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Internal Piles vs External — आपको कौन से हैं? लक्षण से पहचानें

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

सुबह उठकर वॉशरूम जाना दिन की सबसे सामान्य शुरुआत होनी चाहिए, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं होता। भागदौड़ और अपनी डेस्क जॉब पर घंटों लगातार बैठे रहने (Long sitting) के बाद, जब मल त्याग करते समय असहनीय दर्द होता है या पॉट में खून की कुछ बूंदें दिखाई देती हैं, तो दिमाग सुन्न पड़ जाता है। इंटरनेट खंगालने पर एक ही खौफनाक शब्द सामने आता है, बवासीर या पाइल्स (Piles / Hemorrhoids)।

लेकिन क्या आपको पता है कि हर पाइल्स एक जैसी नहीं होती? कुछ लोगों को भयंकर दर्द होता है लेकिन खून नहीं आता, जबकि कुछ को खून की धार बहती है लेकिन दर्द बिल्कुल नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि सूजी हुई नसें (Veins) आंत के अंदर हैं या बाहर। जब तक आप यह नहीं समझेंगे कि आपको इंटरनल (Internal) पाइल्स हैं या एक्सटर्नल (External), तब तक कोई भी क्रीम या चूर्ण आपकी समस्या को जड़ से खत्म नहीं कर सकता। अपनी इस सुविधाजनक जीवनशैली (Convenience lifestyle) के बीच आइए इस बीमारी के खामोश डैमेज को डिकोड करें और समझें कि आयुर्वेद की नज़र से आपका पाचन तंत्र (Digestive system) क्या अलार्म बजा रहा है।

Internal Piles vs External Piles: असली अंतर क्या है?

पाइल्स असल में कोई ट्यूमर या गांठ नहीं है; ये आपके मलाशय (Rectum) और गुदा (Anus) की सूजी हुई और लटकी हुई नसें (Veins) हैं।

  • इंटरनल पाइल्स (Internal Piles): ये मलाशय के अंदर (dentate line के ऊपर) होते हैं। क्योंकि इस हिस्से में दर्द महसूस करने वाली नसें (Pain receptors) नहीं होतीं, इसलिए इंटरनल पाइल्स में अक्सर दर्द नहीं होता। इसका सबसे बड़ा लक्षण है मल त्याग करते समय चमकीला लाल खून (bright red blood) आना। कई बार ज़ोर लगाने पर ये मस्से (prolapsed hemorrhoids) बाहर आ जाते हैं और फिर अपने आप अंदर चले जाते हैं।
  • एक्सटर्नल पाइल्स (External Piles): ये गुदा के बिल्कुल बाहरी हिस्से पर होते हैं जहाँ दर्द महसूस करने वाली नसें बहुत सेंसिटिव होती हैं। इसमें भयंकर दर्द होता है, खासकर बैठते या चलते समय। इनमें अक्सर खून नहीं आता, लेकिन अगर इन सूजी हुई नसों के अंदर खून का थक्का (Blood clot) जम जाए (Thrombosed piles), तो दर्द बर्दाश्त से बाहर हो जाता है और यह एक सख्त, नीले रंग की गांठ जैसा महसूस होता है।

दोषों के अनुसार पाइल्स (अर्श) के प्रकार

आयुर्वेद में पाइल्स को अर्श कहा गया है (जो दुश्मन की तरह प्राण हर ले)। शरीर के बिगड़े हुए दोषों के अनुसार इसके लक्षण अलग होते हैं:

  • वात-प्रधान अर्श (सूखा और दर्दनाक): यह अक्सर लगातार रहने वाली कब्ज़ के कारण होता है। मस्से सूखे, कड़े और गहरे रंग के होते हैं। इसमें खून नहीं आता, लेकिन सुई चुभने जैसा भयंकर दर्द और लोअर एब्डोमिनल पेन व गैस रहती हैं। इसके लिए वात दोष कम करने के उपाय बेहद ज़रूरी हैं।
  • पित्त-प्रधान अर्श (जलन और खून): इसमें मस्से लाल या पीले रंग के होते हैं। भयंकर खून आता है और ऐसा लगता है मानो गुदा मार्ग में आग लग गई हो। इसके लिए पित्त शांत करने वाले आहार लेना अनिवार्य है।
  • कफ-प्रधान अर्श (भारीपन और श्लेष्मा): मस्से बड़े, चिकने और हल्के रंग के होते हैं। दर्द कम होता है लेकिन चिपचिपा पदार्थ (Mucus) आता रहता है, जिससे हर वक्त योनि या गुदा के पास गीलापन और भारीपन रहता है।

क्या आपका शरीर भी अंदरूनी डैमेज के ये अलार्म बजा रहा है?

पाइल्स रातों-रात नहीं बनते। आंतों का नर्वस सिस्टम कई खामोश संकेत देता है, जिन्हें हम अक्सर साधारण गैस मान लेते हैं:

  • टॉयलेट पेपर पर ताज़ा खून: मल त्यागने के बाद कमोड में या टॉयलेट पेपर पर चमकीले लाल खून की बूंदें (यह इंटरनल पाइल्स का सबसे बड़ा लक्षण है)।
  • बैठने में भयंकर परेशानी: ऑफिस की कुर्सी पर या ड्राइविंग करते समय गुदा में भारी चुभन महसूस होना (एक्सटर्नल पाइल्स का अलार्म)।
  • हर वक्त इनकम्प्लीट इवैक्युएशन की भावना: मल त्याग करने के बाद भी ऐसा महसूस होना कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ है और कुछ फँसा हुआ है।
  • गुदा के आस-पास भयंकर खुजली (Pruritus Ani): सूजन और म्यूकस के रिसाव के कारण वहां की त्वचा इरिटेट हो जाती है, जिससे रात के समय असहनीय खुजली होती है।

कब्ज़ और दर्द से बचने के चक्कर में लोग क्या भयंकर गलतियाँ करते हैं?

असहजता और दर्द के कारण लोग अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं जो आंतों को हमेशा के लिए अपाहिज कर देते हैं:

  • टॉयलेट में स्मार्टफोन लेकर बैठना: कॉमोड पर बैठकर 20-30 मिनट तक रील्स या सोशल मीडिया देखना। इससे पेल्विक एरिया की नसों पर भयंकर ग्रेविटी और खिंचाव पड़ता है, जो पाइल्स का सबसे बड़ा कारण है।
  • तेज़ लैक्सेटिव्स (Laxatives) की लत: रोज़ रात को पेट साफ करने वाली तेज़ चूर्ण (जैसे सनाय पत्ती) खाना। ये आंतों की अंदरूनी परत को छील देते हैं और नसों को ढीला कर देते हैं।
  • मल त्यागते समय भयंकर ज़ोर (Straining) लगाना: कब्ज़ होने पर मल को ज़बरदस्ती बाहर धकेलने की कोशिश करना, जिससे नसें सूजकर बाहर (Prolapse) आ जाती हैं।
  • लगातार मानसिक तनाव: तनाव के कारण फाइट या फ्लाइट मोड एक्टिव रहता है, जिससे आंतों में खून का संचार रुक जाता है और आईबीएस (IBS) या कब्ज़ की समस्या जन्म लेती है।

आयुर्वेद अर्श (Piles) के इस विज्ञान को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान इसे केवल सूजी हुई नसें मानता है, लेकिन आयुर्वेद इसे अपान वात और अग्निमांद्य के भयंकर टकराव के रूप में समझता है।

  • जठराग्नि का कमज़ोर होना: आयुर्वेद और पाचन का स्पष्ट नियम है कि जब जठराग्नि कमज़ोर होती है, तो भोजन पचने के बजाय आम (Toxins) बनाता है। यह आम मल को बहुत ज़्यादा सूखा या चिपचिपा बना देता है।
  • अपान वात का ब्लॉक होना: शरीर के निचले हिस्से की गति को अपान वात चलाता है। जब रूखे मल के कारण यह वात ब्लॉक हो जाता है, तो यह उल्टी दिशा में दबाव डालता है, जिससे गुदावली (Anal sphincters) की नसें सूजकर अर्श (Piles) बन जाती हैं।
  • रक्त धातु की अशुद्धि: पित्त-प्रधान पाइल्स में जब रक्त अशुद्ध हो जाता है, तो वह सूजी हुई नसों से बाहर रिसने (Bleeding) लगता है।

नसों की सूजन कम करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

अपने शरीर को एक Buy It For Life (BIFL) संपत्ति मानें। आपकी डाइट ही आपकी आंतों का असली रिपेयर किट है। इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाएं:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - आंतों को चिकनाई और फाइबर देने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - मल को सुखाने और जलाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, दलिया, ओट्स, मूंग दाल की खिचड़ी। मैदा, वाइट ब्रेड, सूखे बिस्कुट, पैकेटबंद नूडल्स।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (आंतों के लिए सबसे बड़ा अमृत), तिल का तेल। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा रूखा और बिना तेल-घी का खाना (Zero-fat diet)।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, परवल, जिमीकंद (सूरन - पाइल्स के लिए जादुई)। भारी कटहल, बैंगन, बहुत ज़्यादा शिमला मिर्च, कच्चा सलाद (कब्ज़ में)।
फल (Fruits) पपीता, अमरूद (बीज निकालकर), रात भर भीगी हुई मुनक्का, अंजीर। कच्चे या बिना मौसम के ठंडे फल, केले।
पेय पदार्थ (Beverages) गुनगुना पानी, धनिए का पानी, छाछ (भुना जीरा डालकर)। बर्फ का पानी (पाचन के लिए ज़हर है), बहुत ज़्यादा कड़क चाय या डार्क कॉफी।

खूनी और बादी बवासीर को जड़ से खत्म करने वाली जड़ी-बूटियाँ

अगर आप अपनी नसों को सर्जरी से बचाना चाहते हैं, तो प्रकृति के इन रसायनों का सहारा लें:

  • सूरन (Jimikand / Elephant Foot Yam): आयुर्वेद में सूरन को अर्शोघ्न (पाइल्स का दुश्मन) कहा गया है। यह आंतों की सूजन को कम करता है और मस्सों को सुखाकर प्राकृतिक रूप से झाड़ देता है।
  • त्रिफला (Triphala): आंतों से सालों पुराना कचरा साफ करने और बिना लत के पेट साफ रखने के लिए त्रिफला (Triphala) का सेवन सबसे सुरक्षित है।
  • नागकेसर (Nagkesar): अगर आपको इंटरनल पाइल्स में भयंकर ब्लीडिंग हो रही है, तो नागकेसर का चूर्ण मक्खन या छाछ के साथ लेने से खून का बहना तुरंत (कुछ ही खुराकों में) रुक जाता है।
  • हरीतकी (Haritaki): यह वात का अनुलोमन करती है और आंतों की सिकुड़न (Peristalsis) को वापस लाकर मल को बिना ज़ोर लगाए बाहर धकेलती है।
  • एलोवेरा (Aloe Vera): एक्सटर्नल पाइल्स की भयंकर जलन और दर्द को बर्फ जैसी ठंडक देने के लिए ताज़े एलोवेरा जेल का स्थानीय प्रयोग (Local application) और सेवन दोनों फायदेमंद हैं।

सूजी हुई नसों को रीबूट करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात और आम आंतों में बहुत गहराई तक जम चुका हो, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत राहत देती हैं:

  • अवगाह स्वेद (Sitz Bath): त्रिफला, नीम या फिटकरी के गुनगुने काढ़े में 15-20 मिनट बैठने से एक्सटर्नल पाइल्स का दर्द, सूजन और खुजली तुरंत शांत हो जाती है।
  • मात्रा बस्ती (Matra Basti): बड़ी आंत से भयंकर वात (गैस और रूखेपन) को खत्म करने के लिए मेडिकेटेड ऑयल की मात्रा बस्ती (Matra Basti) दी जाती है। यह सीधे मलाशय को चिकनाई देती है।
  • विरेचन (Virechana): लिवर और आंतों की डीप-क्लीनिंग के लिए की जाने वाली यह विरेचन थेरेपी (Virechana therapy) शरीर से अत्यधिक पित्त और सड़े हुए चिपचिपे टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है।
  • क्षार कर्म (Kshara Karma): अगर मस्से बहुत पुराने और बड़े हो चुके हैं, तो आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से बने क्षार का लेप लगाकर उन्हें बिना सर्जरी के सुखाकर गिरा दिया जाता है।

आंतों और नसों के प्राकृतिक रूप से रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

लगातार रूखेपन और ज़ोर लगाने से डैमेज हुई नसों को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 हफ्ते: नागकेसर और सुरन के प्रभाव से ब्लीडिंग और भयंकर दर्द में तुरंत आराम मिलेगा। मल का चिपचिपापन और कड़ापन कम होगा।
  • 1-2 महीने: औषधियों और घी के सेवन से आपकी जठराग्नि सुधरेगी। एक्सटर्नल मस्सों की सूजन और खुजली लगभग खत्म हो जाएगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म (बस्ती) और रसायनों के प्रभाव से आंतों का रूखापन खत्म होने लगेगा। बाहर निकले हुए मस्से (Prolapsed piles) सिकुड़ कर अपनी जगह वापस जाने लगेंगे। आप बिना किसी खौफ के वॉशरूम जा सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

पाइल्स के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य नसों को सुन्न करने के लिए एनेस्थेटिक क्रीम्स (Anesthetic creams) और मस्सों को काटने के लिए सर्जरी (Hemorrhoidectomy) करना। अपान वात को शांत करना, जठराग्नि को बढ़ाना और 'क्षार कर्म' या जड़ी-बूटियों से मस्सों को सुखाना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल नसों (Veins) के फूलने की एक स्थानीय (Local) समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और रूखे आहार का एक संपूर्ण सिंड्रोम (अग्निमांद्य) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल केवल भारी मात्रा में फाइबर और पानी पीने की आम सलाह दी जाती है। खाने में 'स्नेहन' (घी), सही पोश्चर, और जठराग्नि के अनुसार सुपाच्य आहार पर ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर सर्जरी के बाद भी अगर कब्ज़ रही, तो कुछ सालों में मस्से दोबारा (Recurrence) बन जाते हैं। शरीर की जठराग्नि और आंतें अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि बीमारी जड़ से खत्म हो जाती है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस वात और पाइल्स को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • मल में बहुत ज़्यादा खून बहना (Heavy Bleeding): अगर मल त्यागते समय खून की धार बहने लगे और चक्कर या भयंकर कमज़ोरी (Anemia) महसूस होने लगे।
  • मल का रंग बिल्कुल काला (Tar-like) होना: अगर मल डामर जैसा काला और भयंकर बदबूदार आए (यह पेट या ऊपरी आंतों में ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है)।
  • असहनीय और लगातार दर्द: अगर एक्सटर्नल पाइल्स में खून का थक्का जम जाए (Thrombosed piles) और दर्द इतना भयंकर हो कि लेटना भी मुश्किल हो जाए।
  • मल का आकार पेंसिल की तरह पतला होना: अगर लगातार आपका मल रिबन या पेंसिल की तरह बहुत पतला आने लगे (यह आंतों में किसी अन्य रुकावट या ट्यूमर का अलार्म हो सकता है)।

निष्कर्ष

पाइल्स केवल गुदा मार्ग की बीमारी नहीं है; यह एक चीखता हुआ अलार्म है कि आपका प्रोसेसर (जठराग्नि) भारी और रूखे खाने को डिकोड नहीं कर पा रहा है और आंतें अपना लचीलापन खो चुकी हैं। दर्द निवारक क्रीम्स और सर्जरी के डरावने चक्रव्यूह से बाहर निकलें। कच्ची सब्ज़ियों और रूखे ओट्स को हमेशा अच्छे से पकाकर और शुद्ध गाय के घी के साथ खाएं। सूरन, त्रिफला और नागकेसर जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और अगर समस्या पुरानी है तो पंचकर्म की मात्रा बस्ती थेरेपी से अपनी सूखी हुई आंतों को प्राकृतिक चिकनाई देकर नया जीवन दें। बवासीर के इस दर्दनाक बोझ को अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा न बनने दें, और अपने पाचन तंत्र को स्थायी रूप से फौलादी बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

अगर आपको टॉयलेट पेपर या पॉट में ताज़ा लाल खून दिखता है लेकिन कोई दर्द नहीं होता, तो यह इंटरनल पाइल्स (Internal Piles) है। अगर आपको गुदा के बाहर मटर के दाने जैसी सख्त गांठ महसूस होती है, जिसमें बैठने या चलने पर भयंकर दर्द होता है, तो वह एक्सटर्नल पाइल्स (External Piles) है।

यह एक आधा सच है। फाइबर आंतों के लिए झाड़ू का काम करता है, लेकिन अगर आंतों में पानी और स्नेहन (चिकनाई/घी) नहीं है, तो वही फाइबर मल को स्पंज की तरह सुखाकर पत्थर बना देता है। बहुत ज़्यादा रूखा फाइबर वात भड़काता है, जिससे कब्ज़ और पाइल्स बिगड़ जाते हैं।

शत-प्रतिशत। जब आप उकड़ू (Squat) बैठते हैं, तो प्यूबोरेक्टैलिस (Puborectalis) मांसपेशी पूरी तरह रिलैक्स हो जाती है और आंतों का एंगल सीधा हो जाता है। इससे मल बिना ज़ोर (Straining) लगाए एक बार में आसानी से बाहर आ जाता है, जिससे नसों पर दबाव नहीं पड़ता।

ईसबगोल एक प्राकृतिक बल्क-फॉर्मिंग लैक्सेटिव है, लेकिन इसे हमेशा हल्के गर्म पानी या दूध में फुलाकर (Gel form) लेना चाहिए। अगर आप इसे सूखा खाएंगे या इसके साथ पानी कम पिएंगे, तो यह आंतों में जाकर कब्ज़ को और बढ़ा देगा, जिससे पाइल्स की ब्लीडिंग ट्रिगर हो सकती है।

नहीं। बवासीर (Piles) में मलाशय की नसें सूजकर फूल जाती हैं (मस्से बन जाते हैं)। जबकि फिशर (Fissure) में कड़े मल के कारण गुदा की त्वचा में कट या चीरा लग जाता है। फिशर में मल त्यागते समय शीशा चुभने जैसा भयंकर दर्द होता है जो घंटों तक बना रहता है।

अश्वगंधा सीधे तौर पर मस्सों को नहीं सुखाता, लेकिन यह बीमारी के कारण आई भयंकर क्रोनिक फटीग (Chronic fatigue) को दूर करने और स्ट्रेस को कम करने में जादुई अश्वगंधा (Ashwagandha) रसायन का काम करता है, जो वात दोष को कंट्रोल करने में मदद करता है।

हाँ। बहुत ज़्यादा कैफीन (चाय/कॉफी) और मसालेदार खाना पित्त (गर्मी) को भड़काता है। कैफीन शरीर से पानी सोखकर (Diuretic) मल को सुखा देता है, जिससे मल त्यागते समय नसों पर रगड़ लगती है और भयंकर ब्लीडिंग व जलन शुरू हो जाती है।

नहीं। एक्यूट पाइल्स के दौरान स्क्वैट्स (Squats) या डेडलिफ्ट जैसी भारी एक्सरसाइज़ करने से पेट (Intra-abdominal pressure) और पेल्विक एरिया पर भयंकर दबाव पड़ता है, जिससे इंटरनल मस्से बाहर की ओर (Prolapse) आ सकते हैं। इस दौरान केवल वॉक या हल्के योग करें।

हाँ, फिटकरी (स्फटिका) में प्राकृतिक रूप से खून रोकने (Styptic) और सिकुड़ने (Astringent) के गुण होते हैं। गुनगुने पानी में थोड़ी सी फिटकरी डालकर बैठने से सूजन कम होती है और एक्सटर्नल पाइल्स का दर्द व ब्लीडिंग तुरंत शांत होती है।

बिल्कुल। अगर पाइल्स शुरुआती स्टेज (Grade 1 या 2) में हैं, तो आयुर्वेद की क्षार कर्म थेरेपी, वात-अनुलोमन जड़ी-बूटियाँ (सूरन, त्रिफला) और सही डाइट से सूजी हुई नसें वापस अपनी प्राकृतिक अवस्था में आ जाती हैं और सर्जरी की ज़रूरत हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।

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