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Eczema गर्मी में और बढ़ जाता है — पसीने और Pitta का संबंध

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

गर्मियों का मौसम आते ही एक्जिमा (Eczema) की समस्या तेज़ी से बढ़ने लगती है। लोग इस भयंकर खुजली और लालपन से बचने के लिए रोज़ाना स्टेरॉयड क्रीम या लोशन का इस्तेमाल करते हैं। ये क्रीम कुछ समय के लिए खुजली को दबा देती हैं, लेकिन पसीना आते ही या असर खत्म होते ही त्वचा पर फिर से दाने और जलन वापस आ जाती है। आयुर्वेद के अनुसार, गर्मी के मौसम में त्वचा की यह समस्या बिगड़े हुए 'पित्त दोष' और अशुद्ध रक्त का परिणाम है। पसीने में मौजूद टॉक्सिन्स जब रोमछिद्रों में फँसते हैं, तो एक्जिमा और भड़क जाता है।

Eczema और पसीने का संबंध क्या है?

एक्जिमा एक ऐसी स्थिति है जहाँ त्वचा की ऊपरी परत पर भारी रूखापन, लालपन और खुजली आ जाती है। एक सामान्य इंसान में पसीना शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है, लेकिन एक्जिमा के मरीज़ में पसीने के साथ निकलने वाले टॉक्सिन्स ('आम') कटी-फटी त्वचा में भारी जलन पैदा करते हैं। लोग इसके लिए स्टेरॉयड क्रीम लगाते हैं, जो बीमारी को त्वचा के अंदर ही दबा देती हैं। लेकिन इससे रक्त में मौजूद अशुद्धि खत्म नहीं होती। बिना डॉक्टर की सलाह के सिर्फ बाहरी लोशन पर निर्भर रहना त्वचा को हमेशा के लिए पतला और कमज़ोर कर देता है।

Eczema और त्वचा रोग से जुड़ी मुख्य बीमारियाँ कौन सी हैं?

त्वचा की तकलीफ और एलर्जी से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • एटॉपिक डर्मेटाइटिस (Atopic Dermatitis): यह एक्जिमा का सबसे आम रूप है, जहाँ कोहनियों और घुटनों के पीछे भयंकर खुजली होती है।
  • कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस (Contact Dermatitis): पसीने, धूल या किसी केमिकल के सीधे संपर्क में आते ही त्वचा का लाल हो जाना।
  • डिशिड्रोटिक एक्जिमा (Dyshidrotic Eczema): हथेलियों और पैरों के तलवों पर पानी से भरे छोटे-छोटे दाने निकलना।
  • सोरायसिस (Psoriasis): हालाँकि यह अलग है, लेकिन इसमें भी त्वचा पर लाल और पपड़ीदार चकत्ते बन जाते हैं।

गर्मी में Eczema और पित्त वृद्धि के लक्षण और संकेत

स्टेरॉयड से आराम मिलने के बाद बीमारी का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • असहनीय खुजली (Itching): खासकर रात के समय या पसीना आने पर शरीर में सुई चुभने जैसी भयंकर खुजली होना।
  • त्वचा का लाल और गर्म होना: प्रभावित हिस्से को छूने पर गर्माहट महसूस होना और त्वचा का छिल जाना।
  • पानी वाले दाने: त्वचा पर छोटे-छोटे दाने निकलना जिनमें से कई बार चिपचिपा पानी या खून निकलता है।
  • रूखी और पपड़ीदार त्वचा: त्वचा का इतना रूखा हो जाना कि वह खिंचने लगे और पपड़ी बनकर झड़ने लगे।
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी: स्टेरॉयड क्रीम का असर खत्म होते ही कुछ ही घंटों में जलन का फिर से शुरू हो जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार Eczema लौटने के कारण (पित्त और रक्त दृष्टि)

गर्मियों में बार-बार एक्जिमा होने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • पित्त दोष का भड़कना: गर्मी का मौसम और मसालेदार खाना शरीर में 'पित्त' (गर्मी) को भड़काता है, जो खून को दूषित कर त्वचा पर दाने निकालता है।
  • पसीने में जमे टॉक्सिन्स: पसीने में यूरिया और नमक होता है, जो एक्जिमा वाली रूखी त्वचा पर लगते ही भयंकर एसिड की तरह काम करता है।
  • कमज़ोर पाचन और 'आम': पेट साफ न होने से शरीर में विषैले टॉक्सिन्स ('आम') बनते हैं, जो खून के ज़रिए त्वचा तक पहुँचते हैं।
  • स्टेरॉयड पर निर्भरता: रोज़ाना भारी क्रीम लगाने से त्वचा की रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाती है और वह बाहरी एलर्जी को रोक नहीं पाती।
  • मानसिक तनाव: तनाव सीधा पित्त को बढ़ाता है, जिससे बिना किसी कारण के खुजली भड़क उठती है।

Eczema के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

इस खुजली को अगर अनदेखा किया जाए या सिर्फ लोशन के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • त्वचा का स्थायी रूप से मोटा होना (Lichenification): लगातार खुजलाने से त्वचा हाथी की खाल जैसी मोटी और काली पड़ जाती है।
  • भयंकर इन्फेक्शन (Infection): त्वचा छिलने से बैक्टीरिया अंदर चले जाते हैं और पस वाले घाव बन जाते हैं।
  • नींद में रुकावट: रात में खुजली उठने से नींद पूरी नहीं होती, जिससे दिनभर भारी थकान और चिड़चिड़ापन रहता है।
  • मानसिक तनाव और अवसाद: खराब त्वचा के कारण इंसान बाहर निकलने से कतराने लगता है और डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

एक्जिमा (विर्चचिका) पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से एक्जिमा सिर्फ त्वचा की ऊपरी दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'विर्चचिका' या त्वचा रोग की श्रेणी में रखा जाता है। यह मुख्य रूप से बिगड़े हुए पित्त दोष और दूषित रक्त (रक्त दृष्टि) का परिणाम है। जब पाचक अग्नि कमज़ोर होती है, तो शरीर में जमा 'आम' रक्त में मिलकर उसे दूषित कर देता है। गर्मियों में पसीने के ज़रिए यह टॉक्सिन त्वचा से बाहर आने की कोशिश करता है और जलन पैदा करता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर ढूँढते हैं कि पित्त और रक्त का स्तर कितना बिगड़ चुका है। आयुर्वेद में बस क्रीम लगाकर बीमारी को दबाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि खून साफ हो, पित्त शांत हो और त्वचा प्राकृतिक रूप से अंदर से हील हो।

पित्त शांत करने और Eczema दूर करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में खून को साफ करने, पित्त शांत करने और त्वचा को निखारने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • नीम (Neem): यह आयुर्वेद की सबसे बेहतरीन एंटी-बैक्टीरियल और रक्त शोधक (Blood purifier) औषधि है, जो त्वचा के हर इन्फेक्शन को काटती है।
  • मंजिष्ठा (Manjistha): यह दूषित रक्त को साफ कर त्वचा के लालपन और भयंकर जलन को तुरंत शांत करती है।
  • खदिर (Khadir): यह त्वचा रोगों के लिए अमृत है, जो पसीने से होने वाली खुजली और दानों को अंदर से खत्म करती है।
  • गिलोय (Giloy): यह इम्युनिटी को मज़बूत करती है और शरीर से सारे विषैले टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर त्वचा को नया जीवन देती है।

त्वचा को हील करने के लिए पंचकर्म: रक्तमोक्षण और पित्त शमन

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित रक्त को बाहर निकालकर बेदाग त्वचा पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • विरेचन और रक्तमोक्षण: जब एक्जिमा सालों पुराना हो और व्यक्ति स्टेरॉयड पर निर्भर हो, तो पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली वात-पित्त नाड़ियों और रक्त की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • पित्त का डिटॉक्स (विरेचन): इसमें औषधीय घी पिलाकर आँतों और लिवर में जमे हुए दूषित पित्त को मल के रास्ते पूरी तरह बाहर निकाला जाता है।
  • दूषित खून निकालना (रक्तमोक्षण): लीच थेरेपी (जौंक) के प्रयोग से प्रभावित हिस्से का गंदा खून निकाला जाता है, जिससे भयंकर खुजली में जादुई तरीके से आराम मिलता है।

एक्जिमा (खुजली और त्वचा की बीमारी) में क्या खाएं और किन चीजों से बचें?

इस बीमारी में शरीर की गर्मी और खून की खराबी को दूर करने के लिए ऐसा खाना खाना चाहिए जो पेट को ठंडा रखे और आसानी से पच जाए:

खाने में ये चीजें जरूर लें:

  • लौकी, तोरई, परवल जैसी हरी सब्जियां और पुराना चावल खूब खाएं। ये चीजें पेट को ठंडा रखती हैं और अंदर गर्मी नहीं बनने देतीं।
  • दिन भर में खूब सारा सादा पानी और नारियल पानी पिएं। इससे शरीर के अंदर की सारी गंदगी पसीने के रास्ते बाहर निकल जाती है।
  • सब्जी-दाल बनाते समय धनिया, जीरा और सौंफ का इस्तेमाल करें। ये मसाले शरीर की जलन और खुजली को बहुत जल्दी कम करते हैं।

इन चीजों से बिल्कुल दूर रहें:

  • लाल मिर्च, अचार, टमाटर और खट्टे फल (जैसे संतरा और नींबू) खाना बिल्कुल छोड़ दें। ये चीजें शरीर की गर्मी और खुजली को बहुत ज्यादा भड़का देती हैं।
  • बाहर का खाना, पिज्जा, पैकेट वाली चीजें और चाय-कॉफी एकदम बंद कर दें। ये हमारी चमड़ी (स्किन) के लिए जहर की तरह काम करते हैं।
  • अंडा और मीट-मछली खाने से पूरी तरह बचें। इनसे खून गंदा होता है और एक्जिमा की परेशानी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।

पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगता है?

त्वचा की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे एक्जिमा कितना पुराना है और स्टेरॉयड पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर खुजली की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही लालपन और दाने कम होने लगते हैं।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है और त्वचा काली पड़ चुकी है, तो खून साफ होने और प्राकृतिक रंग वापस आने में 6 महीने से 1 साल भी लग सकता है।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में पित्तनाशक जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म और सही खानपान शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: डाइट का कड़ाई से पालन करने पर खून हमेशा के लिए साफ हो जाता है और भविष्य में बिना किसी क्रीम के भी एक्जिमा लौटकर नहीं आता।

आधुनिक उपचार और पित्त-आधारित आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य स्टेरॉयड लोशन और एंटी-एलर्जिक दवाओं से खुजली दबाना दूषित रक्त को साफ कर पित्त संतुलित करना और त्वचा को भीतर से हील करना
नज़रिया त्वचा की समस्या को केवल बाहरी एलर्जी मानना अशुद्ध रक्त, बढ़े पित्त और अंदरूनी दोष असंतुलन को मूल कारण मानना
उपचार तरीका स्टेरॉयड क्रीम और एंटी-एलर्जिक गोलियों पर निर्भरता नीम, मंजिष्ठा, रक्तमोक्षण और जड़ी-बूटियों से प्राकृतिक उपचार
डाइट और लाइफस्टाइल केवल एलर्जी से बचने की सीमित सलाह पित्त-शामक आहार, डिटॉक्स और प्राकृतिक दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर लोशन छोड़ते ही बीमारी दोबारा और तेज़ रूप में लौटना त्वचा की प्राकृतिक हीलिंग और दीर्घकालिक स्थायी आराम मिलना

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • त्वचा पर लगातार खुजलाने से घाव बन जाएँ और उनमें से पीला पानी या खून आने लगे।
  • पसीना आते ही शरीर में असहनीय जलन और चुभन महसूस हो।
  • खुजली के कारण रात भर नींद न आए और चिड़चिड़ापन बढ़ जाए।
  • स्टेरॉयड क्रीम लगाने के बाद भी दाने और लालपन में कोई कमी न आ रही हो।

समय पर सलाह लेने से शरीर को बड़े इन्फेक्शन से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के अनुसार गर्मी में एक्जिमा (Eczema) का बढ़ना शरीर में बिगड़े हुए 'पित्त दोष' और दूषित रक्त (रक्त दृष्टि) का सीधा संकेत है। गर्मियों में मसालेदार खाने और भारी तनाव से पाचक अग्नि कमज़ोर होती है और 'आम' बनता है। पसीने में मौजूद नमक जब इन टॉक्सिन्स के साथ मिलकर त्वचा के रोमछिद्रों में फँसता है, तो वह भयंकर खुजली और जलन पैदा करता है। बाहरी स्टेरॉयड लोशन सिर्फ बीमारी को अंदर दबाते हैं। खून को साफ करने वाली जड़ी-बूटियाँ (नीम, मंजिष्ठा), सही आहार और पंचकर्म अपनाकर इस बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, पसीने में सोडियम और यूरिया जैसे टॉक्सिन्स होते हैं। जब यह पसीना एक्जिमा वाली कटी-फटी और नाज़ुक त्वचा पर लगता है, तो यह एसिड की तरह काम करता है और भयंकर खुजली व जलन पैदा करता है।

नहीं, स्टेरॉयड क्रीम सिर्फ त्वचा की नसों को कुछ समय के लिए सुन्न कर देती हैं और बीमारी को अंदर दबा देती हैं। क्रीम छोड़ते ही पित्त और अशुद्ध रक्त के कारण दाने फिर से लौट आते हैं।

बिल्कुल, टमाटर, नींबू, अचार और खट्टे फल शरीर में सीधे पित्त (गर्मी) को भड़काते हैं। खून में अम्लता बढ़ने से एक्जिमा के लाल चकत्ते तुरंत भयंकर रूप ले लेते हैं।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार जब पित्त बहुत ज़्यादा दूषित हो जाता है, तो यह त्वचा के नीचे तरल पदार्थ के रूप में जमा हो जाता है, जो छोटे-छोटे पानी वाले दानों और खुजली का कारण बनता है।

नीम एक प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और शक्तिशाली रक्त शोधक (Blood purifier) है। यह दूषित खून को अंदर से साफ करता है, त्वचा के इन्फेक्शन को मारता है और एक्जिमा की भयंकर खुजली को तुरंत शांत करता है।

हाँ, भारी तनाव और चिंता शरीर में पित्त और वात दोष दोनों को बढ़ा देते हैं, जिससे नर्वस सिस्टम उत्तेजित होता है और बिना किसी बाहरी कारण के भी शरीर में खुजली शुरू हो जाती है।

गर्म पानी एक्जिमा वाली त्वचा की प्राकृतिक नमी को छीनकर उसे और ज़्यादा रूखा बना देता है। हमेशा हल्के गुनगुने या ताज़े पानी से नहाना चाहिए, जिससे त्वचा शांत रहे और पित्त न भड़के।

हाँ, रक्तमोक्षण त्वचा रोगों में सबसे अचूक पंचकर्म है। यह शरीर के प्रभावित हिस्से से दूषित और गंदे खून को चूसकर बाहर निकाल देता है, जिससे एक्जिमा के पुराने घाव भी तेज़ी से भरने लगते हैं।

नारियल का तेल स्वभाव से बहुत ठंडा (पित्तशामक) और स्निग्ध होता है। यह त्वचा को गहराई से नमी देता है, पसीने की जलन को कम करता है और घावों को प्राकृतिक रूप से भरता है।

हाँ, रेड मीट, अंडे और ज़्यादा मसालेदार खाना पचने में भारी होते हैं और सीधे रक्त को अशुद्ध (रक्त दृष्टि) करते हैं। शरीर की गर्मी बढ़ने से त्वचा पर खुजली और सूजन कई गुना बढ़ जाती है।

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