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गर्मी में Jaundice (पीलिया) क्यों फैलता है? Water और Liver का संबंध

Information By Dr. Keshav Chauhan

गर्मियों का मौसम आते ही प्यास बुझाने के लिए लोग अक्सर बाहर का ठंडा पानी, बर्फ वाले जूस और गन्ने का रस पीने लगते हैं। यहीं से पीलिया (Jaundice) का सबसे बड़ा खतरा शुरू होता है। आधुनिक चिकित्सा के अनुसार, दूषित पानी में मौजूद हेपेटाइटिस ए (Hepatitis A) और ई (Hepatitis E) वायरस सीधे लिवर पर हमला करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, गर्मी के मौसम में शरीर का 'पित्त दोष' पहले से ही भड़का हुआ होता है और पाचक अग्नि कमज़ोर होती है। जब इस कमज़ोर लिवर में दूषित जल पहुँचता है, तो लिवर का काम रुक जाता है और शरीर में 'बिलीरुबिन' (Bilirubin) फैलने लगता है। सही आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और शुद्ध आहार से लिवर को फिर से मज़बूत किया जा सकता है।

गर्मी में Jaundice और Water-Liver का संबंध क्या है?

लिवर हमारे शरीर का सबसे बड़ा फिल्टर है, जो खून से गंदगी को बाहर निकालता है। जब पुरानी लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) टूटती हैं, तो एक पीला पदार्थ 'बिलीरुबिन' बनता है। स्वस्थ लिवर इसे फिल्टर करके मल-मूत्र के ज़रिए बाहर निकाल देता है। लेकिन गर्मियों में जब हम बाहर का दूषित पानी या बर्फ खाते हैं, तो उसमें मौजूद वायरस लिवर में भारी सूजन (Hepatitis) पैदा कर देते हैं। सूजा हुआ लिवर बिलीरुबिन को फिल्टर नहीं कर पाता, और यह पीला ज़हर सीधे खून में मिलकर आँखों, त्वचा और पेशाब को पीला कर देता है। यही कारण है कि जलजनित (Waterborne) बीमारियाँ गर्मी और मानसून में सबसे ज़्यादा फैलती हैं।

Jaundice और लिवर से जुड़ी मुख्य बीमारियाँ कौन सी हैं?

दूषित जल और लिवर की सूजन से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • हेपेटाइटिस ए और ई (Hepatitis A & E): यह दूषित पानी और खाने से फैलने वाला वायरल इन्फेक्शन है, जो गर्मी में पीलिया का सबसे बड़ा कारण है।
  • ऑब्सट्रक्टिव जॉन्डिस (Obstructive Jaundice): जब पित्त की नली (Bile duct) में पथरी या सूजन के कारण रुकावट आ जाए और पित्त लिवर में ही वापस जाने लगे।
  • हेमोलिटिक जॉन्डिस (Hemolytic Jaundice): जब शरीर में लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) बहुत तेज़ी से टूटने लगें और लिवर पर बिलीरुबिन का भारी ओवरलोड हो जाए।
  • अल्कोहॉलिक हेपेटाइटिस (Alcoholic Hepatitis): जो लोग शराब पीते हैं, गर्मियों में उनका लिवर पहले से ज़्यादा कमज़ोर होता है और पीलिया जल्दी पकड़ता है।

Jaundice (पीलिया) के लक्षण और संकेत

लिवर में सूजन आने के बाद शरीर में कुछ परेशानियाँ उभरना शुरू हो जाती हैं। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • आँखें और त्वचा का पीला होना: खून में बिलीरुबिन बढ़ने से आँखों का सफेद हिस्सा और त्वचा गहरे पीले रंग की हो जाती है।
  • गहरे पीले रंग का पेशाब: पेशाब का रंग सरसों के तेल जैसा गहरा पीला हो जाना।
  • सफेद या मटमैला मल: पित्त का रस आँतों में न पहुँचने के कारण मल का रंग हल्का या मिट्टी जैसा हो जाता है।
  • भयंकर थकान और भूख न लगना: शरीर का पूरी तरह टूट जाना, खाने से नफरत होना और उल्टियाँ आना।
  • पेट के दाहिने हिस्से में दर्द: लिवर में सूजन के कारण पसलियों के नीचे दाहिनी तरफ भारी दर्द और खिंचाव रहना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

गर्मियों में बार-बार पीलिया फैलने के कारण (पित्त वृद्धि और दूषित जल)

गर्मी में पीलिया होने के पीछे सिर्फ धूप नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • दूषित पानी और बर्फ (Contaminated Water): सड़क किनारे बिकने वाले गन्ने के रस, नींबू पानी या गोलगप्पे के पानी में इस्तेमाल होने वाली बर्फ में सबसे ज़्यादा बैक्टीरिया होते हैं।
  • पित्त दोष का भड़कना: बाहर की गर्मी और मसालेदार खाना शरीर के 'पित्त' (गर्मी) को बेकाबू कर देता है, जो लिवर को डैमेज करता है।
  • पाचक अग्नि का कमज़ोर होना: गर्मियों में हमारी जठराग्नि प्राकृतिक रूप से सुस्त होती है। ऐसे में भारी या दूषित खाना पचता नहीं, बल्कि ज़हर (आम) बनाता है।
  • कटे हुए फलों का सेवन: खुले में रखे कटे हुए फल (जैसे तरबूज़ या पपीता) पर मक्खियाँ बैठती हैं, जो लिवर इन्फेक्शन का सीधा कारण हैं।

Jaundice को अनदेखा करने के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

अगर पीलिया के लक्षणों को अनदेखा किया जाए या सिर्फ झाड़-फूँक के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • एक्यूट लिवर फेलियर (Acute Liver Failure): लिवर अचानक अपना सारा काम करना बंद कर सकता है, जो जानलेवा स्थिति है।
  • क्रोनिक हेपेटाइटिस: अगर वायरस लंबे समय तक लिवर में रहे, तो यह लिवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) का कारण बन सकता है।
  • मस्तिष्क पर असर (Hepatic Encephalopathy): लिवर द्वारा खून साफ न करने पर टॉक्सिन्स दिमाग में पहुँच जाते हैं, जिससे मरीज़ कोमा में जा सकता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जानलेवा जोखिमों को कम किया जा सकता है।

पीलिया (कामला रोग) पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से पीलिया सिर्फ एक इन्फेक्शन नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'कामला रोग' कहा जाता है। यह मुख्य रूप से 'रक्त' (Blood) और 'पित्त दोष' की बीमारी है। जब हम दूषित पानी या बहुत ज़्यादा मसालेदार, गर्म तासीर वाली चीज़ें खाते हैं, तो पित्त भड़क कर 'रक्त धातु' (Blood tissue) और 'मांस धातु' को जला देता है। यह दूषित पित्त लिवर से निकलकर शरीर की त्वचा, आँखों और पेशाब में फैल जाता है, जिसे कामला (Jaundice) कहते हैं। आयुर्वेद में इसका इलाज लिवर को ठंडक पहुँचाने, पित्त को मल के रास्ते बाहर निकालने और पाचक अग्नि को सुधारने पर आधारित है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का लिवर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: पीलापन, भूख में कमी और उल्टियों की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: LFT (Liver Function Test) रिपोर्ट, बिलीरुबिन का स्तर और खायी जा रही दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: रोज़ाना के खान-पान, बाहर का पानी पीने की आदत को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: पित्त असंतुलन को पकड़ने के बाद ही लिवर को डिटॉक्स करने का सबसे सटीक इलाज शुरू किया जाता है।

लिवर को ताकत देने और पीलिया दूर करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में लिवर से बिलीरुबिन को बाहर निकालने, टॉक्सिन्स साफ करने और पित्त शांत करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • कुटकी (Kutki): यह पीलिया के लिए आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है। यह लिवर की सूजन उतारती है और पित्त को मल के रास्ते बाहर निकालती है।
  • भूमि आँवला (Bhumi Amla): यह लिवर की डैमेज कोशिकाओं को नया जीवन (Rejuvenate) देती है और हेपेटाइटिस वायरस को खत्म करने में मदद करती है।
  • कालमेघ (Kalmegh): यह खून से टॉक्सिन्स को साफ कर पाचक अग्नि को तेज़ करता है, जिससे मरीज़ की खत्म हुई भूख वापस लौट आती है।
  • पुनर्नवा (Punarnava): यह लिवर की भारी सूजन को कम करती है और शरीर में रुके हुए विषैले पानी को यूरिन के ज़रिए बाहर निकालती है।

लिवर डिटॉक्स के लिए पंचकर्म: पित्त शोधन और विरेचन

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, लिवर के ज़हरीले पित्त को बाहर निकालकर संपूर्ण गट हेल्थ पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • विरेचन (Virechana): पीलिया के इलाज में विरेचन सबसे मुख्य और अचूक चिकित्सा है।
  • इलाज का समय: यह लिवर की स्थिति के अनुसार तय की जाने वाली शरीर की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • पित्त का डिटॉक्स: पीलिया में शरीर के अंदर पित्त (बिलीरुबिन) का भारी जमाव होता है। औषधीय जड़ी-बूटियाँ देकर इस दूषित पित्त को आँतों में लाया जाता है और मल (Loose motions) के ज़रिए पूरी तरह बाहर निकाल दिया जाता है। इससे आँखों और त्वचा का पीलापन जादुई तरीके से कम होने लगता है।

Jaundice के रोगी के लिए सही और शुद्ध आहार

लिवर की सूजन उतारने और पीलिया ठीक करने के लिए सबसे हल्का, बिना तेल-मसाले वाला और सुपाच्य आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • गन्ने का रस और मूली: घर पर निकाला हुआ ताज़ा गन्ने का रस और मूली के पत्तों का रस पीलिया की सबसे अच्छी प्राकृतिक दवा है।
  • उबला हुआ खाना: पुराना चावल, मूंग की पतली दाल और उबली हुई लौकी खाएँ। यह लिवर पर बिल्कुल दबाव नहीं डालता।
  • नारियल पानी और ग्लूकोज़: शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाने के लिए दिन भर नारियल पानी और उबला हुआ ठंडा पानी पिएँ।

क्या न खाएँ?

  • तेल, घी और मसाले: पीलिया के दौरान लिवर फैट (चिकनाई) को बिल्कुल नहीं पचा पाता। तली हुई चीज़ें खाने से उल्टियाँ शुरू हो जाएंगी।
  • बाहर का पानी और बर्फ: खुले में बिकने वाला जूस, बर्फ या गोलगप्पे का पानी सीधा ज़हर का काम करेगा।
  • हल्दी और लाल मिर्च: कई लोग मानते हैं कि पीलिया में हल्दी नहीं खानी चाहिए। आयुर्वेद भी इस दौरान गर्म तासीर के मसाले (हल्दी, मिर्च) बंद करने की सलाह देता है।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी और कमज़ोरी के लक्षणों को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी LFT (Bilirubin, SGOT, SGPT) रिपोर्ट के बारे में बारीकी से पूछा जाता है।
  • आपके पानी पीने के स्रोत और बाहर के खाने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी भूख, उल्टी और मल-मूत्र के रंग पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो लिवर को पूरी तरह रिकवर कर सके।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

पित्त असंतुलन और Jaundice को पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगता है?

पीलिया का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बिलीरुबिन का स्तर: ठीक होने का वक्त इस बात पर निर्भर करता है कि खून में बिलीरुबिन का लेवल कितना बढ़ा हुआ है और लिवर की सूजन कितनी है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर बिलीरुबिन 3-5 के बीच है, तो आयुर्वेदिक औषधियों और उबले आहार से 1 से 2 हफ्तों में ही पीलापन और थकान कम होने लगती है।
  • गंभीर बीमारी का समय: अगर पीलिया हेपेटाइटिस वायरस के कारण बहुत भयंकर हो गया है, तो लिवर को पूरी तरह नॉर्मल होने और ताकत वापस आने में 1 से 2 महीने लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: साफ पानी पीने और बाहर का खाना छोड़ने पर लिवर हमेशा के लिए मज़बूत हो जाता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।

आधुनिक उपचार और दोष-आधारित आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य लक्षणों को संभालते हुए लिवर को खुद रिकवर होने देना लिवर की सूजन घटाकर और बिलीरुबिन बाहर निकालकर रिकवरी तेज़ करना
नज़रिया पीलिया को वायरल संक्रमण मानकर सपोर्टिव ट्रीटमेंट देना दूषित पित्त, कमजोर अग्नि और लिवर असंतुलन को मूल कारण मानना
उपचार तरीका ग्लूकोज़, उल्टी रोकने की दवा और आराम की सलाह कुटकी, भूमि आँवला और विरेचन से लिवर डिटॉक्स व हीलिंग
डाइट और लाइफस्टाइल हल्का भोजन और आराम पर सीमित फोकस पित्त-शामक आहार, सुपाच्य भोजन और प्राकृतिक डिटॉक्स पर ज़ोर
लंबा असर रिकवरी में महीनों लगना और कमजोरी बने रहना लिवर की तेज़ रिकवरी और दीर्घकालिक प्राकृतिक स्वास्थ्य लाभ मिलना

पीलिया बढ़ने पर डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • मरीज़ को लगातार उल्टियाँ हो रही हों और पानी की एक घूँट भी पेट में न रुक रही हो (Heavy Dehydration)।
  • आँखों और त्वचा का पीलापन बहुत ज़्यादा गहरा (संतरे के रंग जैसा) हो जाए।
  • मरीज़ को बुखार के साथ-साथ बेहोशी छाने लगे या वह बहकी-बहकी बातें करने लगे (मस्तिष्क पर असर)।
  • पेट के दाहिने हिस्से में असहनीय दर्द होने लगे।

समय पर सलाह लेने से लिवर फेलियर जैसी जानलेवा स्थिति से शरीर को बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद और मेडिकल साइंस दोनों के अनुसार गर्मी के मौसम में पीलिया (Jaundice) मुख्य रूप से दूषित पानी और बर्फ से फैलता है। गर्मियों में जब हमारी पाचक अग्नि कमज़ोर होती है और 'पित्त' बढ़ा हुआ होता है, तब बाहर का गन्ने का रस या नींबू पानी लिवर में हेपेटाइटिस ए और ई वायरस पहुँचा देता है। लिवर सूज कर खून में 'बिलीरुबिन' छोड़ना शुरू कर देता है। इस स्थिति में बाहर का तेल-मसाला बिल्कुल बंद कर देना चाहिए। आयुर्वेद की कुटकी और भूमि आँवला जैसी जड़ी-बूटियाँ, और उबला हुआ शुद्ध आहार अपनाकर लिवर की सूजन उतारी जा सकती है और पीलिया को तेज़ी से जड़ से खत्म किया जा सकता है।

FAQs

गन्ने के रस में समस्या नहीं है, समस्या उसमें डाली जाने वाली अशुद्ध बर्फ और बिना धुले गन्ने या मशीन की गंदगी में है। यह दूषित पानी हेपेटाइटिस वायरस (Hepatitis A & E) का घर होता है, जो सीधा लिवर पर हमला करता है।

जब लिवर सूज जाता है, तो वह खून से बिलिरूबिन (पीला पदार्थ) को मल के रास्ते नहीं निकाल पाता। शरीर इस ज़हर को किडनी के ज़रिए पेशाब से बाहर फेंकने की कोशिश करता है, जिससे पेशाब सरसों के तेल जैसा पीला हो जाता है।

हेपेटाइटिस ए और ई वायरस संक्रमित व्यक्ति के मल (Stool) से पानी या खाने के ज़रिए फैलते हैं। अगर साफ-सफाई (Hand hygiene) न रखी जाए और संक्रमित व्यक्ति के जूठे बर्तन या पानी का इस्तेमाल किया जाए, तो यह दूसरों को भी हो सकता है।

हल्दी की तासीर गर्म होती है और पीलिया में शरीर का पित्त (गर्मी) पहले से ही बहुत बढ़ा होता है। इसलिए आयुर्वेदिक डॉक्टर पीलिया के दौरान हल्दी, लाल मिर्च और गर्म मसाले पूरी तरह बंद करवा देते हैं।

मूली के पत्तों का रस और शुद्ध (बिना बर्फ का) गन्ने का रस लिवर की कार्यक्षमता बढ़ाते हैं, शरीर को प्राकृतिक शुगर (ऊर्जा) देते हैं और बिलीरुबिन को तेज़ी से मल-मूत्र के रास्ते बाहर धकेलने में मदद करते हैं।

आयुर्वेद में पीलिया को 'कामला' कहा गया है, जो 'पित्त दोष' के भड़कने से होता है। बढ़ा हुआ दूषित पित्त लिवर से निकलकर शरीर के रक्त (खून) और त्वचा में फैलकर पीलापन लाता है।

लिवर शरीर में फैट (चिकनाई) पचाने वाला 'पित्त रस' (Bile) बनाता है। पीलिया में लिवर काम नहीं कर रहा होता, इसलिए ज़रा सा भी तेल या घी खाने पर वह पचता नहीं और तुरंत भयंकर उल्टी हो जाती है।

बिल्कुल, कुटकी आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली 'लिवर डिटॉक्स' जड़ी-बूटी है। यह लिवर की डैमेज कोशिकाओं को रिपेयर करती है और शरीर में जमे हुए बिलीरुबिन को बाहर निकालती है।

पीलिया (हेपेटाइटिस ए और ई) कई बार अपनी साइकिल पूरी करके (2-3 हफ्ते में) खुद ठीक होने लगता है, जिसका श्रेय लोग झाड़-फूँक को दे देते हैं। लेकिन लिवर को अंदर से रिपेयर करने के लिए सही डाइट और आयुर्वेदिक औषधियों की ज़रूरत होती है।

हाँ, विरेचन पंचकर्म के ज़रिए शरीर और आँतों में जमे हुए दूषित और ज़हरीले पित्त (बिलीरुबिन) को मल के (Loose motions) रास्ते बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे पीलापन बहुत तेज़ी से कम होता है।

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