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बुज़ुर्गों को बार -बार Constipation - Laxative Daily सही है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आज के समय में बुज़ुर्गों में कब्ज़ की दिक्कत बहुत आम हो गई है। ऐसे में कई लोग तुरंत आराम पाने के लिए रोज़ लैक्सेटिव (पेट साफ करने वाली दवा या चूर्ण) खाने लगते हैं। शुरू में तो इससे बड़ा आराम मिलता है, लेकिन इसका लगातार इस्तेमाल आपके कुदरती पाचन को बुरी तरह बिगाड़ सकता है। उम्र ढलने के साथ हाज़मा धीमा होना, पानी कम पीना, उठना-बैठना कम होना और दवाइयों के असर से कब्ज़ और बढ़ जाती है। जल्दी राहत के चक्कर में लोग इन दवाओं के गुलाम बन जाते हैं, जो आगे चलकर भारी पड़ता है। इसलिए यह समझना बहुत ज़रूरी है कि रोज़-रोज़ पेट साफ करने की गोली खाना कितना सही है और कब ये आदत शरीर को कमज़ोर कर सकती है।

कब्ज़ (Constipation) आखिर होता क्या है? 

कब्ज़ का सीधा सा मतलब है मल त्यागने (फ्रेश होने) में भारी परेशानी होना या पेट का पूरी तरह से साफ न होना। कभी-कभार एक-आध दिन पेट साफ न हो तो चलता है, लेकिन अगर ये दिक्कत बार-बार हो रही है, तो समझ लीजिए कि पेट का सिस्टम डगमगा गया है। इसमें मल एकदम पत्थर जैसा हो जाता है और उसे बाहर निकालने के लिए बहुत ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़ता है। इसी वजह से पेट में हमेशा भारीपन और अजीब सी बेचैनी बनी रहती है।

बुज़ुर्गों में कब्ज़़ इतनी आम क्यों हो जाती है? उम्र ढलने के साथ शरीर की मशीनरी धीरे-धीरे सुस्त पड़ने लगती है। इसका सीधा असर पेट पर भी पड़ता है, यही वजह है कि उम्रदराज लोगों में कब्ज़ की शिकायत इतनी आम है। कई बार तो ये दिक्कत इतनी लंबी खिंच जाती है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी ही अज़ाब बन जाती है।

बुज़ुर्गों में कब्ज़़ के मुख्य कारण

  • पाचन की सुस्ती: उम्र बढ़ने के साथ शरीर का मेटाबॉलिज़्म सुस्त पड़ जाता है, जिससे खाना बहुत देर से पचता है और कब्ज़ होने लगती है।
  • एंजाइम्स का कमज़ोर होना: खाना पचाने वाले रस अपना काम ठीक से नहीं कर पाते, जिससे खाना पचने के बजाय अंदर ही पड़ा रहता है।
  • आंतों की सुस्ती: आंतों की चाल बहुत सुस्त हो जाती है, जिससे मल को आगे खिसकने में काफी समय लगता है।
  • कम चलना-फिरना: बुज़ुर्गों का हिलना-डुलना कम हो जाता है, जिसका सीधा असर उनके पाचन पर पड़ता है।
  • पानी कम पीना: कई बुज़ुर्ग पानी बहुत कम पीते हैं, जिससे मल एकदम सूखकर सख्त हो जाता है और पेट साफ होने में जान निकल जाती है।
  • दवाइयों का असर: लंबे समय तक चलने वाली कुछ दवाइयों की गर्मी से भी कब्ज़ की दिक्कत पैदा हो जाती है।

कब्ज़़ के संकेत और लक्षण कब्ज़ 

सिर्फ पेट साफ न होने तक ही सीमित नहीं है, शरीर इसके कई इशारे पहले से देने लगता है जिन्हें अक्सर लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

  • पेट साफ न होना: एक-दो दिन तक वाशरूम न जा पाना कब्ज़ का सबसे बड़ा इशारा है।
  • सख्त मल आना: मल का इतना कड़क और सूखा होना कि उसे पास करने में बहुत ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़े।
  • पेट में भारीपन: ज़रा सा खाने पर या खाली पेट भी ऐसा लगना कि पेट एकदम भरा और भारी है।
  • गैस: पेट में खूब गैस बनना और पेट गुब्बारे की तरह फूल जाना बहुत आम बात है।
  • भूख मर जाना: जब पेट ही साफ नहीं होगा, तो खाने का मन भी बिल्कुल नहीं करता।
  • अधूरा पेट साफ होना: वाशरूम से आने के बाद भी ऐसा लगना कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ है।

लैक्सेटिव क्या होता है और क्या इसे रोज़ लेना सही है? 

लैक्सेटिव वो दवा या चूर्ण है जो कब्ज़ के समय पेट साफ करने के काम आती है। यह आंतों की चाल को तेज़ करके या मल को नरम करके उसे बाहर धकेलती है। इसीलिए लोग तुरंत आराम के लिए इसे खा लेते हैं। लेकिन भाई, इसे रोज़ खाना बिल्कुल सही नहीं है। शुरू-शुरू में तो ये मज़ा देता है, लेकिन लंबे समय तक इसके भरोसे रहने से आपकी आंतें और असली पाचन एकदम सुस्त पड़ जाता है। शरीर को इसकी ऐसी लत लग जाती है कि बिना गोली के पेट साफ होना नामुमकिन सा लगने लगता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह पर ही, कभी-कभार इसका इस्तेमाल करना चाहिए ताकि शरीर मज़बूत बना रहे।

लैक्सेटिव शरीर में कैसे काम करते हैं? 

ये दवाएं बस इमरजेंसी में पेट साफ करने का काम करती हैं, लेकिन ये आपके हाज़मे का पक्का इलाज नहीं हैं।

  • आंतों की चाल बढ़ाना: कुछ लैक्सेटिव आंतों को भड़काते हैं जिससे मल बहुत तेज़ गति से आगे बढ़ता है।
  • पानी खींचना: कुछ दवाएं आंतों में पानी भर देती हैं, जिससे सूखा हुआ मल फूलकर नरम हो जाता है।
  • मल को मुलायम करना: कुछ दवाएं सीधे मल को इतना सॉफ्ट कर देती हैं कि उसे निकालना आसान हो जाता है।
  • आंतों की सफाई: ये आंतों में चिपके मल को बाहर निकालकर कुछ देर की शांति दे देती हैं।

बार-बार लैक्सेटिव लेने से क्या नुकसान हो सकते हैं? 

लगातार इन पेट साफ करने वाली दवाओं को फांकने से शरीर पर बहुत बुरे असर पड़ते हैं। शुरू की राहत आगे चलकर बहुत भारी पड़ती है।

  • पानी सूखना (डिहाइड्रेशन): इन दवाओं से शरीर का सारा पानी बाहर निकल जाता है, जिससे भयानक कमज़ोरी और डिहाइड्रेशन हो जाता है।
  • मिनरल्स का बिगड़ना: शरीर के ज़रूरी नमक (सोडियम-पोटैशियम) का बैलेंस टूट जाता है, जिससे थकान और चक्कर आने लगते हैं।
  • लत लग जाना: धीरे-धीरे शरीर इनका ऐसा मोहताज हो जाता है कि बिना चूर्ण के वाशरूम जाना पहाड़ लगने लगता है।
  • आंतों की कमज़ोरी: रोज़ के इस्तेमाल से आंतों का अपना कुदरती ज़ोर एकदम खत्म हो जाता है और हाज़मा बैठ जाता है।
  • पेट में मरोड़: कई लोगों को इन दवाओं की वजह से पेट में भयंकर ऐंठन और मरोड़ उठने लगती है।

बुज़ुर्गों की पाचन शक्ति क्यों कमजोर हो जाती है? 

उम्र के साथ शरीर की खाना पचाने की ताक़त धीरे-धीरे जवाब देने लगती है। आयुर्वेद कहता है कि पेट की 'अग्नि' ठंडी पड़ जाती है, जिससे खाना पचता नहीं है। इसके अलावा, शरीर में खाना पचाने वाले रस भी कम बनने लगते हैं और मेटाबॉलिज़्म एकदम सुस्त पड़ जाता है। नतीजा ये होता है कि खाना अंदर ही पड़ा रहता है और शरीर की गंदगी को बाहर निकालने का रास्ता पूरी तरह जाम हो जाता है।

आयुर्वेद में कब्ज़़ को कैसे समझा जाता है? 

आयुर्वेद की मानें तो कब्ज़ सीधा वात बिगड़ने का नतीजा है। जब शरीर में वात बहुत ज़्यादा भड़क जाता है, तो आंतों की चाल और आपका पाचन पूरी तरह डगमगा जाते हैं। इससे मल सूख जाता है और फ्रेश होने में भारी दिक्कत आती है। वात का तो काम ही है सूखापन और बेतरतीब चाल। इसके बिगड़ने पर मल एकदम कड़क हो जाता है, जिससे पेट पूरी तरह साफ नहीं हो पाता। इसके अलावा, पेट की आग (अग्नि) का कमज़ोर पड़ना भी कब्ज़ की एक बड़ी वजह है। जब हाज़मा ढीला पड़ता है, तो भूख मर जाती है, पेट में गैस बनती है और हमेशा भारीपन लगता है। ऐसे में शरीर अंदर की गंदगी को बाहर नहीं फेंक पाता और कब्ज़ की दिक्कत और गहरी हो जाती है।

कब्ज़ दूर करने वाली असरदार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में कुछ ऐसी चुनिंदा और परखी हुई औषधियां हैं, जो हाज़मे को वापस ट्रैक पर लाती हैं। ये कोई आम जुलाब (Laxative) नहीं हैं जो सिर्फ एक दिन के लिए पेट साफ करें, बल्कि ये सिस्टम को अंदर से ठीक करती हैं:

  • त्रिफला चूर्ण: तीन फलों का यह सबसे पुराना और भरोसेमंद नुस्खा आंतों की बेहतरीन सफाई करता है और पूरे हाज़मे को एकदम चकाचक कर देता है।
  • इसबगोल: इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर होता है। यह आंतों में जाकर सूखे और कड़क मल को नरम बनाता है, जिससे बिना किसी तकलीफ के पेट तुरंत साफ हो जाता है।
  • हरड़ (हरीतकी): आयुर्वेद में इसे पेट के लिए 'अमृत' माना गया है। यह सुस्त पड़ी आंतों को जगाती है और शरीर की नेचुरल सफाई प्रक्रिया को काफी तेज़ कर देती है।

कब्ज़ से राहत दिलाने वाली खास आयुर्वेदिक थेरेपी

पंचकर्म और आयुर्वेद की इन खास प्रक्रियाओं से आंतों की चाल सुधरती है और शरीर की सारी जकड़न पूरी तरह खत्म हो जाती है:

  • अभ्यंग (हर्बल तेल मालिश): जब जड़ी-बूटियों में पके हुए हल्के गर्म तेल से पूरे बदन और पेट की मालिश होती है, तो भड़का हुआ वात एकदम शांत हो जाता है और आंतों की जकड़न खुल जाती है।
  • स्वेदन (औषधीय भाप): तेल मालिश के ठीक बाद भाप लेने से शरीर के अंदर तक गर्माहट पहुंचती है। इससे आंतों में चिपका हुआ मल पिघलने लगता है और आसानी से बाहर खिसक जाता है।
  • बस्ती चिकित्सा: कब्ज़ और वात की बीमारियों में इसे 'ब्रह्मास्त्र' माना जाता है। इसमें आंतों के रास्ते खास औषधीय काढ़ा या तेल पहुंचाया जाता है, जो पुरानी से पुरानी कब्ज़ को जड़ से साफ कर देता है और वात को कंट्रोल में रखता है।
  • नाड़ी स्वेदन: इसमें एक खास नली के जरिए पेट और आस-पास के हिस्सों पर हर्बल भाप दी जाती है। इससे पेट का भारीपन तुरंत कम होता है और पूरा सिस्टम फिर से अच्छे से काम करने लगता है।

सहायक आहार: क्या खाएं/क्या न खाएं

सही आहार शरीर को हल्का, सक्रिय और संतुलित बनाए रखने में मदद कर सकता है।

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • हरी सब्जियां और मौसमी फल
  • मूंग दाल और सुपाच्य भोजन
  • पर्याप्त पानी और हल्के पेय
  • सीमित मात्रा में घी
  • सूखे मेवे और पौष्टिक आहार

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • अत्यधिक मीठा और भारी भोजन
  • पैकेट बंद और कृत्रिम खाद्य पदार्थ
  • बहुत ज्यादा चाय और कॉफी
  • देर रात भोजन करना
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

डॉक्टर से कब सलाह लें?

घर के बड़े-बुज़ुर्गों में कब्ज़ की दिक्कत अगर लगातार बनी हुई है, तो इसे महज़ 'बुढ़ापे की आम समस्या' समझकर टालना बिल्कुल सही नहीं है। अगर नीचे बताई गई परेशानियां दिखें, तो बिना देरी किए डॉक्टर से मिलना चाहिए:

  • कई दिन तक पेट जाम रहना: जब कई-कई दिन तक पेट साफ ही न हो और हर वक्त बेचैनी या भारीपन लगे।
  • हद से ज्यादा ज़ोर लगाना: टॉयलेट में बहुत ज्यादा ज़ोर लगाने के बाद भी पेट ठीक से खाली न हो पाए।
  • लगातार पेट दर्द और गैस: पेट में हर समय भारीपन, भयंकर गैस या मीठा-मीठा दर्द बना रहे।
  • भूख मर जाना: खाने-पीने का मन न करे और शरीर में अंदर से कमज़ोरी लगने लगे।
  • दवाओं की लत: जब बिना जुलाब (पेट साफ करने वाली दवा या चूर्ण) खाए काम ही न चले।
  • मल का कड़क होना: मल बहुत ज्यादा सूखा, कड़क या असामान्य आने लगे।
  • वजन गिरना: बिना वजह वजन कम होने लगे और शरीर हर वक्त थका-थका सा रहे।
  • रूटीन खराब होना: जब पेट की इस दिक्कत की वजह से रोज़मर्रा के उठने-बैठने और कामों में अड़चन आने लगे।

निष्कर्ष

यह सच है कि उम्र बढ़ने के साथ बुज़ुर्गों में कब्ज़ होना एक बहुत आम बात है, लेकिन इसे सिर्फ 'उम्र का तकाज़ा' मानकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। आज की मेडिकल साइंस इसे हमारी खराब लाइफस्टाइल, खान-पान और दवाइयों के साइड-इफेक्ट से जोड़कर देखती है। वहीं, आयुर्वेद के मुताबिक यह शरीर में भड़के हुए 'वात', कमज़ोर पड़ चुके हाज़मे और आंतों में आई खुश्की (सूखेपन) का सीधा नतीजा है।

पेट साफ करने वाले चूर्ण या गोलियों (Laxatives) के सहारे ज़िंदगी बिताना इसका पक्का इलाज बिल्कुल नहीं है। अगर सही रूटीन, हल्का और सुपाच्य खाना, भरपूर पानी और हल्की-फुल्की वॉक (शारीरिक गतिविधि) करने की आदत डाली जाए, तो इस परेशानी को बहुत आसानी से काबू में किया जा सकता है और पूरे पाचन तंत्र को नेचुरली मजबूत बनाया जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

कब्ज़़ हर बार गंभीर समस्या नहीं होती, लेकिन अगर यह बार-बार हो या लंबे समय तक बना रहे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार यह सिर्फ लाइफस्टाइल या खानपान की वजह से भी हो सकता है। समय पर ध्यान देने से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

हां, कम पानी पीना कब्ज़़ का एक बड़ा कारण हो सकता है। शरीर में पानी की कमी से मल सूखा और सख्त हो जाता है। इससे पेट साफ होने में कठिनाई बढ़ जाती है। इसलिए पर्याप्त पानी पीना बहुत जरूरी होता है।

हां, कब्ज़़ के साथ गैस बनना और पेट फूलना बहुत आम बात है। जब पाचन धीमा होता है तो भोजन सही से नहीं पचता। इससे पेट में भारीपन और असहजता महसूस होती है। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रह सकती है।

हां, कम शारीरिक गतिविधि से पाचन तंत्र की गति धीमी हो जाती है। चलने-फिरने से आंतों की मूवमेंट बेहतर होती है। जब गतिविधि कम होती है तो मल आगे बढ़ने में समय लगता है। इससे कब्ज़़ की समस्या बढ़ सकती है।

हां, कब्ज़़ के कारण पेट में असहजता और भारीपन नींद को प्रभावित कर सकते हैं। कई बार व्यक्ति को बार-बार उठना पड़ता है या नींद गहरी नहीं होती। खराब पाचन नींद की गुणवत्ता को भी कम कर सकता है।

हां, जब पेट साफ नहीं होता तो भूख कम लग सकती है। पाचन सही न होने की वजह से खाने का मन भी कम होता है। इससे शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता। लंबे समय तक यह कमजोरी बढ़ा सकता है।

 अगर कब्ज़़ बार-बार हो रहा है तो इसे सामान्य नहीं मानना चाहिए। यह शरीर में किसी असंतुलन का संकेत हो सकता है। बार-बार समस्या होने पर ध्यान देना जरूरी होता है। समय पर सुधार करने से समस्या बढ़ने से रोका जा सकता है।

हां, पाचन खराब होने पर व्यक्ति चिड़चिड़ा और थका हुआ महसूस कर सकता है। पेट में असहजता मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती है। इससे मन शांत नहीं रहता और बेचैनी बढ़ सकती है।

कब्ज़़ में तुरंत राहत जरूरी नहीं होती, लेकिन लंबे समय तक समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार यह धीरे-धीरे ठीक होता है। अगर समस्या बढ़ रही हो तो ध्यान देना जरूरी है।

हां, लगातार कब्ज़़ रहने से शरीर में भारीपन और कमजोरी महसूस हो सकती है। पाचन सही न होने से ऊर्जा का स्तर भी कम हो सकता है। इससे व्यक्ति जल्दी थका हुआ महसूस करता है।

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