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Ulcerative Colitis में Steroids की Dose कब घटाई जा सकती है? आयुर्वेदिक Plan

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आजकल पेट और पाचन से जुड़ी परेशानियाँ बहुत तेजी से पैर पसार रही हैं। इन्हीं में से एक है अल्सरेटिव कोलाइटिस, जिसमें मरीज पेट दर्द, दिनभर में कई-कई बार दस्त होना, शरीर टूटना और कभी-कभी मल के साथ खून आने जैसी गंभीर तकलीफों से जूझता है। यह ऐसी बीमारी है जो इंसान की पूरी रोजमर्रा की जिंदगी को पटरी से उतार देती है।

अक्सर इन तकलीफों को दबाने के लिए लंबे समय तक हैवी दवाइयां और स्टेरॉयड लेने पड़ते हैं। ऐसे में हर मरीज के मन में यही सवाल घूमता है कि इन भारी-भरकम दवाओं की डोज कब और कैसे कम होगी, ताकि शरीर बिना किसी सहारे के खुद को संभालना सीख सके और बीमारी दोबारा पलटकर वार न करे।

अल्सरेटिव कोलाइटिस क्या है?

अल्सरेटिव कोलाइटिस बड़ी आंत की अंदरूनी परत पर होने वाली एक गंभीर सूजन है, जो धीरे-धीरे वहां छोटे-छोटे घाव (अल्सर) बना देती है। यह कोई दो-चार दिन की बीमारी नहीं है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली (क्रोनिक) समस्या है। इसमें मरीज को बार-बार मोशन के लिए भागना पड़ता है, पेट में मरोड़ उठती है और ब्लीडिंग होती है। आंतों से लगातार खून बहने और पोषक तत्व न पच पाने के कारण शरीर में कमजोरी आ जाती है।

अल्सरेटिव कोलाइटिस: शरीर को कमजोर करने वाले मुख्य संकेत

यह बीमारी धीरे-धीरे इंसान की पूरी ताकत सोख लेती है। इसलिए इसके इन इशारों को समय रहते पहचानना बहुत जरूरी है:

  • बार-बार दस्त होना: दिनभर में कई बार अचानक पेट खराब होना और टॉयलेट के चक्कर काटना।
  • मल में खून आना: शौच के वक्त खून या मवाद (पस) का आना इस बीमारी का सबसे बड़ा और खतरनाक लक्षण है।
  • पेट में दर्द और मरोड़: पेट के निचले हिस्से में हर वक्त मीठा-मीठा दर्द या तेज ऐंठन महसूस होना।
  • कमजोरी: खाया-पीया शरीर को न लगने के कारण हर वक्त बैटरी डाउन रहना और सुस्ती छाए रहना।
  • अचानक प्रेशर बनना (Urgency): बिना संभलने का मौका दिए अचानक बहुत जोर से बाथरूम जाने की जरूरत महसूस होना।
  • वज़न का तेजी से गिरना: भूख पूरी तरह मर जाती है और बिना कुछ किए ही वज़न लगातार घटने लगता है।

अल्सरेटिव कोलाइटिस: आखिर क्यों होती है यह समस्या?

बड़ी आंत के अंदरूनी हिस्से में सूजन और घाव पैदा करने वाली इस बीमारी के पीछे कई अंदरूनी और बाहरी कारण जिम्मेदार होते हैं:

  • इम्यूनिटी का रास्ता भटक जाना: जब हमारे शरीर का अपना ही रक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) कन्फ्यूज होकर अपनी ही आंतों की स्वस्थ कोशिकाओं को दुश्मन समझकर उन पर हमला करने लगता है।
  • शरीर में हद से ज्यादा गर्मी: आयुर्वेद के मुताबिक, जब शरीर में 'पित्त दोष' बहुत ज्यादा उबलने लगता है, तो वह आंतों की नाजुक परत को जला देता है, जिससे वहां घाव और ब्लीडिंग शुरू हो जाती है।
  • गलत खान-पान: बहुत ज्यादा मिर्च-मसालेदार, तली-भुनी चीजें, जंक फूड या बासी खाना पेट के पूरे सिस्टम को बिगाड़कर आंतों में इन्फेक्शन पैदा कर देता है।
  • दिमागी तनाव और टेंशन: बहुत ज्यादा चिंता, गुस्सा या मानसिक तनाव सीधा हमारे पेट पर असर डालता है। स्ट्रेस बढ़ते ही यह बीमारी और ज्यादा भड़क जाती है।
  • पेट में कचरा (टॉक्सिन्स) जमा होना: जब खाना सही से नहीं पचता, तो वह पेट में सड़कर जहरीले तत्व बनाने लगता है। यही गंदगी आंतों की परत को बीमार कर देती है।
  • पारिवारिक इतिहास (जेनेटिक्स): कुछ मामलों में यह बीमारी खानदानी भी होती है। अगर परिवार में पहले किसी को यह दिक्कत रही हो, तो इसके होने का खतरा बढ़ जाता है।

स्टेरॉयड क्यों दिए जाते हैं?

जब अल्सरेटिव कोलाइटिस का हमला (Flare-up) बहुत तेज होता है और आंतों की सूजन बेकाबू हो जाती है, तब डॉक्टर स्टेरॉयड का सहारा लेते हैं। इनका काम आंतों में मची इस 'आग' को तुरंत बुझाना होता है:

  • सूजन पर तुरंत ब्रेक लगाना: ये दवाएं भटके हुए इम्यून सिस्टम को शांत करती हैं ताकि वह आंतों पर हमला करना बंद कर दे।
  • गंभीर स्थिति को संभालना: जब अचानक बीमारी के लक्षण बहुत उग्र हो जाते हैं, तो स्टेरॉयड उन्हें तेजी से दबाकर मरीज को राहत देते हैं।
  • दर्द और ब्लीडिंग रोकना: आंतों के घावों की सूजन घटते ही पेट का मरोड़ना और मल के साथ खून आना बंद हो जाता है।
  • सिर्फ अस्थायी राहत: याद रखने वाली बात यह है कि स्टेरॉयड कोई परमानेंट इलाज नहीं हैं; ये सिर्फ मुसीबत के वक्त स्थिति को कंट्रोल करने का एक जरिया हैं।

स्टेरॉयड का शरीर पर क्या असर होता है?

शुरुआत में स्टेरॉयड भले ही संजीवनी की तरह लगें, लेकिन लंबे समय तक इनका इस्तेमाल शरीर को अंदर से खोखला कर सकता है:

  • बीमारियों से लड़ने की ताकत घटना: इनके लगातार इस्तेमाल से शरीर की अपनी नेचुरल इम्यूनिटी इतनी कमजोर हो जाती है कि छोटे-मोटे इन्फेक्शन भी आसानी से घेर लेते हैं।
  • मेटाबॉलिज्म का डिस्टर्ब होना: ये शरीर की पूरी कार्यप्रणाली को डिस्टर्ब कर देते हैं, जिससे एनर्जी और पाचन का बैलेंस बिगड़ जाता है।
  • चेहरे और शरीर पर सूजन आना: स्टेरॉयड की वजह से शरीर में पानी रुकने लगता है (वाटर रिटेंशन), भूख बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और वज़न तेजी से भागता है।
  • हड्डियां कमजोर होना: लंबे समय तक इन्हें लेने से हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है, जिससे वे कमजोर और नाजुक हो जाती हैं।

स्टेरॉयड की खुराक अचानक क्यों नहीं घटाई जा सकती?

स्टेरॉयड की गोलियों को कभी भी अपनी मर्जी से अचानक बंद करने की भूल नहीं करनी चाहिए, यह बेहद खतरनाक हो सकता है। असल में, जब आप लंबे समय तक बाहर से स्टेरॉयड लेते हैं, तो शरीर की अपनी प्राकृतिक प्रणालियां (जो नेचुरल स्टेरॉयड बनाती हैं) सुस्त पड़ जाती हैं और पूरी तरह दवाओं पर निर्भर हो जाती हैं।

अगर आप अचानक दवा बंद कर देंगे, तो शरीर का डिफेंस सिस्टम अचानक पागल हो जाएगा और आंतों पर दुगनी रफ्तार से हमला कर देगा। इसे 'रीबाउंड इन्फ्लेमेशन' कहते हैं, जिससे बीमारी का पुराना हमला पहले से भी कहीं ज्यादा घातक रूप में वापस आ सकता है। इसीलिए डॉक्टर हमेशा इसकी डोज को 'टेपरिंग' यानी धीरे-धीरे, कतरा-कतरा कम करते हैं, ताकि शरीर को बिना दवाओं के खुद को संभालने का पूरा समय मिल सके।

आयुर्वेद की दृष्टि और जड़ से इलाज की समझ

आयुर्वेद में अल्सरेटिव कोलाइटिस को महज आंतों की बीमारी नहीं माना जाता। इसे मुख्य रूप से 'ग्रहणी विकार' और 'रक्तातिसार' (रक्त और पित्त का असंतुलन) के रूप में देखा जाता है।

बीमारी की आयुर्वेदिक जड़ें और कारण

आयुर्वेद के अनुसार, इस पूरी गड़बड़ी की शुरुआत आपके पेट से होती है:

  • कमजोर पाचन अग्नि (Mandagni): जब पेट की पाचक अग्नि ठंडी पड़ जाती है, तो खाना सही से पचने के बजाय पेट में ही रुक जाता है।
  • 'आम' यानी टॉक्सिन्स का बनना: यही अधपका भोजन शरीर में 'आम' (एक तरह का जहरीला और चिपचिपा कचरा) बनाता है, जो आंतों की दीवारों पर चिपककर वहां सूजन पैदा करता है।
  • पित्त दोष का भड़कना: भड़का हुआ पित्त (गर्मी) आंतों में अल्सर और छाले बना देता है, जिससे मल के रास्ते खून बहने लगता है।
  • वात दोष का बिगड़ना: जब वात (वायु) का बैलेंस बिगड़ता है, तो पेट में असहनीय मरोड़, सुई चुभने जैसा दर्द और बार-बार टॉयलेट भागने की बेचैनी पैदा होती है।
  • खराब लाइफस्टाइल: जरूरत से ज्यादा तीखा-खट्टा खाना, हर वक्त की मानसिक चिंता और जेनेटिक कारण इस आग में घी डालने का काम करते हैं।

अल्सरेटिव कोलाइटिस के उपचार में उपयोग की जाने वाली आयुर्वेदिक औषधियां

इस बीमारी में आयुर्वेद का पूरा फोकस शरीर की गर्मी को शांत करने पर होता है। इसलिए ऐसी जड़ी-बूटियां दी जाती हैं जो तासीर में एकदम ठंडी हों, ताकि आंतों के घाव जल्दी भरें और सूजन खत्म हो सके:

  • बेल: बेल का काम आपके बिगड़े हुए हाजमे को दोबारा पटरी पर लाना है। यह आंतों को ताकत देता है, जिससे खाना पचना बहुत आसान हो जाता है।
  • मुलेठी: पेट की अंदरूनी सूजन को खींचने और छालों (अल्सर) पर मरहम लगाने के लिए मुलेठी बहुत ही असरदार मानी जाती है।
  • शंख भस्म: जब पेट में तेजाब (एसिड) बन रहा हो और जलन हो, तो शंख भस्म उसे तुरंत ठंडा करने का काम करती है।
  • आंवला: विटामिन-C का खजाना होने के साथ-साथ यह शरीर के 'पित्त' (गर्मी) को मारता है, जिससे अंदरूनी घाव बहुत तेजी से भरते हैं।

अल्सरेटिव कोलाइटिस के उपचार में उपयोग की जाने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

सिर्फ गोलियां ही नहीं, पंचकर्म की कुछ खास थेरेपीज भी हैं जो सीधा आंतों पर काम करती हैं और मरीज को बहुत तेजी से आराम पहुंचाती हैं:

  • पिच्छा बस्ती: अल्सरेटिव कोलाइटिस में इसे किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। इसमें जड़ी-बूटियों का औषधीय काढ़ा मलद्वार (टॉयलेट के रास्ते) से अंदर दिया जाता है। यह सीधा आंतों के घावों पर जाकर एक लेयर (परत) बना देता है, जिससे ब्लीडिंग तुरंत रुक जाती है।
  • तक्र धारा: इस प्रोसेस में माथे पर लगातार औषधीय छाछ की धार गिराई जाती है। यह आपके दिमाग की सारी टेंशन को सोख लेती है और शरीर की उबलती हुई गर्मी को बिल्कुल शांत कर देती है।
  • शिरोधारा: बीमारी की वजह से उड़ी हुई नींद और स्ट्रेस को ठीक करने के लिए शिरोधारा की जाती है। दिमाग रिलैक्स रहता है, तो शरीर अपने आप तेजी से रिकवर होने लगता है।

अल्सरेटिव कोलाइटिस में सहायक आहार और जीवनशैली

सच कहें तो इस बीमारी का 70 से 80 फीसदी इलाज आपकी अपनी रसोई में ही है। आपको वो चीजें खानी हैं जो पेट में जाते ही पच जाएं और आंतों को बिल्कुल भी मेहनत न करनी पड़े:

  • छाछ: ताजी और बिना खट्टी छाछ में थोड़ा सा भुना हुआ जीरा मिला लें। अल्सर वाले पेट के लिए यह सच में किसी अमृत से कम नहीं है।
  • हल्का खाना: मूंग की पतली दाल, खिचड़ी, घीया (लौकी) और तोरई खाएं। ये चीजें पेट को बहुत आराम देती हैं और आसानी से हजम हो जाती हैं।
  • नारियल पानी: बार-बार दस्त से शरीर का जो पानी सूख जाता है, नारियल पानी उसकी कमी पूरी करता है और पेट की आग (जलन) को बुझाता है।
  • क्या न खाएं: तीखी मिर्च, गरम मसाले, खट्टे फल, चाय-कॉफी, हैवी डेयरी प्रोडक्ट्स और शराब को बिल्कुल हाथ न लगाएं।
  • रात का खाना: रात का खाना (डिनर) जितना हो सके हल्का रखें और सोने से कम से कम 2-3 घंटे पहले हर हाल में खा लें।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम रेखा कंवर है और मैं जयपुर, राजस्थान से हूँ। लगभग 4 साल पहले मुझे अल्सरेटिव कोलाइटिस की समस्या हो गई थी, जिससे मैं बहुत परेशान रहने लगी थी और मेरी पूरी सेहत प्रभावित हो गई थी। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ भी लीं, लेकिन उनसे मुझे साइड इफेक्ट्स होने लगे। फिर एक दिन मैंने टीवी पर जीवा आयुर्वेद के बारे में देखा और वहाँ जाने का निर्णय लिया। हम जीवा क्लिनिक गए और वहाँ से उपचार शुरू किया। नियमित दवाइयों और सही मार्गदर्शन से आज मैं पूरी तरह ठीक महसूस करती हूँ। मैं जीवा आयुर्वेद का दिल से धन्यवाद करती हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

इसे सिर्फ 'पेट खराब होना' समझकर इग्नोर न करें। अगर आपको ये दिक्कतें दिखें, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं:

  • शौच (मोशन) के साथ खून या मवाद (पस) आने लगे।
  • दिनभर में बार-बार दस्त के लिए भागना पड़े और पेट में तेज ऐंठन हो।
  • बिना किसी डाइटिंग के वज़न तेजी से गिरने लगे।
  • शरीर में हर वक्त थकान और सुस्ती छाई रहे।
  • पेट के निचले हिस्से में लगातार दर्द बना रहे।
  • अचानक बहुत जोर से टॉयलेट का प्रेशर बने, जिसे एक मिनट भी रोकना मुश्किल हो जाए।

निष्कर्ष

सीधी सी बात है, अल्सरेटिव कोलाइटिस सिर्फ खराब हाजमे की बीमारी नहीं है। यह आपकी कमजोर इम्यूनिटी, सुस्त हाजमे और बिगड़े हुए लाइफस्टाइल का नतीजा है। जहां मॉडर्न मेडिसिन स्टेरॉयड देकर सिर्फ सूजन को कुछ वक्त के लिए दबाती है, वहीं आयुर्वेद शरीर की बिगड़ी हुई वात-पित्त और कमजोर पाचक अग्नि को जड़ से ठीक करने पर काम करता है।

लंबे समय तक जंक फूड खाना, स्ट्रेस लेना और उल्टे-सीधे समय पर खाना आंतों को अंदर से एकदम छील देता है। इसलिए, सिर्फ गोलियां खाकर लक्षणों को मत दबाइए। अपनी डाइट सुधारिए, ठंडी तासीर वाली जड़ी-बूटियां अपनाइए और टेंशन फ्री रहिए यही आंतों को दोबारा नया जैसा बनाने का सबसे पक्का रास्ता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार सही खानपान और जीवनशैली के अनुशासन से इस स्थिति को लंबे समय तक शांत रखा जा सकता है। यह बीमारी जड़ से तभी खत्म मानी जाती है जब शरीर की पाचन अग्नि और दोष पूरी तरह संतुलित हो जाएं।

अल्सरेटिव कोलाइटिस के रोगियों को आमतौर पर दूध और उससे बने भारी उत्पादों से बचने की सलाह दी जाती है क्योंकि ये पचाने में कठिन होते हैं। दूध की जगह ताजी छाछ का सेवन आंतों के लिए अधिक फायदेमंद और सुपाच्य माना जाता है।

हल्का व्यायाम और योग शरीर में रक्त संचार बढ़ाते हैं और तनाव को कम करने में मदद करते हैं। हालांकि फ्लेयर अप या ब्लीडिंग के दौरान भारी व्यायाम से बचना चाहिए क्योंकि इससे शरीर की गर्मी और थकान बढ़ सकती है।

मिर्च मसालों के साथ-साथ बहुत ज्यादा खट्टे फल, कैफीन और शराब का सेवन भी आंतों की सूजन बढ़ा सकता है। कच्ची सब्जियां और सलाद के बजाय अच्छी तरह पकी हुई और नरम सब्जियां खाना आंतों के लिए सुरक्षित होता है।

 लंबे समय तक गंभीर सूजन रहने से जोड़ों में दर्द, आंखों में जलन या त्वचा पर चकत्ते जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। आयुर्वेद इसे शरीर में बढ़ी हुई अत्यधिक पित्त ऊर्जा का अन्य अंगों में फैलना मानता है।

रात का भोजन भारी या देर से करने से पाचन अग्नि मंद हो जाती है और शरीर में विषाक्त तत्व जमा होने लगते हैं। रात का खाना हल्का होना चाहिए और सोने से कम से कम तीन घंटे पहले कर लेना चाहिए।

प्राकृतिक रूप से ठंडी तासीर वाली चीजें जैसे नारियल पानी फायदेमंद हैं लेकिन बर्फ वाली या बहुत ठंडी चीजों से बचना चाहिए। अत्यधिक ठंडी चीजें पाचन अग्नि को कमजोर कर सकती हैं, जिससे भोजन का सही पाचन नहीं हो पाता।

क्रोध और अत्यधिक चिंता शरीर में पित्त दोष को बढ़ाते हैं जो सीधे आंतों की सूजन को ट्रिगर कर सकते हैं। मानसिक शांति के लिए प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास लक्षणों को नियंत्रित करने में बहुत सहायक होता है।

जब आंतें पोषक तत्वों को सोखना बंद कर देती हैं तो शरीर की धातुओं का क्षय होने लगता है और वजन गिरने लगता है। पाचन में सुधार होने पर शरीर को पोषण मिलने लगता है और धीरे धीरे वजन सामान्य होने लगता है।

बिना विशेषज्ञ की सलाह के कड़ा उपवास रखने से वात दोष बढ़ सकता है और कमजोरी आ सकती है। शरीर की क्षमता के अनुसार हल्का भोजन लेना या तरल आहार पर रहना पाचन तंत्र को आराम देने के लिए बेहतर होता है।

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