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Steroid Cream बंद करते ही Psoriasis वापस — Rebound क्यों?

Information By Dr. Keshav Chauhan

स्टेरॉयड क्रीम (Steroid Creams) और भारी दवाओं का इस्तेमाल सोरायसिस (Psoriasis) जैसी स्किन से जुड़ी गंभीर बीमारियों में काफी आम है। ये क्रीम त्वचा की ऊपरी सतह पर मौजूद लालिमा, सूजन और पपड़ी को कुछ समय के लिए कम कर देती हैं या बिगड़े हुए इम्यून सिस्टम (Immune System) को तुरंत दबा देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि दवाओं का असर खत्म होने के तुरंत बाद या क्रीम का इस्तेमाल बंद करते ही फिर से भयंकर खुजली, लाल चकत्ते और पपड़ी झड़ने की समस्या होने लगती है और बीमारी पहले से भी बड़े और भयंकर रूप में वापस आ जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में 'रिबाउंड (Rebound)' कहते हैं। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार स्टेरॉयड के इस्तेमाल से त्वचा का पतला होना, बीमारी कितनी गंभीर है, दवाओं पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर के अंदर मौजूद अशुद्ध रक्त और टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और त्वचा की सेहत बनी रहे।

सोरायसिस और रिबाउंड की समस्या क्या है?

सोरायसिस एक ऐसी स्थिति है, जहाँ हमारा इम्यून सिस्टम ही हमारी त्वचा की कोशिकाओं (Cells) पर हमला कर देता है। एक सामान्य इंसान में त्वचा की नई कोशिकाएँ बनने में हफ्तों का समय लगता है, लेकिन सोरायसिस के मरीज़ में ये कोशिकाएँ कुछ ही दिनों में बनकर त्वचा के ऊपर जमा होने लगती हैं। इसके कारण लाल चकत्ते, भारी खुजली और सफेद पपड़ी (Scales) झड़ने जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। आमतौर पर लोग इसका शिकार कमज़ोर इम्युनिटी, मानसिक तनाव, आनुवांशिकी (Genetics) या गलत खानपान के कारण होते हैं। स्टेरॉयड क्रीम लगाने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये क्रीम सिर्फ ऊपरी सतह को शांत करती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस रक्त दोष को ठीक नहीं करतीं जिसके कारण कोशिकाएँ बार-बार बनती हैं। दवा का बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना त्वचा और अंगों पर बुरा असर डालता है। क्रीम छोड़ते ही बीमारी का दुगनी तेज़ी से वापस आना 'रिबाउंड फ्लेयर (Rebound Flare)' कहलाता है।

यह बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

त्वचा की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से सोरायसिस की ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • प्लाक सोरायसिस (Plaque Psoriasis): यह सबसे आम है। इसमें कोहनी, घुटनों और सिर (Scalp) पर लाल चकत्ते और मोटी सफेद पपड़ी जम जाती है।
  • गटेट सोरायसिस (Guttate Psoriasis): यह अक्सर बचपन या जवानी में किसी इन्फेक्शन के बाद होता है। इसमें शरीर पर पानी की बूँदों जैसे लाल दाने हो जाते हैं।
  • पस्टुलर सोरायसिस (Pustular Psoriasis): इसमें त्वचा पर मवाद (Pus) भरे दाने निकल आते हैं और तेज़ दर्द व जलन होती है।
  • सोरायटिक अर्थराइटिस (Psoriatic Arthritis): इसमें त्वचा की पपड़ी के साथ-साथ जोड़ों में भयंकर दर्द और सूजन आ जाती है।

सोरायसिस रिबाउंड के लक्षण और संकेत

स्टेरॉयड से आराम मिलने के बाद बीमारी का बार-बार लौट आना रक्त की गंभीर अशुद्धि का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • त्वचा का लाल होना: क्रीम छोड़ते ही त्वचा पर अचानक तेज़ लालिमा आ जाना और सूजन का बढ़ना।
  • भयंकर खुजली: रात के समय या पसीना आने पर शरीर में असहनीय खुजली होना।
  • पपड़ी का झड़ना: कपड़ों या बिस्तर पर हमेशा सफेद पपड़ी या डैंड्रफ जैसा पाउडर गिरना।
  • जलन और दर्द: त्वचा छिलने के कारण वहाँ तेज़ जलन और सुई चुभने जैसा दर्द होना।
  • त्वचा का फटना: खुजलाने के कारण चकत्तों का फट जाना और उनमें से खून बहना।
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी: स्टेरॉयड क्रीम का असर खत्म होते ही कुछ ही दिनों के भीतर बीमारी का फिर से तेज़ी से फैलने लगना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार समस्या लौटने (Rebound) के मुख्य कारण क्या हैं?

क्रीम छोड़ने पर बार-बार सोरायसिस लौटने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • रक्त और आम का संचय: गलत खान-पान जैसे विरुद्ध आहार (दूध के साथ खट्टी चीज़ें) खाने से शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है। यह रक्त (खून) को अशुद्ध कर देता है।
  • स्टेरॉयड पर निर्भरता: तुरंत राहत के लिए लंबे समय तक स्टेरॉयड क्रीम लगाने से त्वचा प्राकृतिक रूप से खुद को हील करना भूल जाती है और बहुत पतली (Skin Thinning) हो जाती है।
  • मानसिक तनाव: स्ट्रेस (Stress) और चिंता से शरीर में वात दोष बिगड़ता है, जो सोरायसिस के लक्षणों को तुरंत भड़का देता है।
  • कमज़ोर इम्युनिटी: इम्यून सिस्टम का अत्यधिक आक्रामक होना, जिससे कोशिकाएँ बहुत तेज़ी से बढ़ने लगती हैं।
  • खराब पाचन और कब्ज़: पेट साफ न होना और पाचन कमज़ोर होने से शरीर की गंदगी बाहर नहीं निकल पाती और अशुद्धि के रूप में त्वचा पर दिखने लगती है।

समस्या के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

सोरायसिस की बीमारी को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इसका अंदरूनी इलाज न मिले, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • जोड़ों को स्थायी नुकसान: सालों तक सोरायसिस रहने से यह सोरायटिक अर्थराइटिस बन सकता है, जिससे उँगलियाँ और जोड़ हमेशा के लिए टेढ़े हो सकते हैं।
  • हृदय रोग का खतरा: शरीर में लगातार सूजन रहने से हृदय को खून पंप करने में दिक्कत होती है, जिससे ब्लड प्रेशर और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
  • मानसिक तनाव और डिप्रेशन: लगातार त्वचा खराब दिखने के डर से इंसान का लोगों से मिलना-जुलना मुश्किल हो जाता है, जिससे वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।
  • अन्य अंगों पर दबाव: लंबे समय तक स्टेरॉयड और भारी दवाइयाँ खाने से लिवर और किडनी पर भारी नुकसान पहुँचता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित आयुर्वेदिक इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से सोरायसिस सिर्फ बाहरी त्वचा की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'कुष्ठ रोग', 'एककुष्ठ' या 'किटिभ' की श्रेणी में रखा जाता है। यहाँ यह माना जाता है कि जब शरीर में वात और कफ दोष बुरी तरह बिगड़ जाते हैं और रक्त, रस और लसिका (त्वचा की परतों) में जाकर बैठ जाते हैं, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी और त्वचा की स्थिति देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं पेट में 'आम' यानी टॉक्सिन्स तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने खून को दूषित कर दिया है। जब तक यह अशुद्धि शरीर में रहेगी, सोरायसिस की तकलीफ बार-बार लौटकर आती रहेगी। आयुर्वेद में बस पपड़ी हटाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, रक्त की सफाई हो, पाचन सुधरे और त्वचा प्राकृतिक रूप से मज़बूत बने ताकि स्टेरॉयड की ज़रूरत ही न पड़े।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: मरीज़ को दिख रहे सभी लक्षणों, खुजली के समय और पपड़ी की प्रकृति की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: मरीज़ की पिछली बीमारियाँ, पहले इस्तेमाल की गई स्टेरॉयड क्रीम (Steroids) और खायी गई भारी दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: मरीज़ के रोज़ाना के खान-पान, विरुद्ध आहार लेने की आदत और नींद को परखा जाता है।
  • मानसिक स्थिति: सोरायसिस में मानसिक तनाव बहुत बड़ा कारण होता है, इसलिए मरीज़ की मानसिक शांति पर भी ध्यान दिया जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और बिगड़े हुए दोषों को पकड़ने के बाद ही मरीज़ के लिए रक्त शोधन का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

सोरायसिस की समस्या के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में रक्त को साफ करने, खुजली मिटाने और त्वचा को मज़बूती देने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • नीम (Neem): आयुर्वेद में इसे त्वचा रोगों के लिए सबसे बेहतरीन औषधि माना गया है। यह खून को साफ करती है और इन्फेक्शन को  खत्म करती है।
  • मंजिष्ठा (Manjistha): यह रक्त शोधक है और त्वचा की सूजन व लालिमा को कम करती है। इसका असर चकत्तों को तेज़ी से सुखाने में होता है।
  • गिलोय (Giloy): यह बेहतरीन इम्यून-मॉड्यूलेटर है। इसके इस्तेमाल से इम्युनिटी सही होती है और स्ट्रेस कम होता है।
  • खदिर (Khadir): यह जड़ी-बूटी त्वचा के गहरे रोगों को काटने में अचूक है। यह शरीर में नया 'आम' नहीं बनने देती।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: शरीर की अंदरूनी सफाई और पोषण

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, जमे हुए टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य और स्वस्थ त्वचा पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और शोधन: जब सोरायसिस सालों पुराना हो, बार-बार रिबाउंड हो रहा हो और व्यक्ति स्टेरॉयड पर निर्भर हो चुका हो, तो जीवा आयुर्वेद में विरेचन और रक्तमोक्षण जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों और रक्त की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • टॉक्सिन्स बाहर निकालना: 'विरेचन' प्रक्रिया में मरीज़ को औषधीय घी पिलाकर आँतों की सफाई की जाती है। इससे लिवर में जमा पुराना पित्त और गंदगी पूरी तरह बाहर निकल जाती है।
  • रक्तमोक्षण (Leech Therapy): जोंक (Leech) के ज़रिए अशुद्ध खून को त्वचा के प्रभावित हिस्से से बाहर निकाला जाता है, जिससे लालिमा और खुजली तुरंत गायब हो जाती है।

सोरायसिस के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, सोरायसिस की समस्या को दूर करने के लिए हल्का, ताज़ा और पित्त दोष को शांत करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • लौकी, तोरई और मूंग दाल: पचने में हल्की और ठंडी तासीर वाली सब्ज़ियों का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह खून को साफ रखने में मदद करते हैं।
  • भरपूर पानी और शुद्ध घी: दिन भर पर्याप्त पानी पिएँ। भोजन में शुद्ध गाय का घी शामिल करें, यह शरीर के अंदर के रूखेपन को  खत्म करता है।
  • ताज़े फल: सेब, अनार और पपीता खाएँ, जो शरीर को अंदर से ताक़त देते हैं।

क्या न खाएँ?

  • विरुद्ध आहार: दूध के साथ मछली, प्याज़, लहसुन या खट्टे फलों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, यह त्वचा रोगों का सबसे बड़ा कारण है।
  • खट्टी और मसालेदार चीज़ें: अचार, इमली, टमाटर और लाल मिर्च का सेवन न करें, यह पित्त और खुजली को तुरंत बढ़ाते हैं।
  • मैदा और जंक फूड: पिज़्ज़ा, बर्गर, पैकेटबंद चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, क्योंकि ये शरीर में सूजन और 'आम' बढ़ाते हैं जिससे चकत्ते भड़कने लगते हैं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ ऊपर-ऊपर से लक्षण देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, खुजली के समय और पपड़ी झड़ने के लक्षणों को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी पुरानी बीमारी और पहले इस्तेमाल किए गए स्टेरॉयड क्रीम के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और विरुद्ध आहार लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और पेट साफ होने की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।
  • चकत्तों के फैलाव और त्वचा की लाली को बारीकी से समझा जाता है।
  • अगर कमज़ोर इम्युनिटी की शिकायत है, तो उसे भी ध्यान में रखा जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपकी त्वचा को भीतर से पूरी तरह साफ करे।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में सोरायसिस की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे बीमारी कितनी पुरानी है, शरीर के कितने हिस्से में फैली है, और मरीज़ की स्टेरॉयड पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर स्किन की परेशानी की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही खुजली कम होने लगती है और पपड़ी झड़ना रुक जाता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है और व्यक्ति रोज़ स्टेरॉयड क्रीम लगाता है, तो रक्त को पूरी तरह साफ होने और दोषों को संतुलित होने में 6 महीने से 1 साल या उससे अधिक भी लग सकता है।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से रक्तशोधक जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म, सही खानपान और ध्यान (Meditation) शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो इम्युनिटी मज़बूत हो जाती है और भविष्य में बिना स्टेरॉयड के भी स्किन बिल्कुल साफ रहती है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य पेनकिलर, स्टेरॉयड और इंजेक्शन से दर्द दबाना वात दोष शांत कर नसों को भीतर से मज़बूत करना
नज़रिया नसों की समस्या को केवल दर्द या सूजन मानना वात असंतुलन, मज्जा धातु की कमजोरी और टॉक्सिन्स को मूल कारण मानना
उपचार तरीका Painkillers, steroid injections और अंत में सर्जरी जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म और प्राकृतिक पोषण से नसों की हीलिंग
डाइट और लाइफस्टाइल दवाओं और आराम पर अधिक निर्भरता वात-शामक आहार, तेल चिकित्सा और संतुलित दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर दवा छोड़ते ही दर्द लौटना और सर्जरी की नौबत आना नसों की प्राकृतिक मजबूती और दीर्घकालिक स्थायी आराम मिलना

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

सोरायसिस की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • चकत्ते तेज़ी से पूरे शरीर पर फैलने लगें और भयंकर खुजली हो।
  • लगातार खुजलाने से त्वचा फट जाए और उसमें से खून आने लगे।
  • त्वचा में मवाद (Pus) भर जाए या बुखार महसूस हो।
  • मानसिक तनाव इतना बढ़ जाए कि आप लोगों से मिलना छोड़ दें।
  • स्टेरॉयड क्रीम छोड़ने के बाद बीमारी दुगनी तेज़ी से लौट आए।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और शरीर को बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से स्टेरॉयड छोड़ने पर बार-बार लौटने वाला सोरायसिस (Rebound) मुख्य रूप से वात-कफ दोष के बिगड़ने तथा रक्त के अशुद्ध होने से जुड़ा होता है। गलत खान-पान (विरुद्ध आहार), भारी तनाव, और खराब पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स ('आम') बनते हैं जो खून को गंदा कर देते हैं। यही गंदगी त्वचा के ज़रिए पपड़ी और खुजली के रूप में बाहर आती है। सिर्फ बाहरी स्टेरॉयड क्रीम लगाने से त्वचा कुछ देर के लिए साफ हो जाती है लेकिन बीमारी अंदर ही रहती है और क्रीम छोड़ते ही भड़क जाती है। इलाज में रक्त शुद्धि सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें दोषों को संतुलित करना, हल्का और ताज़ा खाना खाना, नीम और मंजिष्ठा जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना, और तनाव मुक्त दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से ठीक किया जा सके।

FAQs

स्टेरॉयड सिर्फ बाहरी लक्षणों को दबाते हैं। क्रीम छोड़ते ही शरीर का दबा हुआ इम्यून सिस्टम तेज़ी से प्रतिक्रिया करता है, जिससे बीमारी दुगनी ताक़त से वापस आती है।

बिल्कुल नहीं, यह छूने, साथ खाने या हाथ मिलाने से नहीं फैलती। यह शरीर के अंदर के इम्यून सिस्टम की समस्या है।

आयुर्वेद के अनुसार, सोरायसिस में भारी और क्रीम वाला दूध कम पीना चाहिए, और इसे कभी भी खट्टे फलों या नमक के साथ (विरुद्ध आहार) नहीं लेना चाहिए।

हाँ, सर्दियों में हवा रूखी और ठंडी होती है जो त्वचा की नमी छीन लेती है, जिससे खुजली और पपड़ी (Scales) तेज़ी से बढ़ने लगती हैं।

हाँ, बहुत ज़्यादा तनाव या चिंता शरीर में वात दोष और हार्मोन्स को बिगाड़ देती है, जिससे सोरायसिस के चकत्ते अचानक से भड़क जाते हैं।

हाँ, गुनगुने पानी में नीम के पत्ते या खदिर का काढ़ा डालकर नहाने से खुजली शांत होती है और त्वचा साफ रहती है।

आयुर्वेदिक इलाज, पंचकर्म और सही डाइट के लंबे समय तक कड़ाई से पालन से सोरायसिस को जड़ से नियंत्रित किया जा सकता है और स्टेरॉयड से हमेशा के लिए छुटकारा मिल सकता है।

नहीं, केमिकल वाले साबुन त्वचा को और रूखा बनाते हैं। इसकी जगह बेसन या मुल्तानी मिट्टी जैसे प्राकृतिक लेप का इस्तेमाल करना चाहिए।

हाँ, सोरायसिस पुराना होने पर यह जोड़ों को प्रभावित कर सकता है जिसे सोरायटिक अर्थराइटिस (Psoriatic Arthritis) कहते हैं। इसमें जोड़ों में भयंकर दर्द होता है।

आयुर्वेद के अनुसार, सोरायसिस में लाल मांस (Red meat) और भारी मांसाहार नहीं खाना चाहिए क्योंकि यह पचने में भारी होता है और खून में गर्मी (पित्त) बढ़ाता है।

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