हुआ भोजन पेट में ज़्यादा देर तक रुका रहता है, जिससे उसमें सड़न पैदा होती है और शरीर में गैस व एसिड का अत्यधिक निर्माण होने लगता है।

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